पंचायत भवन निर्माण रोकने की रिट याचिका खारिज — पटना उच्च न्यायालय, 2024

Shubham Shivansh

Reviewed by: Shubham Shivansh

License Number: D/7102/2022

Shubham Shivansh is a lawyer at Samvida Law Associates practicing in civil disputes, service law, and GST matters. He represents clients in property disputes, contractual disagreements, service-related grievances, and tax compliance matters before the Patna High Court and other jurisdictions. His practice handles civil litigation, employment-related disputes, and regulatory matters for individuals and businesses across Bihar.

याचिकाकर्ता ने दावा किया कि पंचायत सरकार भवन उसका निजी भूखंड होने के बावजूद उस पर बनाया जा रहा है और उसने पटना उच्च न्यायालय से निर्माण रोकने की मांग की। न्यायालय को इस बात का कोई प्रमाण नहीं मिला कि जमीन उसकी है और उसने राज्य का यह रुख स्वीकार किया कि यह सरकारी भूमि है। रिट याचिका खारिज कर दी गई और पंचायत भवन का निर्माण जारी रह सकता है। न्यायालय ने यह भी माना कि केवल किराया रसीदें और म्यूटेशन अपने आप में स्वामित्व सिद्ध नहीं करते।

मामले की पृष्ठभूमि

यह रिट याचिका पटना उच्च न्यायालय के समक्ष सिविल रिट क्षेत्राधिकार वाद संख्या 1060/2021 के रूप में दायर की गई थी। याचिकाकर्ता ने न्यायालय से यह प्रार्थना की कि विभिन्न राज्य प्राधिकारियों और स्थानीय अधिकारियों को उसका मकान तोड़ने तथा ग्राम अरगा उसुरी, थाना बीरौल, जिला दरभंगा स्थित उसकी कथित रायती भूमि पर पंचायत सरकार भवन बनाने से रोका जाए।

याचिकाकर्ता के अनुसार 13 कठ्ठा भूमि, पुराना खाता संख्या 217 (नया खाता संख्या 866), पुराना खेसरा संख्या 1142 (नया खेसरा संख्या 1559), मौजा अरगा उसुरी, तौजी संख्या 6553, थाना संख्या 86, बीरौल, दरभंगा, वर्ष 1355 फसली में बिलट मंडल नामक व्यक्ति के पक्ष में सालाना किराया रुपये 2/- पर बसाई गई थी। उसका कहना था कि पूर्व ज़मींदार अब्दुल मजीद और अब्दुल गफ्फार ने वास्तविक कब्जा दिया था तथा किराया रसीदें जारी की थीं।

बिलट मंडल की मृत्यु के बाद, उनके चार पुत्रों, जिनमें याचिकाकर्ता के पिता भी शामिल थे, ने कथित रूप से उक्त भूमि विरासत में प्राप्त की। याचिकाकर्ता ने कहा कि चारों भाइयों के बीच आपसी बंटवारा हुआ और अलग-अलग जमाबंदी तैयार हुई, जिनमें से एक जमाबंदी संख्या 494 उसके पिता, जिन्हें बऊआन मंडल के नाम से भी जाना जाता था, के नाम से बनी। उसका दावा था कि उसके पिता ने बाद में बिहार राज्य को ही किराया देना जारी रखा।

किन्तु पुनरीक्षण सर्वे के दौरान पुरानी खाता संख्या 217 से नया खाता संख्या 866 निकाला गया और पुराना खेसरा संख्या 1142 को नया खेसरा संख्या 1559 कर दिया गया। याचिकाकर्ता का कहना था कि यह कार्यवाही जमाबंदी धारकों के प्रतिकूल की गई।

याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया कि वर्ष 1997 में अंतिम प्रकाशन के समय विवादित भूमि को गलत रूप से “धनहर” के रूप में “अनाबद बिहार सरकार” के नाम दर्ज किया गया और टिप्पणी स्तंभ में तीन निजी व्यक्तियों – कखान मंडल, मखन मंडल और महेंद्र मंडल – के अवैध कब्जे को दर्शाया गया। उनके पिता ने इसके बाद 10.06.1997 को बिहार किरायेदारी अधिनियम की धारा 106 के अंतर्गत सेटलमेंट अधिकारी, दरभंगा के समक्ष वाद संख्या 6565/1991 दायर कर पुन:संख्या निर्धारण और प्रविष्टि को चुनौती दी।

बाद में जब पंचायत सरकार भवन योजना शुरू हुई तो याचिकाकर्ता ने अंचल अधिकारी, बीरौल के समक्ष आवेदन दिया। अंचल अधिकारी ने दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 144 के तहत कार्यवाही प्रारंभ करने हेतु उप-मंडल पदाधिकारी से अनुरोध किया, जिसके फलस्वरूप वाद संख्या 334/2020 दर्ज हुआ। कोविड-19 महामारी और वैधानिक अवधि समाप्त हो जाने के कारण यह कार्यवाही याचिकाकर्ता को अंतिम राहत दिए बिना ही समाप्त हो गई।

न्यायालय ने क्या परखा और क्या निर्णय दिया

पटना उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति मोहित कुमार शाह ने याचिकाकर्ता के निजी स्वामित्व के दावे और राज्य के इस पक्ष, कि भूमि “अनाबद बिहार सरकार” श्रेणी की सरकारी भूमि है, दोनों की जांच की।

याचिकाकर्ता ने मुख्य रूप से अपने पूर्वज के पक्ष में कथित बसावटी, चार भाइयों के बीच कथित बंटवारा, अपने पिता के नाम जमाबंदी संख्या 494 के निर्माण और किराया भुगतान की पुरानी कहानी पर भरोसा किया। उसने वर्ष 2012–13 की एक किराया/मलगुजारी रसीद अभिलेख पर रखी, जिसके बारे में उसका कहना था कि वह जमाबंदी संख्या 494 से संबंधित है और सिद्ध करती है कि भूमि उसके परिवार के नाम रायती है।

उसका तर्क था कि चूंकि जमाबंदी अब भी उसके पिता के नाम विद्यमान है, इसलिए अधिकारीगण विधिवत कार्यवाही के द्वारा जमाबंदी रद्द किए बिना उसके कब्जे में दखल नहीं दे सकते या उस पर पंचायत सरकार भवन का निर्माण नहीं कर सकते।

राज्य ने अपनी ओर से दरभंगा के उप-विकास आयुक्त और जिला पदाधिकारी द्वारा दाखिल प्रति-शपथपत्र के माध्यम से इस संस्करण को चुनौती दी। उन्होंने न्यायालय को बताया कि 26.10.2022 के मेमो द्वारा उप-मंडल पदाधिकारी, बीरौल की अध्यक्षता में एक जांच समिति गठित की गई थी।

उप-मंडल पदाधिकारी, अंचल अधिकारी तथा उप समाहर्ता भूमि सुधार (डीसीएलआर) से युक्त इस समिति ने स्थल निरीक्षण किया। उन्होंने मौजा अरगा उसुरी, थाना संख्या 86, खाता संख्या 866, खेसरा संख्या 1559, रकबा 96 डिसमिल, की भूमि पर याचिकाकर्ता और अन्य ग्रामीणों की उपस्थिति में निरीक्षण किया।

समिति ने 04.11.2022 के मेमो द्वारा अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की। इसमें दर्ज किया गया कि पंचायत सरकार भवन के लिए चिन्हित भूमि “अनाबद बिहार सरकार” श्रेणी की है और पंचायत भवन निर्माण के लिए पहले ही अनापत्ति प्रमाण पत्र जारी किया जा चुका है। निर्माण कार्य प्लिंथ स्तर तक पूरा हो चुका था।

महत्त्वपूर्ण रूप से, रिपोर्ट में कहा गया कि खेसरा संख्या 1559 पर कोई मकान नहीं है। ग्रामीणों के अनुसार, याचिकाकर्ता की भूमि लगभग दो किलोमीटर दूर वार्ड संख्या 1 में, खेसरा संख्या 826/3969 के अंतर्गत स्थित है। जहां पंचायत भवन बन रहा है, उस हिस्से को छोड़कर खेसरा संख्या 1559 की शेष भूमि खाली पड़ी थी।

