इंजीनियर के विरुद्ध विभागीय दंड बरकरार — पटना उच्च न्यायालय, 2022

Sunita Kumari

Reviewed by: Sunita Kumari

License Number: BR/708/2009

Sunita Kumari is a lawyer based in Siwan and Chapra practicing family law. She represents clients in divorce proceedings, matrimonial disputes, and POCSO (Protection of Children from Sexual Offences) matters. Her practice handles family law litigation across the region, including matrimonial property issues, inheritance disputes, and matters involving vulnerable persons.

पटना उच्च न्यायालय ने एक सेवानिवृत्त सरकारी कर्मचारी पर लगाए गए विभागीय दंड में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया। न्यायालय ने माना कि जांच और अपील के दौरान विधि सम्मत प्रक्रिया का पालन किया गया था। अदालत को यह भी लगा कि अतिरिक्त भुगतान और सुरक्षा राशि के अनियमित विमोचन से जुड़े प्रमुख आरोप सिद्ध हो चुके हैं। परिणामस्वरूप, दंड आदेश तथा पूर्व में पारित एकल न्यायाधीश का निर्णय यथावत रहने दिया गया।

मामले की पृष्ठभूमि

अपीलकर्ता राज्य बिहार के जल संसाधन विभाग में सरकारी कर्मचारी था। उसके जिम्मे जिन कार्यों की देखरेख थी, उनके संबंध में उसके विरुद्ध आरोप लगाए गए। विशिष्ट आरोप यह थे कि उसने लागू नियमों का उल्लंघन करते हुए अतिरिक्त भुगतान किए और कार्य पूर्ण न होने के बावजूद सुरक्षा राशि जारी कर दी।

इन कथित अनियमितताओं के कारण विभाग ने उसके विरुद्ध विभागीय कार्यवाही प्रारंभ की। आरोपों की जांच के लिए एक जांच अधिकारी नियुक्त किया गया। अपीलकर्ता ने इस जांच में भाग लिया।

जांच अधिकारी ने 30.05.1995 को अपनी जांच रिपोर्ट प्रस्तुत की। अपीलकर्ता के अनुसार, यह रिपोर्ट उसे कभी प्रदान ही नहीं की गई। इसके बावजूद, प्राधिकारी ने उस रिपोर्ट पर भरोसा किया और 13.02.1998 को दंड आदेश जारी कर दिया।

अपीलकर्ता पर लगाया गया दंड गंभीर प्रकृति का था। इसमें एक निंदा प्रविष्टि, तीन वेतन-वृद्धियों को संचयी प्रभाव सहित रोके जाने तथा 1.06 लाख रुपये की वसूली का आदेश शामिल था। आदेश में यह भी उल्लेख था कि निलंबन अवधि के दौरान उसे भरपाई भत्ते (subsistence allowance) से अधिक किसी भी भुगतान का हकदार नहीं माना जाएगा।

अपीलकर्ता ने इस प्रथम दंड आदेश को चुनौती देते हुए पटना उच्च न्यायालय में सिविल रिट अधिकारिता वाद संख्या 7997/1998 दायर किया। उच्च न्यायालय की पीठ ने मुख्यतः इस आधार पर पाया कि अपीलकर्ता को जांच रिपोर्ट पर अपना पक्ष रखने का अवसर नहीं दिया गया था, इसलिए दंड आदेश टिक नहीं सकता।

इसलिए, उस पूर्व रिट में उच्च न्यायालय ने प्रकरण को संबंधित प्राधिकारी के पास वापस भेज दिया। प्राधिकारी को यह निर्देश दिया गया कि जांच रिपोर्ट पर अपीलकर्ता को अपना उत्तर दाखिल करने का अवसर देकर, विधि के अनुसार नया आदेश पारित किया जाए।

रिमांड के बाद, दंड निर्धारण प्राधिकारी ने पुनः मामले पर विचार किया। उसने फिर से वही दंड आरोपित किया: निंदा प्रविष्टि, तीन वेतन-वृद्धियों को संचयी प्रभाव सहित रोके जाना, 1.06 लाख रुपये की वसूली, और निलंबन अवधि में भरपाई भत्ते से अधिक किसी भी भुगतान से वंचित रखना।

इस दूसरे दंड आदेश को अपीलकर्ता ने सी.डब्ल्यू.जे.सी. संख्या 9242/2000 के माध्यम से चुनौती दी। हालांकि, उसने बाद में वह रिट याचिका वापस ले ली। इसे इस उद्देश्य से वापस लिया गया कि वह रिट जारी रखने के बजाय दंड आदेश के विरुद्ध अपील दायर कर सके।

