दुर्घटना क्षतिपूर्ति के विरुद्ध बीमा अपील खारिज — पटना उच्च न्यायालय, 2026

Sakshi Bhatnagar

Reviewed by: Sakshi Bhatnagar

License Number: BR/2891A/2019

Sakshi Bhatanagar is a lawyer at Samvida Law Associates practicing criminal law. She represents clients in criminal proceedings before the Patna High Court and subordinate courts, handling bail applications, criminal appeals, NDPS matters, and customs-related cases. Her practice focuses on criminal defense and litigation across multiple forums in Bihar.

इस वाद में एक बीमा कंपनी ने मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण द्वारा पारित क्षतिपूर्ति अवार्ड को चुनौती दी थी। पटना उच्च न्यायालय ने मृत अभियंता के परिवार के पक्ष में अधिकरण के निर्णय को बरकरार रखा। न्यायालय ने वाहन की पहचान और आयकर कटौती से संबंधित बीमाकर्ता की आपत्तियों को अस्वीकार कर दिया। कंपनी को 19 फरवरी 2026 तक शेष पूरी क्षतिपूर्ति राशि ब्याज सहित अदा करने का निर्देश दिया गया है।

मामले की पृष्ठभूमि

09.07.2012 को ग्रामीण कार्य विभाग, बिहार, पटना के एक सहायक अभियंता अपनी मोटरसाइकिल से दरभंगा की ओर जा रहे थे। जब वे बहादुरपुर थाना क्षेत्र, जिला दरभंगा के तरलाही के पास पहुंचे, तो पीछे से एक ट्रैक्टर रजिस्ट्रेशन संख्या BR-07-G-4161 आया।

आरोप है कि ट्रैक्टर ने मोटरसाइकिल को लापरवाह और तेजी से चलाते हुए टक्कर मार दी। अभियंता को गंभीर चोटें आईं और उन्हें दरभंगा मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल, दरभंगा ले जाया गया, जहां उपचार के दौरान उसी दिन उनकी मृत्यु हो गई।

दुर्घटना के बाद सामान्य आपराधिक प्रक्रिया अनुसरित हुई। 09.07.2012 को बहादुरपुर थाना कांड संख्या 252 वर्ष 2012 के रूप में प्राथमिकी दर्ज की गई। जांच की गई और अभियोग पत्र समर्पित किया गया। दुर्घटना में शामिल ट्रैक्टर The New India Assurance Company Limited के साथ बीमित था।

मृतक के परिजन, जिनमें उनकी पत्नी और नाबालिग बच्चे शामिल हैं, ने मोटर वाहन दुर्घटना दावा अधिकरण, मुजफ्फरपुर के समक्ष दावा वाद दायर किया। यह वाद दावा वाद संख्या 326/12 के रूप में “Vijaya Kumari & Ors. vs. Jyoti Devi & Another” शीर्षक से दर्ज हुआ। ट्रैक्टर की मालकिन को प्रतिवादी बनाया गया और बीमाकर्ता को द्वितीय प्रतिवादी बनाया गया।

12वें अतिरिक्त जिला न्यायाधीश सह मोटर वाहन दुर्घटना दावा अधिकरण, मुजफ्फरपुर (अधिकरण) ने कई मुद्दे तय किए, जैसे दुर्घटना की घटना, लापरवाह एवं तीव्र गति से वाहन चलाना, बीमा कवरेज, ड्राइविंग लाइसेंस की वैधता, दावे की ग्राह्यता, तथा क्षतिपूर्ति की मात्रा और उसकी देयता।

दिनांक 07.11.2015 के निर्णय तथा 26.11.2015 के अवार्ड द्वारा अधिकरण ने यह माना कि ट्रैक्टर ने लापरवाह एवं तीव्र गति से चलाए जाने के कारण मृतक की मोटरसाइकिल को टक्कर मारी, और यह भी कि दुर्घटना के समय वाहन बीमा कंपनी के साथ बीमित था। अधिकरण ने मृतक की मासिक आय 47,941/- रुपये आंकी, उनकी आयु 54–55 वर्ष मानी, आवश्यक कटौतियां लागू कीं और कुल 42,27,428/- रुपये की क्षतिपूर्ति राशि निर्धारित की।

