मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला बिहार के किशनगंज में एक दर्जी और कपड़े की दुकान के मालिक के बीच विवाद से उत्पन्न हुआ। शिकायतकर्ता दर्जी की मां हैं, जिनके बारे में कहा गया है कि उनका बेटा नेमचंद रोड पर फुटपाथ पर सिलाई की दुकान चला रहा है।
शिकायत के अनुसार, दर्जी के पहले से याचिकाकर्ता की कपड़े की दुकान के साथ व्यवसायिक व्यवहार थे। कथित तौर पर 4,000/- रुपये बकाया थे। 22.02.2025 को, कुछ सिलाई का काम पूरा करने के बाद, भुगतान और हिसाब-किताब के निपटान को लेकर कथित तौर पर विवाद हो गया।
शाम को, कहा जाता है कि याचिकाकर्ता ने शिकायतकर्ता के बेटे को गाली-गलौज की। बाद में, अपनी दुकान पर, याचिकाकर्ता ने कथित तौर पर “गलत गणना” के आधार पर 5,000/- रुपये की नई मांग उठाई। जब दर्जी ने विरोध किया, तो याचिकाकर्ता पर आरोप है कि उसने अपने कर्मचारियों को उसे मारने के लिए उकसाया।
शिकायत में आगे कहा गया है कि याचिकाकर्ता ने Raymonds Showroom के मालिक और एक पार्षद, मनीष जालान को बुलाया। वे कथित तौर पर कई कर्मचारियों के साथ आए और शिकायतकर्ता के बेटे की पिटाई की, जिससे उसे चोटें आईं। एक शुभचिंतक, बिपुल अग्रवाल, जिसने बीच-बचाव की कोशिश की, उसे भी कथित तौर पर मारा-पीटा गया।
बताया गया कि शिकायतकर्ता का बेटा किसी तरह वहाँ से बचकर निकला और किशनगंज अस्पताल में इलाज कराया। भयवश, शिकायतकर्ता उसी दिन पुलिस के पास नहीं गईं। 23.02.2025 को, उन्होंने लिखित शिकायत दर्ज कराई और वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों को ईमेल भी किया। उनका आरोप है कि उनकी शिकायत पर कोई कार्रवाई नहीं की गई।
बाद में, उन्होंने न्यायिक दंडाधिकारी प्रथम श्रेणी-सह-मुनस्यफ न्यायाधीश (कनिष्ठ प्रभाग)-II, किशनगंज के समक्ष शिकायत मामला संख्या 130C/2025 (लाडली खातून बनाम मनोज दुगर एवं अन्य) दायर किया। 27.08.2025 को मजिस्ट्रेट ने संज्ञान लेते हुए भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 126(2), 115(2), 318(4), 352 सहपठित धारा 3(5) के अंतर्गत याचिकाकर्ता के विरुद्ध समन आदेश पारित किया।
इस बीच, याचिकाकर्ता पहले ही भारतीय न्याय संहिता की विभिन्न धाराओं के अंतर्गत शिकायतकर्ता के विरुद्ध किशनगंज थाना मामला संख्या 99/2025 दर्ज करा चुके थे। 21.07.2025 को उन्होंने मजिस्ट्रेट के समक्ष एक आवेदन दायर कर इस पूर्व लंबित पुलिस मामले की जानकारी दी और उसके समर्थन में सामग्री भी प्रस्तुत की।
27.08.2025 के समन आदेश से स्वयं को आहत महसूस करते हुए, याचिकाकर्ता ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) की धारा 528 के तहत पटना उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया और आदेश तथा शिकायत मामला संख्या 130C/2025 की समस्त कार्यवाही को रद्द करने की मांग की।
न्यायालय ने क्या परखा और क्या निर्णय दिया
पटना उच्च न्यायालय ने माननीय श्री न्यायमूर्ति पुर्नेंदु सिंह के समक्ष, याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता और राज्य बिहार की ओर से माननीय अपर लोक अभियोजक (APP) की दलीलें सुनीं।
याचिकाकर्ता की ओर से यह दलील दी गई कि शिकायत में लगाए गए आरोप झूठे और मनगढ़ंत हैं। उनके अनुसार, शिकायत केवल उन्हें परेशान करने और उनके द्वारा दर्ज पहले की प्राथमिकी, किशनगंज थाना मामला संख्या 99/2025, का जवाबी वार करने के लिए दायर की गई है। उन्होंने 21.07.2025 के आवेदन और मजिस्ट्रेट के समक्ष रखी गई सामग्री पर भी भरोसा किया, यह दिखाने के लिए कि पहले से एक पुलिस मामला लंबित था और मजिस्ट्रेट ने उनकी प्रस्तुतियों पर विचार नहीं किया।
