मामले की पृष्ठभूमि
याचिकाकर्ता नगर परिषद, सिवान की निर्वाचित मुख्य पार्षद थीं। उनके विरुद्ध प्रतिवादी सं. 9, जो कि पूर्व राज्यमंत्री हैं, द्वारा शिकायत दायर की गई, जिसमें नगरपालिका कार्यों और भूमि खरीद में भ्रष्टाचार तथा अनियमितताओं के आरोप लगाए गए।
इस शिकायत पर कार्यवाही करते हुए, जिला पदाधिकारी, सिवान ने जांच की और 06.04.2021 की तिथि वाली एक रिपोर्ट प्रस्तुत की। इस रिपोर्ट के आधार पर शहरी विकास एवं आवास विभाग ने बिहार नगरपालिका अधिनियम, 2007 की धारा 25(5) के तहत याचिकाकर्ता को कारण बताओ नोटिस जारी किया।
याचिकाकर्ता ने 28.09.2021 को विस्तृत उत्तर दाखिल किया, जिसमें आरोपों का खंडन करते हुए स्पष्टीकरण दिए। हालांकि, उनका कहना था कि उन्हें जांच प्रतिवेदन की प्रति कभी उपलब्ध नहीं कराई गई और उन्हें कोई व्यक्तिगत सुनवाई भी नहीं दी गई।
29.11.2021 को विभाग के नाम से अवर सचिव के हस्ताक्षर से एक आदेश जारी किया गया, जिसमें कहा गया कि जांच प्रतिवेदन में उल्लिखित आरोप सिद्ध पाए गए हैं और याचिकाकर्ता का कारण बताओ उत्तर “स्वीकार योग्य नहीं” है। धारा 25(5) का सहारा लेते हुए इस आदेश द्वारा उन्हें मुख्य पार्षद के पद से हटा दिया गया।
असंतुष्ट होकर, याचिकाकर्ता ने पटना उच्च न्यायालय के समक्ष सिविल रिट न्यायाधिकार वाद सं. 20463/2021 दाखिल कर 29.11.2021 के हटाने के आदेश, स्मरण-पत्र सं. 3484 को चुनौती दी। एक हस्तक्षेपकर्ता आवेदक ने भी स्वयं को पक्षकार बनाने की मांग की, यह कहते हुए कि उसने पूर्व में याचिकाकर्ता के आचरण के संबंध में संवैधानिक प्राधिकारियों को शिकायतें दी थीं।
न्यायालय ने क्या परीक्षण किया और क्या निर्णय दिया
माननीय श्री न्यायमूर्ति चक्रधारी शरण सिंह तथा माननीय श्री न्यायमूर्ति मधुरेश प्रसाद की द्वैपीठ ने हटाने के आदेश की वैधता और बिहार नगरपालिका अधिनियम, 2007 की धारा 25(5) के तहत अपनाई गई प्रक्रिया का परीक्षण किया।
प्रारंभ में, न्यायालय ने विवादित आदेश को पूर्ण रूप से पुनरुत्पादित किया, जिसमें जिला पदाधिकारी की जांच में सिद्ध बताए गए दस विशिष्ट आरोप शामिल थे, जैसे सड़क चौड़ीकरण कार्य में कथित अनियमितताएँ, आरक्षित राशि का समय से पूर्व भुगतान, कचरा निपटान हेतु भूमि क्रय में उचित अनुमोदन के बिना कार्यवाही, तथा दिशा-निर्देशों के उल्लंघन में एक डेवलपर को भुगतान इत्यादि।
आदेश के अंग्रेज़ी अनुवाद से दो मुख्य बातें सामने आईं: प्रथम, उसमें केवल जिला पदाधिकारी की जांच के निष्कर्षों को सूचीबद्ध किया गया था; द्वितीय, उसमें केवल एक संक्षिप्त कथन था कि याचिकाकर्ता का स्पष्टीकरण स्वीकार योग्य नहीं है, और तत्क्षण धारा 25(5) के तहत उन्हें पद से हटा दिया गया। उनके पक्ष में दिये गए प्रतिरक्षा (डिफेन्स) पर कोई विचार-विमर्श दर्ज नहीं था।
याचिकाकर्ता का तर्क था कि आदेश बिना कारण वाला और नॉन-स्पीकिंग है तथा उन्हें जांच प्रतिवेदन की प्रति उपलब्ध नहीं कराई गई और न ही उचित सुनवाई का अवसर दिया गया। उन्होंने इस तथ्य पर बल दिया कि ऐसा आदेश, जो एक लोकतांत्रिक रूप से निर्वाचित प्रतिनिधि को हटाता है और जिसके गंभीर परिणाम होते हैं, उसे अधिनियम और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का कड़ाई से पालन करना चाहिए।
