प्रकरण की पृष्ठभूमि
याचिकाकर्ता ने 1 अप्रैल 1975 को बिहार लोक सेवा आयोग द्वारा आयोजित 22वीं संयुक्त प्रतियोगी परीक्षा (15वीं न्यायिक सेवा) के माध्यम से चयन के बाद दरभंगा में न्यायिक मजिस्ट्रेट के रूप में बिहार न्यायिक सेवा जॉइन की। मार्च 1990 में उन्हें बिहार उच्चतर न्यायिक सेवा में पदोन्नत कर मुजफ्फरपुर में अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश के रूप में पदस्थापित किया गया।
उन्हें 19 अक्टूबर 1992 से उच्चतर न्यायिक सेवा में स्थायी किया गया और 1 फरवरी 1997 से प्रतिगामी प्रभाव के साथ चयन वेतनमान प्रदान किया गया। बाद में वे 2001 में जिला एवं सत्र न्यायाधीश बने, फिर बिहार राज्य विधि आयोग के सदस्य सचिव और उसके बाद बिहार न्यायिक अधिकारियों प्रशिक्षण संस्थान, पटना (अब बिहार न्यायिक अकादमी) के पहले निदेशक बने।
जब वे प्रशिक्षण संस्थान के निदेशक थे, उस समय एक शिकायतकर्ता मोहम्मद अज़हर द्वारा माननीय मुख्य न्यायाधीश, पटना उच्च न्यायालय को एक शिकायत भेजी गई। शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया कि याचिकाकर्ता एक वरिष्ठ न्यायिक अधिकारी के रूप में अपनी स्थिति का दुरुपयोग कर पूर्वी चंपारण के स्थानीय प्रशासन और न्यायिक अधिकारियों पर गंभीर भूमि विवाद के संबंध में दबाव डाल रहे थे, जिसमें पांच लोगों की मृत्यु और कई लोग घायल हुए थे, और जिसके परिणामस्वरूप तुरकौलिया थाना कांड संख्या 318/2005 दर्ज हुआ।
इस शिकायत पर उच्च न्यायालय ने तत्कालीन जिला एवं सत्र न्यायाधीश, पूर्वी चंपारण, मोतिहारी से प्रतिवेदन मांगा। जिला न्यायाधीश ने रिपोर्ट दी कि याचिकाकर्ता उनसे तीन बार उनके सरकारी आवास पर मिले और टेलीफोन पर भी बात की, तथा उनसे आपराधिक मामले में मदद करने और लगभग 75 बीघा विवादित भूमि के संबंध में अनुकूल आदेश पारित कराने हेतु जिला पदाधिकारी, पूर्वी चंपारण, मोतिहारी को प्रभावित करने का अनुरोध किया।
6 जुलाई 2006 को पटना उच्च न्यायालय की स्थायी समिति ने विभागीय कार्यवाही की आशंका में याचिकाकर्ता को निलंबित करने और उनके मुख्यालय को सिविल न्यायालय घोषित करने का संकल्प पारित किया। यह निलंबन 10 जुलाई 2006 के ज्ञापन संख्या 6631-33 द्वारा सूचित किया गया। इसी बैठक में, स्थायी समिति ने अधिसूचना संख्या 233A दिनांक 23 जून 2006 द्वारा प्रदत्त सुपर टाइम स्केल की सूची में याचिकाकर्ता का नाम वापस ले लिया। इस वापसी को 11 जुलाई 2006 के ज्ञापन संख्या 6643-47 द्वारा अधिसूचित किया गया।
इसके बाद 25 सितंबर 2006 के ज्ञापन संख्या 9925 द्वारा उन पर आरोप पत्र जारी किया गया। मुख्य आरोप यह था कि पटना स्थित न्यायिक अधिकारियों प्रशिक्षण संस्थान के निदेशक के रूप में पदस्थ रहते हुए उन्होंने भूमि विवाद तथा तुरकौलिया थाना कांड संख्या 318/2005 के संबंध में जिला न्यायाधीश, मोतिहारी और मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी, मोतिहारी को प्रभावित करने की कोशिश की, जबकि उक्त मामले में एक प्रतिवेदन में उन्हें षड्यंत्रकर्ता के रूप में नामित किया गया था।
