थैलेसीमिया से पीड़ित बच्चों को रक्त उपलब्ध कराने के राज्य के कर्तव्य की स्पष्ट व्याख्या — पटना उच्च न्यायालय, 2021

Shipra Sinha

Reviewed by: Shipra Sinha

License Number: BR/1674/2021

Shipra Sinha is a lawyer at Samvida Law Associates practicing family law and civil disputes. She represents clients in matrimonial matters, inheritance disputes, property-related family conflicts, and civil litigation before the Patna High Court and subordinate courts. Her practice handles family law proceedings and civil matters for individuals and families across Bihar.

तीन जनहितप्रेरित याचिकाकर्ताओं ने बिहार में थैलेसीमिया से प्रभावित बच्चों की रक्त और इलाज के अभाव में हो रही मौतों के संबंध में पटना उच्च न्यायालय का रुख किया। न्यायालय ने यह मानते हुए कि ऐसे मरीजों के लिए रक्त सहित सभी सुविधाएँ उपलब्ध कराना राज्य का दायित्व है, यह भी कहा कि राज्य रक्त की अनुपलब्धता का बहाना नहीं कर सकता। न्यायालय ने विशेषज्ञ चिकित्सकीय समिति के गठन, सुविधाओं के सर्वेक्षण तथा प्रभावित परिवारों को क्षतिपूर्ति की अनुशंसा करने के निर्देश दिए। विस्तृत दिशा-निर्देशों के साथ यह रिट याचिका बिहार सरकार के प्रति निर्देश जारी करते हुए निपटाई गई।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला सिविल रिट याचिका के रूप में तीन ऐसे व्यक्तियों द्वारा दायर किया गया जो प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से थैलेसीमिया से पीड़ित व्यक्तियों से जुड़े हुए हैं। उन्होंने पटना उच्च न्यायालय का रुख करते हुए यह दावा किया कि बिहार में थैलेसीमिया मरीजों की स्थिति बेहद गंभीर हो चुकी है, विशेषकर COVID-19 महामारी की पृष्ठभूमि में।

याचिकाकर्ताओं के अनुसार, राज्य में थैलेसीमिया मरीजों के लिए रक्त तथा समुचित उपचार संबंधी व्यवस्थाओं की गंभीर कमी थी। उन्होंने राष्ट्रीय समाचार पत्रों और ऑनलाइन पोर्टलों में प्रकाशित विभिन्न रिपोर्टों पर भरोसा किया, जिनमें ऐसे मरीजों की दयनीय स्थिति का वर्णन किया गया था।

याचिकाकर्ताओं ने न्यायालय के समक्ष पूर्णिया और मुज़फ्फरपुर ज़िलों से थैलेसीमिया से पीड़ित कम उम्र के बच्चों से संबंधित सात विशिष्ट उदाहरण प्रस्तुत किए। इनमें से पाँच मामलों में, बच्चों की मृत्यु कथित तौर पर उचित दवाइयों और रक्त की अनुपलब्धता के कारण हो गई थी। दो बच्चे अभी भी इस बीमारी से लड़ रहे बताए गए। इन सभी घटनाओं में साझा शिकायत यह थी कि रक्त और आवश्यक उपकरण सहित बुनियादी चिकित्सीय संसाधन उपलब्ध नहीं थे, और रक्त की काला बाज़ारी के आरोप भी लगाए गए।

इसी पृष्ठभूमि में, रिट याचिका में न्यायालय से यह निवेदन किया गया कि वह थैलेसीमिया मरीजों के लिए रक्त और अन्य सुविधाओं की उपलब्धता सुनिश्चित करने के राज्य के दायित्व की जांच करे तथा उन बच्चों के परिवारों को क्षतिपूर्ति पर विचार करे जिनकी मृत्यु चिकित्सा सुविधाओं के अभाव में हुई।

न्यायालय ने क्या विचार किया और क्या निर्णय दिया

पटना उच्च न्यायालय ने माननीय मुख्य न्यायाधीश के माध्यम से सबसे पहले तीन प्रमुख प्रश्न निर्धारित किए। पहला, क्या राज्य पर थैलेसीमिया से ग्रसित दिव्यांग मरीजों को रक्त सहित सभी सुविधाएँ उपलब्ध कराने का दायित्व है। दूसरा, क्या रक्त की अनुपलब्धता के आधार पर रक्त देने से इनकार करना राज्य के लिए वैध बचाव हो सकता है। तीसरा, क्या राज्य पर ऐसे थैलेसीमिया मरीजों के परिवारों को क्षतिपूर्ति देने का दायित्व है जिनकी मृत्यु अपर्याप्त चिकित्सा सुविधाओं की अनुपलब्धता के कारण हुई।