राज्य ने प्रारंभ में आदेश का बचाव करने का प्रयास किया, यह सुझाव देते हुए कि कारण विभागीय अभिलेख (फाइल) में मौजूद हैं और पूरक प्रत्युत्तर हलफनामा दाखिल करने के लिए समय माँगा। 27.01.2022 को पीठ ने अपने प्रारंभिक दृष्टिकोण में दर्ज किया कि आदेश “प्रत्यक्षतः अवैध” है, “नॉन-स्पीकिंग और बिना कारण का है, जिसके गंभीर दीवानी परिणाम हैं”, फिर भी राज्य इसे बचाव करने पर अड़ा रहा और समय की मांग की।
प्रतिवादी सं. 9 के वरिष्ठ अधिवक्ता ने स्पष्ट रूप से स्वीकार किया कि आदेश नॉन-स्पीकिंग होने के कारण अवहनीय है।
हालाँकि, एक हस्तक्षेपकर्ता के अधिवक्ता ने Supreme Court के निर्णय State of Maharashtra v. Prabhu (1994) 2 SCC 481 तथा पटना उच्च न्यायालय के निर्णय State of Bihar v. Akhil Bhartiya Jan Kalyan Sangh, 2000(1) PLJR 632 पर भरोसा करते हुए यह दलील दी कि अनुच्छेद 226 एक इक्विटी अधिकार-क्षेत्र है। उनका तर्क था कि याचिकाकर्ता के विरुद्ध आरोपों की गंभीरता को देखते हुए उच्च न्यायालय को आदेश में हस्तक्षेप से परहेज करना चाहिए, क्योंकि आदेश को रद्द करने से उन्हें पुनः मुख्य पार्षद के पद पर बहाल कर दिया जाएगा और इससे कथित रूप से न्याय का माखौल (miscarriage of justice) होगा।
न्यायालय ने बिहार नगरपालिका अधिनियम की धारा 25(5) की समीक्षा की, जो मुख्य पार्षद या उप मुख्य पार्षद को हटाने की अनुमति देती है, अन्य बातों के साथ, जहाँ वह अपने कर्तव्यों के निर्वहन में कदाचार का दोषी पाया जाए, लेकिन यह सब उचित स्पष्टीकरण का अवसर देने के बाद ही किया जा सकता है। न्यायालय ने उल्लेख किया कि विवादित अधिसूचना प्रधान सचिव द्वारा पारित आदेश के आलोक में जारी की गई थी, जिसे विभागीय मंत्री ने अनुमोदित किया था, यद्यपि उस पर हस्ताक्षर अवर सचिव के थे।
याचिकाकर्ता ने विशेष रूप से यह दलील दी कि जिस जांच प्रतिवेदन पर भरोसा किया गया, उसकी प्रति उन्हें कभी भी उपलब्ध नहीं कराई गई। राज्य की प्रत्युत्तर हलफनामा, जिस पर परियोजना पदाधिकारी-सह-उप निदेशक ने शपथ ली, में केवल यह कहा गया कि विशेष सचिव ने कारण बताओ नोटिस में जांच प्रतिवेदन में निहित आरोपों का उल्लेख किया था। इसमें यह स्पष्ट खंडन नहीं था कि स्वयं प्रतिवेदन उन्हें नहीं दिया गया था।
न्यायालय ने देखा कि विवादित आदेश के सतही परीक्षण से ही यह स्पष्ट है कि उसमें केवल जांच के निष्कर्षों को दोहराया गया है और उत्तर को “स्वीकार योग्य नहीं” घोषित कर दिया गया है, बिना किसी तर्क या याचिकाकर्ता के स्पष्टीकरण पर विचार के। राज्य का यह रुख कि याचिकाकर्ता द्वारा प्रस्तुत “प्रत्येक बिंदु” पर विचार किया गया है, “प्रत्यक्षतः गलत” पाया गया, क्योंकि आदेश में ऐसे किसी विचार का कोई उल्लेख नहीं था।