याचिकाकर्ता ने अपने निलंबन और विभागीय कार्यवाही को CWJC संख्या 5500/2007 में चुनौती दी, तथा सुपर टाइम स्केल की वापसी को अलग से CWJC संख्या 13586/2006 में चुनौती दी। 30 अप्रैल 2008 को पटना उच्च न्यायालय की द्वैवपीठ ने दोनों रिट याचिकाओं को स्वीकार करते हुए निलंबन, विभागीय कार्यवाही और सुपर टाइम स्केल की वापसी को रद्द कर दिया।
इस आदेश के अनुपालन में, स्थायी समिति ने 20 मई 2008 को उनका निलंबन वापस लिया और विभागीय कार्यवाही समाप्त कर दी, हालांकि उच्च न्यायालय की अपील दायर करने की मंशा के अधीन। इसके बाद उन्हें परिवार न्यायालय, कटिहार के प्रधान न्यायाधीश के रूप में पदस्थ किया गया, जहाँ उन्होंने 7 अगस्त 2008 को कार्यभार संभाला।
प्रशासनिक पक्ष पर, उच्च न्यायालय ने सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष विशेष अनुमति याचिकाएँ (SLP (C) संख्या 12618/2008 और 22890/2008) उच्च न्यायालय के आदेशों के विरुद्ध दायर कीं। 19 सितंबर 2008 को सर्वोच्च न्यायालय ने अंतरिम स्थगन प्रदान किया। 3 अक्टूबर 2008 को SLPs का निपटारा करते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने अंतरिम स्थगन को स्थायी किया और पटना उच्च न्यायालय को निर्देश दिया कि वह चार सप्ताह के भीतर याचिकाकर्ता के विरुद्ध विभागीय कार्यवाही पूर्ण करे, और तब तक उन्हें निलंबित रखने का आदेश दिया।
इन निर्देशों के अनुपालन में, 15 अक्टूबर 2008 के आदेश द्वारा याचिकाकर्ता को पुनः निलंबित कर दिया गया, इस बार परिवार न्यायालय के प्रधान न्यायाधीश के पद से। विभागीय जांच 22 दिसंबर 2008 को पुनः शुरू हुई।
इस अवधि के दौरान वे निलंबित ही रहे और अंततः 31 अक्टूबर 2009 को सेवानिवृत्त हो गए। सेवानिवृत्ति के पश्चात, 10 नवंबर 2009 को स्थायी समिति ने बिहार पेंशन नियमावली, 1950 के नियम 43(ख) के अंतर्गत विभागीय कार्यवाही जारी रखने का संकल्प पारित किया। इस रूपांतरण को 16 नवंबर 2009 के ज्ञापन संख्या 17602 द्वारा अधिसूचित किया गया।
न्यायालय ने क्या विचार किया और क्या निर्णय दिया
जांच अधिकारी ने तीन प्रमुख गवाहों के साक्ष्य दर्ज किए: जिला एवं सत्र न्यायाधीश, पूर्वी चंपारण, मोतिहारी; शिकायतकर्ता मोहम्मद अज़हर; और जिला पदाधिकारी, पूर्वी चंपारण, मोतिहारी। अभियोजन साक्ष्य 11 दिसंबर 2009 को बंद होने के बाद, याचिकाकर्ता ने 21 दिसंबर 2009 को अपना लिखित बचाव-पत्र दाखिल किया। अपने बचाव में उन्होंने किसी भी प्राधिकारी पर दबाव डालने से इंकार किया और कहा कि उनका उस भूमि विवाद से कोई संबंध नहीं है, तथा जिला न्यायाधीश द्वारा साजिश और पक्षपात का आरोप लगाया।