इसके बाद न्यायालय ने थैलेसीमिया के बारे में याचिकाकर्ताओं द्वारा रखा गया विवरण अभिलेख पर दर्ज किया। न्यायालय ने नोट किया कि थैलेसीमिया एक वंशानुगत रक्त विकार है। इस अवस्था में शरीर पर्याप्त हीमोग्लोबिन का निर्माण नहीं करता, जो लाल रक्त कोशिकाओं में पाई जाने वाली वह प्रोटीन है जो ऑक्सीजन ले जाने के लिए उत्तरदायी होती है। हीमोग्लोबिन की कमी के कारण लाल रक्त कोशिकाएँ ठीक से कार्य नहीं कर पातीं और उनकी आयु कम होती है, जिसके परिणामस्वरूप परिसंचरण में स्वस्थ लाल रक्त कोशिकाओं की संख्या कम हो जाती है।

लाल रक्त कोशिकाएँ शरीर के सभी हिस्सों में ऑक्सीजन पहुँचाती हैं। जब पर्याप्त स्वस्थ लाल रक्त कोशिकाएँ नहीं होतीं तो शरीर की कोशिकाओं को पर्याप्त ऑक्सीजन नहीं मिलती। इससे व्यक्ति को थकान, कमजोरी या सांस फूलने जैसी स्थिति का सामना करना पड़ता है, जिसे एनीमिया कहा जाता है। न्यायालय ने रेखांकित किया कि थैलेसीमिया से पीड़ित लोगों में एनीमिया हल्का या गंभीर हो सकता है और गंभीर एनीमिया अंगों को क्षति पहुँचाकर मृत्यु का कारण बन सकता है।

न्यायालय ने यह भी अवलोकन किया कि थैलेसीमिया की रोकथाम बहुत कठिन है क्योंकि यह माता-पिता से जीन के माध्यम से बच्चों में चला जाता है। उपचार प्रायः विटामिन, बार-बार रक्त चढ़ाने और आयरन की अधिकता को कम करने वाली दवाओं पर आधारित होता है। एक महत्वपूर्ण उपकरण संबंधी आवश्यकता यह है कि ट्रांसफ्यूज़न (रक्त चढ़ाने) के दौरान ऐसे फ़िल्टरों का उपयोग किया जाए जो मरीज के शरीर में आयरन का स्तर स्वीकार्य सीमा से अधिक न बढ़ने दें। अतिरिक्त आयरन घातक आयरन विषाक्तता का कारण बन सकता है।

याचिकाकर्ताओं ने यह इंगित किया कि बिहार में मरीजों को गंभीर समस्याओं का सामना करना पड़ता है क्योंकि ये फ़िल्टर अक्सर अस्पतालों में उपलब्ध नहीं होते। इसके अतिरिक्त, महत्वपूर्ण दवाइयों की भी कमी है। वे न तो सरकारी अस्पतालों में मिलती हैं और न ही सामान्य दवा दुकानों पर, और कई बार केवल थैलेसीमिया सोसाइटीज़ के माध्यम से ही प्राप्त की जा सकती हैं।

न्यायालय ने दर्ज किया कि Desferal, जो थैलेसीमिया उपचार के लिए प्रयुक्त एक महंगी दवा है, और उसकी पम्प मशीन, अनिवार्य मानी जाती हैं। किंतु याचिकाकर्ताओं के अनुसार ये अस्पतालों में उपलब्ध नहीं हैं और यदि माता-पिता अपने बच्चों के लिए उपचार चाहते हैं तो उन्हें स्वयं इन्हें खरीदना पड़ता है।

याचिकाकर्ताओं ने ऐसे आँकड़े भी साझा किए जिनसे संकेत मिलता था कि भारत में थैलेसीमिया के बड़े अनुपात वाले मामले बिहार और उत्तर प्रदेश से आते हैं। थैलेसीमिया उपचार को भारत की 12वीं पंचवर्षीय योजना में स्थान दिया गया था और इस रोग को अधिकारों का संरक्षण अधिनियम, 2016 के अंतर्गत एक दिव्यांगता के रूप में मान्यता दी गई है।

