पारदर्शिता की कमी के कारण टेंडर का पुनर्मूल्यांकन — पटना उच्च न्यायालय, 2024

Sakshi Bhatnagar

Reviewed by: Sakshi Bhatnagar

License Number: BR/2891A/2019

साक्षी भटनागर समविदा लॉ एसोसिएट्स में एक वकील हैं जो आपराधिक कानून में प्रथा करती हैं। वह पटना उच्च न्यायालय और अधीनस्थ अदालतों में आपराधिक कार्यवाही में क्लाइंट का प्रतिनिधित्व करती हैं, जमानत आवेदन, आपराधिक अपील, एनडीपीएस मामलों और सीमा शुल्क संबंधित मामलों को संभालती हैं। उनकी प्रैक्टिस बिहार में कई फोरम में आपराधिक रक्षा और मुकदमेबाजी पर केंद्रित है।

 

पटना उच्च न्यायालय ने एक सरकारी निविदा की जांच की, जिसमें एक बोलीदाता को पहले अयोग्य घोषित किया गया था, पर बाद में चुपचाप योग्य घोषित कर दिया गया। न्यायालय ने निविदा प्रक्रिया को मनमाना और पारदर्शिता से रहित पाया। न्यायालय ने उस बोलीदाता के पक्ष में जारी स्वीकृति-पत्र (Letter of Acceptance) को रद्द कर दिया। अब प्राधिकरण या तो निष्पक्ष तरीके से पुनः कार्य आवंटित कर सकता है या पुनः निविदा आमंत्रित कर सकता है।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला बिहार अर्बन इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट कॉर्पोरेशन लिमिटेड (BUIDCO) द्वारा जारी एक सार्वजनिक निविदा से उत्पन्न हुआ है। यह निविदा राज्य सरकार के नगर विकास एवं आवास विभाग के अंतर्गत बस क्यू शेल्टर (Bus Queue Shelters) से संबंधित राजस्व-सृजन परियोजना के लिए थी।

याचिकाकर्ता, एडम मीडिया एंड रिक्रिएशन प्राइवेट लिमिटेड, ने बोलीदाता के रूप में भाग लिया। प्रतिवादी संख्या 7, एम/एस मगध एडवरटाइजिंग ब्यूरो, और प्रतिवादी संख्या 8, पीआई सिस्टम प्रा. लि., भी बोलीदाता थे।

दिनांक 21.05.2024 को तकनीकी बोली मूल्यांकन समिति ने तकनीकी बोलियों पर विचार किया। परिशिष्ट-P6 के अनुसार केवल तीन बोलीदाताओं, जिनमें याचिकाकर्ता और प्रतिवादी संख्या 8 शामिल थे, को तकनीकी रूप से योग्य पाया गया। प्रतिवादी संख्या 7 को अनुभव के प्रमाणित भुगतान प्रमाणपत्र (certified payment certificate of experience) प्रस्तुत न करने के कारण अयोग्य कर दिया गया, जो रिक्वेस्ट फॉर प्रपोज़ल (RFP) के तहत एक अनिवार्य शर्त थी।

बाद में, प्रतिवादी संख्या 7 ने 25.05.2024 दिनांकित एक शिकायत BUIDCO को दी, जिसमें अपनी अयोग्यता पर पुनर्विचार करने का अनुरोध किया। 26.06.2024 को समिति फिर से बैठक में बैठी और उस शिकायत तथा आगे की जांच के आधार पर अपने पूर्व निर्णय को पलटते हुए प्रतिवादी संख्या 7 को तकनीकी रूप से योग्य मान लिया।

इसके बाद BUIDCO ने 05.07.2024 को प्रतिवादी संख्या 7 के पक्ष में स्वीकृति-पत्र (LOA) जारी किया। 25.07.2024 को प्रतिवादी संख्या 7 के साथ एक अनुबंध पर हस्ताक्षर किए गए। इस अवधि के दौरान याचिकाकर्ता को लगातार ई-मेल प्राप्त होते रहे और वह आधिकारिक वेबसाइट देखता रहा, जिस पर LOA जारी होने की तारीख के बाद भी निविदा की स्थिति “pending” ही प्रदर्शित होती रही।

