खोयी हुई फाइल के बावजूद कॉलेज की स्थिति पर निर्णय लेने को कहा गया राज्य को — पटना उच्च न्यायालय, 2026

Shubham Shivansh

Reviewed by: Shubham Shivansh

License Number: D/7102/2022

शुभम शिवांश समविदा लॉ एसोसिएट्स में एक वकील हैं जो नागरिक विवाद, सेवा कानून और जीएसटी मामलों में प्रथा करते हैं। वह पटना उच्च न्यायालय और अन्य अधिकार क्षेत्रों में संपत्ति विवाद, अनुबंधात्मक असहमति, सेवा संबंधित शिकायतों और कर अनुपालन के मामलों में क्लाइंट का प्रतिनिधित्व करते हैं। उनकी प्रैक्टिस बिहार में व्यक्तियों और व्यवसायों के लिए नागरिक मुकदमेबाजी, रोजगार संबंधित विवाद और नियामक मामलों को संभालती है।

पटना के एक कॉलेज के शिक्षण व गैर-शिक्षण कर्मियों ने पटना उच्च न्यायालय से गुहार लगाई कि राज्य सरकार को निर्देश दिया जाए कि उनके कॉलेज को अंगीभूत इकाई घोषित किया जाए। न्यायालय ने माना कि केवल इस आधार पर कि मूल सरकारी फाइल गुम हो गई है, राज्य सरकार उनका दावा खारिज नहीं कर सकती। आवश्यकता होने पर अतिरिक्त मुख्य सचिव (शिक्षा) को अभिलेखों का पुनर्निर्माण करना होगा और मामला राज्य सरकार के समक्ष रखना होगा। कॉलेज को अंगीभूत दर्जा देने पर अंतिम निर्णय तीन माह के भीतर लिया जाना अनिवार्य है।

मामले की पृष्ठभूमि

यह रिट याचिका द्वारका नाथ कॉलेज, जट्टीचक, मसौढ़ी, जिला पटना के शिक्षण एवं गैर-शिक्षण कर्मचारियों द्वारा दायर की गई थी। यह कॉलेज मगध विश्वविद्यालय, बोधगया से संबद्ध था और विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा मान्यता प्राप्त था। बाद में पुनर्गठन के बाद, एक सरकारी अधिसूचना के माध्यम से यह कॉलेज पाटलिपुत्र विश्वविद्यालय के अधीन आ गया।

विवाद इस बात को लेकर है कि क्या इस कॉलेज को विश्वविद्यालय का अंगीभूत कॉलेज माना जाना चाहिए, जिसके साथ जुड़ी सभी वित्तीय व सेवा संबंधी सुविधाएँ मिलती हैं। याचिकाकर्ताओं के अनुसार, राज्य सरकार ने 1980 के दशक के अंतिम वर्षों में इसे यह दर्जा देने का निर्णय ले लिया था, परंतु औपचारिक अधिसूचना कभी जारी नहीं हुई।

वर्ष 1986–87 में राज्य सरकार ने 36 संबद्ध कॉलेजों को विभिन्न विश्वविद्यालयों के अधीन अंगीभूत कॉलेज में परिवर्तित करने का निर्णय लिया। इनके साथ ही पाँच अन्य कॉलेज, जिनमें द्वारका नाथ कॉलेज भी शामिल था, एक योजना के अंतर्गत लिए गए जिसे चतुर्थ चरण अंगीभूत कॉलेज (36+5 योजना) के नाम से जाना गया। इन पाँच में से चार कॉलेजों को वास्तव में अंगीभूत कॉलेज के रूप में अधिसूचित कर दिया गया। केवल इस कॉलेज को यह दर्जा नहीं मिला, क्योंकि बाद में राज्य की ओर से यह कहा गया कि इसकी मूल फाइल लापता हो गई।

वर्षों तक यह मुद्दा बिहार विधानमंडल में उठता रहा। 2006 में जब यह मामला विधान परिषद में उठाया गया, तो आश्वासन समिति (शिक्षा विभाग) ने कहा कि कॉलेज को अंगीभूत कॉलेज घोषित करने की अनुशंसा की जा चुकी है, लेकिन मामला अभी भी राज्य सरकार के समक्ष लंबित है।

