पुलिस बर्खास्तगी अनुचित जांच के कारण निरस्त — पटना उच्च न्यायालय, 2025

इस मामले में, बिहार पुलिस के एक सहायक अवर निरीक्षक ने अपनी सेवा से बर्खास्तगी को चुनौती दी। पटना उच्च न्यायालय ने पाया कि उनके विरुद्ध चलाया गया विभागीय अनुशासनिक जांच मूल प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों तथा बिहार सरकारी सेवक नियमावली, 2005 का उल्लंघन करता है। न्यायालय ने बर्खास्तगी आदेश और अपील आदेश दोनों को निरस्त कर दिया। अब इस निर्णय के स्वाभाविक कानूनी परिणामस्वरूप याचिकाकर्ता विधि अनुसार सेवा लाभों की पुनर्बहाली सहित अन्य लाभ पाने के हकदार हैं।

मामले की पृष्ठभूमि

याचिकाकर्ता ने बिहार पुलिस में कांस्टेबल के रूप में ज्वाइन किया और बाद में उन्हें नवंबर 2016 में सहायक अवर निरीक्षक (ASI) के पद पर पदोन्नत किया गया। दिनांक 09.12.2016 को उनकी पोस्टिंग पटना के बेउर थाना में की गई।

दिनांक 03.02.2017 को उप महानिरीक्षक (DIG), सेंट्रल रेंज, पटना ने बेउर थाने की सीमााधिकार क्षेत्र में अवैध शराब निर्माण एवं व्यापार होते हुए देखा। उन्होंने आवश्यक कार्रवाई करने का निर्देश दिया। उसी दिन एक प्रतिवेदन (जो बाद में रिट याचिका में परिशिष्ट-2 के रूप में संलग्न किया गया) प्रस्तुत किया गया, जिसमें कहा गया कि अवैध शराब का व्यापार बेउर थाने के स्टाफ के संरक्षण में, कथित रूप से अन्य व्यक्तियों के साथ मिलीभगत से चल रहा है और इसमें याचिकाकर्ता की भी संलिप्तता है।

दिनांक 14.02.2017 को ज्ञापांक सं. 1097 द्वारा वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (SSP), पटना ने याचिकाकर्ता को निलंबित कर दिया और बेउर थाना के पदाधिकारी प्रभारी तथा अन्य के विरुद्ध, जिनमें याचिकाकर्ता भी शामिल थे, कार्रवाई करने का निर्देश दिया।

इसके उपरांत, DIG, सेंट्रल रेंज ने SSP, पटना को थाना प्रभारी धिरेन्द्र कुमार पांडे के विरुद्ध विभागीय कार्यवाही चलाने का निर्देश दिया। दिनांक 11.05.2017 को याचिकाकर्ता के विरुद्ध भी विभागीय कार्यवाही शुरू करने का निर्णय लिया गया। प्रथम विभागीय कार्यवाही का परिणाम यह हुआ कि 06.06.2017 को उन्हें सेवा से बर्खास्त कर दिया गया, जिसे 05.10.2017 के अपीलीय आदेश द्वारा पुष्टि कर दी गई।

याचिकाकर्ता ने पुनर्विचार का आग्रह किया। पुलिस महानिदेशक (DGP) ने पहली कार्यवाही में अनियमितताएँ और अवैधानिकताएँ पाईं, बर्खास्तगी तथा अपीलीय आदेश दोनों को निरस्त कर दिया और मामले को अनुशासनिक प्राधिकारी के पास पुनर्विचार हेतु भेज दिया। DGP ने यह भी निर्देश दिया कि आरोप की गंभीरता को देखते हुए, नयी विभागीय कार्यवाही के दौरान याचिकाकर्ता निलंबित रहेंगे। याचिकाकर्ता को पुनः पदस्थापित किया गया, फिर पुनः निलंबित किया गया और 28.09.2018 को नयी विभागीय जांच करने का ताज़ा निर्णय लिया गया।

दूसरी जांच के लिए, DSP, ट्रैफिक-I, पटना को प्रस्तुतिकरण अधिकारी (Conducting Officer) और पुलिस निरीक्षक, ट्रैफिक को प्रस्तुतीकरण पदाधिकारी (Presenting Officer) नियुक्त किया गया। दिनांक 28.03.2019 का आरोपपत्र (परिशिष्ट-15) उन्हें दिया गया और याचिकाकर्ता ने 05.05.2019 को विस्तृत लिखित स्पष्टीकरण दाखिल किया।

