वादपत्र संशोधन करने में देरी को क्षम्य माना गया — पटना उच्च न्यायालय, 2024

Shubham Shivansh

Reviewed by: Shubham Shivansh

License Number: D/7102/2022

शुभम शिवांश समविदा लॉ एसोसिएट्स में एक वकील हैं जो नागरिक विवाद, सेवा कानून और जीएसटी मामलों में प्रथा करते हैं। वह पटना उच्च न्यायालय और अन्य अधिकार क्षेत्रों में संपत्ति विवाद, अनुबंधात्मक असहमति, सेवा संबंधित शिकायतों और कर अनुपालन के मामलों में क्लाइंट का प्रतिनिधित्व करते हैं। उनकी प्रैक्टिस बिहार में व्यक्तियों और व्यवसायों के लिए नागरिक मुकदमेबाजी, रोजगार संबंधित विवाद और नियामक मामलों को संभालती है।

पटना उच्च न्यायालय ने एक उप न्यायाधीश के उस आदेश को निरस्त कर दिया, जिसमें सिविल वाद के वादपत्र में संशोधन करने के लिए अधिक समय देने से इंकार किया गया था। वादी बार‑बार पहले से स्वीकृत संशोधन को लागू करने की समय‑सीमा चूकता रहा था। उच्च न्यायालय ने देरी को स्वीकार तो किया, परंतु उस पर 10,000 रुपये की लागत (कॉस्ट) लगा दी। अब संशोधन किए जाने के बाद शीर्षक वाद आगे बढ़ेगा।

प्रकरण की पृष्ठभूमि

विवाद शीर्षक वाद संख्या 29/2009 से संबंधित है, जो उप न्यायाधीश‑IV, सुपौल की अदालत में लंबित है। उस वाद में वादी ही पटना उच्च न्यायालय के समक्ष याचिकाकर्ता है। प्रतिवादी वे प्रतिस्थापित उत्तराधिकारी तथा अन्य पक्ष हैं जिन्हें शीर्षक वाद में प्रतिवादी के रूप में पक्षकार बनाया गया है।

दिनांक 30.09.2014 को वादी ने दीवानी प्रक्रिया संहिता, 1908 के आदेश VI नियम 17 के अंतर्गत वादपत्र में संशोधन करने हेतु एक प्रार्थना पत्र दाखिल किया। यह संशोधन एक पश्चातवर्ती घटना के कारण माँगा गया था, जो वादी के अनुसार वाद में मांगी गई राहतों को प्रभावित करती थी।

दिनांक 17.09.2015 को परीक्षण न्यायालय ने संशोधन याचिका को स्वीकार कर लिया। तथापि वादी ने निर्देशानुसार वास्तव में वादपत्र में संशोधन नहीं किया। विधि अथवा न्यायालय द्वारा निर्धारित समय के भीतर कथनों (प्लीडिंग्स) में कोई परिवर्तन सम्मिलित नहीं किया गया।

इसे सुधारने के लिए वादी ने 24.02.2016 को फिर से दीवानी प्रक्रिया संहिता के आदेश VI नियम 18 के अंतर्गत एक और प्रार्थना पत्र दायर किया, जिसमें 17.09.2015 को पहले से स्वीकृत संशोधन को लागू करने के लिए समय बढ़ाने का अनुरोध किया गया। 26.04.2016 को परीक्षण न्यायालय ने यह याचिका स्वीकार कर ली और 100 रुपये की लागत पर अतिरिक्त समय प्रदान किया।

यह विस्तार मिलने के बाद भी वादी स्वीकृत परिवर्तनों को वादपत्र में शामिल करने में फिर विफल रहा। परिणामस्वरूप 30.01.2017 को वादी ने एक और प्रार्थना पत्र दायर किया, इस बार संहिता की धाराएँ 148 और 151 के अंतर्गत, जिसमें उसने परीक्षण न्यायालय से अनुरोध किया कि उसे पहले से स्वीकृत संशोधन करने की अनुमति फिर से दी जाए।

दिनांक 19.07.2017 को उप न्यायाधीश‑IV, सुपौल ने इस दूसरी समय‑वृद्धि याचिका को खारिज कर दिया। न्यायालय को और अधिक समय देने का कोई औचित्य नहीं लगा और व्यावहारिक रूप से संशोधन करने का मार्ग बंद कर दिया गया।

इस आदेश से आहत होकर वादी ने भारत के संविधान के अनुच्छेद 227 के तहत पटना उच्च न्यायालय की पर्यवेक्षी अधिकारिता का आह्वान किया और सिविल मिस्‍सेलिनियस अधिकारिता संख्या 1634/2017 दायर की। उच्च न्यायालय के समक्ष चुनौती केवल दिनांक 30.01.2017 की धाराएँ 148 और 151 के अंतर्गत दायर याचिका को अस्वीकार करने वाले 19.07.2017 के आदेश तक सीमित थी।