दूसरी ओर, राज्य की ओर से उपस्थित माननीय APP ने मजिस्ट्रेट के आदेश का समर्थन किया। उनका तर्क था कि शिकायत मामला संख्या 130C/2025 में 27.08.2025 को पारित संज्ञान आदेश में कोई त्रुटि नहीं है और इसलिए उच्च न्यायालय के हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है।
इसके बाद उच्च न्यायालय ने 01.07.2024 से लागू हुए नए आपराधिक कानूनों के विधिक ढांचे पर ध्यान केंद्रित किया। अदालत ने उल्लेख किया कि भारतीय न्याय संहिता, 2023 (BNS), भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) और भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023 ने क्रमशः भारतीय दंड संहिता, दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) और भारतीय साक्ष्य अधिनियम का स्थान ले लिया है।
अदालत ने समझाया कि पुरानी CrPC के तहत, यदि पुलिस FIR दर्ज करने से इनकार कर दे, तो व्यक्ति मजिस्ट्रेट के पास धारा 190 CrPC के तहत जा सकता था और धारा 156(1) के अंतर्गत पुलिस जांच का निर्देश मांग सकता था। यदि मजिस्ट्रेट को केवल शिकायत पुलिस को भेजना अनुचित लगता, लेकिन फिर भी उसे यह प्रतीत होता कि संज्ञेय अपराध बनता है, तो वह धारा 200 CrPC के तहत आगे बढ़ता।
धारा 200 CrPC के तहत, मजिस्ट्रेट को संज्ञान लेने से पहले शिकायतकर्ता और गवाहों के बयान शपथ पर दर्ज करने होते थे। उस स्तर पर आरोपी को कार्यवाही में भाग लेने का कोई अधिकार नहीं था। केवल तब, जब मजिस्ट्रेट को पर्याप्त आधार दिखाई देते और वह धारा 204 CrPC के तहत समन जारी करता, आरोपी को उपस्थित होकर प्रतिवाद करने का अधिकार मिलता था।
अदालत ने सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय Chandra Deo Singh बनाम Prokash Chandra Bose एवं अन्य, 1963 SCC OnLine SC 4 का हवाला दिया। वहाँ सर्वोच्च न्यायालय ने निर्णय दिया था कि धारा 200 के चरण में, क्योंकि प्रश्न यह होता है कि क्या आरोपी को बिल्कुल बुलाया ही जाए या नहीं, इसलिए आरोपी को कार्यवाही में भाग लेने का कोई अधिकार नहीं है और मजिस्ट्रेट उसे ऐसा करने की अनुमति नहीं दे सकता। मजिस्ट्रेट केवल शिकायत और शिकायतकर्ता व उसके गवाहों के शपथ-पत्र बयान ही देख सकता है।
पटना उच्च न्यायालय ने आगे A.R. Antulay बनाम Ramdas Sriniwas Nayak, 1984 2 SCC 500 निर्णय का संदर्भ दिया, जिसमें सर्वोच्च न्यायालय ने निजी शिकायत मामलों में अपनाई जाने वाली प्रक्रिया का वर्णन किया था। यह स्पष्ट किया गया कि जब निजी शिकायत दायर होती है, तो शिकायतकर्ता का शपथ-पत्र पर परीक्षण किया जाना आवश्यक है (सिवाय इसके कि शिकायतकर्ता लोक सेवक हो)। शिकायतकर्ता और किसी भी गवाह के परीक्षण के बाद, न्यायालय न्यायिक रूप से यह तय करता है कि समन जारी करने के लिए कोई मामला बनता है या नहीं। समन जारी करना, संज्ञान लेना और आरोपी को उपस्थित होने के लिए बुलाना है।
पटना उच्च न्यायालय ने यह भी उल्लेख किया कि हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय ने Sarla Gupta बनाम Directorate of Enforcement, 2025 INSC 645 में भी, CrPC की धाराओं 200 से 204 की व्याख्या करते हुए, इसी प्रकार का दृष्टिकोण अपनाया है।
इसके बाद उच्च न्यायालय ने इस मामले में BNSS की धारा 528 के तहत उठे संक्षिप्त प्रश्न पर विचार किया: क्या धारा 223(1) BNSS के तहत जारी नोटिस के अनुपालन में याचिकाकर्ता द्वारा दायर आवेदन पर मजिस्ट्रेट के लिए विचार करना आवश्यक था?