जांच के दौरान, याचिकाकर्ता ने अनुरोध किया कि कुछ महत्वपूर्ण व्यक्तियों को पेश किया जाए ताकि वे उनका प्रतिपरीक्षण (cross-examination) कर सकें, और साथ ही कॉल डिटेल भी मांगे। कॉल रिकॉर्ड उपलब्ध करा दिए गए, परन्तु कुछ व्यक्तियों के प्रतिपरीक्षण के उनके अनुरोध को अस्वीकार कर दिया गया। इसी बीच, SHO धिरेन्द्र कुमार पांडे के विरुद्ध विभागीय जांच इस निष्कर्ष के साथ समाप्त हुई कि उन पर लगे आरोप सिद्ध नहीं हुए; उन्हें DIG, सेंट्रल रेंज, पटना द्वारा निर्गत ज्ञापांक सं. 359 के आदेश से केवल चेतावनी देते हुए आरोपमुक्त कर दिया गया।

दिनांक 17.08.2019 को DSP, ट्रैफिक-I ने अपनी जांच प्रतिवेदन (परिशिष्ट-22) प्रस्तुत की, जिसमें याचिकाकर्ता के विरुद्ध आरोपों को सिद्ध माना गया। उस प्रतिवेदन और प्रस्तावित दंड के आधार पर जारी कारण-पत्रों (show cause notice) का याचिकाकर्ता ने उत्तर दिया। SSP, पटना ने पत्र सं. 4714 द्वारा याचिकाकर्ता को सेवा से बर्खास्त करने की अनुशंसा पुलिस महानिरीक्षक, सेंट्रल रेंज, पटना के समक्ष की।

दिनांक 02.06.2020 के आदेश द्वारा, ज्ञापांक सं. 173 (परिशिष्ट-28), पुलिस महानिरीक्षक, सेंट्रल रेंज ने याचिकाकर्ता को सेवा से बर्खास्त कर दिया। याचिकाकर्ता ने 02.06.2020 को अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक (कानून एवं व्यवस्था), बिहार, पटना के समक्ष अपील दायर की, किन्तु यह अपील 07.10.2020 के आदेश (परिशिष्ट-30) से खारिज कर दी गई। इन दोनों आदेशों को इस रिट याचिका में पटना उच्च न्यायालय के समक्ष चुनौती दी गई।

न्यायालय ने क्या परीक्षण किया और क्या निर्णय दिया

माननीय श्री न्यायमूर्ति हरीश कुमार की एकलपीठ ने पहले यह विचार किया कि स्मारक (memorial) जैसे वैकल्पिक उपाय उपलब्ध होने के बावजूद क्या रिट याचिका विचारणीय है। न्यायालय ने पुनः स्पष्ट किया कि वैकल्पिक उपाय के कारण रिट क्षेत्राधिकार का बहिष्कार विवेकाधीन नियम है, बाध्यकारी नहीं। जब मौलिक अधिकारों के उल्लंघन, प्राकृतिक न्याय के भंग होने या अधिकार क्षेत्र के अभाव का आरोप हो, तो इस नियम की अनदेखी की जा सकती है।

चूँकि याचिकाकर्ता की मूल चुनौती यह थी कि विभागीय कार्यवाही और आदेश प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों तथा बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली, 2005 (नियम, 2005) के नियम 17 का उल्लंघन करते हैं, न्यायालय ने जांच एवं दंड आदेशों की वैधता की पड़ताल करने का निर्णय लिया।

न्यायालय ने मामले की उत्पत्ति पर गौर किया। DIG, सेंट्रल रेंज, पटना ने ज्ञापांक सं. 231 दिनांक 03.02.2017 द्वारा SSP, पटना को बेउर थाना अंतर्गत शराब की बिक्री एवं व्यापार की जांच करने तथा तत्काल प्रभाव से SHO सहित वर्तमान स्टाफ का स्थानांतरण करने का निर्देश दिया था।