जांच समिति ने उन तीन व्यक्तियों के वारिसों से भी बातचीत की जिनका नाम पुनरीक्षण सर्वे खसरा-खतियान में खेसरा संख्या 1559 के अवैध कब्जेदार के रूप में दर्ज था – अर्थात् कखान मंडल के पुत्र (गंगाराम मंडल) और उनकी पुत्रवधू (भुल्ली देवी), मखन मंडल के पुत्र (राम नारायण मंडल), तथा महेंद्र मंडल के पुत्र (राम शरण मंडल)। ये सभी स्थल पर उपस्थित हुए और स्पष्ट रूप से कहा कि उन्हें खेसरा संख्या 1559 पर पंचायत सरकार भवन निर्माण से कोई आपत्ति नहीं है। उन्होंने इस संबंध में पहले से हलफनामे भी दे रखे थे।

इन्हीं तथ्यों के आधार पर जांच समिति ने निष्कर्ष निकाला कि जिस भूमि, खाता संख्या 866, खेसरा संख्या 1559, रकबा 96 डिसमिल, पर पंचायत सरकार भवन बनाया जा रहा है, उस पर याचिकाकर्ता का कोई हक, अधिकार या स्वार्थ नहीं है।

राज्य ने यह भी इंगित किया कि याचिकाकर्ता द्वारा दायर की गई किराया/मलगुजारी रसीदों में कहीं भी खाता या खेसरा संख्या का उल्लेख नहीं है और संबंधित अंचल कार्यालय के अभिलेखों में न तो अनुकूल अधिकार अभिलेख (रिकॉर्ड ऑफ राइट्स) और न ही ऐसी कोई किराया रसीद उपलब्ध हैं।

दोनों पक्षों की दलील सुनने के बाद न्यायालय ने अभिलेख पर मौजूद सामग्री का सूक्ष्म परीक्षण किया। उसे यह पाया कि याचिकाकर्ता ने यह प्रदर्शित करने के लिए कोई भी साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किया कि खाता संख्या 866, खेसरा संख्या 1559, मौजा अगर-उसुरी, थाना संख्या 86, बीरौल, दरभंगा स्थित भूमि उसकी रायती भूमि है। न तो शीर्षक का कोई ठोस प्रमाण था और न ही उसके पक्ष में वैध जमाबंदी की रचना के समर्थन में कोई दस्तावेज।

दूसरी ओर, अधिकार अभिलेख (पुनरीक्षण सर्वे खतियान), जिसमें स्वयं रिट याचिका के पृष्ठ 19 पर संलग्न अंश भी शामिल था, से यह स्पष्ट था कि खेसरा संख्या 1559 “अनाबद बिहार सरकार” के नाम दर्ज है। इसमें तीनों मंडलों (कखान, मखन और महेंद्र) को अवैध कब्जेदार के रूप में दर्शाया गया था, परंतु कहीं भी याचिकाकर्ता या उसके पिता का नाम नहीं था।

न्यायालय ने यह भी नोट किया कि याचिकाकर्ता द्वारा प्रस्तुत एकमात्र किराया/मलगुजारी रसीद वर्ष 2012–13 की थी और उसमें किसी खाता या खेसरा संख्या का उल्लेख नहीं था। न्यायालय ने टिप्पणी की कि ऐसी रसीद “किसी भी प्रकार की कल्पना के द्वारा” भी याचिकाकर्ता के विवादित भूमि पर हक, अधिकार या स्वार्थ को सिद्ध नहीं कर सकती।

इसके बाद न्यायमूर्ति शाह ने बाध्यकारी विधिक सिद्धांतों का उल्लेख किया। LPA संख्या 34/2015 (State of Bihar & Ors. vs. Chandrabanshi Singh) में डिवीजन बेंच के निर्णय पर भरोसा करते हुए एकलपीठ ने पुनः पुष्टि की कि केवल राज्य द्वारा किराया रसीद जारी कर देना या स्वीकार कर लेना भूमि पर स्वामित्व उत्पन्न नहीं करता।