धारा 223 BNSS, जिसने धारा 200 CrPC का स्थान लिया है, को निर्णय में पुनरुत्पादित किया गया। इसमें कहा गया है कि जिस मजिस्ट्रेट को शिकायत पर संज्ञान लेना हो, वह शिकायतकर्ता और गवाहों के बयान शपथ पर दर्ज करेगा। महत्वपूर्ण रूप से, प्रथम उपबंध यह कहता है कि “कोई भी मजिस्ट्रेट, आरोपी को सुने बिना किसी अपराध का संज्ञान नहीं लेगा।”
अदालत ने रेखांकित किया कि यह पुराने कानून से एक बड़ा बदलाव है। धारा 200 CrPC के अंतर्गत, प्रक्रिया जारी होने से पहले आरोपी की कोई भूमिका नहीं थी। जबकि धारा 223(1) BNSS के तहत, अब आरोपी को प्रारंभिक चरण में, संज्ञान लेने से पहले ही, सुने जाने का अवसर देना अनिवार्य है।
अदालत ने समझाया कि धारा 223 BNSS, पुरानी धारा 200 की संरचना पर आधारित है, लेकिन इसमें आरोपी के लिए नई सुरक्षा-व्यवस्थाएँ जोड़ी गई हैं। जबकि अब भी संज्ञान लेने से पहले शिकायतकर्ता और गवाहों के परीक्षण की अनिवार्यता है, इसके साथ-साथ अब यह स्पष्ट रूप से इस बात पर ज़ोर देता है कि संज्ञान लेने या न लेने के निर्णय से पहले मजिस्ट्रेट को आरोपी को सुनना होगा।
अदालत ने इसके बाद सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय D. Lakshminarayana Reddy बनाम V. Narayana Reddy, AIR 1976 SC 1672 का संदर्भ दिया, जिसमें “संज्ञान लेने” के अर्थ की व्याख्या की गई थी। जब कोई मजिस्ट्रेट शिकायत प्राप्त कर धारा 200 और उसके अनुवर्ती प्रावधानों (जो अब धारा 210 BNSS और BNSS के अध्याय XVI के अनुरूप हैं) के तहत आगे बढ़ने के लिए अपना मस्तिष्क लगाता है, तो कहा जाता है कि उसने संज्ञान ले लिया है। यदि वह केवल धारा 156(3) के तहत जांच का आदेश देता है या तलाशी वारंट जारी करता है, तो उसे संज्ञान लेना नहीं कहा जाएगा।
इस पृष्ठभूमि में, पटना उच्च न्यायालय ने शिकायत मामला संख्या 130C/2025 में मजिस्ट्रेट की कार्यवाही की पड़ताल की। अदालत ने पाया कि मजिस्ट्रेट ने 27.08.2025 का समन आदेश “अत्यंत यांत्रिक ढंग से” पारित किया, और धारा 223 तथा 210 BNSS के तहत अपेक्षित अधिकार-प्रयोग नहीं किया।
अभिलेख से यह स्पष्ट हुआ कि याचिकाकर्ता ने 21.07.2025 दिनांकित आवेदन मजिस्ट्रेट के समक्ष दाखिल किया था। उस आवेदन में उन्होंने न्यायालय को सूचित किया था कि वर्तमान शिकायत से पूर्व वह शिकायतकर्ता के विरुद्ध BNS की विभिन्न धाराओं के तहत किशनगंज थाना मामला संख्या 99/2025 दर्ज करा चुके हैं तथा उसके समर्थन में कुछ सामग्री भी प्रस्तुत की थी।
उच्च न्यायालय ने नोट किया कि मजिस्ट्रेट के आदेश में याचिकाकर्ता द्वारा प्रस्तुत की गई उन सामग्रियों का कोई उल्लेख नहीं है। ऐसा कोई संकेत नहीं मिला कि मजिस्ट्रेट ने याचिकाकर्ता के आवेदन पर विचार किया हो या धारा 223(1) BNSS के तहत अपेक्षित रूप से उसे सार्थक सुनवाई दी हो।
उच्च न्यायालय के मत में, BNSS की प्रक्रिया, विशेषकर संज्ञान से पूर्व आरोपी को सुनवाई का अनिवार्य अवसर देने के प्रावधान का पालन न करना, समन आदेश को अस्थिर और असंवहनीय बना देता है।
तदनुसार, पटना उच्च न्यायालय ने शिकायत मामला संख्या 130C/2025 में 27.08.2025 को पारित आदेश को रद्द (क्वैश) और निरस्त कर दिया। अदालत ने सावधानीपूर्वक यह भी स्पष्ट किया कि उसने शिकायत के गुण-दोष या उसकी सामग्री की मेरिट पर कोई विचार नहीं किया है। उसने स्वयं को केवल प्रक्रियागत अनियमितता तक सीमित रखा और उसी आधार पर क्वैशिंग आवेदन का निपटारा किया।