इसके प्रत्युत्तर में, सिटी एस.पी. (पश्चिम) ने जांच कर पत्र सं. 987 दिनांक 13.02.2017 के अंतर्गत प्रतिवेदन प्रस्तुत किया। प्रतिवेदन में कहा गया कि 28/29.01.2017 की रात्रि को शराब से लदी एक गाड़ी पकड़ी गई और बेउर थाना लाई गई। आगे आरोप था कि पुलिस गश्ती दल ने O.D. अधिकारी के साथ मिलीभगत कर ₹1,64,000/- की उगाही के बाद वाहन तथा पकड़े गए व्यक्ति को छोड़ दिया। यह भी कहा गया कि उप निरीक्षक सुनील कुमार तथा SHO के निजी चालक जितेन्द्र कुमार इसमें शामिल थे और बाद में प्राप्त सूचना से याचिकाकर्ता की संलिप्तता भी सामने आई।

महत्वपूर्ण रूप से, प्रतिवेदन ने निष्कर्ष निकाला कि SHO के निजी चालक जितेन्द्र कुमार कुछ पुलिसकर्मियों की मदद से अवैध शराब व्यापार में संलिप्त था। इसी प्रतिवेदन के आधार पर याचिकाकर्ता, सुनील कुमार, विश्वंभर प्रसाद और SHO धिरेन्द्र कुमार पांडे सहित कई अधिकारियों को निलंबित किया गया।

जब न्यायालय ने 28.03.2019 को याचिकाकर्ता को दिए गए आरोपपत्र पर ध्यान दिया, तो उसने देखा कि आरोप केवल यह कहता है कि सिटी एस.पी. की जांच के अनुसार, बेउर थाना में पदस्थापना के दौरान अवैध शराब निर्माण एवं व्यापार से संबंधित मामले में याचिकाकर्ता दोषी पाए गए। उनके आचरण को पुलिसकर्मी के लिए अनुपयुक्त बताते हुए, कदाचार, अवज्ञा और कर्तव्य की लापरवाही करार दिया गया।

न्यायालय ने पाया कि इस आरोप में याचिकाकर्ता द्वारा किए गए किसी विशिष्ट घटना, दिनांक या ठोस कृत्य का उल्लेख नहीं था। 28/29.01.2017 की घटनाओं के बारे में “कोई संकेत तक” नहीं था। यह स्पष्ट नहीं था कि याचिकाकर्ता की कौन सी विशिष्ट कार्रवाई कदाचार, अवज्ञा या लापरवाही की श्रेणी में आती है।

इसके अतिरिक्त, नियम 17, नियमावली 2005 यह अनिवार्य करता है कि जब जांच प्रस्तावित हो, तो अनुशासनिक प्राधिकारी पृथक-पृथक आरोप लेख (articles of charge) तैयार करे और प्रासंगिक तथ्यों द्वारा समर्थित कथित कदाचार की व्याख्या (statement of imputations), दस्तावेजों की सूची तथा उन गवाहों की सूची उपलब्ध कराए जिनके द्वारा आरोप सिद्ध किए जाएंगे।

इस मामले में, आरोपपत्र के साथ संलग्न गवाहों की सूची में ऐसे किसी व्यक्ति का नाम नहीं था, जिसने 28/29.01.2017 की घटना देखी हो या जिसने वास्तव में याचिकाकर्ता की कथित भूमिका के बारे में कुछ कहा हो। इसके बजाय, गवाह केवल औपचारिक थे: प्रभारी, जनरल शाखा, DIG, सेंट्रल रेंज; SSP क्राइम रीडर के गोपनीय रीडर; सिटी एस.पी.; और ASI, न्यू पुलिस लाइन। यहाँ तक कि उनके नाम भी नहीं, केवल पदनाम लिखे गए थे।

न्यायालय ने देखा कि विभागीय कार्यवाही में जो गवाह परीक्षित हुए, वे मात्र औपचारिक गवाह थे, जिन्होंने दस्तावेजों पर हस्ताक्षरों की पहचान और पुष्टि की। किसी ने भी याचिकाकर्ता की कथित संलिप्तता के बारे में व्यक्तिगत ज्ञान से बयान नहीं दिया। इसके बावजूद, जांच अधिकारी ने मुख्यतः 13.02.2017 के पूर्ववर्ती प्रारंभिक जांच प्रतिवेदन पर आधारित होकर दोषसिद्धि की रिपोर्ट दी।