मामला पुनः मुख्यमंत्री तक पहुँचा, जिन्होंने बिहार के महाधिवक्ता की राय मांगी। बताया गया कि महाधिवक्ता ने कॉलेज को अंगीभूत दर्जा देने के पक्ष में राय दी। मानव संसाधन विकास विभाग और शिक्षा विभाग ने भी इस मामले पर सकारात्मक विचार किया और आगे बढ़ने की स्वीकृति दी। इसके बाद फाइल वित्त विभाग के समक्ष रखी गई और कॉलेज को अंगीभूत इकाई के रूप में समर्थन देने के लिए वित्तीय विवरण तैयार किए गए।

इन सभी कदमों के बावजूद मामला अंतिम निर्णय के लिए कभी कैबिनेट तक नहीं पहुँच सका। जब 2013 में पुनः विधानसभा में यह मुद्दा उठाया गया, तो तत्कालीन शिक्षा मंत्री ने स्वीकार किया कि अनुशंसाएँ की जा चुकी हैं, मामला कैबिनेट के समक्ष लंबित है और कॉलेज को अपनी ओर से सुप्रीम कोर्ट के निर्देशानुसार S.L.P. No. 12591 of 2010 में गठित न्यायमूर्ति एस.सी. अग्रवाल आयोग के समक्ष अपना पक्ष रखना चाहिए।

अलग से, इसी कॉलेज के प्राचार्य ने पटना उच्च न्यायालय में C.W.J.C. No. 12106 of 2018 दायर किया। उस मामले में उन्होंने या तो कॉलेज को पाटलिपुत्र विश्वविद्यालय की अंगीभूत इकाई घोषित करने या deficit grant कॉलेज के रूप में राज्य लाभों के साथ मान्यता देने एवं कर्मचारियों के बकाया भुगतान की मांग की। 12.12.2024 को माननीय एकल न्यायाधीश ने उस रिट याचिका को गुण-दोष में न जाते हुए यह निर्देश देकर निपटा दिया कि प्राचार्य, शिक्षा विभाग के प्रधान सचिव के समक्ष एक विस्तृत प्रतिनिधित्व दाखिल करें।

न्यायालय ने क्या परखा और क्या निर्णय दिया

न्यायमूर्ति हरीश कुमार ने याचिकाकर्ताओं, बिहार राज्य और पाटलिपुत्र विश्वविद्यालय की ओर से दी गई दलीलों को सुना।

याचिकाकर्ताओं के अधिवक्ता ने विभिन्न सरकारी अभिलेखों व टिप्पणियों पर भरोसा किया, जिनसे यह प्रदर्शित हुआ कि 1987 में ही कॉलेज ने अंगीभूत दर्जा पाने की सभी शर्तें पूर्ण कर ली थीं। उनके अनुसार उस समय के मुख्यमंत्री ने यह स्वीकार कर लिया था कि यह कॉलेज और अन्य चार कॉलेज, तथा पहले से चिन्हित 36 कॉलेज सभी मानदंडों पर खरे उतरते हैं। आदेश भी पारित हुए, परंतु इस विशेष कॉलेज के लिए अधिसूचना इसलिए जारी नहीं हो सकी क्योंकि विभाग में इसकी मूल फाइल “traceless” हो गई।

याचिकाकर्ताओं ने यह रेखांकित किया कि अन्य चार तुलनात्मक रूप से समान स्थिति वाले कॉलेजों को 1987 में अंगीभूत दर्जा दे दिया गया, जबकि केवल उनके कॉलेज को गुमशुदा फाइल के कारण बाहर रखा गया। उनका तर्क था कि चतुर्थ चरण के अन्य कॉलेजों में नियुक्तियों संबंधी विवाद के सुप्रीम कोर्ट में लंबित रहने का इस कॉलेज से कोई संबंध नहीं था और उससे देरी को उचित नहीं ठहराया जा सकता।

उन्होंने यह भी बताया कि राज्य सरकार ने 06.12.1982 को विश्वविद्यालय की अनुशंसा के आधार पर कॉलेज को संबद्धता प्रदान की थी, अर्थात 09.12.1988 को लागू हुई राज्य की “वित्त रहित शिक्षा नीति” के लागू होने से पहले ही।