प्रक्रिया में पारदर्शिता की कमी महसूस करते हुए याचिकाकर्ता ने सिविल रिट अधिकारिता प्रकरण संख्या 11068/2024 में पटना उच्च न्यायालय का दरवाज़ा खटखटाया। कार्यवाही के दौरान याचिकाकर्ता ने I.A. संख्या 02/2024 भी दायर की, जिसमें विशेष रूप से 05.07.2024 दिनांकित उस LOA को चुनौती दी गई, जो प्रतिवादी संख्या 7 के पक्ष में जारी किया गया था।

न्यायालय ने क्या जांचा और क्या निर्णय दिया

पटना उच्च न्यायालय ने, माननीय मुख्य न्यायाधीश तथा माननीय श्री न्यायाधीश पार्थ सारथी की सम्मिलित पीठ के माध्यम से, BUIDCO द्वारा अपनाई गई निविदा प्रक्रिया की बारीकी से जांच की।

याचिकाकर्ता की मुख्य शिकायत यह थी कि प्रतिवादी संख्या 7, जिसे एक आवश्यक तकनीकी शर्त पूरी न करने के कारण एक बार अयोग्य करार दिया गया था, उसे बाद में चुपचाप फिर से प्रतिस्पर्धा में शामिल कर लिया गया, और इस बारे में मूल रूप से योग्य बोलीदाताओं को सूचित नहीं किया गया। याचिकाकर्ता ने कहा कि यह सब अधिकारियों की मिलीभगत से और RFP के उल्लंघन में किया गया।

याचिकाकर्ता ने परिशिष्ट-P6, तकनीकी बोली मूल्यांकन समिति का 21.05.2024 दिनांकित निर्णय, पर भरोसा किया, जिसमें स्पष्ट रूप से प्रतिवादी संख्या 7 को अनुभव के प्रमाणित भुगतान प्रमाणपत्र न देने के कारण अयोग्य घोषित किया गया था। याचिकाकर्ता ने परिशिष्ट-P8, बिहार सरकार की वेबसाइट का प्रिंट-आउट भी प्रस्तुत किया, जिसमें 11.07.2024 को संबंधित निविदा की स्थिति “pending” दिखाई गई थी, जबकि 05.07.2024 को पहले ही LOA जारी हो चुका था।

आगे, याचिकाकर्ता ने ई-मेल (परिशिष्ट-P9) भी प्रस्तुत किए, जो 27.07.2024 तक प्राप्त हुए थे, जिनमें यह कहा गया था कि “evaluation cover-2 has been completed and the petitioner has qualified.” इन संचारों से यह संकेत मिला कि 25.07.2024 को प्रतिवादी संख्या 7 के साथ अनुबंध हस्ताक्षरित हो जाने के बाद भी प्रणाली याचिकाकर्ता को यह बताती रही कि उसकी बोली अभी भी प्रक्रिया में है और वह योग्य हो चुका है।

याचिकाकर्ता ने RFP की धारा 2.13.2 पर भी भरोसा किया, जो स्पष्ट रूप से कहती है कि बोली की नियत तिथि के बाद दी गई कोई भी परिवर्तन, संशोधन या अतिरिक्त जानकारी तब तक स्वीकार्य नहीं होगी जब तक प्राधिकरण द्वारा विशेष रूप से न मांगी गई हो। याचिकाकर्ता का तर्क था कि प्रतिवादी संख्या 7 को, बिना किसी औपचारिक मांग के, अयोग्य घोषित होने के बाद एक मौलिक त्रुटि को दूर करने की अनुमति दी गई, जो RFP के तहत स्वीकार्य नहीं था।

दूसरी ओर, BUIDCO के वरिष्ठ अधिवक्ता ने तर्क दिया कि प्रतिवादी संख्या 7 द्वारा कोई नया दस्तावेज़ प्रस्तुत नहीं किया गया। BUIDCO के अनुसार, प्रतिवादी संख्या 7 की शिकायत केवल पुनर्विचार का अनुरोध थी, जिसमें ऐसे स्पष्ट और पठनीय प्रतिलिपियां संलग्न थीं जो वास्तव में पहले से ही अपलोड की गई बोली का हिस्सा थीं।