यह निर्णय क्यों महत्वपूर्ण है
यह निर्णय उन सभी व्यक्तियों के लिए महत्वपूर्ण है जो नए BNSS ढांचे के अंतर्गत निजी आपराधिक शिकायतों का सामना कर रहे हैं, विशेषकर बिहार में।
पटना उच्च न्यायालय ने स्पष्ट कर दिया है कि धारा 223(1) BNSS के अनुसार, मजिस्ट्रेट शिकायत पर संज्ञान लेकर आरोपी को तलब नहीं कर सकता, जब तक कि पहले आरोपी को सुने जाने का अवसर न दे दिया जाए। यह एक नया अधिकार है जो पुरानी CrPC के तहत उपलब्ध नहीं था।
आरोपी व्यक्तियों के लिए इसका अर्थ यह है कि वे अब प्रारंभिक स्तर पर ही, न्यायालय द्वारा औपचारिक रूप से आपराधिक कार्यवाही शुरू करने का निर्णय लेने से पहले, अपना पक्ष रख सकते हैं। शिकायतकर्ताओं के लिए इसका मतलब है कि उन्हें यह समझकर तैयार रहना होगा कि जिन व्यक्तियों के विरुद्ध वे आरोप लगा रहे हैं, उन्हें संज्ञान लेने से पहले ही अपनी बात कहने या सामग्री प्रस्तुत करने का अवसर मिलेगा।
यह निर्णय मजिस्ट्रेटों को भी चेतावनी देता है कि उन्हें BNSS के नए प्रावधानों का सावधानी से पालन करना होगा और वे यांत्रिक ढंग से कार्य नहीं कर सकते। यदि वे पूर्व-संज्ञान चरण में प्रस्तावित आरोपी द्वारा दायर आवेदन या सामग्री की अनदेखी करते हैं, तो उनके आदेश निरस्त किए जा सकते हैं।
कानूनी प्रश्न और उनके उत्तर
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प्रश्न: क्या BNSS की धारा 223(1) के तहत, मजिस्ट्रेट के लिए यह आवश्यक था कि वह निजी शिकायत पर संज्ञान लेने से पूर्व आरोपी को सुने जाने का अवसर दे और उसके आवेदन पर विचार करे?
उत्तर: हाँ। उच्च न्यायालय ने माना कि धारा 223(1) BNSS प्रारंभिक स्तर पर आरोपी को सुनवाई का अवसर प्रदान करना अनिवार्य बनाती है और पाया कि मजिस्ट्रेट ने इस आवश्यकता का पालन नहीं किया। -
प्रश्न: क्या शिकायत मामला संख्या 130C/2025 में याचिकाकर्ता के आवेदन और प्रस्तुत सामग्रियों का उल्लेख किए बिना 27.08.2025 को पारित समन आदेश वैध और टिकाऊ था?
उत्तर: नहीं। उच्च न्यायालय ने माना कि मजिस्ट्रेट ने यांत्रिक ढंग से कार्य किया और BNSS की धाराओं 223 तथा 210 के तहत अपेक्षित तरीके से अपना अधिकार-प्रयोग नहीं किया, इसलिए समन आदेश को रद्द कर दिया गया।
अदालत द्वारा उद्धृत मामले
- Chandra Deo Singh बनाम Prokash Chandra Bose एवं अन्य, 1963 SCC OnLine SC 4.
- A.R. Antulay बनाम Ramdas Sriniwas Nayak, 1984 2 SCC 500.
- Sarla Gupta बनाम Directorate of Enforcement, 2025 INSC 645.
- D. Lakshminarayana Reddy बनाम V. Narayana Reddy, AIR 1976 SC 1672.
मामले का विवरण
मामला संख्या: आपराधिक मिसलेनियस संख्या 79857/2025; उद्गत शिकायत मामला संख्या 130C/2025; थाना मामला संख्या 130/2025, किशनगंज।
मामले का शीर्षक: मनोज कुमार दुगर बनाम द स्टेट ऑफ बिहार एवं अन्य।
पीठ: माननीय श्री न्यायमूर्ति पुर्नेंदु सिंह।
निर्णय दिनांक: 15.12.2025।
उद्धरण: 2026(1) PLJR 525।
पक्षकारों के अधिवक्ता: याचिकाकर्ता के लिए श्री रवी रंजन, अधिवक्ता; राज्य/विपक्षी पक्ष के लिए श्री अजीत कुमार, APP।
मामले का स्वरूप: भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 528 के तहत याचिका, जिसमें समन आदेश तथा निजी शिकायत मामले में उससे उत्पन्न कार्यवाही को निरस्त करने की मांग की गई।
निर्णय की लिंक: पटना उच्च न्यायालय के आधिकारिक निर्णय को देखें
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