जिला न्यायाधीश का साक्ष्य और उनकी पूर्व रिपोर्ट अत्यंत महत्वपूर्ण थे। उन्होंने गवाही दी कि याचिकाकर्ता तीन बार उनके सरकारी आवास पर आए और टेलीफोन से संपर्क किया, तथा उनसे भूमि विवाद में मदद करने और जिला पदाधिकारी पर प्रभाव डालकर अनुकूल आदेश दिलवाने का अनुरोध किया। जांच अधिकारी ने यह उल्लेख किया कि याचिकाकर्ता ने जिला न्यायाधीश से कई बिंदुओं पर जिरह की, किंतु इन व्यक्तिगत मुलाकातों के बारे में एक भी प्रश्न नहीं पूछा। उच्च न्यायालय ने बाद में जिरह के दौरान इस चुप्पी को जिला न्यायाधीश के बयान को विश्वसनीय और पक्षपात रहित मानने का मजबूत आधार माना।
शिकायतकर्ता मोहम्मद अज़हर की भी गवाही ली गई। उन्होंने कहा कि चूँकि याचिकाकर्ता उच्च न्यायिक पद पर आसीन थे, इसलिए वे स्वयं को माननीय मुख्य न्यायाधीश को प्रार्थना-पत्र भेजने के लिए विवश महसूस कर रहे थे। जांच प्रतिवेदन में दर्ज है कि याचिकाकर्ता ने जिरह में अज़हर से 180 से अधिक प्रश्न पूछे, जिनमें से अधिकांश विवादित भूमि के विवरण पर केंद्रित थे। जांच अधिकारी के लिए यह अत्यधिक पूछताछ याचिकाकर्ता के इस दावे के विपरीत थी कि उनका भूमि से कोई लेना-देना नहीं, और इससे यह प्रदर्शित हुआ कि उन्हें विवाद में गहरी जानकारी एवं संलग्नता थी।
तीसरे प्रमुख गवाह जिला पदाधिकारी, पूर्वी चंपारण, मोतिहारी थे। उन्होंने पुष्टि की कि भूमि के संबंध में याचिकाकर्ता के परिवार के पक्ष में कई आदेश पारित हुए थे, फिर भी वे कब्जा नहीं ले पाए थे। इसके बाद याचिकाकर्ता के भाई ने जिला पदाधिकारी के समक्ष एक प्रार्थना-पत्र दाखिल किया, जिसमें भूमि की बुवाई हेतु मजिस्ट्रेट और पुलिस बल की तैनाती का अनुरोध किया गया। मूल अभिलेख प्रस्तुत किए गए और उनकी जांच की गई। याचिकाकर्ता ने अपने भाई द्वारा कथित रूप से प्रस्तुत दस्तावेजों की प्रामाणिकता पर प्रश्न उठाने की कोशिश की, परंतु जिला पदाधिकारी की गवाही को इस संदर्भ में कमजोर नहीं किया जा सका।
इन साक्ष्यों के आधार पर जांच अधिकारी ने निष्कर्ष निकाला कि याचिकाकर्ता और उनका परिवार विवादित भूमि पर कब्जा सुनिश्चित करना चाहते थे, और उन्होंने वरिष्ठ न्यायिक अधिकारी के रूप में अपने पद का उपयोग कर जिला न्यायाधीश के माध्यम से जिला पदाधिकारी पर दबाव डालने की कोशिश की। जब ये प्रयास सफल नहीं हुए, तो परिवार ने स्वयं कब्जा लेने की कोशिश की, जिसके परिणामस्वरूप हिंसक घटना घटी और पाँच लोगों की मृत्यु तथा कई लोग घायल हुए।
जांच अधिकारी ने आगे यह भी माना कि याचिकाकर्ता ने व्यक्तिगत भूमि विवाद में मदद लेने के लिए जिला न्यायाधीश से संपर्क किया, जिससे एक निजी पारिवारिक विवाद और उनके न्यायिक अधिकारी के रूप में आधिकारिक पद के बीच की सीमा धुंधली हो गई। ऐसा करते हुए वह अपने उच्च पद की गरिमा और प्रतिष्ठा बनाए रखने में विफल रहे।