BUIDCO ने परिशिष्ट R7/C के माध्यम से कहा कि फाइल में रखी हार्ड कॉपी अपठनीय थी, जिसने प्रारंभिक अयोग्यता का कारण बना। शिकायत के बाद परियोजना निदेशक ने ई-प्रोक्योरमेंट पोर्टल से सॉफ्ट कॉपी डाउनलोड की और उसे शिकायत के साथ संलग्न प्रमाणपत्रों से मिलान किया। परियोजना निदेशक ने यह भी दावा किया कि प्रमाणपत्र की प्रामाणिकता नियोक्ता, इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन लिमिटेड (IOCL), से सत्यापित की गई और उसे वास्तविक पाया गया। इसी आधार पर समिति ने 26.06.2024 को प्रतिवादी संख्या 7 को तकनीकी रूप से योग्य मानने का निर्णय लिया।

प्रतिवादी संख्या 7 के अधिवक्ता ने इस संस्करण का समर्थन किया और कहा कि सभी आवश्यक प्रमाणपत्र पहले से ही अपलोडेड निविदा में मौजूद थे, तथा आपत्ति ने केवल उसी बात को रेखांकित किया जो पहले से रिकॉर्ड पर थी। हार्ड कॉपी दोबारा दी गई, और सत्यापन के बाद प्रतिवादी संख्या 7 को सही रूप से योग्य माना गया।

BUIDCO और प्रतिवादी संख्या 7 दोनों ने यह भी तर्क दिया कि प्रतिवादी संख्या 7 की बोली, याचिकाकर्ता की तुलना में, काफी अधिक राशि उद्धृत करती थी, जो राजस्व सृजन के लिहाज से बेहतर थी। प्रतिवादी संख्या 8 ने यह प्रस्तुत किया कि यदि प्रतिवादी संख्या 7 की योग्यता रद्द की जाती है, तो स्वाभाविक रूप से निविदा दूसरे सबसे अधिक बोली लगाने वाले, अर्थात प्रतिवादी संख्या 8, को जानी चाहिए।

इन परस्पर विरोधी तर्कों का निर्णय करने से पहले न्यायालय ने सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय Tata Motors Limited बनाम The Brihan Mumbai Electric Supply & Transport Undertaking (BEST) एवं अन्य, 2023 LiveLaw (SC) 467, का संदर्भ लिया। उस निर्णय में न्यायालयों को वाणिज्यिक निविदाओं में हस्तक्षेप करते समय अत्यंत सावधानी बरतने की चेतावनी दी गई है, और कहा गया है कि केवल तभी हस्तक्षेप हो जब मनमानी, दुर्भावना, पक्षपात या स्पष्ट अविवेकशीलता दिखाई दे। न्यायालयों को प्राधिकरणों के तकनीकी या वाणिज्यिक विकल्पों का पुनर्मूल्यांकन नहीं करना चाहिए।

उस सावधानी को ध्यान में रखते हुए पटना उच्च न्यायालय ने इस मामले के तथ्यों का विश्लेषण किया।

प्रथम, न्यायालय ने नोट किया कि केवल तीन बोलीदाताओं, जिनमें याचिकाकर्ता और प्रतिवादी संख्या 8 शामिल थे, को 21.05.2024 को तकनीकी रूप से योग्य पाया गया था और प्रतिवादी संख्या 7 को अनुभव के प्रमाणित भुगतान प्रमाणपत्र न होने के कारण स्पष्ट रूप से अयोग्य ठहराया गया था।

द्वितीय, न्यायालय ने 26.06.2024 की कार्यवाही, परिशिष्ट R7/C, की जांच की। इसमें यह दर्ज था कि परियोजना निदेशक ने समिति को सूचित किया कि हार्ड कॉपी अपठनीय थी। प्रतिवादी संख्या 7 की शिकायत के बाद दस्तावेज़ को पुनः ई-प्रोक्योरमेंट पोर्टल से डाउनलोड किया गया, शिकायत के साथ संलग्न प्रमाणपत्र से उसका मिलान किया गया और उसकी प्रामाणिकता IOCL से सत्यापित की गई। इसी आधार पर समिति ने अपने पूर्व निर्णय को पलट दिया।