इसके बाद पीठ ने बिहार नगरपालिका अधिनियम की धारा 44 पर विचार किया, जो नगरपालिका पदाधिकारियों और कर्मचारियों के विरुद्ध भ्रष्टाचार या कदाचार के आरोपों की जांच हेतु लोक प्रहरी की नियुक्ति का प्रावधान करती है। धारा 25(5) की उप-प्रावधान (proviso) में कहा गया है कि लोक प्रहरी की नियुक्ति के बाद, सरकार केवल लोक प्रहरी की संस्तुति के आधार पर ही हटाने के आदेश पारित कर सकती है।
न्यायालय के समक्ष यह तथ्य निर्विवाद था कि यह प्रावधान लगभग ग्यारह साल से अधिनियम में मौजूद होने के बावजूद, राज्य सरकार ने अब तक कोई लोक प्रहरी नियुक्त नहीं किया है।
विवादित आदेश पर निर्णय लेने से पहले, न्यायालय ने पहले हस्तक्षेपकर्ता का आवेदन (आइ.ए. सं. 1/2021) खारिज किया। Supreme Court के निर्णय Ravi Yashwant Bhoir v. District Collector, Raigad, (2012) 4 SCC 407, विशेष रूप से अनुच्छेद 59 और 60 पर भरोसा करते हुए न्यायालय ने कहा कि केवल दूरस्थ या भावनात्मक शिकायत रखने वाला व्यक्ति ऐसे वाद में आवश्यक पक्षकार होने का दावा नहीं कर सकता। किसी शिकायतकर्ता को लोकस स्टैंडी का दावा करने के लिए वास्तविक कानूनी क्षति या स्वामित्व अधिकार के उल्लंघन को प्रदर्शित करना होता है। हस्तक्षेपकर्ता के पास ऐसा कोई प्रवर्तनीय अधिकार नहीं था; इसलिए उसका आवेदन “पूर्णतः भ्रांतिपूर्ण” (wholly misconceived) पाया गया।
वस्तुस्थिति (मेरिट्स) पर, न्यायालय ने लोकतांत्रिक रूप से निर्वाचित स्थानीय प्रतिनिधियों की सुरक्षा से संबंधित Supreme Court के कई निर्णयों पर मजबूत भरोसा किया। न्यायालय ने उल्लेख किया कि 74वें संवैधानिक संशोधन के बाद नगरपालिका संस्थाओं को अब संवैधानिक दर्जा प्राप्त है और निर्वाचित पदाधिकारियों को राज्य द्वारा “सहजता से” (unceremoniously) नहीं हटाया जा सकता, न ही राज्य कोई “लापरवाह दृष्टिकोण” (casual approach) अपना सकता है।
Ravi Yashwant Bhoir से विस्तृत उद्धरण करते हुए पीठ ने जोर दिया कि निर्वाचित पदाधिकारी को सरकारी सेवक से ऊँचे पायदान पर रखा जाना चाहिए। यदि एक अस्थायी कर्मचारी को भी कदाचार के लिए बिना पूर्ण जांच के नहीं हटाया जा सकता, तो निर्वाचित प्रतिनिधि को तो निश्चित रूप से पूर्ण प्रक्रिया अपनाए बिना, कारण दर्ज किए बिना और प्राकृतिक न्याय का कड़ाई से पालन किए बिना नहीं हटाया जा सकता।
न्यायालय ने Ravi Yashwant Bhoir के अनुच्छेद 34 पर विशेष बल दिया: एक लोकतंत्र में, निर्वाचित प्रतिनिधि अपने पूर्ण कार्यकाल के लिए पद पर बने रहने का अधिकारी होता है जब तक कि विधि द्वारा निर्धारित उचित प्रक्रिया के माध्यम से उसे नहीं हटाया जाता; हटाने की कार्यवाही में प्राकृतिक न्याय के मानकों का पालन होना चाहिए और यह दिखाया जाना चाहिए कि प्राधिकार ने आरोपों और स्पष्टीकरण दोनों पर अपना मन लागू किया है।