समाधान के रूप में, याचिकाकर्ताओं ने सुझाव दिया कि राज्य को थैलेसीमिया डे केयर सेंटर स्थापित करने चाहिए ताकि बच्चों को बार-बार ट्रांसफ्यूज़न से होने वाली आयरन की अधिकता से बचाया जा सके। उन्होंने तंत्रगत उपायों के लिए न्यायालय के हस्तक्षेप की मांग की।

इसके प्रत्युत्तर में, बिहार राज्य ने अपने प्रतिवाद हलफनामे के माध्यम से वे कदम विस्तार से बताए जो उसके अनुसार उठाए गए थे। स्वास्थ्य विभाग ने कहा कि वह थैलेसीमिया मरीजों के लिए बुनियादी ढाँचे में सुधार के लिए कार्य कर रहा है। इन पहलों में समुदायों और स्कूलों में जागरूकता, शिक्षा और जाँच कार्यक्रम, हीमोग्लोबिनोपैथी की स्क्रीनिंग के लिए प्रयोगशालाओं की स्थापना, थैलेसीमिया से ग्रस्त बच्चों के जन्म को रोकने के लिए गर्भवती महिलाओं और उनके पतियों की जाँच, और मेडिकल कॉलेजों में पूर्व-प्रसव निदान केंद्रों की स्थापना शामिल थी।

सरकार ने यह भी stated किया कि वह National Health Mission के दिशा-निर्देशों का पालन कर रही है और “Integrated Centre for Hemoglobinopathies and Haemophilia” को डे केयर सेंटर के रूप में कई प्रमुख अस्पतालों में स्थापित करने की प्रक्रिया में है: PMCH, Patna; SKMCH, Muzaffarpur; JNMCH, Bhagalpur; ANMCH, Gaya; और Sadar Hospital, Purnea। PMCH और SKMCH के बारे में कहा गया कि वे पहले से ही कार्यशील हैं और पूर्णतः थैलेसीमिया, Haemophilia और Sickle Cell Anaemia के उपचार के लिए समर्पित हैं।

नियमित रक्त आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए, इन डे केयर सेंटरों पर संग्रहण केंद्र बनाए गए थे। विभिन्न रक्त बैंकों से एकत्रित रक्त को थैलेसीमिया मरीजों के लिए वहाँ संग्रहित किया जाएगा। राज्य ने एक वेबसाइट thalassemiaregistry.bihar.gov.in भी प्रारंभ की, जिस पर मरीज स्वयं पंजीकरण कर अपॉइंटमेंट ले सकते हैं।

न्यायालय ने आगे नोट किया कि बिहार में 38 ज़िले हैं, और राज्य के अनुसार थैलेसीमिया उपचार सुविधाएँ और रक्त बैंक, शिवहर और सुपौल को छोड़कर सभी ज़िलों में मौजूद थे। बिहार के सभी 98 रक्त बैंक थैलेसीमिया मरीजों को रक्त उपलब्ध करा रहे थे और 984 से अधिक मरीज पंजीकृत थे। क्रियान्वयन की निगरानी और सुधार के लिए नियमित ज़िला-स्तरीय बैठकें आयोजित किए जाने का भी दावा किया गया।

हालाँकि, संवैधानिक प्रावधानों और अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार साधनों की जांच करने के बाद न्यायालय ने राज्य के विधिक दायित्व को व्यापक दृष्टिकोण से देखा। उसने Universal Declaration of Human Rights, International Covenant on Economic, Social and Cultural Rights तथा UN Convention on the Rights of Persons with Disabilities का हवाला दिया। ये दस्तावेज़ सर्वोच्च संभव स्वास्थ्य मानक के अधिकार को मान्यता देते हैं और दिव्यांग व्यक्तियों के विरुद्ध भेदभाव को निषिद्ध करते हैं।

न्यायालय ने Supreme Court के निर्णय Vikash Kumar v. Union Public Service Commission का संदर्भ दिया, जिसमें दिव्यांग व्यक्तियों के लिए “reasonable accommodation” की व्याख्या की गई और यह रेखांकित किया गया कि राज्य पर यह सकारात्मक दायित्व है कि वह ऐसी परिस्थितियाँ बनाए जो दिव्यांग व्यक्तियों के समक्ष खड़ी बाधाओं को दूर करें।