इसके पश्चात अपीलकर्ता ने सरकार के समक्ष एक प्रतिवेदन (representation) दायर किया। अभिलेख के अनुसार, इस प्रतिवेदन को अपील के रूप में ग्रहण किया गया। सक्षम प्राधिकारी ने इसे उसी रूप में विचार कर 09.08.2000 के आदेश द्वारा दंड आदेश में हस्तक्षेप न करने का निर्णय लिया। यह अपीलीय आदेश 04.07.2002 को अपीलकर्ता को सूचित किया गया।

बाद में, अपीलकर्ता ने सिविल रिट अधिकारिता वाद संख्या 3457/2004 दायर किया। उस रिट में उसने दंड आदेश के साथ-साथ उसके प्रतिवेदन को अपील के रूप में ग्रहण किए जाने की वैधता को भी चुनौती दी। पटना उच्च न्यायालय के एक माननीय एकल न्यायाधीश ने उसकी रिट याचिका खारिज कर दी और विभागीय कार्यवाही तथा दंड को बरकरार रखा।

एकल न्यायाधीश के निर्णय से आहत होकर, अपीलकर्ता ने वर्तमान लेटर्स पेटेंट अपील संख्या 1458/2018 पटना उच्च न्यायालय की द्वैध पीठ के समक्ष दायर की।

न्यायालय ने क्या परखा और क्या निर्णय दिया

लेटर्स पेटेंट अपील में द्वैध पीठ ने पहले अपीलकर्ता के अधिवक्ता तथा राज्य पक्ष के अधिवक्ता की दलीलें सुनीं। अपीलकर्ता की मुख्य आपत्तियाँ अनुशासनिक प्राधिकारी और अपीलीय प्राधिकारी – दोनों के विरुद्ध थीं।

उसकी केंद्रीय शिकायत यह थी कि किसी भी प्राधिकारी ने आरोपों का खंडन करने के लिए उसने जो कारण बताए थे, उनका समुचित संज्ञान नहीं लिया। उसके अनुसार, अतिरिक्त भुगतान और सुरक्षा राशि के अनियमित विमोचन के आरोपों के विरुद्ध पेश की गई उसकी विस्तृत सफाई को नजरअंदाज कर दिया गया।

अपीलकर्ता ने यह दलील भी दी कि सरकार के समक्ष दिया गया उसका प्रतिवेदन विधिक अर्थों में औपचारिक अपील के रूप में दायर नहीं किया गया था। इसके बावजूद उसे अपील की तरह माना गया। उसका कहना था कि वह जिन कई आधारों को एक विधिवत अपील में उठाना चाहता था, वे आधार उस प्रतिवेदन में स्थान ही नहीं पा सके।

प्रतिवेदन में केवल सीमित बिंदु ही शामिल होने के कारण, उसका दावा था कि अपीलीय प्राधिकारी को उसकी संपूर्ण रक्षा का पूरा चित्र नहीं मिल सका। फलतः 09.08.2000 दिनांकित उसका आदेश उन सभी प्रासंगिक मुद्दों पर विचार नहीं कर सका, जिन्हें वह अन्यथा किसी विधिवत अपील में उठाता।

अपीलकर्ता ने पहले की उच्च न्यायालय की कार्यवाही, यानी सी.डब्ल्यू.जे.सी. संख्या 7997/1998 के निर्णय पर भी भरोसा किया, जिसमें प्रथम दंड आदेश निरस्त कर प्रकरण रिमांड किया गया था। उसका तर्क था कि रिमांड के बाद भी प्राधिकारियों ने विधि का पालन नहीं किया और स्वतंत्र तर्क देने के बजाय मात्र पूर्ववत दंड को दोहरा दिया।

दूसरी ओर, राज्य का पक्ष — जिसे न्यायालय ने स्वीकार किया — यह था कि विभागीय कार्यवाही विधि-सम्मत प्रक्रिया के अनुरूप संचालित की गई। अपीलकर्ता ने जांच में भाग लिया और उसे अपना बचाव प्रस्तुत करने का पर्याप्त अवसर मिला।

द्वैध पीठ ने गौर किया कि माननीय एकल न्यायाधीश ने तीन प्रमुख तत्वों का सावधानीपूर्वक परीक्षण किया था: (1) जांच रिपोर्ट, (2) अनुशासनिक प्राधिकारी का आदेश, और (3) अपीलीय प्राधिकारी का आदेश। इन सभी अभिलेखों पर विचार करने के बाद, एकल न्यायाधीश ने स्पष्ट निष्कर्ष दर्ज किए थे।

एकल न्यायाधीश के निष्कर्षों के अनुसार, आरोप संख्या 1, 1(क) और 2 पूरी तरह सिद्ध पाए गए। आरोप संख्या 4 आंशिक रूप से सिद्ध पाया गया। ये निष्कर्ष लगाए गए दंड, जिसमें 1.06 लाख रुपये की वसूली और वेतन-वृद्धियों का रोका जाना शामिल था, का समर्थन करते थे।