पीठ ने State of Punjab v. Bhajan Singh, (2001) 3 SCC 565 का भी उल्लेख किया, जिसमें Supreme Court ने एक निर्वाचित नगरपालिका अध्यक्ष को पद संभालने से रोकने वाली कार्यपालिका की हरकत की निंदा की और दोषी सचिव पर व्यक्तिगत लागत लगाई थी। Tarlochan Dev Sharma v. State of Punjab, (2001) 6 SCC 260 का भी हवाला दिया गया, जिसमें वरिष्ठ सिविल सेवकों को चेतावनी दी गई कि वे अपना वैधानिक विवेक राजनीतिक दबाव के सामने समर्पित न करें और यह स्पष्ट किया गया कि नगरपालिका अध्यक्षों को हटाने जैसी कठोर शक्तियाँ पूर्ण स्वतंत्र मनन के साथ ही प्रयोग की जानी चाहिए।
इन सिद्धांतों को लागू करते हुए, पटना उच्च न्यायालय ने यह निर्णय दिया कि याचिकाकर्ता के विरुद्ध हटाने का आदेश “प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का घोर उल्लंघन” (flagrant violation) है और “लापरवाही तथा हल्के ढंग से” (causal and cavalier manner) पारित किया गया है। न्यायालय ने पाया कि प्राधिकार धारा 25(5) के तहत आदेश के गंभीर परिणामों के प्रति असंवेदनशील प्रतीत होता है, जो न केवल निर्वाचित मुख्य पार्षद को पद से हटाता है, बल्कि उसे शेष कार्यकाल के दौरान पुनः चुनाव लड़ने से अयोग्य भी कर देता है और एक सामाजिक कलंक पैदा करता है जो भावी चुनावी संभावनाओं को प्रभावित कर सकता है।
न्यायालय ने प्राकृतिक न्याय के बुनियादी मानकों को दोहराया: कोई भी अर्ध-न्यायिक (quasi-judicial) आदेश, जिससे दीवानी या दुष्परिणाम (civil or evil consequences) उत्पन्न होते हों, कारणयुक्त होना चाहिए; आदेश में मनन (application of mind) का प्रतिबिंब होना चाहिए; प्रभावित व्यक्ति को स्पष्टीकरण का उचित अवसर दिया जाना चाहिए; कारण बताओ नोटिस के उत्तर पर विधिवत विचार किया जाना चाहिए और यह आदेश की सतह पर दिखाई देना चाहिए; और जिस भी सामग्री पर भरोसा किया जा रहा हो, जैसे जांच प्रतिवेदन, उसे पूर्व में उपलब्ध कराना आवश्यक है।
इस मामले में, इनमें से कोई भी सुरक्षा उपबंधों का पालन नहीं किया गया। जांच प्रतिवेदन उपलब्ध नहीं कराया गया; कोई सुनवाई नहीं दी गई; कारण बताओ उत्तर पर चर्चा नहीं की गई; और यह दर्ज नहीं किया गया कि याचिकाकर्ता की प्रतिरक्षा क्यों अस्वीकार की गई।
पीठ ने “कानूनी दुर्भावना” (legal malice) या “कानून में दुर्भावना” (malice in law) की अवधारणा पर भी चर्चा की, जैसा कि Ravi Yashwant Bhoir में समझाया गया है। यद्यपि न्यायालय को ऐसा कोई सामग्री नहीं मिला जिससे यह कहा जा सके कि आदेश व्यक्तिगत द्वेष या दुर्भावना से प्रेरित था, परंतु उसने निष्कर्ष निकाला कि याचिकाकर्ता के अधिकारों की अवहेलना करते हुए ऐसा आदेश पारित करने का “कोई वैध बहाना” नहीं था। इस आधार पर न्यायालय ने माना कि यह कार्यवाही “अप्रत्यक्ष और ओछे उद्देश्य” (oblique and indirect object) से प्रेरित थी और इसलिए यह कानूनी दुर्भावना से ग्रस्त है।
राज्य ने महाधिवक्ता के माध्यम से दो संप्रेषण प्रस्तुत किए: एक महाधिवक्ता द्वारा प्रधान सचिव को, जिसमें विभाग को भविष्य में धारा 25(5) के तहत ऐसे नॉन-स्पीकिंग आदेश जारी न करने की चेतावनी दी गई थी; और दूसरा विभाग द्वारा, जिसमें कहा गया था कि वह विवादित आदेश को वापस लेकर एक नया, विस्तृत और कारणयुक्त आदेश पारित करना चाहता है, जिसके लिए उसने न्यायालय की अनुमति मांगी।