हालाँकि, उस प्रारंभिक प्रतिवेदन के लेखक (सिटी एस.पी.) को विभागीय जांच में गवाह के रूप में परीक्षित नहीं किया गया, न ही उन व्यक्तियों को, जिनके बयान उसने पूर्व में दर्ज किए थे। न्यायालय ने बल देकर कहा कि, जैसा कि उच्चतम न्यायालय ने बार-बार कहा है, केवल दस्तावेज प्रस्तुत कर देना उसके अंतर्वस्तु को सिद्ध नहीं कर देता; इसके लिए जांच के दौरान विधिवत सिद्ध मौखिक या दस्तावेजी साक्ष्य होना आवश्यक है।

न्यायालय ने उच्चतम न्यायालय के निर्णय Roop Singh Negi v. Punjab National Bank पर भरोसा किया, जिसमें कहा गया कि बर्खास्तगी जैसे गंभीर दंड के लिए गवाहों और मौखिक साक्ष्य का होना, तथा प्रतिपरीक्षण का अवसर देना अनिवार्य है। केवल अप्रमाणित प्रतिवेदनों या कथित स्वीकृति पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं है, और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन आवश्यक है।

पटना उच्च न्यायालय ने Ayaaubkhan Noorkhan Pathan v. State of Maharashtra & Ors का भी उल्लेख किया, जहाँ उच्चतम न्यायालय ने कहा कि प्रतिपरीक्षण का अधिकार प्राकृतिक न्याय का अविभाज्य हिस्सा है और हलफनामा या लिखित बयान को तब तक साक्ष्य नहीं माना जा सकता जब तक उस व्यक्ति का प्रतिपरीक्षण संभव न हो।

इन सिद्धांतों को लागू करते हुए न्यायालय ने नोट किया कि जिन प्रमुख व्यक्तियों के बयान अत्यंत महत्वपूर्ण थे, उनके प्रतिपरीक्षण का याचिकाकर्ता का अनुरोध अस्वीकार कर दिया गया था। राज्य ने तर्क दिया कि 13.08.2019 को दर्ज गवाहों के बयान का प्रतिपरीक्षण करने से याचिकाकर्ता ने इंकार कर दिया था, परन्तु न्यायालय ने रेखांकित किया कि ये मात्र औपचारिक गवाह थे, न कि वे लोग जिन्हें कथित कदाचार के बारे में प्रत्यक्ष जानकारी थी।

एक अन्य गंभीर दोष यह पाया गया कि प्रस्तुतीकरण पदाधिकारी ने वस्तुतः कोई भूमिका नहीं निभाई। ऐसा प्रतीत हुआ कि जांच अधिकारी ने स्वयं ही प्रस्तुतीकरण पदाधिकारी की भूमिका ग्रहण कर ली, विभाग का पक्ष भी प्रस्तुत किया और स्वयं ही उसका निर्णायक भी बना। अपने पूर्ववर्ती निर्णय Panchanan Kumar v. Bihar State Electricity Board & Ors का हवाला देते हुए न्यायालय ने कहा कि जब जांच अधिकारी बिना किसी उचित कारण के दोनों भूमिकाएँ एक साथ निभाता है, तो ऐसी जांच प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के प्रतिकूल होने के कारण दूषित हो जाती है।

न्यायालय ने उच्चतम न्यायालय के निर्णय State of Uttar Pradesh & Ors v. Saroj Kumar Sinha में की गई टिप्पणियों को भी याद किया, जिसमें कहा गया कि जांच अधिकारी निष्पक्ष होना चाहिए और “पूर्वाग्रह से ग्रस्त मन” के साथ आगे नहीं बढ़ सकता।

इसके पश्चात न्यायालय ने अनुच्छेद 226 के अंतर्गत विभागीय कार्यवाहियों पर न्यायिक समीक्षा के सीमित दायरे को स्पष्ट किया, जैसा कि Union of India v. P. Gunasekaran में प्रतिपादित है। यद्यपि उच्च न्यायालय अपीलीय न्यायालय की भाँति साक्ष्य का पुनर्मूल्यांकन नहीं करता, पर वह हस्तक्षेप कर सकता है जब, अन्य बातों के साथ, जांच सक्षम प्राधिकारी द्वारा न की गई हो, निर्धारित प्रक्रिया का पालन न हुआ हो, प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन हुआ हो, प्रासंगिक साक्ष्य की अनदेखी की गई हो, अप्रमाण्य साक्ष्य पर भरोसा किया गया हो, या निष्कर्ष किसी भी साक्ष्य के अभाव में आधारित हों।