जांच प्रतिवेदन 30 जुलाई 2010 को प्रस्तुत होने के बाद, स्थायी समिति के 10 अगस्त 2010 के निर्णय के अनुसार रजिस्ट्री ने प्रतिवेदन की प्रति याचिकाकर्ता को उपलब्ध कराई और कार्यालय पत्र संख्या 12214 दिनांक 20 अगस्त 2010 द्वारा उनसे यह कारण बताने को कहा कि प्रतिवेदन को क्यों न स्वीकार किया जाए और बिहार पेंशन नियमावली, 1950 के नियम 43(ख) के अंतर्गत कार्रवाई क्यों न की जाए।
याचिकाकर्ता ने 6 सितंबर 2010 को अपना उत्तर दाखिल किया और कई आपत्तियाँ उठाईं। उन्होंने शिकायत को अस्पष्ट बताते हुए उस पर प्रहार किया, यह दलील दी कि जिला न्यायाधीश या मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी से मुलाकात की कोई विशिष्ट तिथि और समय दर्ज नहीं है, जिला पदाधिकारी को प्रभावित करने की किसी भी कोशिश से इंकार किया और कहा कि स्वयं शिकायतकर्ता ही अभियुक्त था, अतः वह शिकायत दर्ज नहीं कर सकता था। उन्होंने पुनः जिला न्यायाधीश द्वारा साजिश का आरोप दोहराया और यह तर्क दिया कि उच्च न्यायालय के प्रशासनिक पक्ष को उन पर अधिकार क्षेत्र प्राप्त नहीं था, क्योंकि वे राज्य सरकार में प्रतिनियुक्ति पर थे।
स्थायी समिति ने जांच अभिलेख और उनके उत्तर पर विचार किया। अपनी बैठक दिनांक 21 सितंबर 2010 में उसने बिहार पेंशन नियमावली के नियम 43(ख) के अंतर्गत अपनी शक्तियों का प्रयोग करते हुए उनकी पेंशन का 5% रोकने तथा संपूर्ण निलंबन अवधि को निलंबन के रूप में ही मानने का संकल्प पारित किया। इसे 25 सितंबर 2010 के ज्ञापन संख्या 14452 द्वारा औपचारिक रूप से सूचित किया गया।
याचिकाकर्ता ने इस दंड के विरुद्ध अपील दायर की, किंतु अपीलीय प्राधिकारी ने 6 दिसंबर 2010 के ज्ञापन संख्या 18567 द्वारा इसे खारिज कर दिया। इसके बाद उन्होंने वर्तमान रिट याचिकाएँ दायर कीं: CWJC संख्या 4937/2011, जिसमें पेंशन कटौती, निलंबन अवधि के उपचार और संबंधित पेंशन लाभों को चुनौती दी गई; और CWJC संख्या 4749/2011, जिसमें सुपर टाइम स्केल की वापसी को चुनौती दी गई।
पटना उच्च न्यायालय ने, माननीय श्री न्यायमूर्ति राजीव रॉय (माननीय मुख्य न्यायाधीश सहित पीठ की ओर से) द्वारा बोलते हुए, उनके प्रत्येक आधार पर विचार किया।
प्रथम, जिला न्यायाधीश द्वारा साजिश और पक्षपात के आरोप पर न्यायालय ने यह नोट किया कि याचिकाकर्ता ने जिरह में कभी भी जिला न्यायाधीश से उनके आवास पर कथित तीन मुलाकातों के बारे में प्रश्न नहीं किया। इस परिस्थिति में न्यायालय ने जांच अधिकारी की इस राय को स्वीकार किया कि जिला न्यायाधीश की रिपोर्ट और गवाही को पक्षपाती नहीं माना जा सकता।