क्योंकि 50,000/- रुपये पहले ही अंतरिम क्षतिपूर्ति के रूप में अदा किए जा चुके थे, देय शुद्ध राशि 41,77,428/- रुपये निर्धारित की गई, जिस पर दावा वाद दायर किए जाने की तिथि से भुगतान होने तक प्रतिवर्ष 6% की दर से ब्याज देय था। इस निर्णय और अवार्ड से आहत और असंतुष्ट बीमा कंपनी ने पटना उच्च न्यायालय में सिविल अपील (विविध) संख्या 702 वर्ष 2016 दायर की।

न्यायालय ने क्या जांचा और क्या निर्णय दिया

पटना उच्च न्यायालय ने माननीय श्री न्यायमूर्ति राजीव रॉय के माध्यम से The New India Assurance Company Limited द्वारा दायर अपील की सुनवाई की। बीमाकर्ता ने न्यायालय के समक्ष दो मुख्य आपत्तियां उठाईं।

पहली आपत्ति यह थी कि बहादुरपुर थाना कांड संख्या 252 वर्ष 2012 में दर्ज प्राथमिकी एक “अज्ञात” ट्रैक्टर चालक के विरुद्ध दर्ज की गई थी। अतः, अपीलकर्ता के अनुसार यह निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता कि रजिस्ट्रेशन संख्या BR-07-G-4161 वाला ट्रैक्टर ही दुर्घटना में शामिल था। इस आधार पर कंपनी ने दावा किया कि वह दी गई क्षतिपूर्ति राशि अदा करने के लिए उत्तरदायी नहीं है।

दूसरी आपत्ति में बीमाकर्ता ने तर्क दिया कि अधिकरण ने मृतक की कुल सकल वेतन राशि 47,941/- रुपये प्रतिमाह के आधार पर क्षतिपूर्ति की गणना की, जबकि आयकर की कटौती नहीं की गई। कंपनी ने कहा कि वेतन से 30% आयकर की कटौती होनी चाहिए थी, जिससे अंतिम क्षतिपूर्ति राशि कम हो जाती।

दूसरी ओर, दावेदारों के अधिवक्ता ने दोनों आधारों का विरोध किया। पहले मुद्दे के संबंध में उन्होंने बहादुरपुर थाना कांड संख्या 252 वर्ष 2012 की केस डायरी से सामग्री प्रस्तुत की। इन अभिलेखों से यह स्पष्ट हुआ कि यद्यपि घटना स्थल पर उपस्थित न रहने के कारण, स्वाभाविक रूप से, विधवा ने एक “अज्ञात ट्रैक्टर” के विरुद्ध प्राथमिकी दर्ज कराई थी, परंतु पुलिस जांच द्वारा शीघ्र ही दोषी वाहन की पहचान कर ली गई।

केस डायरी से पता चला कि पुलिस ने 09.07.2012 को ही, अर्थात दुर्घटना की तिथि पर ही, ट्रैक्टर रजिस्ट्रेशन संख्या BR-07-G-4161 और ट्रेलर BR-07-G-4197 को जब्त कर लिया था। पुलिस ने इस वाहन के निरीक्षण हेतु मोटर वाहन निरीक्षक से अनुरोध भी किया। इस आधार पर दावेदारों ने तर्क दिया कि इस विशेष ट्रैक्टर का घातक दुर्घटना से संबंध होने के स्पष्ट प्रमाण हैं, अतः बीमाकर्ता देयता से नहीं बच सकता।

दूसरे मुद्दे के संदर्भ में, दावेदारों ने उच्च न्यायालय का ध्यान सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय Ranjana Prakash and Ors. vs. Divisional Manager & Anr., 2011 (5) SCC 382 की ओर आकर्षित किया। उस मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने अपने पूर्व निर्णय Sarla Verma का उल्लेख किया था।

Sarla Verma में प्रतिपादित सिद्धांत, जिसे सर्वोच्च न्यायालय ने Ranjana Prakash में उद्धृत किया, यह है कि यदि मृतक स्थायी नौकरी पर नियमित वेतन और समय-समय पर वेतन वृद्धि के प्रावधान के साथ कार्यरत था, तो 40 से 50 वर्ष के आयु वर्ग में 30% राशि को “भविष्य की संभावनाओं” के रूप में वर्तमान आय में जोड़ा जाना चाहिए। साथ ही, वास्तविक रूप से देय आयकर को वार्षिक आय से घटाकर क्षतिपूर्ति की गणना के लिए शुद्ध “आय” निकाली जानी है।

