पटना उच्च न्यायालय: पुराने दीवानी मुकदमे में बार-बार लिखावट विशेषज्ञ की मांग को अदालत ने ठुकराया (2022)

निर्णय की सरल व्याख्या

पटना उच्च न्यायालय ने अगस्त 2022 में एक ऐसे दीवानी मुकदमे पर फैसला सुनाया जो पिछले तीन दशकों से लंबित था। यह मुकदमा वर्ष 1990 में दायर हुआ था, जिसमें वादी (याचिकाकर्ता) ने “बिक्री के समझौते के विशेष निष्पादन” की मांग की थी। आसान भाषा में कहा जाए तो वादी चाहता था कि प्रतिवादी (बाद में जिनका निधन हो गया) को मजबूर किया जाए कि वे 1989 के कथित समझौते के अनुसार अपनी जमीन बेचें।

लेकिन प्रतिवादी का कहना था कि उन्होंने ऐसा कोई बिक्री का समझौता 05.08.1989 को नहीं किया। उन्होंने यह बात बहुत पहले, 2000 में जब वे गवाह बने, उसी समय अपने बयान में स्पष्ट कर दी थी।

मुकदमे के रिकॉर्ड के अनुसार, अदालत ने 2002 में प्रतिवादी के हस्ताक्षर अदालत के कर्मचारी (शेरिस्तेदार) के सामने लिए थे, ताकि उनकी तुलना विवादित दस्तावेज़ के हस्ताक्षर से कराई जा सके। लेकिन इसके बाद वादी ने लगभग 15 साल तक कोई कदम नहीं उठाया।

फिर 2017 में, जब मुकदमा लगभग समाप्ति के करीब था, वादी ने अचानक एक आवेदन देकर कहा कि उस विवादित हस्ताक्षर को हस्तलिपि विशेषज्ञ के पास भेजा जाए।

अदालत ने पाया कि मुकदमे की सुनवाई बहुत आगे बढ़ चुकी है — अपील से लौटने के बाद गवाह फिर से पेश हो चुके हैं, दस्तावेज़ साक्ष्य में लिए जा चुके हैं और बहस भी शुरू हो चुकी है। ऐसे में, अदालत को यह आवेदन सिर्फ देरी करने का प्रयास लगा। इसलिए 19 फरवरी 2018 को अदालत ने यह आवेदन खारिज कर दिया।

लेकिन वादी ने फिर 13 मार्च 2018 को वही मांग दोबारा रखी। अदालत ने दूसरी बार भी, 09 अप्रैल 2018 को, यह कहते हुए आवेदन खारिज कर दिया कि एक ही मांग के लिए बार-बार आवेदन देना न्याय प्रक्रिया का दुरुपयोग है।

इसके बाद वादी ने पटना उच्च न्यायालय में एक दीवानी याचिका दायर की — सिविल मिसलेनियस जुरिडिक्शन नंबर 1152/2018 — यह कहते हुए कि निचली अदालत ने गलती की है और उसे हस्ताक्षर की जांच की अनुमति मिलनी चाहिए थी।

माननीय न्यायमूर्ति अनिल कुमार सिन्हा ने निचली अदालत के आदेश को सही ठहराया और कहा कि अदालत का रुख पूरी तरह न्यायसंगत है। न्यायालय ने कहा —

  • यह मुकदमा 1990 का है।
  • प्रतिवादी ने 2000 में ही हस्ताक्षर से इंकार कर दिया था।
  • अदालत ने 2002 में नमूना हस्ताक्षर ले लिया था।
  • इसके बाद वादी ने 15 साल तक कुछ नहीं किया।
  • और जब मुकदमा अंतिम बहस पर था, तभी आवेदन दिया गया।

इन परिस्थितियों में अदालत ने माना कि यह आवेदन सिर्फ कार्यवाही को लंबा खींचने के लिए किया गया है। इसलिए उच्च न्यायालय ने भी हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया और कहा कि विशेषज्ञ की राय लेना कोई अधिकार नहीं, बल्कि अदालत का विवेकाधिकार है।