न्यायालय ने क्या परखा और क्या निर्णय दिया

यह मामला पटना उच्च न्यायालय के माननीय न्यायमूर्ति अरुण कुमार झा के समक्ष आया। न्यायालय ने याचिकाकर्ता के अधिवक्ता तथा प्रतिवादीगण संख्या 1 से 12 की ओर से उपस्थित अधिवक्ता की दलीलें सुनीं।

याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने घटनाक्रम का क्रमवार विवरण रखा। उन्होंने इंगित किया कि वादपत्र में संशोधन की अनुमति परीक्षण न्यायालय ने 17.09.2015 को ही आदेश VI नियम 17 के तहत दे दी थी। उनके अनुसार अब यह विवादित नहीं था कि मूलतः संशोधन स्वीकार्य है या नहीं; एकमात्र प्रश्न यह था कि क्या वादी को वादपत्र में शारीरिक रूप से संशोधन लागू करने के लिए और समय दिया जा सकता है।

उन्होंने समझाया कि अपरिहार्य परिस्थितियों के कारण वादी न्यायालय के आदेश का पालन नहीं कर पाया। याचिकाकर्ता को एक गरीब व्यक्ति बताया गया, जिसे आजीविका कमाने के लिए राज्य के बाहर जाना पड़ता था। इस मजबूरी की वजह से वह 26.04.2016 को दिए गए प्रारंभिक विस्तार के बावजूद, समय पर वादपत्र में संशोधन सम्मिलित करने की औपचारिक कार्रवाई नहीं कर सका।

याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने इस बात पर जोर दिया कि संशोधन का उद्देश्य विवादित संपत्ति से बेदखली से संबंधित एक पश्चातवर्ती घटना को अभिलेख पर लाना था। यदि यह घटना वादपत्र में शामिल न की जाए, तो याचिकाकर्ता इसी वाद में कब्जा पुनर्प्राप्ति की राहत नहीं मांग सकेगा। उनके अनुसार इससे वादी को गंभीर क्षति होगी और संभव है कि कथित बेदखली से जुड़ी एक महत्वपूर्ण राहत मांगने से वह वंचित रह जाए।

दूसरी ओर प्रतिवादीगण संख्या 1 से 12 के अधिवक्ताओं ने किसी भी प्रकार की अतिरिक्त ढील का कड़ा विरोध किया। उनका तर्क था कि वादी ने न्यायालय के निर्देशों का पालन करने में लगातार लापरवाही दिखाई है। 17.09.2015 के संशोधन स्वीकृति आदेश तथा उसके बाद 26.04.2016 को आदेश VI नियम 18 के तहत मात्र 100 रुपये की नाममात्र लागत के साथ दिए गए विस्तार के बावजूद, वादी ने कोई कदम नहीं उठाया।

प्रतिवादियों के अधिवक्ताओं ने कहा कि इस निरंतर विफलता के लिए कोई संतोषजनक स्पष्टीकरण नहीं दिया गया। उनके मत में गरीबी या राज्य के बाहर काम करने की सामान्य बातें इतनी लंबी निष्क्रियता को उचित नहीं ठहरातीं। उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि स्वयं शीर्षक वाद वर्ष 2009 से लंबित है और वादी की लापरवाह प्रवृत्ति से मामले के निपटारे में अनावश्यक देरी हो रही है।

दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद पटना उच्च न्यायालय ने विधिक ढांचे पर विचार किया। न्यायालय ने उल्लेख किया कि संहिता के आदेश VI नियम 18 के अनुसार यदि आदेश में विशेष रूप से समय निर्धारित न हो, तो किसी भी संशोधन को आदेश की तारीख से चौदह दिनों के भीतर लागू कर देना चाहिए। यहां, 26.04.2016 को आदेश VI नियम 18 के तहत वादी को अवसर दिए जाने के बावजूद, उसने उसका लाभ नहीं उठाया।

न्यायालय ने स्पष्ट रूप से यह अवलोकन किया कि दिनांक 17.09.2015 के आदेश के आलोक में संशोधन न करने के कारण याचिकाकर्ता “पूरी तरह दोषी” था। तथ्यात्मक अभिलेख से स्पष्ट था कि वादी ने पहले आदेश VI नियम 18 के तहत और फिर संहिता की धाराएँ 148 और 151 के तहत याचिका दायर की थी। दूसरी याचिका को परीक्षण न्यायालय ने खारिज कर दिया, जिसके कारण वर्तमान अनुच्छेद 227 की याचिका दाखिल हुई।