न्यायालय ने, हालांकि, विभाग को केवल आदेश वापस लेकर नया कारणयुक्त आदेश जारी करने की अनुमति देने से इनकार कर दिया, क्योंकि उक्त संप्रेषण में बुनियादी खामियों को दूर करने, जैसे जांच प्रतिवेदन देना और याचिकाकर्ता को सुनवाई का अवसर देना, का कोई उल्लेख नहीं था। अतः पीठ ने रिट याचिका का अंतिम निपटारा करने और आदेश को रद्द करने का निर्णय लिया।
कार्यान्वयन (ऑपरेटिव) भाग में, न्यायालय ने 29.11.2021 की तिथि वाले, स्मरण-पत्र सं. 3484, शहरी विकास एवं आवास विभाग के विवादित आदेश को निरस्त कर दिया। यह स्पष्ट किया गया कि न्यायालय ने याचिकाकर्ता के विरुद्ध लगाए गए आरोपों की सत्यता या असत्यता पर कोई निर्णय नहीं दिया है; किसी भी प्रकार के अवलोकन को मेरिट्स पर निष्कर्ष के रूप में नहीं पढ़ा जाना चाहिए।
न्यायालय ने प्रतिवादियों को यह स्वतंत्रता दी कि यदि वे उचित समझें तो नए सिरे से कार्यवाही शुरू कर सकते हैं, परंतु यह केवल विधि के अनुरूप, जांच प्रतिवेदन उपलब्ध कराने, उचित सुनवाई का अवसर देने और Ravi Yashwant Bhoir में प्रतिपादित विधि को ध्यान में रखते हुए ही किया जा सकता है।
यह मानते हुए कि अवैध आदेश के कारण याचिकाकर्ता सिवान नगर परिषद की मुख्य पार्षद के पद से बाहर रहीं, न्यायालय ने Bhajan Singh के अनुसरण में उदाहरणीय लागत लगाई। राज्य बिहार को दो सप्ताह के भीतर याचिकाकर्ता को रु. 25,000 का भुगतान करने का निर्देश दिया गया। आदेश रद्द होने के परिणाम, जिसमें पद पर पुनर्बहाली शामिल है, स्वयं ही अनुसरण करने थे।
यह निर्णय क्यों महत्वपूर्ण है
यह निर्णय बिहार और उससे आगे के सभी नगरपालिकाओं और नगर परिषदों के निर्वाचित प्रतिनिधियों के लिए महत्वपूर्ण है।
यह स्पष्ट संदेश देता है कि राज्य सरकार केवल एक संक्षिप्त, बिना कारण वाला आदेश जारी कर किसी लोकतांत्रिक रूप से निर्वाचित मुख्य पार्षद को नहीं हटा सकती। प्राधिकारियों को पूर्ण सुनवाई का अवसर देना होगा, जांच से संबंधित सामग्री साझा करनी होगी, और ऐसे कठोर कदम उठाने से पहले संबंधित व्यक्ति की प्रतिरक्षा पर सावधानीपूर्वक विचार करना होगा।
पटना उच्च न्यायालय ने यह भी रेखांकित किया कि बिहार नगरपालिका अधिनियम की धारा 44 के अंतर्गत लोक प्रहरी जैसी प्रावधानों की अनदेखी अनिश्चितकाल तक नहीं की जा सकती। निष्पक्ष जांच के लिए कानून में निहित सुरक्षा उपायों का सम्मान किया जाना चाहिए।
साधारण नागरिकों और पार्षदों के लिए, यह निर्णय दिखाता है कि जहाँ सरकारी आदेश मूलभूत निष्पक्षता का उल्लंघन करते हैं, वहाँ न्यायालय हस्तक्षेप करेंगे, भले ही आरोप गंभीर हों। न्यायालय ने आदेश को इसलिए रद्द नहीं किया कि आरोप झूठे थे, बल्कि इसलिए कि सही कानूनी प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया था।
कानूनी प्रश्न और उनके उत्तर
प्रश्न: क्या राज्य, बिहार नगरपालिका अधिनियम की धारा 25(5) के तहत केवल जांच प्रतिवेदन के आधार पर, बिना वह प्रतिवेदन उपलब्ध कराए, बिना कारण दर्ज किए और बिना उसके उत्तर पर विचार किए, मुख्य पार्षद को हटा सकता था?