Ranjana Prakash में न्यायालय ने यह भी अवलोकन किया कि यदि दोनों कदम (भविष्य की संभावनाओं के लिए 30% जोड़ना और लगभग 30% आयकर की कटौती) एक साथ किए जाएं, तो कुछ मामलों में ये एक-दूसरे को संतुलित कर देते हैं और अधिकरण द्वारा अपनाई गई आय प्रभावी रूप से अपरिवर्तित रहती है।

दावेदारों के अधिवक्ता ने तर्क दिया कि वर्तमान मामले में अधिकरण ने 30% भविष्य की संभावनाओं की राशि नहीं जोड़ी, जबकि मृतक की हैसियत सहायक अभियंता के रूप में तथा निश्चित वेतन पर नियुक्ति को देखते हुए ऐसा किया जाना चाहिए था। यदि वह 30% वृद्धि जोड़ी जाए और साथ ही 30% आयकर कटौती भी लागू की जाए, तो दोनों एक-दूसरे को निष्प्रभावी कर देंगे और अधिकरण द्वारा प्रयुक्त आय का आंकड़ा यथावत रहेगा। अतः दावेदारों के अनुसार, आयकर कटौती के लिए बीमाकर्ता की दलील से पहले से प्रदान की गई क्षतिपूर्ति राशि में कोई कमी नहीं आएगी।

दोनों पक्षों की दलीलें सुनने और अभिलेखों का अवलोकन करने के बाद पटना उच्च न्यायालय ने कुछ महत्वपूर्ण तथ्य दर्ज किए:

मृतक ग्रामीण कार्य विभाग, बिहार में सहायक अभियंता के रूप में निश्चित वेतन पर कार्यरत थे। वे 09.07.2012 को अपनी मोटरसाइकिल चला रहे थे, जब रजिस्ट्रेशन संख्या BR-07-G-4161 वाला ट्रैक्टर पीछे से आकर उन्हें टक्कर मार गया। न्यायालय ने नोट किया कि केस डायरी के अनुसार पुलिस ने 09.07.2012 को ही इस ट्रैक्टर को जब्त कर लिया था और मोटर वाहन निरीक्षक को निरीक्षण के लिए अनुरोध भेजा था।

न्यायालय ने यह भी दर्ज किया कि उक्त ट्रैक्टर अपीलकर्ता बीमा कंपनी के साथ 29.05.2012 से 28.05.2013 की अवधि के लिए बीमित था। दुर्घटना की तिथि 09.07.2012 इस पॉलिसी अवधि के भीतर ही आती है। इन तथ्यों के आलोक में न्यायालय ने माना कि बीमाकर्ता की पहली आपत्ति, अर्थात बीमित ट्रैक्टर की संलिप्तता पर प्रश्नचिह्न, स्वीकार नहीं की जा सकती। अतः अधिकरण द्वारा दिया गया यह निष्कर्ष कि दुर्घटना में वही ट्रैक्टर शामिल था और बीमा कंपनी उत्तरदायी है, बरकरार रखा गया।

दूसरे मुद्दे यानी आयकर कटौती पर आते हुए, उच्च न्यायालय ने Ranjana Prakash & Ors. में सर्वोच्च न्यायालय की तर्कशृंखला का सावधानीपूर्वक परीक्षण किया। न्यायालय ने उस निर्णय के अनुच्छेद 9 और 10 का हवाला दिया, जिनमें सर्वोच्च न्यायालय ने समझाया कि कुछ परिस्थितियों में भविष्य की संभावनाओं के लिए 30% जोड़ और आयकर के लिए 30% कटौती “एक-दूसरे को रद्द” कर देते हैं, जिससे गणना हेतु ली गई आय और क्षतिपूर्ति राशि में कोई परिवर्तन नहीं होता।