न्यायालय ने इस पूरे अभ्यास पर जोर देते हुए कहा कि यह सब “मूल रूप से योग्य तीन बोलीदाताओं की पीठ पीछे” किया गया। उन्हें कभी यह सूचित नहीं किया गया कि पहले अयोग्य ठहराया गया प्रतिद्वंद्वी फिर से दौड़ में शामिल कर दिया गया है। प्रति-शपथपत्र में स्वयं यह स्वीकार किया गया कि प्रारंभ में केवल तीन बोलीदाता ही योग्य पाए गए थे और प्रतिवादी संख्या 8 के विरुद्ध याचिकाकर्ता की आपत्ति खारिज की जा चुकी थी। किन्तु इस पर कोई स्पष्टीकरण नहीं दिया गया कि यदि प्रतिवादी संख्या 7 की निविदा में सभी आवश्यक प्रमाणपत्र मौजूद थे तो प्रथम मूल्यांकन के समय उनका समुचित परीक्षण क्यों नहीं हुआ।

इसके बाद न्यायालय ने 05.07.2024 को प्रतिवादी संख्या 7 के पक्ष में जारी LOA और 11.07.2024 की वेबसाइट प्रिंट-आउट को देखा, जिसमें निविदा की स्थिति “pending” दर्शाई गई थी। BUIDCO ने समझाया कि जब तक समझौता निष्पादित नहीं हो जाता, उच्चतम बोलीदाता द्वारा अनुबंध पर हस्ताक्षर से इनकार की स्थिति में, स्थिति “pending” ही दिखाई जाती है। परंतु 27.07.2024 के उन ई-मेल के साथ जब इसे देखा गया, जिनमें याचिकाकर्ता को “cover-2 evaluation” में योग्य बताया जा रहा था, तो न्यायालय को स्थिति संदिग्ध लगी।

BUIDCO ने एक अतिरिक्त प्रति-शपथपत्र के माध्यम से यह स्पष्ट करने की कोशिश की कि 28.06.2024 को, जब समिति की कार्यवाही अपलोड की गई, एक स्वतः उत्पन्न ई-मेल चला गया था। वह ई-मेल केवल यह बताता था कि याचिकाकर्ता की cover-1 (तकनीकी बोली) योग्य घोषित हो गई है, जिसका निर्णय 21.05.2024 को पहले ही हो चुका था। परंतु न्यायालय इस तथ्य से चिंतित रहा कि 28.06.2024 को प्रतिवादी संख्या 7 की पुनः योग्यता के बारे में पहले से योग्य बोलीदाताओं को कभी प्रत्यक्ष रूप से सूचित नहीं किया गया।

इसके बाद न्यायालय ने RFP की धारा 2.13.2 पर भरोसा किया, जो अंतिम तिथि के बाद किसी भी परिवर्तन या अतिरिक्त दस्तावेज़ को, प्राधिकरण द्वारा स्पष्ट रूप से मांग किए बिना, निषिद्ध करती है। न्यायालय ने माना कि यदि हार्ड कॉपी अपठनीय थी, तो प्राधिकरण का दायित्व था कि वह बोलीदाता से स्पष्टीकरण मांगे। यदि यह अयोग्यता से पहले नहीं किया गया, तो बाद में अयोग्य घोषित बोलीदाता द्वारा दिए गए दस्तावेज़ों पर निर्भर करना गंभीर संदेह उत्पन्न करता है।

न्यायालय ने प्रथम मूल्यांकन में संबंधित प्रमाणपत्रों पर ध्यान न जाने को निविदा दस्तावेज़ों की जांच में “पूर्ण शिथिलता” (absolute laxity) बताया। भले ही प्रमाणपत्र वास्तव में अपलोडेड दस्तावेज़ों में मौजूद रहे हों, एक बार अयोग्यता हो जाने के बाद, प्राधिकरण पर यह दायित्व था कि वह योग्य बोलीदाताओं को बुलाकर स्पष्ट रूप से सूचित करे कि पूर्व अयोग्यता को पलटा जा रहा है।

न्यायालय ने बल देकर कहा कि सार्वजनिक निविदा अत्यंत पारदर्शिता और निष्पक्षता के साथ संचालित की जानी चाहिए, विशेषकर जब यह प्रतिस्पर्धी हो और जहां वित्तीय बोलियां केवल तकनीकी योग्यता के बाद ही खोली जाती हैं। तकनीकी मूल्यांकन प्रवेश-द्वार (threshold) चरण है और इस स्तर पर किसी भी परिवर्तन को खुलकर और निष्पक्ष तरीके से सूचित किया जाना आवश्यक है।