अंततः, पटना उच्च न्यायालय ने वादी की याचिका खारिज कर दी और निचली अदालत के आदेशों को बरकरार रखा। अब मुकदमा बिना विशेषज्ञ जांच के आगे बढ़ेगा।

निर्णय का महत्व और इसका प्रभाव आम जनता या सरकार पर

यह फैसला तीन दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है —

  1. अनावश्यक देरी को अदालतें बर्दाश्त नहीं करेंगी: जब कोई मुकदमा बहुत पुराना हो जाता है, तो अदालतें ऐसे आवेदन तुरंत खारिज कर सकती हैं जो मुकदमे को लटकाने के लिए किए गए हों।
  2. विशेषज्ञ राय लेना कोई अधिकार नहीं है: हर विवादित हस्ताक्षर को विशेषज्ञ के पास भेजना जरूरी नहीं। अदालत देखेगी कि यह मांग समय पर की गई या नहीं, और क्या यह वास्तव में मामले के निपटारे में मदद करेगी।
  3. उच्च न्यायालय का हस्तक्षेप सीमित है: अगर निचली अदालत का आदेश तर्कसंगत है, तो उच्च न्यायालय सामान्यतः उसमें दखल नहीं देता।

यह फैसला बिहार के दीवानी मामलों में एक स्पष्ट संदेश देता है — यदि किसी दस्तावेज़ पर संदेह है, तो शुरुआत में ही कदम उठाएं। देरी करने पर अदालतें आपकी बात नहीं मानेंगी।

कानूनी मुद्दे और निर्णय

  • क्या अदालत अंतिम चरण में विशेषज्ञ राय के लिए आवेदन खारिज कर सकती है?
    ✔️ हाँ। अगर अदालत को लगता है कि यह मांग देरी कराने के लिए की गई है, तो उसे खारिज किया जा सकता है।
  • क्या एक ही मुद्दे पर बार-बार आवेदन देना उचित है?
    ❌ नहीं। एक बार जब आवेदन खारिज हो गया, तो उसी मांग को दोहराना न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग है।
  • क्या उच्च न्यायालय ऐसे आदेशों में दखल दे सकता है?
    ✔️ नहीं, जब तक आदेश में कोई स्पष्ट त्रुटि या गैरकानूनी बात न हो।
  • क्या लंबे समय तक निष्क्रिय रहने से आवेदन खारिज किया जा सकता है?
    ✔️ हाँ। अगर वादी वर्षों तक कोई कदम नहीं उठाता, तो बाद में किया गया आवेदन विश्वसनीय नहीं माना जाएगा।

मामले का शीर्षक
वादी बनाम प्रतिवादी (नाम गोपनीय)

केस नंबर
Civil Miscellaneous Jurisdiction No. 1152 of 2018
(संबंधित मामला – Title Suit No. 68 of 1990, मुंसिफ न्यायालय, बिहार शरीफ)

उद्धरण (Citation)
2023 (1) PLJR 68

न्यायमूर्ति गण का नाम
माननीय श्री न्यायमूर्ति अनिल कुमार सिन्हा

वकीलों के नाम और किनकी ओर से पेश हुए
वादी की ओर से — श्री भूपेन्द्र कुमार वर्मा, अधिवक्ता
प्रतिवादी की ओर से — अभिलेख में स्पष्ट नहीं

निर्णय का लिंक

NDQjMTE1MiMyMDE4IzMjTg==-h7NjMfSi6e0=

यदि आपको यह जानकारी उपयोगी लगी और आप बिहार में कानूनी बदलावों से जुड़े रहना चाहते हैं, तो Samvida Law Associates को फॉलो कर सकते हैं।

Facing a similar matter before the Patna High Court? Contact Samvida Law Associates.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Recent News