द्वितीय, भूमि से किसी प्रकार के संबंध से इंकार करने के उनके दावे को खारिज किया गया। न्यायालय ने जांच अधिकारी के इस अवलोकन का उल्लेख किया कि याचिकाकर्ता ने मोहम्मद अज़हर से भूमि के संबंध में लगभग 180 प्रश्न पूछे थे, जो उनके विस्तृत ज्ञान को दर्शाता है। जिला पदाधिकारी के अभिलेख, जिनमें याचिकाकर्ता के भाई द्वारा मजिस्ट्रेट और पुलिस बल उपलब्ध कराने हेतु कब्जा दिलाने के लिए प्रार्थना-पत्र शामिल थे, ने भी भूमि के प्रति परिवार की सक्रिय दिलचस्पी की पुष्टि की।
तृतीय, न्यायालय ने उनके अधिकार-क्षेत्र संबंधी आपत्ति की जांच की, अर्थात यह कि वे जब राज्य सरकार में प्रतिनियुक्ति पर थे, उस समय उच्च न्यायालय उन्हें निलंबित नहीं कर सकता था या विभागीय कार्यवाही आरंभ नहीं कर सकता था। न्यायालय ने दर्ज किया कि यही तर्क पहले CWJC संख्या 5500/2007 में स्वीकार कर लिया गया था, परंतु वह निर्णय वस्तुतः तब निरस्त हो गया जब सर्वोच्च न्यायालय ने SLPs में स्थगन को स्थायी करते हुए उच्च न्यायालय को स्वयं विभागीय कार्यवाही पूर्ण करने तथा उन्हें निलंबित रखने का निर्देश दिया। सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय State of West Bengal v. Nripendra Nath Bagchi (AIR 1966 SC 447) पर भरोसा करते हुए पीठ ने दोहराया कि संविधान के अनुच्छेद 235 में निहित “नियंत्रण” में अनुशासनात्मक नियंत्रण सम्मिलित है और अधीनस्थ न्यायपालिका पर यह नियंत्रण उच्च न्यायालय में निहित है। न्यायालय ने माना कि प्रतिनियुक्ति पर रहते हुए भी याचिकाकर्ता बिहार उच्चतर न्यायिक सेवा के सदस्य बने रहे और पटना उच्च न्यायालय को उन पर पूर्ण अनुशासनात्मक अधिकार प्राप्त रहा।
चतुर्थ, इस तर्क पर कि नियम 43(ख) के अंतर्गत कार्यवाही जारी नहीं रखी जा सकती क्योंकि अंतिम आदेश में “गंभीर दुराचरण” या “आर्थिक क्षति” का कोई विशिष्ट निष्कर्ष दर्ज नहीं है, न्यायालय ने पूर्णपीठ के निर्णय Shambhu Saran v. State of Bihar, 2000 (1) PLJR 665 पर भरोसा किया। उस निर्णय ने स्पष्ट किया कि जहाँ सेवानिवृत्ति से पूर्व ही विभागीय कार्यवाही आरंभ हो गई हो, वहाँ सेवानिवृत्ति के बाद वह नियम 43(ख) के तहत बिना किसी नये आदेश के स्वतः जारी रह सकती है, और नियम में उल्लिखित सुरक्षा प्रावधान केवल उन मामलों में लागू होते हैं जहाँ सेवानिवृत्ति के समय कोई कार्यवाही लंबित न हो। पीठ ने माना कि याचिकाकर्ता के विरुद्ध जांच सेवानिवृत्ति से पूर्व ही शुरू हो चुकी थी; अतः वह नियम 43(ख) के अंतर्गत वैध रूप से जारी रही। न्यायालय ने यह भी माना कि सिद्ध आरोपों की प्रकृति—व्यक्तिगत लाभ के लिए वरिष्ठ न्यायाधीश के पद का उपयोग कर प्रशासन को प्रभावित करने का प्रयास—स्पष्ट रूप से गंभीर दुराचरण के दायरे में आती है, भले ही अंतिम आदेश में ये शब्द स्पष्ट रूप से प्रयुक्त न किए गए हों।