इस मामले में न्यायालय ने पाया कि जांच अधिकारी तथा अनुशासनिक प्राधिकारी के निष्कर्ष किसी भी विधिसम्मत साक्ष्य से समर्थित नहीं थे। प्रारंभिक जांच प्रतिवेदन पर अत्यधिक निर्भरता थी, जिसके अंतर्वस्तु को विभागीय जांच में सिद्ध ही नहीं किया गया था। उस प्रतिवेदन के पीछे के गवाहों की परीक्षा नहीं हुई और याचिकाकर्ता को उनका प्रतिपरीक्षण करने का अवसर भी नहीं दिया गया।

न्यायालय ने यह भी उल्लेख किया कि एक संबंधित मामले (CWJC No. 16616 of 2021) में, अन्य अधिकारी सुनील कुमार, जिन पर 13.02.2017 की उसी सिटी एस.पी. रिपोर्ट के आधार पर समान आरोप लगे थे और जिन्हें इसी प्रकार बर्खास्त किया गया था, की सजा पटना उच्च न्यायालय ने निरस्त कर दी थी। उस मामले में न्यायालय ने यह माना था कि जांच प्रतिवेदन अथवा जांच के दौरान दोष सिद्ध करने हेतु “कोई साक्ष्य” नहीं है, और 100% बकाया वेतन तथा अन्य परिणामी लाभ प्रदान किए थे। न्यायालय ने कहा कि जब आरोप और सामग्री समान हों तो “एकरूपता की माँग है कि समान व्यवहार किया जाए।”

न्यायालय ने यह भी महत्वपूर्ण माना कि जहाँ सिटी एस.पी. की प्रारंभिक रिपोर्ट में SHO धिरेन्द्र कुमार पांडे को कथित अवैध शराब व्यापार का केन्द्रीय व्यक्ति बताया गया था, वहीं अंततः उन्हें केवल चेतावनी के साथ आरोपमुक्त कर दिया गया (परिशिष्ट-20), जबकि उसी मूल सामग्री पर अधीनस्थ ASI याचिकाकर्ता को चरम दंड, अर्थात बर्खास्तगी, झेलनी पड़ी।

न्यायालय ने तत्पश्चात उच्चतम न्यायालय के ताज़ा निर्णय K. Prabhakar Hegde v. Bank of Baroda (Civil Appeal No. 6599 of 2025, निर्णय दिनांक 19 अगस्त, 2025) की चर्चा की। वहाँ उच्चतम न्यायालय ने कहा कि यदि किसी प्रारंभिक जांच प्रतिवेदन पर विभागीय जांच में भरोसा किया जाना हो, तो उस प्रतिवेदन के आधार पर जिन गवाहों के बयान दर्ज किए गए हैं, उन्हें जांच अधिकारी के समक्ष पेश कर प्रतिपरीक्षण का अवसर दिया जाना चाहिए और वह प्रतिवेदन स्वयं भी दंडित कर्मचारी को उपलब्ध कराया जाना चाहिए। विशेषतः जब प्रारंभिक प्रतिवेदन कर्मचारी की अनुपस्थिति में एकत्रित सामग्री पर आधारित हो, तो वह अंतिम जांच में दोषसिद्धि का एकमात्र आधार नहीं बन सकता।

इन्हीं सिद्धांतों को वर्तमान मामले पर लागू करते हुए पटना उच्च न्यायालय ने माना कि impugned बर्खास्तगी तथा अपीलीय आदेश “प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पूर्णतः उल्लंघन” करते हैं।

आगे, न्यायालय ने impugned बर्खास्तगी आदेश को संक्षिप्त और कारणरहित बताते हुए उसकी आलोचना की। उसमें यह नहीं दिखता कि दूसरी कारण-पत्र का याचिकाकर्ता द्वारा दिए गए उत्तर पर कोई विचार किया गया हो। अपीलीय आदेश ने भी नियम 27, नियमावली 2005 के विपरीत, जो अपीलीय प्राधिकारी के दायित्व को निर्धारित करता है, उठाए गए विशिष्ट आधारों पर चर्चा या उनका विचार नहीं किया।