दूसरी ओर, राज्य की ओर से प्रतिवादी संख्या 2 व 3 ने एक प्रत्युत्तर हलफनामा दाखिल किया। उनका मुख्य आपत्ति यह थी कि रिट याचिका अत्यधिक देरी व लाचेस के कारण खारिज होनी चाहिए, क्योंकि जिन घटनाओं की शिकायत की गई है, वे 1980 के दशक की हैं।

राज्य ने स्वीकार किया कि पत्र संख्या 202 दिनांक 19.08.1986 द्वारा 36 संबद्ध कॉलेजों को अंगीभूत कॉलेज के रूप में अधिसूचित किया गया था। यह भी स्वीकार किया कि तत्पश्चात तत्कालीन मुख्यमंत्री ने चार और कॉलेजों को अंगीभूत बनाने की घोषणा की और 1987 में अधिसूचनाएँ जारी की गईं। राज्य ने कहा कि चतुर्थ चरण के इन कॉलेजों में शिक्षण व गैर-शिक्षण कर्मचारियों की नियुक्तियों की वैधता का प्रश्न सुप्रीम कोर्ट में Civil Appeal No. 6098 of 1997 [(2005) 9 SCC 129] में गया।

उस मामले के परिणामस्वरूप सुप्रीम कोर्ट ने न्यायमूर्ति एस.सी. अग्रवाल आयोग का गठन किया, जो उन नियुक्तियों की वैधता की जाँच हेतु था। आयोग ने विस्तृत प्रतिवेदन प्रस्तुत किया। उसके बाद कुछ प्रभावित व्यक्तियों ने उस प्रक्रिया के कुछ पहलुओं को S.L.P. No. 12591 of 2010 में चुनौती दी, जिसके चलते न्यायमूर्ति एस.बी. सिन्हा आयोग की नियुक्ति की गई, जिसने अपना प्रतिवेदन भी दे दिया। अनेक अवमानना याचिकाएँ एवं आगे की कार्यवाहियाँ चलीं और जिन व्यक्तियों के दावे एस.बी. सिन्हा आयोग ने निरस्त कर दिए, उनमें से एक और समूह पुनः सुप्रीम कोर्ट पहुँचा।

राज्य का तर्क था कि इन वादों के अभी भी लंबित रहने और लगभग 37 वर्ष बीत जाने के बाद अब कॉलेज को अंगीभूत इकाई घोषित करने का निर्णय लेना व्यावहारिक नहीं है, विशेषकर तब जब 40 कॉलेजों के वैध रूप से नियुक्त कर्मचारियों के समावेश का प्रश्न सुप्रीम कोर्ट के समक्ष विचाराधीन है।

राज्य ने आगे कहा कि वह यह स्पष्ट रूप से नहीं बता सकता कि इस कॉलेज के संबंध में अंतिम निर्णय क्यों नहीं लिया गया, क्योंकि सभी कॉलेजों की मूल फाइलें निगरानी विभाग द्वारा जब्त कर ली गई थीं। उसका तर्क था कि जब तक कोई औपचारिक आदेश जारी नहीं हो जाता, मुख्यमंत्री की घोषणा को बाध्यकारी नहीं माना जा सकता।

राज्य ने यह भी कहा कि बाद में मेमो संख्या 1846 दिनांक 21.11.2008 में निहित एक संकल्प द्वारा उसने वित्त रहित शिक्षा नीति को समाप्त कर दिया और यह नीति अपनाई कि संबद्ध कॉलेजों को छात्रों के परिणाम के आधार पर प्रदर्शन-आधारित अनुदान दिया जाएगा। द्वारका नाथ कॉलेज पहले से ही इस नीति के तहत प्रदर्शन-आधारित अनुदान प्राप्त कर रहा है।

पाटलिपुत्र विश्वविद्यालय के अधिवक्ता ने न्यायालय को अवगत कराया कि विश्वविद्यालय 18.03.2018 को अस्तित्व में आया। उसके बाद ही यह कॉलेज एक संबद्ध कॉलेज के रूप में इसके अधिकार क्षेत्र में आया। चूँकि रिट याचिका इससे पहले दायर की गई थी, पाटलिपुत्र विश्वविद्यालय ने आवश्यक रिकार्ड के लिए मगध विश्वविद्यालय से माँग की, परंतु वे अब तक प्राप्त नहीं हुए। विश्वविद्यालय का तर्क था कि किसी कॉलेज को अंगीभूत कॉलेज घोषित करना अंतत: एक नीतिगत प्रश्न है जो राज्य सरकार और संबंधित विभाग के विवेक पर निर्भर करता है।