परंतु उच्च न्यायालय केवल याचिकाकर्ता को दोषी ठहराने पर ही नहीं रुका। उसने प्रक्रिया संबंधी कानून के व्यापक उद्देश्य पर भी विचार किया। न्यायालय ने यह रेखांकित किया कि किसी भी अदालत का प्रयत्न पक्षकारों के बीच वास्तविक विवाद का समाधान करने का होना चाहिए। प्रक्रिया संबंधी नियम इस प्रक्रिया में सहायक होने के लिए हैं, न कि न्याय में बाधा डालने के लिए।

न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण सीमा‑रेखा भी जोड़ी: यह उदार दृष्टिकोण तब अपनाया जाना चाहिए जब देरी के कारण विपक्षी पक्ष के पक्ष में कोई निहित अधिकार (वेस्तेड राइट) उत्पन्न न हो गया हो। ऐसी स्थिति में परीक्षण न्यायालय को सामान्यतः पहले से स्वीकृत संशोधन को लागू करने के लिए समय देने वाली याचिका स्वीकार करनी चाहिए, न कि तकनीकी आधारों पर किसी पक्ष को बाहर कर देना चाहिए।

इन सिद्धांतों को लागू करते हुए पटना उच्च न्यायालय ने निष्कर्ष निकाला कि परीक्षण न्यायालय को अधिक संतुलित दृष्टिकोण अपनाना चाहिए था। यद्यपि वादी का आचरण निंदनीय था, परंतु उसे बेदखली की पश्चातवर्ती घटना को अभिलेख पर लाने से रोक देना वास्तविक विवाद के निराकरण में बाधा बन सकता था। 2009 से लंबित वाद में अधिक उपयुक्त यह होता कि संशोधन की अनुमति दी जाए और उसके बाद मामले का गुण‑दोष के आधार पर निर्णय किया जाए।

अतः “मामले के तथ्यात्मक पहलुओं में और गहराई से जाए बिना” उच्च न्यायालय ने अपनी पर्यवेक्षी अधिकारिता का प्रयोग किया। उसने शीर्षक वाद संख्या 29/2009 में उप न्यायाधीश‑IV, सुपौल द्वारा पारित 19.07.2017 के विवादित आदेश को निरस्त कर दिया।

न्यायालय ने 30.01.2017 की संहिता की धाराएँ 148 और 151 के तहत दायर याचिका को स्वीकार कर लिया। किंतु यह राहत बिना शर्त नहीं थी। न्यायसंगतता (इक्विटी) संतुलित करने और प्रतिवादियों को हुई देरी की क्षतिपूर्ति के लिए न्यायालय ने पर्याप्त लागत लगाई।

उच्च न्यायालय ने निर्देश दिया कि याचिका की स्वीकृति, विवादित प्रतिवादियों को 10,000 रुपये लागत के भुगतान पर निर्भर रहेगी। यह राशि उच्च न्यायालय के आदेश की प्रति प्राप्त या प्रस्तुत होने के बाद परीक्षण न्यायालय के समक्ष पहली ही तिथि पर अदा की जानी है। केवल ऐसे भुगतान के पश्चात ही वादी 17.09.2015 को पहले से स्वीकृत संशोधन को लागू कर सकेगा।

इन निर्देशों के साथ अनुच्छेद 227 के तहत दायर सिविल मिस्‍सेलिनियस याचिका स्वीकार कर ली गई। जब निर्धारित लागत का भुगतान कर दिया जाएगा और संशोधन कर लिया जाएगा, तब संशोधित वादपत्र के साथ शीर्षक वाद उप न्यायाधीश‑IV, सुपौल के समक्ष आगे बढ़ेगा।

यह निर्णय क्यों महत्वपूर्ण है

यह निर्णय सिविल वादों के पक्षकारों, विशेषकर संपत्ति एवं शीर्षक विवादों में उलझे लोगों के लिए महत्वपूर्ण है, जहाँ वाद दायर होने के बाद परिस्थितियाँ बदल जाती हैं। यह दर्शाता है कि यदि कोई पक्ष लापरवाहीवश कथनों में संशोधन की समय‑सीमा चूक भी जाए, तब भी पटना उच्च न्यायालय तकनीकी नियमों को सारगर्भित न्याय पर हावी होने से रोकने के लिए हस्तक्षेप कर सकता है।

न्यायालय ने स्पष्ट कर दिया कि मुख्य उद्देश्य पक्षकारों के बीच वास्तविक विवाद का निर्णय करना है। जब देरी के कारण दूसरे पक्ष के पक्ष में कोई निहित अधिकार उत्पन्न न हुआ हो, तब न्यायालयों को बेदखली जैसी महत्वपूर्ण पश्चातवर्ती घटनाओं से संबंधित संशोधनों को अस्वीकार करने में जल्दबाज़ी नहीं करनी चाहिए।