अन्ततः न्यायालय ने माना कि आरोपपत्र में स्पष्ट एवं पृथक आरोपों का अभाव था, जांच के निष्कर्ष किसी विधिसम्मत साक्ष्य से समर्थित नहीं थे, प्रस्तुतीकरण पदाधिकारी ने अपनी भूमिका नहीं निभाई और दंड तथा अपीलीय आदेश तर्कहीन, कारणरहित तथा प्राकृतिक न्याय के प्रतिकूल थे।

तदनुसार, पटना उच्च न्यायालय ने 02.06.2020 की बर्खास्तगी का आदेश (ज्ञापांक सं. 173) जो पुलिस महानिरीक्षक, सेंट्रल रेंज, पटना द्वारा पारित हुआ था, साथ ही 07.10.2020 का अपीलीय आदेश जो अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक (कानून एवं व्यवस्था), बिहार, पटना द्वारा पारित हुआ था, दोनों को निरस्त कर दिया। रिट याचिका को स्वीकार कर न्यायालय ने निर्देश दिया कि एक बार impugned आदेश निरस्त हो जाने पर “परिणाम स्वयं अनुसरण करेंगे”, अर्थात सेवा संबंधी एवं वित्तीय लाभ विधि अनुसार बहाल किए जाएँ। पक्षकारों को अपने-अपने व्यय स्वयं वहन करने का निर्देश दिया गया।

यह निर्णय क्यों महत्वपूर्ण है

यह निर्णय बिहार में विभागीय कार्यवाही का सामना कर रहे पुलिसकर्मियों तथा सभी सरकारी सेवकों के लिए महत्वपूर्ण है। यह दर्शाता है कि अवैध शराब व्यापार जैसे गंभीर आरोपों वाले मामलों में भी प्राधिकरणों को विधिसम्मत प्रक्रिया और बुनियादी निष्पक्षता का पालन अनिवार्य रूप से करना होगा।

पटना उच्च न्यायालय ने यह रेखांकित किया कि आरोप स्पष्ट एवं विशिष्ट होने चाहिए, साक्ष्य को जांच में विधिपूर्वक सिद्ध किया जाना चाहिए, और आरोपित कर्मचारी को प्रमुख गवाहों का प्रतिपरीक्षण करने का अवसर अवश्य दिया जाना चाहिए। केवल प्रारंभिक जांच प्रतिवेदन पर भरोसा करना, उसके लेखक और गवाहों की परीक्षा किए बिना, अनुमन्य नहीं है।

निर्णय यह चेतावनी भी देता है कि जांच अधिकारी न्यायाधीश और अभियोजक दोनों की भूमिका एक साथ नहीं निभा सकता। प्रस्तुतीकरण पदाधिकारी को विभाग का पक्ष रखना होता है और जांच अधिकारी को निष्पक्ष रहना होता है।

अन्य कर्मचारियों के लिए यह मामला यह भी दर्शाता है कि अपीलीय प्राधिकरणों को अपील में उठाए गए आधारों की गंभीरता से जांच करनी चाहिए और कारणयुक्त निर्णय देना चाहिए। केवल दंड की यथावत पुष्टि कर देना, बिना कारण बताए, निरस्त किया जा सकता है।

समग्र रूप से, यह निर्णय पुनः पुष्ट करता है कि प्राकृतिक न्याय और नियम 17 तथा नियम 27, नियमावली 2005 के अंतर्गत निर्धारित प्रक्रिया केवल औपचारिकताएँ नहीं हैं। ये आजीविका की रक्षा करती हैं और बर्खास्तगी जैसे कठोर दंड लगाने से पहले इनका कठोरता से पालन किया जाना आवश्यक है।