सभी पक्षों को सुनने के बाद, न्यायालय ने पहले राज्य की देरी संबंधी आपत्ति पर विचार किया। उसने उपलब्ध अभिलेखों का परीक्षण करते हुए पाया कि कॉलेज को अंगीभूत दर्जा देने का मुद्दा सरकारी तंत्र के भीतर जीवित रहा है। यह विषय कम-से-कम 2013 तक विधानसभा में उठता रहा। उस अवसर पर शिक्षा मंत्री ने स्वीकार किया था कि कॉलेज को अंगीभूत दर्जा देने की अनुशंसा पहले से मौजूद है और मामला कैबिनेट के समक्ष लंबित है।

न्यायालय ने देखा कि रिट याचिका 2013 में ही उस समय दायर की गई जब प्रश्न विचाराधीन था। इसके अतिरिक्त, 2018 में कॉलेज के प्राचार्य ने अलग रिट दायर की, जिसका निपटारा दिसंबर 2024 में ही प्रधान सचिव, शिक्षा को निर्देश देकर किया गया। इन परिस्थितियों में न्यायालय ने माना कि याचिकाकर्ताओं के दावे को बासी या देरी से दायर कहकर खारिज नहीं किया जा सकता।

न्यायालय ने केंद्रीय विधिक प्रश्न इस रूप में निर्धारित किया: क्या केवल इस आधार पर कि मूल फाइल विभाग में खो गई है, किसी व्यक्ति को उसके अधिकार से वंचित किया जा सकता है?

तथ्यों पर न्यायालय ने नोट किया कि:

  • कॉलेज को 06.12.1982 को संबद्धता प्रदान की गई, जो “वित्त रहित शिक्षा नीति” 09.12.1988 से पहले की है।
  • कॉलेज ने 1987 में अन्य चार कॉलेजों के साथ-साथ सभी दृष्टि से अंगीभूत दर्जा पाने की पात्रता प्राप्त कर ली थी।
  • उन चार कॉलेजों के पक्ष में अधिसूचनाएँ जारी हुईं, परंतु इस कॉलेज के लिए नहीं, केवल इसलिए कि इसका अभिलेख खो गया था।

न्यायालय ने यह स्वीकार किया कि यह स्थापित सिद्धांत है कि किसी सरकारी फाइल पर आंतरिक टिप्पणियाँ स्वयं में बाध्यकारी कानूनी आदेश नहीं होतीं। इस संदर्भ में उसने सुप्रीम कोर्ट के फैसले State of Bihar & Ors. v. Kripalu Shanker, AIR 1987 SC 1554 पर भरोसा किया।

हालाँकि, न्यायालय ने इस पर बल दिया कि इस मामले की फाइल टिप्पणियों में स्पष्ट रूप से परिलक्षित होता है कि राज्य सरकार लगातार इस कॉलेज को अंगीभूत कॉलेज घोषित करने का इरादा रखती थी। मूल फाइल के गुम हो जाने के कारण औपचारिक अधिसूचना जारी नहीं हो सकी। ऐसी स्थिति में विभाग का कर्तव्य था कि वह फाइल का पुनर्निर्माण करे और निर्णय प्रक्रिया को आगे बढ़ाए, न कि मामले को अनिश्चितकालीन स्थिति में छोड़ दे।

न्यायालय ने कहा कि किसी फाइल के खो जाने से अपने-आप उस पर आधारित कानूनी अधिकार समाप्त नहीं हो जाते। नागरिकों या कर्मचारियों को प्रशासनिक चूकों के कारण, विशेषकर जब दोष राज्य का हो, कष्ट नहीं उठाना चाहिए। न्यायालय ने आगे माना कि जब “अनुदान व बाउंटी” बाँटने की बात आती है, तो राज्य भेदभावपूर्ण व्यवहार नहीं कर सकता और इस बात को रेखांकित करने के लिए सुप्रीम कोर्ट के निर्णय Ramana Dayaram Shetty v. International Airport Authority of India and Ors., 1979 AIR 1628 का हवाला दिया कि राज्य की कार्रवाई मनमानी रहित और समानतापूर्ण होनी चाहिए।