इस सिद्धांत को लागू करते हुए पटना उच्च न्यायालय ने माना कि भले ही अपीलकर्ता कंपनी की 30% आयकर कटौती की दलील स्वीकार कर ली जाए, तो भी 30% वृद्धि भविष्य की संभावनाओं के रूप में जोड़नी पड़ेगी। जब दोनों लागू किए जाएंगे तो वे परस्पर संतुलित हो जाएंगे और अधिकरण द्वारा अपनाई गई आय की राशि अपरिवर्तित रहेगी। परिणामस्वरूप, इस आधार पर अधिकरण द्वारा तय क्षतिपूर्ति राशि में कोई कमी नहीं की जा सकती। अतः न्यायालय ने बीमाकर्ता की दूसरी आपत्ति भी अस्वीकार कर दी।

इसके बाद उच्च न्यायालय ने यह दर्ज किया कि अपीलकर्ता कंपनी ने अन्य कोई तर्क नहीं उठाया है। फलतः न्यायालय को अधिकरण के निर्णय और अवार्ड में हस्तक्षेप करने का कोई कारण नहीं दिखा। सिविल अपील (विविध) संख्या 702 वर्ष 2016 खारिज कर दी गई।

क्योंकि 50,000/- रुपये की राशि पहले ही दावेदारों को दी जा चुकी थी, न्यायालय ने निर्देश दिया कि शेष 41,77,428/- रुपये की राशि, 6% प्रतिवर्ष ब्याज सहित, 19.02.2026 तक विधवा को अदा की जाए।

न्यायालय ने आगे आदेश दिया कि यदि बीमा कंपनी 19.02.2026 तक भुगतान करने में विफल रहती है, तो विधवा दावेदार 25,000/- रुपये लागत की हकदार होगी। यह लागत भुगतान में विलंब के लिए उत्तरदायी दोषी अधिकारी से वसूल की जा सकेगी।

इसी के साथ न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि किसी प्रकार का वैधानिक उल्लंघन हुआ हो तो बीमा कंपनी को विधि के अनुसार उस मुद्दे को उठाने का अधिकार रहेगा। न्यायालय ने यह भी निर्देश दिया कि यदि अपील में कोई वैधानिक जमा राशि जमा की गई हो, तो उसे वापस कर दिया जाए।

यह निर्णय क्यों महत्वपूर्ण है

यह निर्णय सड़क दुर्घटना पीड़ितों के परिवारों के लिए, विशेषकर जब दोषी वाहन ट्रैक्टर या इसी प्रकार का वाणिज्यिक वाहन हो, अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह दर्शाता है कि यदि बाद की जांच में दोषी वाहन की स्पष्ट पहचान हो जाए और वह वाहन बीमित हो, तो मात्र इस आधार पर कि प्रारंभिक प्राथमिकी में “अज्ञात” वाहन का उल्लेख था, बीमा कंपनी देयता से मुक्त नहीं हो सकती।

पटना उच्च न्यायालय ने केस डायरी प्रविष्टियों पर भरोसा किया, जिनमें दुर्घटना की तिथि पर ही उक्त विशिष्ट ट्रैक्टर की जब्ती और उसके निरीक्षण के लिए अनुरोध दर्ज था। इससे यह पुष्टि होती है कि दस्तावेजी जांच अभिलेख दुर्घटना क्षतिपूर्ति मामलों में दावेदारों के पक्ष में मजबूत आधार दे सकते हैं।

निर्णय यह भी स्पष्ट करता है कि क्षतिपूर्ति की गणना में आयकर कटौती और भविष्य की संभावनाएं किस प्रकार परस्पर क्रिया करती हैं। जहां मृतक स्थायी, वेतनभोगी सरकारी नौकरी पर था, वहां न्यायालय भविष्य की संभावनाओं के लिए एक निश्चित प्रतिशत जोड़ सकते हैं और साथ ही आयकर की कटौती भी कर सकते हैं। जैसा कि सर्वोच्च न्यायालय ने समझाया है और यहां लागू किया गया है, ये दोनों संख्याएं एक-दूसरे को संतुलित कर सकती हैं, जिससे मूल आय का आंकड़ा अपरिवर्तित रहता है।