न्यायालय ने यह पाया कि BUIDCO द्वारा, एक बार अयोग्य घोषित बोलीदाता से बाद में दस्तावेज़ स्वीकार करना और फिर यह कहना कि ये दस्तावेज़ पहले से ही रिकॉर्ड पर थे, “गंभीर और प्रत्यक्ष रूप से स्पष्ट त्रुटि” (gross and palpable infirmity) है। इसके साथ ही अन्य बोलीदाताओं को सूचना न देना और संदिग्ध ई-मेल श्रृंखला ने पूरी प्रक्रिया को मनमाना, अविवेकपूर्ण और अनुचित बना दिया।

न्यायालय ने इस दलील को अस्वीकार कर दिया कि प्रतिवादी संख्या 7 द्वारा अधिक वित्तीय उद्धरण देने से प्रक्रिया वैध हो जाती है। भले ही सरकार को अधिक राजस्व प्राप्त होने की संभावना हो, यह किसी भी मनमानी या पक्षपातपूर्ण प्रक्रिया को जायज़ नहीं ठहरा सकता। आगे, न्यायालय ने यह भी इंगित किया कि राजस्व-सृजन वाली निविदा में, यदि प्राधिकरण को उद्धृत राशि संतोषजनक न लगे, तो वह उन्हें स्वीकार न करने और नयी निविदा निकालने के लिए हमेशा स्वतंत्र है।

अंततः न्यायालय ने 05.07.2024 दिनांकित, प्रतिवादी संख्या 7 के पक्ष में जारी LOA में हस्तक्षेप किया। उसने I.A. संख्या 02/2024 को स्वीकार करते हुए उस LOA (जो आवेदन में मेमो संख्या 553 दिनांक 05.07.2025 के रूप में वर्णित है) को रद्द कर दिया।

हालांकि, न्यायालय ने जानबूझकर यह घोषणा नहीं की कि कार्य प्रतिवादी संख्या 8 को दिया जाए। उसने यह निर्णय BUIDCO पर छोड़ दिया, यह कहते हुए कि वित्तीय व्यवहार्यता और अन्य विचारों के आधार पर प्राधिकरण या तो किसी योग्य बोलीदाता को कार्य दे सकता है या पुनः निविदा आमंत्रित कर सकता है।

न्यायालय ने निर्देश दिया कि यदि पुनः निविदा निकाली जाती है, तो सभी बोलीदाता भाग ले सकेंगे, जब तक कि किसी को धोखाधड़ी, तथ्यों को छुपाने या झूठे बयान के कारण अयोग्य न ठहराया गया हो। इस प्रकार, निविदा प्रक्रिया को या तो पुनः किया जाना होगा या आगे इस प्रकार बढ़ाया जाना होगा कि वह सभी के प्रति पारदर्शी और निष्पक्ष हो।

यह निर्णय क्यों महत्वपूर्ण है

यह निर्णय बिहार में सरकारी निविदाओं में भाग लेने वाले सभी व्यक्तियों के लिए, विशेषकर BUIDCO और इसी तरह के निकायों द्वारा संचालित निविदाओं के संदर्भ में, महत्वपूर्ण है। यह स्पष्ट करता है कि एक बार किसी बोलीदाता को तकनीकी आधार पर अयोग्य कर दिए जाने के बाद, प्राधिकरण प्रतिस्पर्धी बोलीदाताओं को बिना सूचना दिए चुपचाप उस निर्णय को उलट नहीं सकता।

न्यायालय ने साफ कहा कि पारदर्शिता उतनी ही महत्वपूर्ण है जितना कि अधिक वित्तीय प्रस्ताव प्राप्त करना। प्राधिकरणों को अपनी निविदा की शर्तों, जैसे धारा 2.13.2, का कड़ाई से पालन करना होगा, जो अंतिम तिथि के बाद बोलीदाताओं द्वारा दस्तावेज़ जोड़ने या सुधारने पर रोक लगाती है, जब तक कि स्वयं प्राधिकरण स्पष्टीकरण न मांगे।

छोटे और मध्यम ठेकेदारों या विज्ञापनदाताओं के लिए यह फैसला यह भरोसा देता है कि जब निविदा प्रक्रिया मनमानी, अविवेकपूर्ण या पक्षपातपूर्ण प्रतीत होगी, तो पटना उच्च न्यायालय हस्तक्षेप करेगा। यह सरकारी निकायों को भी संकेत देता है कि आंतरिक “सुधार” या बोलियों पर “पुनर्विचार” पारदर्शी ढंग से और निविदा नियमों के अनुरूप ही किया जाना चाहिए।