इन सभी तथ्यों के आलोक में न्यायालय ने निष्कर्ष निकाला कि राज्य सरकार पर कॉलेज को अंगीभूत दर्जा देने संबंधी अंतिम निर्णय लेने का दायित्व है। उसने रेखांकित किया कि किसी भी रूप में भेदभाव अस्वीकार्य है और विधि के शासन से संचालित एक कल्याणकारी राज्य के रूप में सरकार को विशेष रूप से तब समान रूप से कार्य करना होगा जब अन्य समान स्थिति वाले कॉलेजों को दशकों पहले ही अंगीभूत दर्जा दिया जा चुका है।

तद्नुसार, न्यायालय ने बिहार सरकार के शिक्षा विभाग के अतिरिक्त मुख्य सचिव को निर्देश जारी किया। उन्हें कॉलेज के संबंध में प्रासंगिक अभिलेख मँगाने होंगे। यदि अभिलेखों के पुनर्निर्माण की आवश्यकता हो, तो यह कार्यवाही की जानी चाहिए। सामग्री का परीक्षण करके और याचिकाकर्ताओं के दावे के संबंध में संतुष्ट होकर अतिरिक्त मुख्य सचिव को मामले को विधि सम्मत अंतिम निर्णय हेतु राज्य सरकार के समक्ष रखना होगा, यह ध्यान में रखते हुए कि याचिकाकर्ताओं का मामला उन चार अन्य कॉलेजों के साथ समानता (parity) पर आधारित है जिन्हें अंगीभूत दर्जा दिया गया था।

न्यायालय ने अपेक्षा की कि यह सम्पूर्ण कार्यवाही आदेश की प्राप्ति अथवा अधिकारियों के समक्ष प्रस्तुति की तिथि से तीन माह के भीतर पूरी कर ली जाएगी। इन निर्देशों के साथ रिट याचिका का निपटारा कर दिया गया।

यह निर्णय क्यों महत्त्वपूर्ण है

यह निर्णय बिहार के निजी या संबद्ध कॉलेजों के शिक्षकों और गैर-शिक्षण कर्मचारियों के लिए महत्त्वपूर्ण है जो अंगीभूत दर्जा या सरकारी मान्यता की प्रतीक्षा कर रहे हैं। इसमें स्पष्ट किया गया है कि केवल इस आधार पर कि फाइल खो गई या विभाग के अंदरूनी प्रशासनिक कारण हैं, राज्य सरकार निर्णय को अनिश्चितकाल तक टाल नहीं सकती।

पटना उच्च न्यायालय ने स्पष्ट कर दिया कि किसी विभाग में अभिलेख के खो जाने से व्यक्तियों के अधिकार नष्ट नहीं हो जाते। यदि पूर्व की कार्यवाहियों और अनुशंसाओं से यह संकेत मिलता है कि राज्य किसी लाभ को प्रदान करना चाहता था, तो सरकार को अभिलेखों का पुनर्निर्माण करके प्रक्रिया को पूरा करना होगा।

निर्णय यह भी पुष्ट करता है कि समान स्थिति वाली संस्थाओं के साथ असमान व्यवहार नहीं किया जा सकता। जब किसी ही बैच के चार कॉलेजों को पहले ही अंगीभूत बनाया जा चुका है, तो पाँचवें कॉलेज को बिना किसी वैध कानूनी कारण के नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता।

साधारण कर्मचारियों के लिए इसका अर्थ यह है कि यदि स्वयं सरकार ने मामले को लंबित रखा हो तो दीर्घकाल से लंबित दावे अपने-आप “समय-सीमा से बाधित” (time-barred) नहीं हो जाते। जब राज्य के अपने अभिलेख और बयान यह दिखाते हैं कि मुद्दा अभी भी जीवित है, तो न्यायालय हस्तक्षेप कर सरकार को अंतिम निर्णय लेने का निर्देश दे सकता है।