द्वैध पीठ ने एकल न्यायाधीश की तर्कसंगति का परीक्षण किया और उससे सहमति व्यक्त की। पीठ ने अवलोकन किया कि पूर्व रिमांड के बाद सभी औपचारिकताओं का पालन किया गया था। अपीलकर्ता को कार्यवाही से अनभिज्ञ नहीं रखा गया। उसने पुनर्विचार की कार्यवाही में भाग लिया तथा उसे जांच रिपोर्ट और दंड आदेश — दोनों को अपीलीय प्राधिकारी के समक्ष चुनौती देने का पर्याप्त अवसर दिया गया।

प्रतिवेदन को अपील के रूप में ग्रहण किए जाने के मुद्दे पर भी न्यायालय ने अपीलकर्ता की शिकायत पर विस्तार से विचार किया। न्यायालय ने देखा कि जब पहले रिमांड दिया गया था, उस समय न्यायालय द्वारा स्पष्ट दिशा-निर्देश दिए जाने के बावजूद अपीलकर्ता ने कोई विधिवत अपील दाखिल करना नहीं चुना।

चूंकि बाद में प्रकरण को अनुशासनिक प्राधिकारी के निर्णय की पुष्टि के लिए अपीलीय प्राधिकारी, अर्थात् सरकार, के समक्ष रखा गया, इसलिए सरकार ने प्रकरण की समीक्षा की और आदेश पारित किया। अपीलीय प्राधिकारी के आदेश में परिस्थितियों, पृष्ठभूमि के तथ्य तथा अपीलकर्ता के विरुद्ध संकलित साक्ष्यों का संज्ञान लिया गया।

इस संदर्भ में, द्वैध पीठ को अपीलकर्ता के इस तर्क में कोई दम नहीं लगा कि उसके प्रतिवेदन को अपील नहीं माना जा सकता था। न्यायालय ने मूलतः यह माना कि सक्षम अपीलीय प्राधिकारी ने मामले के सार पर विचार कर लिया था। केवल इस कारण कि कोई पृथक या भिन्न शीर्षक से अपील-पत्र दाखिल नहीं किया गया, प्रक्रिया अवैध नहीं हो जाती, विशेषतः तब जब अपीलकर्ता ने स्वयं रिट वापस लेकर इसी उपाय को अपनाने का विकल्प चुना और उसके प्रतिवेदन को उसी उपाय के रूप में माना गया।

न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि विभागीय दंड में हस्तक्षेप की शक्ति — चाहे वह रिट अधिकारिता हो या आंतरिक अपीलीय (intra-court) अधिकारिता — सीमित होती है। जब कर्मचारी को समुचित अवसर दिया गया हो, जांच निष्पक्ष हो, और निष्कर्ष पर्याप्त साक्ष्य पर आधारित हों, तब न्यायालय सामान्यतः तथ्यों का पुनर्मूल्यांकन किसी दीवानी अपीलीय अदालत की तरह नहीं करता।

यहाँ, नियमों का उल्लंघन कर अतिरिक्त भुगतान करने और कार्य पूर्ण हुए बिना सुरक्षा राशि जारी करने के आरोप जांच अधिकारी द्वारा सिद्ध पाए गए। इन निष्कर्षों को अनुशासनिक प्राधिकारी और अपीलीय प्राधिकारी — दोनों ने स्वीकार किया। एकल न्यायाधीश ने भी अभिलेखों का परीक्षण कर इन निष्कर्षों से सहमति जताई।

साक्ष्यों के मूल्यांकन में किसी प्रक्रिया संबंधी खामी या स्पष्ट विकृति (perversity) न पाकर, द्वैध पीठ ने निष्कर्ष निकाला कि हस्तक्षेप का कोई विधिक आधार नहीं है। अतः उसने माना कि अपील निराधार है।

फलस्वरूप, लेटर्स पेटेंट अपील खारिज कर दी गई। एकल न्यायाधीश द्वारा बरकरार रखा गया दंड आदेश प्रभावी बना रहा। कोई अतिरिक्त निर्देश जारी नहीं किए गए और यह मामला द्वैध पीठ के स्तर पर ही समाप्त हो गया।

यह निर्णय क्यों महत्वपूर्ण है

यह निर्णय विभागीय कार्यवाही का सामना कर रहे सरकारी कर्मचारियों और लोक सेवकों के लिए महत्वपूर्ण है। पटना उच्च न्यायालय ने यह रेखांकित किया है कि एक बार जब जांच उचित अवसर के साथ की जाती है और निष्कर्ष साक्ष्य द्वारा समर्थित होते हैं, तो न्यायालय हस्तक्षेप करने में अत्यंत संयम बरतेगा।