Consumer Education & Research Centre v. Union of India और अन्य उन पूर्ववर्ती निर्णयों पर भरोसा करते हुए, जिनमें स्वास्थ्य के अधिकार को संविधान के अनुच्छेद 21 का हिस्सा माना गया, उच्च न्यायालय ने दोहराया कि सामाजिक न्याय और मानवीय गरिमा प्रभावी स्वास्थ्य सेवा तक पहुँच की माँग करते हैं।

इसके पश्चात न्यायालय ने Rights of Persons with Disabilities Act, 2016 की ओर रुख किया। इस अधिनियम के अंतर्गत थैलेसीमिया को रक्त विकार संबंधी दिव्यांगता के रूप में माना गया है और धारा 25 उचित सरकार और स्थानीय प्राधिकारियों पर दायित्व थोपती है। इनमें (सूचित आय सीमा के अधीन, विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों में) आस-पड़ोस में निःशुल्क स्वास्थ्य सेवाएँ प्रदान करना, अस्पतालों में अवरोध-मुक्त पहुँच, उपचार में प्राथमिकता, बच्चों की वार्षिक स्क्रीनिंग तथा अनिवार्य जीवनरक्षक चिकित्सा सुविधाएँ उपलब्ध कराना आदि उपाय शामिल हैं।

इन सभी बातों को एक साथ देखते हुए, न्यायालय ने निष्कर्ष निकाला कि Supreme Court ने स्पष्ट रूप से स्वास्थ्य के अधिकार को एक मौलिक अधिकार के रूप में स्थापित किया है और reasonable accommodation के व्यापक दायरे को स्पष्ट किया है। थैलेसीमिया मरीजों के संदर्भ में, reasonable accommodation में उनके जीवन और स्वतंत्रता के अनुच्छेद 21 के अधिकार की रक्षा तथा UN Convention के अंतर्गत भारत की प्रतिबद्धताओं को निभाने हेतु सभी संभव दवाइयाँ, सुविधाएँ और देखभाल शामिल हैं।

न्यायालय ने यह माना कि ऐसी स्थिति में थैलेसीमिया मरीजों के उपचार के लिए रक्त, दवाइयों या अन्य किसी भी अनिवार्य सामग्री की अनुपलब्धता या कमी सरकार के लिए स्वीकार्य बचाव नहीं हो सकता। निर्णय में ज़ोर देकर कहा गया कि संसाधनों के अभाव में किसी एक भी दिव्यांग व्यक्ति की मृत्यु, अंतरराष्ट्रीय क़ानून के अंतर्गत राज्य के दायित्वों और संवैधानिक मूल्यों के प्रति गंभीर आघात है।

न्यायालय ने विशेष रूप से इस बात पर आश्चर्य और आघात व्यक्त किया कि राज्य ने उन पाँच नामित बच्चों के संबंध में पूर्ण चुप्पी साधी जिनकी मृत्यु हो चुकी थी। इसने नोट किया कि राज्य ने अपनी दलीलों में इन मौतों को स्वीकार तक नहीं किया। न्यायालय के मत में यह तथ्य इस बात की ओर संकेत करता है कि कल्याणकारी राज्य की सबसे महत्वपूर्ण जिम्मेदारियों में से एक — अपने नागरिकों के स्वास्थ्य के अधिकार को सुनिश्चित करना — निभाने में विफलता हुई है।

इस तर्क के आधार पर न्यायालय ने तीन प्रमुख निष्कर्ष घोषित किए। पहला, राज्य पर थैलेसीमिया मरीजों को रक्त सहित सभी सुविधाएँ उपलब्ध कराने का दायित्व है। दूसरा, रक्त की अनुपलब्धता की दलील पर रक्त देने से इनकार करना राज्य के लिए स्वीकार्य नहीं है। तीसरा, ऐसे मामलों में जहाँ केवल अपर्याप्त चिकित्सा सुविधाओं की अनुपलब्धता के कारण मरीज की मृत्यु हुई, राज्य पर उसके परिवार को क्षतिपूर्ति देने का दायित्व है।