दावेदारों के लिए इसका अर्थ यह है कि बीमाकर्ता द्वारा आयकर कटौती की मांग से क्षतिपूर्ति स्वतः कम नहीं हो जाती। न्यायालय यह देखेगा कि जब भविष्य की संभावनाएं विधिवत जोड़ी जाती हैं, तो क्या वास्तव में ऐसी कटौती से कोई अंतर पड़ता है या नहीं।

निर्धारित तिथि तक भुगतान पूरा करने के निर्देश और विलंब होने पर अतिरिक्त लागत लगाने तथा उस लागत को उत्तरदायी अधिकारी से वसूलने की चेतावनी भी एक स्पष्ट संदेश देती है। बीमा कंपनियों को न्यायालय द्वारा प्रदान की गई क्षतिपूर्ति राशि का समय पर पालन करना होगा, अन्यथा उनके कर्मियों पर आर्थिक दुष्परिणाम पड़ सकते हैं।

विधिक प्रश्न और उनके उत्तर

  • प्रश्न: क्या बीमित ट्रैक्टर रजिस्ट्रेशन संख्या BR-07-G-4161 को, जबकि प्राथमिकी “अज्ञात” ट्रैक्टर के विरुद्ध दर्ज थी, घातक दुर्घटना में सम्मिलित सिद्ध किया गया?
    उत्तर: हां। न्यायालय ने माना कि 09.07.2012 को उक्त विशिष्ट ट्रैक्टर की जब्ती और उसके निरीक्षण के लिए अनुरोध, तथा अन्य सामग्री के साथ, उसकी संलिप्तता सिद्ध करते हैं। बीमाकर्ता की आपत्ति अस्वीकार कर दी गई।
  • प्रश्न: क्या मृतक के वेतन से 30% आयकर काटकर क्षतिपूर्ति की गणना की जानी चाहिए थी, जिससे अवार्ड की राशि घट जाती?
    उत्तर: नहीं। सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय Ranjana Prakash & Ors. को लागू करते हुए न्यायालय ने माना कि 30% आयकर कटौती को भविष्य की संभावनाओं के लिए 30% वृद्धि द्वारा संतुलित कर दिया जाएगा, जिससे आय और क्षतिपूर्ति की राशि अपरिवर्तित रहेगी।
  • प्रश्न: क्या पटना उच्च न्यायालय ने 42,27,428/- रुपये (पूर्व भुगतान के बाद शुद्ध 41,77,428/- रुपये) के अधिकरण अवार्ड में हस्तक्षेप किया?
    उत्तर: नहीं। न्यायालय ने बीमाकर्ता की अपील खारिज कर दी और शेष 41,77,428/- रुपये की राशि को 6% ब्याज सहित 19.02.2026 तक अदा करने तथा विलंब की स्थिति में 25,000/- रुपये अतिरिक्त लागत देने का निर्देश दिया।

न्यायालय द्वारा उद्धृत मामले

  • Ranjana Prakash and Ors. vs. Divisional Manager & Anr., 2011 (5) SC 382, जिसमें भविष्य की संभावनाओं और आयकर कटौती के संबंध में Sarla Verma में प्रतिपादित सिद्धांतों पर भरोसा किया गया।

मामले का विवरण

मामला संख्या: Miscellaneous Appeal No. 702 of 2016; arising out of Claim Case No. 326/12

मामले का शीर्षक: The New India Assurance Company Limited vs. Vijaya Kumari & Ors.

न्यायालय: High Court of Judicature at Patna

कोरम: Hon’ble Mr. Justice Rajiv Roy

निर्णय की तिथि: 22.01.2026

उद्धरण: 2026(2) PLJR 231

अधिवक्ता:
अपीलकर्ता (बीमा कंपनी) की ओर से: Mr. Durgesh Kumar Singh, Advocate; assisted by Mr. Abhijeet Kumar Singh, Advocate
प्रतिवादी दावेदारों की ओर से: Mr. Bal Govind Sharma, Advocate; Mr. Dhannjay Kumar No.2, Advocate

मामले का स्वरूप: घातक दुर्घटना के दावे में मोटर वाहन दुर्घटना दावा अधिकरण के अवार्ड के विरुद्ध बीमाकर्ता द्वारा दायर विविध अपील।

निर्णय का लिंक: पटना उच्च न्यायालय का पूर्ण निर्णय पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें


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