कानूनी प्रश्न और उनके उत्तर

  • प्रश्न: क्या कोई बोलीदाता, जिसे एक आवश्यक तकनीकी शर्त पूरी न करने के कारण अयोग्य कर दिया गया हो, बाद में यह कहकर योग्य घोषित किया जा सकता है कि आवश्यक दस्तावेज़ पहले से ही रिकॉर्ड पर थे, जबकि अन्य योग्य बोलीदाताओं को इसकी सूचना न दी जाए?
    उत्तर: नहीं। न्यायालय ने माना कि इस प्रकार पूर्व अयोग्यता को अन्य बोलीदाताओं की पीठ पीछे और RFP की धारा 2.13.2 के विरुद्ध पलटना मनमाना, अविवेकपूर्ण और अनुचित है और इससे पूरी निविदा प्रक्रिया दूषित हो जाती है।
  • प्रश्न: क्या न्यायालयों को ऐसे वाणिज्यिक निविदा मामलों में हस्तक्षेप करना चाहिए, जहां प्राधिकरण का दावा हो कि चुनौती दिए गए निर्णय से उसे अधिक राजस्व प्राप्त होगा?
    उत्तर: हाँ, पर केवल वहीं, जहां मनमानी, दुर्भावना, पक्षपात या अविवेकशीलता प्रदर्शित हो। इस मामले में न्यायालय ने गंभीर प्रक्रियात्मक त्रुटियां पाई और प्राधिकरण के अधिक राजस्व के दावे के बावजूद LOA को रद्द कर दिया।
  • प्रश्न: जब निविदा प्रक्रिया को दूषित पाया जाए, तो उचित उपाय क्या है?
    उत्तर: न्यायालय ने प्रतिवादी संख्या 7 के पक्ष में जारी LOA को रद्द कर दिया और BUIDCO पर छोड़ दिया कि वह या तो विधिसम्मत ढंग से पुनः विचार कर निविदा आवंटित करे या पुनः निविदा आमंत्रित करे, जिसमें सभी गैर-अयोग्य बोलीदाताओं को भाग लेने की अनुमति हो।

न्यायालय द्वारा उद्धृत मामले

  • Tata Motors Limited बनाम The Brihan Mumbai Electric Supply & Transport Undertaking (BEST) एवं अन्य, 2023 LiveLaw (SC) 467.

मामले का संक्षिप्त विवरण

प्रकरण संख्या: Civil Writ Jurisdiction Case No. 11068 of 2024

मामले का शीर्षक: Adam Media and Recreation Private Limited बनाम The State of Bihar & Others

न्याय-विवरण (Citation): 2024 (4) PLJR 326

न्यायालय: उच्च न्यायालय, पटना

पीठ (Coram): माननीय मुख्य न्यायाधीश के. विनोद चंद्रन एवं माननीय श्री न्यायाधीश पार्थ सारथी

निर्णय की तिथि: 17.09.2024

अधिवक्ता:

  • याचिकाकर्ता की ओर से: श्री अविनाश शेखर, अधिवक्ता
  • राज्य एवं BUIDCO (औपचारिक प्रतिवादी) की ओर से: श्री ललित किशोर, वरिष्ठ स्थायी परामर्शदाता; श्री आर.के. प्रयदर्शी, अधिवक्ता; श्री सिद्धार्थ प्रसाद, अधिवक्ता; श्री आयुष कुमार, अधिवक्ता; श्री कनिष्क शंकर, अधिवक्ता
  • प्रतिवादी संख्या 7 की ओर से: श्री सिद्धार्थ प्रसाद, अधिवक्ता
  • प्रतिवादी संख्या 8 की ओर से: श्रीमती कल्पना, अधिवक्ता (जैसा कि निर्णय में दर्ज है)

वाद का स्वरूप: सार्वजनिक खरीद प्रक्रिया में निविदा मूल्यांकन और स्वीकृति-पत्र (Letter of Acceptance) को चुनौती देते हुए सिविल रिट अधिकारिता के तहत दायर रिट याचिका।

पूर्ण निर्णय का लिंक: पटना उच्च न्यायालय का पूर्ण निर्णय पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें


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