इन निष्कर्षों को व्यवहार में लागू कराने के लिए न्यायालय ने स्वतंत्र डॉक्टरों की एक समिति गठित करने का निर्देश दिया। AIIMS Patna के वरिष्ठ विशेषज्ञों तथा एक निजी अस्पताल के परामर्शदाता हेमेटोलॉजिस्ट से मिलकर बनी इस समिति को दोहरा दायित्व सौंपा गया। पहला, थैलेसीमिया मरीजों के उपचार की सुविधा देने वाली सभी संस्थाओं का निरीक्षण कर उनकी तैयारी, उपलब्धता, पहुँचनीयता और देखभाल की गुणवत्ता का मूल्यांकन करना। दूसरा, याचिकाकर्ताओं द्वारा नामित पाँच नाबालिग मौतों के लिए उपयुक्त क्षतिपूर्ति का सुझाव देना।

समिति को आदेश दिया गया कि वह चार माह के भीतर अपनी रिपोर्ट बिहार सरकार के मुख्य सचिव को सौंपे। राज्य को समिति को सभी आवश्यक सहायता प्रदान करने का निर्देश दिया गया। इसके बाद मुख्य सचिव पर यह दायित्व डाला गया कि वह रिपोर्ट पर, जिसमें अनुशंसित क्षतिपूर्ति से संबंधित भाग भी शामिल है, आवश्यक कार्रवाई करे।

न्यायालय ने आगे राज्य को यह आदेश दिया कि वह थैलेसीमिया मरीजों और अन्य कमजोर वर्गों की स्वास्थ्य संबधी आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए सभी संभव कदम उठाए। मुज़फ्फरपुर के उन दो जीवित बच्चों के संदर्भ में, जिनका नाम याचिका में था, सरकार को निर्देश दिया गया कि वह एक अधिकारी नियुक्त करे जो उनके विवरण की पुष्टि कर, कानून के तहत उपलब्ध सभी सहायता प्रदान करे ताकि आगे और मौतें न हों।

निर्णय में यह भी सुझाव दिया गया कि सरकार प्रत्येक ज़िले में एक नोडल अधिकारी नियुक्त करने की संभावना का अन्वेषण करे, ताकि कमजोर वर्गों की जरूरतों का संज्ञान लेकर उनका समाधान किया जा सके। न्यायालय ने शिवहर और सुपौल में यथाशीघ्र रक्त बैंक स्थापित करने तथा पूरे बिहार में रक्त की समुचित उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए रचनात्मक कदम उठाने का निर्देश दिया।

एक मृत बच्चे के पिता के दूसरे बच्चे के संबंध में न्यायालय ने विशेष रूप से राज्य को यह निर्देश दिया कि वह निर्णय में उद्धृत वैधानिक प्रावधानों के अनुरूप उसकी समुचित देखभाल सुनिश्चित करे। अंततः, न्यायालय ने याचिकाकर्ताओं को यह स्वतंत्रता सुरक्षित रखते हुए कि आवश्यकता पड़ने पर वे पुनः न्यायालय का दरवाजा खटखटा सकते हैं, रिट याचिका और उससे संबद्ध सभी आवेदनों का इसी अनुसार निपटारा कर दिया।

यह निर्णय क्यों महत्वपूर्ण है

यह निर्णय इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह स्पष्ट रूप से राज्य से कहता है कि जब थैलेसीमिया से पीड़ित बच्चे उपचार के अभाव में मरते हैं तो रक्त या दवाओं की कमी कोई बहाना नहीं हो सकती। पटना उच्च न्यायालय ने सरल शब्दों में कहा है कि सरकार को सुविधाएँ और रक्त उपलब्ध कराना अनिवार्य है और जहाँ केवल सुविधाओं के अभाव के कारण मौत हुई है, वहाँ उसे क्षतिपूर्ति देनी होगी।

बिहार में थैलेसीमिया मरीजों के परिवारों के लिए यह फैसला नियमित रक्त चढ़ाने, आवश्यक दवाओं, फ़िल्टरों और समर्पित देखभाल केंद्रों की माँग के लिए मजबूत कानूनी आधार प्रदान करता है। यदि न्यायालय द्वारा दिए गए राज्यव्यापी सर्वेक्षण तथा ज़िला-स्तरीय सुधार संबंधी निर्देशों को सही ढंग से लागू किया जाए तो वे सैकड़ों बच्चों के रोज़मर्रा के उपचार में सीधा सुधार ला सकते हैं।