निर्णय यह भी दर्शाता है कि यदि कोई कर्मचारी दंड के विरुद्ध कोई प्रतिवेदन प्रस्तुत करता है और सक्षम प्राधिकारी उसे अपील मानकर गुण-दोष के आधार पर विचार करता है, तो सामान्यतः इसे वैध अपीलीय प्रक्रिया माना जाएगा। बाद में यह तर्क कि वह दस्तावेज “केवल प्रतिवेदन” था, आसानी से स्वीकार नहीं किया जाएगा।

कर्मचारियों के लिए यह इस आवश्यकता को पुष्ट करता है कि वे अपने सभी आधारों और बचावों को समय रहते स्पष्ट रूप से अनुशासनिक तथा अपीलीय प्राधिकारियों के समक्ष रखें। विधिवत अपील दायर न करना, या अपूर्ण प्रतिवेदन देना, उच्च न्यायालय की शरण में आने पर उनके मामले को कमजोर कर सकता है।

प्रशासन के लिए यह मामला पुष्टि करता है कि न्यायालय से प्राप्त रिमांड आदेशों का सावधानीपूर्वक अनुपालन होना चाहिए। यहाँ, पूर्व रिट के बाद, प्राधिकारी ने अपीलकर्ता को जांच रिपोर्ट पर उत्तर देने का अवसर दिया और फिर नया आदेश पारित किया, जो अंततः न्यायिक परीक्षण में खरा उतरा।

कानूनी प्रश्न और उनके उत्तर

  • प्रश्न: क्या अतिरिक्त भुगतान तथा सुरक्षा राशि के अनियमित विमोचन के लिए दी गई विभागीय सज़ा प्रक्रिया संबंधी अनियमितताओं या अपीलकर्ता के बचाव पर विचार न किए जाने के कारण दूषित (vitiated) थी?
    उत्तर: नहीं। न्यायालय ने माना कि सभी प्रक्रिया संबंधी औपचारिकताओं का पालन किया गया, अपीलकर्ता को पर्याप्त अवसर दिया गया और दोषसिद्धि के निष्कर्ष अभिलेखों द्वारा समर्थित थे।
  • प्रश्न: क्या सरकार अपीलकर्ता के प्रतिवेदन को विधिपूर्वक अपील मानकर उस पर निर्णय कर सकती थी?
    उत्तर: हाँ। न्यायालय ने माना कि जब अपीलकर्ता ने, स्पष्ट निर्देशों के बावजूद, कोई औपचारिक अपील दायर नहीं की, और मामला सरकार के समक्ष परिस्थितियों तथा साक्ष्यों के साथ रखा गया तथा उस पर विचार कर आदेश पारित किया गया, तो प्रतिवेदन को अपील की तरह मानने में कोई त्रुटि नहीं थी।

न्यायालय द्वारा उद्धृत मामले

  • उपलब्ध निर्णय-पाठ में किसी अन्य न्यायिक पूर्वनिर्णय का उल्लेख या उस पर निर्भरता नहीं पाई जाती।

मामले का विवरण

मामला संख्या: लेटर्स पेटेंट अपील संख्या 1458/2018, सिविल रिट अधिकारिता वाद संख्या 3457/2004 में

मामले का शीर्षक: राम दत्त प्रसाद शर्मा बनाम द स्टेट ऑफ बिहार एवं अन्य

पीठ (Coram): माननीय श्री न्यायमूर्ति अशुतोष कुमार एवं माननीय श्री न्यायमूर्ति अंजनि कुमार शरण

संदर्भ (Citation): 2022(2) PLJR 59

अधिवक्ता: अपीलकर्ता की ओर से – श्री राजा राम मिश्रा, अधिवक्ता; प्रतिवादियों की ओर से – नाम निर्णय-पाठ में निर्दिष्ट नहीं है।

मामले का स्वरूप: सेवा संबंधी मामले में विभागीय दंड आदेश को चुनौती देने वाली रिट याचिका की खारिजी के विरुद्ध लेटर्स पेटेंट अपील।

निर्णय का लिंक: https://patnahighcourt.gov.in/viewjudgment/MyMxNDU4IzIwMTgjMSNO-DaUjLJBWcGI=


यदि आपको यह व्याख्या उपयोगी लगी हो और आप यह जानने के इच्छुक हों
कि बिहार में विधिक विकास आपके अधिकारों को कैसे प्रभावित कर सकते हैं,
तो आप सम्विदा लॉ एसोसिएट्स को आगे की जानकारी के लिए फ़ॉलो करने पर विचार कर सकते हैं।

Facing a similar matter before the Patna High Court? Contact Samvida Law Associates.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Recent News