पंचम, याचिकाकर्ता ने यह भी दावा किया कि दंड आदेश और अपीलीय आदेश “अकारण” (non-speaking) हैं, अतः विधि विरुद्ध हैं। न्यायालय ने कहा कि अनुशासनात्मक प्राधिकारी जांच अधिकारी के निष्कर्षों से सहमत था और ऐसी स्थिति में उसे साक्ष्यों का पुनर्मूल्यांकन करने या पुनः विस्तृत कारण देने की आवश्यकता नहीं थी। इस सिद्धांत के लिए न्यायालय ने सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय State Bank of Bikaner and Jaipur v. Prabhu Dayal Grover, (1995) 6 SCC 279 का संदर्भ दिया, जिसमें यह स्पष्ट किया गया है कि जब अनुशासनात्मक या अपीलीय प्राधिकारी जांच अधिकारी से असहमत हो या नयी जांच का निर्देश दे तो कारण देना अनिवार्य है, किंतु केवल सहमति जताते समय, बशर्ते उसने अपने मस्तिष्क का उपयोग किया हो, विस्तृत कारण आवश्यक नहीं।
षष्ठ, न्यायालय ने निलंबन अवधि के लिए पूर्ण वेतन और भत्तों की उनकी माँग पर विचार किया। आरोप सिद्ध होने और दंडित किए जाने की स्थिति में पीठ ने माना कि वे निलंबन अवधि के लिए पूर्ण वेतन पाने के अधिकारी नहीं हैं। न्यायालय ने यह भी नोट किया कि बाद का निलंबन, सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश पर, परिवार न्यायालय के प्रधान न्यायाधीश के पद से हुआ, जो एक न्यायिक पद है, प्रतिनियुक्ति का पद नहीं। चूँकि वे दोषमुक्त नहीं हुए बल्कि दोषसिद्ध पाए गए, अतः निलंबन अवधि के लिए वेतन-वापसी (back wages) का दावा नहीं कर सकते।
सप्तम, सुपर टाइम स्केल की वापसी (CWJC संख्या 4749/2011) को चुनौती के संदर्भ में, न्यायालय ने माना कि एक बार जब उन्हें गंभीर दुराचरण का दोषी पाया गया और दंडित किया गया, तो वे उच्च वेतनमान का लाभ लेने पर जोर नहीं दे सकते। न्यायालय ने सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय Union of India v. K.V. Jankiraman, (1991) 4 SCC 109, विशेषतः अनुच्छेद 29, का हवाला देते हुए रेखांकित किया कि किसी कर्मचारी को ऐसी अवधि के लिए प्रोन्नति या उच्च वेतनमान प्रत्यावर्ती रूप से (retrospectively) माँगने का अधिकार नहीं है, जिसके दौरान के आचरण पर बाद में उसे दंडित किया गया हो। पदोन्नति कोई अधिकार नहीं; केवल पदोन्नति के लिए विचार किया जाना अधिकार है। निष्कलंक सेवा रिकॉर्ड एक न्यूनतम आवश्यकता है, और दंडित हो जाने के बाद वे उस मानक पर खरे नहीं उतरते।
न्यायालय ने यह भी उल्लेख किया कि पहले पटना उच्च न्यायालय द्वारा सुपर टाइम स्केल की वापसी रद्द करने का आदेश (CWJC संख्या 13586/2006) वस्तुतः तब उलट गया जब सर्वोच्च न्यायालय ने SLP (C) संख्या 23747/2008 को SLP (C) संख्या 22890/2008 के साथ सुनकर उच्च न्यायालय की अपीलें स्वीकार कर लीं। अतः अब याचिकाकर्ता सुपर टाइम स्केल की वापसी को पुनः नहीं खोल सकते; इस संबंध में कोई भी दावा अव्यवहार्य है।
इन सभी पहलुओं पर विचार करने के बाद पीठ ने निष्कर्ष निकाला कि विभागीय कार्यवाही और दंड आदेश में कोई कानूनी या प्रक्रिया संबंधी त्रुटि नहीं है। न्यायालय ने माना कि याचिकाकर्ता आरोप के लिए दोषी हैं और इस कारण वे न तो पूर्ण पेंशन के, न ही सुपर टाइम स्केल के अधिकारी हैं।