यह निर्णय यह भी पुष्ट करता है कि थैलेसीमिया से पीड़ित व्यक्ति, 2016 के अधिनियम के तहत दिव्यांग व्यक्तियों की श्रेणी में आते हैं और उन्हें विशेष संरक्षण और reasonable accommodation का अधिकार है। यह अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार दायित्वों को ठोस निर्देशों से जोड़ता है और यह स्पष्ट कर देता है कि कमजोर मरीजों के लिए स्वास्थ्य सेवाएँ दान नहीं, बल्कि कानूनी अधिकार हैं।

कानूनी प्रश्न और उनके उत्तर

  • प्रश्न: क्या राज्य पर थैलेसीमिया से ग्रसित दिव्यांग मरीजों को रक्त सहित सभी सुविधाएँ उपलब्ध कराने का दायित्व है?
    उत्तर: हाँ। न्यायालय ने माना कि थैलेसीमिया मरीजों को उनके मौलिक स्वास्थ्य और जीवन के अधिकार का उपभोग करने हेतु राज्य पर रक्त सहित सभी आवश्यक सुविधाएँ उपलब्ध कराने का दायित्व है।
  • प्रश्न: क्या राज्य थैलेसीमिया मरीजों को रक्त की अनुपलब्धता के आधार पर रक्त देने से इनकार कर सकता है?
    उत्तर: नहीं। न्यायालय ने निर्णय दिया कि रक्त की अनुपलब्धता या कमी राज्य के लिए उपलब्ध आधार नहीं है; इस आधार पर रक्त से इनकार करना अस्वीकार्य है।
  • प्रश्न: क्या अपर्याप्त चिकित्सा सुविधाओं की अनुपलब्धता के कारण मृत थैलेसीमिया मरीजों के परिवारों को क्षतिपूर्ति देने के लिए राज्य उत्तरदायी है?
    उत्तर: हाँ। न्यायालय ने माना कि जहाँ मृत्यु केवल पर्याप्त चिकित्सा सुविधाओं की अनुपलब्धता के कारण हुई, वहाँ राज्य पर क्षतिपूर्ति देना अनिवार्य है।

न्यायालय द्वारा उद्धृत मामले

  • Vikash Kumar v. Union Public Service Commission, (2021) 5 SCC 370
  • Consumer Education & Research Centre and others v. Union of India & Ors., (1995) 3 SCC 42
  • Paschim Banga Khet Mazdoor Samity v. State of West Bengal, (1996) 4 SCC 37
  • State of Punjab v. Mohinder Singh Chawla, (1997) 2 SCC 83
  • Union of India v. Moolchand Kharaiti Ram Trust, (2018) 8 SCC 32
  • National Legal Services Authority v. Union of India and Ors., (2014) 5 SCC 438
  • Ankit Abhishek v. State of Bihar, LPA 255 of 2020 (as referred by the Court)

मामले का विवरण

मामला संख्या: Civil Writ Jurisdiction Case No.10986 of 2021

मामले का शीर्षक: Amit Kumar Agarwal & Ors. v. The Union of India & Ors.

पीठ (Coram): Hon’ble the Chief Justice Sanjay Karol; Hon’ble Mr. Justice P. B. Bajanthri

उद्धरण (Citation): 2022(1) PLJR 29

याचिकाकर्ताओं के अधिवक्ता: Mr. Vishal Kumar Singh, Advocate; Mr. Deepak Kumar Singh, Advocate; Mr. Akash Keshav, Advocate; Ms. Akanksha Malviya, Advocate

प्रत्यर्थियों के अधिवक्ता: Dr. K. N. Singh, Additional Solicitor General; Mr. Kumar Priya Ranjan, Central Government Counsel; Mr. S. D. Yadav, AAG-9

मामले का स्वरूप: थैलेसीमिया मरीजों के स्वास्थ्य के अधिकार तथा उपचार और क्षतिपूर्ति उपलब्ध कराने के संबंध में राज्य के दायित्व से जुड़ी जनहित रिट याचिका

निर्णय की तिथि: 01-11-2021

निर्णय का लिंक: https://patnahighcourt.gov.in/viewjudgment/MTUjMTA5ODYjMjAyMSMxI04=-OfTVmFkasis=

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