कानूनी प्रश्न और उनके उत्तर

  • प्रश्न: क्या विभागीय जांच और याचिकाकर्ता की बर्खास्तगी, बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली, 2005 के नियम 17 और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के अनुरूप थी?
    उत्तर: नहीं। आरोपपत्र में स्पष्ट एवं पृथक आरोपों का अभाव था, प्रमुख गवाहों की परीक्षा नहीं की गई, याचिकाकर्ता के प्रतिपरीक्षण के अधिकार से वंचित किया गया और जांच ने अप्रमाणित प्रारंभिक प्रतिवेदन पर अनुचित रूप से भरोसा किया।
  • प्रश्न: क्या जांच अधिकारी एवं अनुशासनिक प्राधिकारियों के निष्कर्ष विधिसम्मत साक्ष्य से समर्थित थे?
    उत्तर: नहीं। पटना उच्च न्यायालय ने माना कि निष्कर्ष किसी विधिक साक्ष्य पर आधारित नहीं थे, बल्कि केवल एक प्रारंभिक प्रतिवेदन पर टिका था, जिसके अंतर्वस्तु को जांच में कभी सिद्ध ही नहीं किया गया।
  • प्रश्न: क्या बर्खास्तगी और अपीलीय आदेश संविधान के अनुच्छेद 226 के अंतर्गत न्यायिक समीक्षा में कायम रह सकते थे?
    उत्तर: नहीं। न्यायालय ने कहा कि आदेश तर्कहीन, संक्षिप्त, मस्तिष्क प्रयोग के अभाव से ग्रस्त थे, अपीलीय दायित्व से सम्बन्धित नियम 27 का उल्लंघन करते थे और इसलिए इन्हें निरस्त किया जाना आवश्यक था। रिट याचिका स्वीकार की गई और आदेश निरस्त होने के परिणामों के पालन का निर्देश दिया गया।

न्यायालय द्वारा उद्धृत मामले

  • Roop Singh Negi v. Punjab National Bank & Ors, (2009) 2 SCC 570
  • Ayaaubkhan Noorkhan Pathan v. State of Maharashtra & Ors, (2013) 4 SCC 465
  • Oryx Fisheries Pvt. Ltd. v. Union of India & Ors, (2010) 13 SCC 427
  • Panchanan Kumar v. The Bihar State Electricity Board & Ors, 1996 (1) PLJR 401
  • D.K. Yadav v. J.M.A. Industries Ltd., (1993) 3 SCC 259 : 1994 (1) PLJR 55 (SC)
  • State of Uttar Pradesh & Ors v. Saroj Kumar Sinha, (2010) 2 SCC 772
  • Commissioner of Police, Delhi & Ors v. Jai Bhagwan, (2011) 6 SCC 376
  • Union of India v. P. Gunasekaran, (2015) 2 SCC 610
  • State of Haryana v. Rattan Singh, (1977) 2 SCC 491 : AIR 1977 SC 1512
  • Airports Authority of India v. Pradip Kumar Banerjee, (2025) 4 SCC 111
  • Boloram Bordoloi v. Lakhimi Gaolia Bank, (2021) 3 SCC 806
  • Om Prakash Sah v. State of Bihar & Ors, LPA No. 34 of 2014 (Patna High Court)
  • Anuj Kumar Singh v. State of Bihar & Ors, CWJC No. 6409 of 2016 (Patna High Court)
  • Ras Bihari Paswan v. State of Bihar & Ors, CWJC No. 8664 of 2017 (Patna High Court)
  • Arun Kumar Jha v. State of Bihar & Ors, CWJC No. 8955 of 2015 (Patna High Court)
  • K. Prabhakar Hegde v. Bank of Baroda, Civil Appeal No. 6599 of 2025, judgment dated 19.08.2025 (Supreme Court of India)
  • CWJC No. 16616 of 2021, Patna High Court (Sunil Kumar का मामला, संबंधित विभागीय कार्यवाही)

मामले का विवरण

मामला संख्या: Civil Writ Jurisdiction Case No. 2615 of 2021

मामले का शीर्षक: Sarwon Kumar v. State of Bihar & Ors

उद्धरण: 2026 (1) PLJR 337

पीठ (Coram): Hon’ble Mr. Justice Harish Kumar

निर्णय की तिथि: 22-08-2025

वादपत्रकार (Advocates):

  • याचिकाकर्ता की ओर से: Mr. Abhinav Srivastava, Senior Advocate; Mr. Shubham Priyadarshi, Advocate
  • प्रतिवादीगण (राज्य) की ओर से: Mr. Manoj Kumar, Advocate

मामले का स्वरूप: बिहार पुलिस ASI के विरुद्ध विभागीय कार्यवाही में सेवा से बर्खास्तगी और अपीलीय आदेश को चुनौती देते हुए संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत दायर रिट याचिका।

निर्णय का लिंक: पटना उच्च न्यायालय का पूर्ण निर्णय पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें

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