हालाँकि, 5% पेंशन कटौती की वैधानिकता को बरकरार रखते हुए, न्यायालय ने सीमित उदारता दिखाई। उसने यह अवलोकन किया कि पेंशन के 5% की स्थायी कटौती के आदेश पर प्रतिवादी संख्या 2 (पटना उच्च न्यायालय, अपने रजिस्ट्रार जनरल के माध्यम से) द्वारा “दूसरी बार विचार” किया जा सकता है। न्यायालय ने याचिकाकर्ता को चार सप्ताह के भीतर नया प्रतिनिधित्व दाखिल करने की अनुमति दी, जिसे प्राधिकारी को यथाशीघ्र उपयुक्त आदेश पारित कर निर्णय करना होगा।
अंततः CWJC संख्या 4937/2011 को पेंशन कटौती के परिमाण/स्थायित्व पर पुनर्विचार हेतु यह स्वतंत्रता देते हुए निपटाया गया और CWJC संख्या 4749/2011 को पूर्ण रूप से खारिज कर दिया गया।
यह निर्णय क्यों महत्वपूर्ण है
यह निर्णय सेवा में कार्यरत और सेवानिवृत्त सरकारी कर्मियों, विशेष रूप से न्यायिक अधिकारियों के लिए महत्वपूर्ण है, जिन्हें सेवानिवृत्ति के निकट भी विभागीय कार्यवाही का सामना करना पड़ सकता है। यह स्पष्ट करता है कि यदि किसी अधिकारी के सेवा में रहते हुए विभागीय जांच शुरू हो गई हो, तो वह सेवानिवृत्ति के बाद बिहार पेंशन नियमावली के नियम 43(ख) के अंतर्गत जारी रह सकती है, और यदि गंभीर दुराचरण सिद्ध हो जाए तो पेंशन लाभों में कटौती की जा सकती है।
राज्य सरकार की संस्थाओं या आयोगों में प्रतिनियुक्त न्यायिक अधिकारियों के लिए यह निर्णय यह पुनः स्थापित करता है कि पटना उच्च न्यायालय को संविधान के अनुच्छेद 235 के तहत पूर्ण नियंत्रण और अनुशासनात्मक अधिकार प्राप्त हैं। प्रतिनियुक्ति न्यायिक पद के दुरुपयोग के लिए उच्च न्यायालय की जांच से अधिकारी को सुरक्षा नहीं देती।
निर्णय यह भी दर्शाता है कि जब विधिसम्मत जांच हो चुकी हो और अनुशासनात्मक तथा अपीलीय प्राधिकारियों ने अपने मस्तिष्क का उपयोग कर निर्णय लिया हो, तो न्यायालय विभागीय निष्कर्षों में सहजता से हस्तक्षेप नहीं करेंगे। पक्षपात और साजिश के आरोपों का समर्थन जिरह और साक्ष्य से होना चाहिए, मात्र नंगे दावों से नहीं।
अंततः, यह निर्णय रेखांकित करता है कि सुपर टाइम स्केल जैसे उच्च वेतनमान और पदोन्नतियाँ स्वतःसिद्ध अधिकार नहीं हैं। जिस अधिकारी के आचरण को दोषपूर्ण पाया गया हो वह ऐसे लाभों पर ज़ोर नहीं दे सकता, भले ही उसे पहले ये लाभ प्रदान कर दिए गए हों और बाद में विभागीय कार्रवाई के कारण वे वापस ले लिए गए हों। साथ ही न्यायालय ने पेंशन कटौती की मात्रा पर मानवीय दृष्टिकोण से पुनर्विचार के लिए एक छोटा-सा अवसर भी खुला रखा।
कानूनी प्रश्न और उनके उत्तर
प्रश्न: क्या पटना उच्च न्यायालय प्रतिनियुक्ति के दौरान और यहाँ तक कि सेवानिवृत्ति के बाद भी विभागीय कार्यवाही आरंभ और जारी रख सकता था तथा याचिकाकर्ता को निलंबन पर रख सकता था?