उत्तर: नहीं। पटना उच्च न्यायालय ने हटाने के आदेश को प्रत्यक्षतः अवैध, नॉन-स्पीकिंग, प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के विरुद्ध पाया और उसे रद्द कर दिया।
प्रश्न: क्या वह हस्तक्षेपकर्ता, जिसने दावा किया कि उसने पूर्व में मुख्य पार्षद के विरुद्ध शिकायत की थी, हटाने के आदेश को चुनौती देने वाली रिट कार्यवाही में आवश्यक पक्षकार था?
उत्तर: नहीं। Ravi Yashwant Bhoir पर भरोसा करते हुए न्यायालय ने कहा कि केवल दूरस्थ या भावनात्मक हित रखने वाला और जिसे कोई कानूनी क्षति न पहुँची हो, ऐसे व्यक्ति का लोकस स्टैंडी नहीं होता और हस्तक्षेप आवेदन खारिज कर दिया।
प्रश्न: क्या उच्च न्यायालय को, इक्विटी के आधार पर, आरोपों की गंभीरता के कारण एक अवैध हटाने के आदेश में हस्तक्षेप करने से इनकार कर देना चाहिए था?
उत्तर: नहीं। न्यायालय ने State of Maharashtra v. Prabhu को अलग (distinguish) करते हुए कहा कि इक्विटी का सहारा ले कर ऐसे आदेश को कायम नहीं रखा जा सकता जो स्पष्ट रूप से वैधानिक सुरक्षा उपायों और प्राकृतिक न्याय का उल्लंघन करता हो, विशेषकर जब वह लोकतांत्रिक रूप से निर्वाचित स्थानीय प्रतिनिधि को हटाता हो।
न्यायालय द्वारा उद्धृत मामले
- Ravi Yashwant Bhoir v. District Collector, Raigad and others, (2012) 4 SCC 407.
- State of Punjab v. Bhajan Singh, (2001) 3 SCC 565.
- Tarlochan Dev Sharma v. State of Punjab and others, (2001) 6 SCC 260.
- State of Maharashtra and others v. Prabhu, (1994) 2 SCC 481.
- State of Bihar v. Akhil Bhartiya Jan Kalyan Sangh and others, 2000(1) PLJR 632.
- State of Punjab v. Baldev Singh, (1999) 6 SCC 172.
- अन्य Supreme Court के मामले जो उद्धरणों के भीतर संदर्भित किए गए हैं, जैसे Anirudhsinhji Jadeja, Purtabpore Co. Ltd. आदि, जो विवेकाधिकार और विधि के शासन पर व्यापक सिद्धांतों का हिस्सा हैं।
मामले का विवरण
वाद संख्या: Civil Writ Jurisdiction Case No. 20463 of 2021
वाद शीर्षक: Smt. Sindhu Singh v. The State of Bihar & Ors.
न्यायालय: High Court of Judicature at Patna
पीठ: Division Bench
कोरम: Hon’ble Mr. Justice Chakradhari Sharan Singh and Hon’ble Mr. Justice Madhuresh Prasad
निर्णय की तिथि: 08.02.2022
उद्धरण: 2022 (1) PLJR 897
अधिवक्ता:
- याचिकाकर्ता की ओर से: Mr. Sanjay Singh, Sr. Advocate; Mr. Ashok Kumar, Advocate; Mr. Bibhuti Narayan, Advocate.
- राज्य बिहार की ओर से: Mr. Lalit Kishore, Advocate General; assisted by Mr. Kinkar Kumar, SC-9.
- प्रतिवादी सं. 9 की ओर से: Mr. P.K. Shahi, Sr. Advocate; Mr. Vikas Kumar, Advocate.
- हस्तक्षेपकर्ता की ओर से: Mr. Y.C. Verma, Sr. Advocate.
मामले का स्वरूप: संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत दायर रिट याचिका, जिसके माध्यम से बिहार नगरपालिका अधिनियम, 2007 की धारा 25(5) के अंतर्गत पारित निर्वाचित मुख्य पार्षद को हटाने के आदेश को चुनौती दी गई।
निर्णय का लिंक: पटना उच्च न्यायालय का पूर्ण निर्णय पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें
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