साथ ही यह निर्णय वादियों तथा उनके वकीलों के लिए सावधानी का संकेत भी देता है। उच्च न्यायालय ने याचिकाकर्ता को पूरी तरह दोषी बताया और परीक्षण न्यायालय द्वारा लगाई गई 100 रुपये की पूर्व लागत की तुलना में कहीं अधिक 10,000 रुपये की लागत लगाई। यह संदेश देता है कि लापरवाही अनदेखी नहीं की जाएगी, भले ही अंततः न्यायालय विवादों का निपटारा गुण‑दोष के आधार पर करने की ओर झुकाव रखे।

लंबे समय से लंबित सिविल वादों में उलझे आम लोगों के लिए यह मामला यह दर्शाता है कि उच्च न्यायालय, परीक्षण न्यायालयों के अत्यधिक कठोर प्रक्रियात्मक आदेशों को सुधार सकता है, परंतु राहत वित्तीय परिणामों और कड़ी टिप्पणियों के साथ आ सकती है। यह इस बात पर बल देता है कि संशोधन की अनुमति मिलने के बाद तत्परता से कार्रवाई की जाए और न्यायालय द्वारा निर्धारित समय‑सीमाओं पर नज़र रखी जाए।

विधिक प्रश्न और उनके उत्तर

  • प्रश्न: जब वादी बार‑बार चूक करता रहता है, तब क्या परीक्षण न्यायालय पहले से स्वीकृत वादपत्र संशोधन को लागू करने के लिए आगे समय देने से इंकार कर सकता है?
    उत्तर: पटना उच्च न्यायालय ने माना कि यद्यपि वादी दोषी था, फिर भी यदि देरी के कारण दूसरे पक्ष के पक्ष में कोई निहित अधिकार उत्पन्न नहीं हुआ हो और अस्वीकृति से वास्तविक विवाद के समाधान में बाधा उत्पन्न हो, तो परीक्षण न्यायालय को सामान्यतः ऐसी याचिका स्वीकार करनी चाहिए। अतः उच्च न्यायालय ने अस्वीकृति आदेश को निरस्त कर दिया और लागत के भुगतान की शर्त पर याचिका स्वीकार की।
  • प्रश्न: न्यायालयों को प्रक्रियात्मक देरी और पक्षकारों के बीच वास्तविक विवाद के निपटारे की आवश्यकता के बीच संतुलन कैसे साधना चाहिए?
    उत्तर: न्यायालय ने दोहराया कि प्रक्रिया संबंधी कानून न्याय के प्रवाह में बाधक नहीं होना चाहिए। जब संशोधन किसी पश्चातवर्ती घटना से संबंधित हो और पूर्ण निर्णय के लिए आवश्यक हो, तब न्यायालयों को उदार दृष्टिकोण अपनाना चाहिए और याचिका को सिरे से खारिज करने के बजाय दूसरे पक्ष को लागत द्वारा क्षतिपूर्ति करनी चाहिए।

न्यायालय द्वारा उद्धृत मामले

  • इस निर्णय के पाठ में किसी पूर्ववर्ती निर्णय का उल्लेख या उस पर निर्भरता नहीं की गई है।

मामले का विवरण

मामला संख्या: सिविल मिस्‍सेलिनियस अधिकारिता संख्या 1634/2017; उद्गम: शीर्षक वाद संख्या 29/2009 (उप न्यायाधीश‑IV, सुपौल)

मामले का शीर्षक: Daya Nand Singh बनाम Suresh Singh एवं अन्य

पीठ (कोरम): माननीय न्यायमूर्ति अरुण कुमार झा

उद्धरण: 2024 (4) PLJR 333

अधिवक्ता: श्री शशि नाथ झा, अधिवक्ता (याचिकाकर्ता की ओर से); श्री सुदीश कुमार, अधिवक्ता (प्रतिवादियों की ओर से); श्री साकेत तिवारी, अधिवक्ता (प्रतिवादियों की ओर से)

मामले का स्वरूप: भारत के संविधान के अनुच्छेद 227 के अंतर्गत एक अंतरिम आदेश को चुनौती देते हुए दायर याचिका, जिसमें शीर्षक वाद में पहले से स्वीकृत वादपत्र संशोधन को लागू करने के लिए समय‑वृद्धि से इंकार किया गया था।

उच्च न्यायालय के निर्णय की तिथि: 17.09.2024

पूर्ण निर्णय का लिंक: Patna High Court Judgment in C.Misc. No. 1634 of 2017


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