उत्तर: हाँ। न्यायालय ने माना कि संविधान के अनुच्छेद 235 के अंतर्गत उच्च न्यायालय को न्यायिक अधिकारियों पर, प्रतिनियुक्त अधिकारी सहित, पूर्ण अनुशासनात्मक नियंत्रण प्राप्त है। जो जांच सेवानिवृत्ति से पूर्व वैध रूप से शुरू हो चुकी हो, वह बिहार पेंशन नियमावली के नियम 43(ख) के तहत स्वतः जारी रह सकती है।
प्रश्न: क्या 5% पेंशन रोके जाने और निलंबन अवधि को निलंबन ही मानने की सज़ा को कारणों के अभाव या अंतिम आदेश में “गंभीर दुराचरण” या “आर्थिक क्षति” का स्पष्ट निष्कर्ष न होने के आधार पर रद्द किया जा सकता था?
उत्तर: नहीं। चूँकि अनुशासनात्मक प्राधिकारी ने कार्यालय के गंभीर दुरुपयोग से संबंधित जांच अधिकारी के निष्कर्षों से सहमति व्यक्त की थी, उसे पुनः विस्तृत कारण लिखने की आवश्यकता नहीं थी। सिद्ध आरोपों की प्रकृति स्वयं नियम 43(ख) के अंतर्गत गंभीर दुराचरण को प्रदर्शित करती है, भले ही ये शब्द स्पष्ट रूप से प्रयुक्त न हुए हों।
प्रश्न: क्या याचिकाकर्ता सुपर टाइम स्केल की बहाली और निलंबन अवधि के पूर्ण वेतन के हकदार थे?
उत्तर: नहीं। न्यायालय ने माना कि ऐसे उच्च लाभों के लिए निष्कलंक सेवा रिकॉर्ड आवश्यक है। एक बार गंभीर दुराचरण सिद्ध हो जाने और दंड लगाए जाने के बाद वे सुपर टाइम स्केल या निलंबन अवधि के पूर्ण वेतन का दावा नहीं कर सकते। इन लाभों से वंचित किया जाना उनके आचरण का स्वाभाविक परिणाम है, कोई अतिरिक्त दंड नहीं।
न्यायालय द्वारा उद्धृत मामले
- State of West Bengal & Anr. v. Nripendra Nath Bagchi, AIR 1966 SC 447
- Shambhu Saran v. State of Bihar & Ors., 2000 (1) PLJR 665 (Full Bench, Patna High Court)
- State Bank of Bikaner, Jaipur & Ors. v. Prabhu Dayal Grover, (1995) 6 SCC 279
- Union of India & Ors. v. K.V. Jankiraman & Ors., (1991) 4 SCC 109
मामले का विवरण
प्रकरण संख्या: CWJC संख्या 4937/2011; CWJC संख्या 4749/2011
मामले का शीर्षक: Vikas Kumar Sharma v. The State of Bihar & Ors. (दोनों रिट याचिकाओं में)
न्यायालय: High Court of Judicature at Patna
पीठ: Hon’ble the Chief Justice; Hon’ble Mr. Justice Rajiv Roy
निर्णय की तिथि: 1 फरवरी 2024
उद्धरण: 2024 (1) PLJR 848
पक्षकारों के अधिवक्ता:
- याचिकाकर्ता की ओर से: Mr. Nand Kishore Singh, Advocate
- प्रतिवादियों (राज्य बिहार एवं पटना उच्च न्यायालय) की ओर से: Mr. Piyush Lall, Advocate
मामले का स्वरूप: संविधान के अनुच्छेद 226 के अंतर्गत सिविल रिट अधिकारिता वाले मामले, जिनमें (i) बिहार पेंशन नियमावली, 1950 के नियम 43(ख) के तहत विभागीय दंड एवं पेंशन कटौती, तथा (ii) सुपर टाइम स्केल वेतन प्रदान किए जाने की वापसी को चुनौती दी गई थी।
अंतिम परिणाम: CWJC संख्या 4937/2011 को पेंशन कटौती के परिमाण/स्थायित्व पर पुनर्विचार की स्वतंत्रता के साथ निपटाया गया; CWJC संख्या 4749/2011 खारिज; दुराचरण के निष्कर्ष, पेंशन कटौती, निलंबन अवधि के उपचार और सुपर टाइम स्केल की वापसी, सभी को बरकरार रखा गया।
निर्णय का लिंक: पटना उच्च न्यायालय का पूरा निर्णय पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें
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