कानूनी प्रश्न और उनके उत्तर

  • प्रश्न: क्या राज्य सरकार केवल इस आधार पर कि मूल विभागीय फाइल खो गई है, किसी कॉलेज को अंगीभूत दर्जा देने संबंधी निर्णय से इनकार कर सकती है या उसे अनिश्चितकाल तक टाल सकती है, और बाद में देरी के आधार पर रिट याचिका का विरोध कर सकती है?
    उत्तर: नहीं। पटना उच्च न्यायालय ने माना कि फाइल का खो जाना अंतर्निहित कानूनी अधिकारों को समाप्त नहीं करता और जहाँ मामला सरकार के समक्ष निरंतर विचाराधीन रहा हो तथा अनुशंसाएँ मौजूद हों, वहाँ देरी नहीं मानी जा सकती। विभाग को अभिलेखों का पुनर्निर्माण करना होगा और राज्य सरकार पर अंतिम निर्णय लेने का दायित्व है।
  • प्रश्न: क्या राज्य सरकार एक कॉलेज को उसी योजना के अंतर्गत अंगीभूत दर्जा पाए अन्य समान स्थिति वाले कॉलेजों से अलग ढंग से व्यवहार कर सकती है?
    उत्तर: नहीं। न्यायालय ने माना कि भेदभाव स्वीकार्य नहीं है। विधि के शासन से संचालित कल्याणकारी राज्य के रूप में सरकार को समान रूप से कार्य करना होगा और उचित कानूनी औचित्य के बिना समता (parity) से इनकार नहीं किया जा सकता।

न्यायालय द्वारा उद्धृत मामले

  • State of Bihar & Ors. v. Kripalu Shanker, AIR 1987 SC 1554 – इस सिद्धांत पर उद्धृत कि सरकारी फाइल की आंतरिक टिप्पणियाँ स्वयं में प्रभावी कानूनी आदेश नहीं होतीं।
  • Ramana Dayaram Shetty v. International Airport Authority of India and Ors., 1979 AIR 1628 – इस बात पर बल देने हेतु उद्धृत कि राज्य मनमाने ढंग से कार्य नहीं कर सकता और लाभ बाँटते समय समान स्थिति वाले व्यक्तियों के साथ समान व्यवहार करना होगा।
  • Bijoy Bahadur Sharma v. The State of Bihar & Ors., 2008 (4) PLJR 547 – राज्य द्वारा यह तर्क देने के लिए उद्धृत कि याचिकाएँ उचित समय के भीतर दायर होनी चाहिए; न्यायालय ने इसे इस आधार पर भिन्न माना कि याचिकाकर्ताओं का दावा निरंतर विचाराधीन रहा।
  • Civil Appeal No. 6098 of 1997, (2005) 9 SCC 129 – चतुर्थ चरण के अंगीभूत कॉलेजों में नियुक्तियों की वैधता तथा न्यायमूर्ति एस.सी. अग्रवाल आयोग के संदर्भ में राज्य के प्रत्युत्तर हलफनामे में उल्लेखित।
  • S.L.P. No. 12591 of 2010 – इसी व्यापक विवाद के संदर्भ में न्यायमूर्ति एस.बी. सिन्हा आयोग के गठन हेतु उद्धृत।

मामले का विवरण

मामला संख्या: Civil Writ Jurisdiction Case No. 14227 of 2013

मामला शीर्षक: Jai Prakash Singh and another v. The State of Bihar and others

न्यायालय: High Court of Judicature at Patna

पीठ (Coram): Hon’ble Mr. Justice Harish Kumar

निर्णय की तिथि: 09.02.2026

उद्धरण: 2026 (2) PLJR 457

मामले का स्वरूप: दीवानी रिट याचिका, जिसमें यह निर्देश चाहा गया कि द्वारका नाथ कॉलेज, जट्टीचक, मसौढ़ी को संबंधित विश्वविद्यालय (पूर्व में मगध विश्वविद्यालय, वर्तमान में पाटलिपुत्र विश्वविद्यालय) का अंगीभूत कॉलेज घोषित किया जाए तथा शिक्षण और गैर-शिक्षण कर्मचारियों के लिए संबंधित राहतें प्रदान की जाएँ।

अधिवक्ता:

  • याचिकाकर्ताओं की ओर से: Mr. Chakrapani, Advocate; Mr. Dipak Kumar, Advocate
  • बिहार राज्य की ओर से: Mr. Sunil Kumar Mandal, SC-3; Mr. Bipin Kumar, AC to SC-3
  • पाटलिपुत्र विश्वविद्यालय की ओर से: Mr. Rana Vikram Singh, Advocate; Ms. Rasika Jha, Advocate

निर्णय का लिंक: Patna High Court Judgment in CWJC No. 14227 of 2013

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