न्यायालय ने Tripathy Kiran Nath Sharma vs. State of Bihar, (2005) 4 PLJR 670 के पूर्व निर्णय तथा हाल के डिवीजन बेंच के 10.05.2024 दिनांकित निर्णय S. M. Ehteshamul Hasan Rehmani vs. the State of Bihar & Ors. (LPA संख्या 1106/2023 एवं युग्मित वाद) का भी हवाला दिया। बाद वाले निर्णय के पैरा 19 को इस आशय पर बल देने के लिए उद्धृत किया गया कि किराया रसीदें स्वामित्व नहीं प्रदान करतीं, विधि के विरुद्ध प्रतिषेध (एसटॉपल) लागू नहीं होता और राज्य अपने अधिकारियों के अनधिकृत कृत्यों से बाध्य नहीं होता।

इसके अतिरिक्त, न्यायालय ने सर्वोच्च न्यायालय के तीन निर्णयों पर भरोसा किया: Suraj Bhan & Ors vs. Financial Commissioner & Ors., (2007) 6 SCC 186; Jitendra Singh vs. State of Madhya Pradesh & Ors., 2021 SCC OnLine SC 802; तथा P. Kishore Kumar vs. Vittal K. Patkar, 2023 SCC OnLine SC 1483। इन सभी निर्णयों में सामूहिक रूप से यह सिद्धांत प्रतिपादित है कि राजस्व अभिलेखों में म्यूटेशन प्रविष्टियां और जमाबंदियां न तो स्वामित्व उत्पन्न करती हैं और न ही समाप्त करती हैं, शीर्षक के संबंध में उनकी कोई प्रैजम्पटिव वैल्यू नहीं होती, और इन्हें केवल राजस्व उद्देश्यों के लिए बनाए रखा जाता है।

सुनवाई के दौरान जब न्यायालय ने विशेष रूप से याचिकाकर्ता के अधिवक्ता से पूछा कि क्या उनके पास विवादित जमाबंदी के सृजन से संबंधित कोई दस्तावेज है, तो अधिवक्ता ने स्वीकार किया कि उनके पास ऐसा कोई दस्तावेज नहीं है, और सुझाव दिया कि ऐसे दस्तावेज “शायद प्रतिवादियों के पास हों”। न्यायालय ने इसे इस बात की और पुष्टि के रूप में देखा कि वैध शीर्षक दस्तावेज अभिलेख पर प्रस्तुत नहीं किए गए थे।

जहां तक यह आरोप था कि अधिकारीगण खेसरा संख्या 1559 पर स्थित याचिकाकर्ता का मकान तोड़ने वाले हैं, न्यायालय ने इस संबंध में राज्य के स्पष्ट रुख पर भरोसा किया कि उस भूमि पर कोई मकान नहीं है। जांच रिपोर्ट में भी दर्ज था कि जिस भूमि पर पंचायत भवन बन रहा है वह खाली पड़ी है और याचिकाकर्ता का मकान, यदि कोई है, तो लगभग दो किलोमीटर दूर किसी अन्य प्लॉट पर है।

समग्र मूल्यांकन के आधार पर न्यायालय ने माना कि याचिकाकर्ता ने सरकारी भूमि पर अवैध और कपटपूर्ण तरीके से कब्जा करने के उद्देश्य से “झूठा और मनगढ़ंत मामला तैयार” किया है, जबकि उसके पास न तो शीर्षक और न ही कब्जे का कोई विधि-सम्मत प्रमाण था। न्यायालय ने निष्कर्ष निकाला कि रिट याचिका निराधार है और उसे खारिज कर दिया।

यह निर्णय क्यों महत्त्वपूर्ण है

यह निर्णय बिहार के ग्रामीणों और भूमिधारकों के लिए महत्त्वपूर्ण है जो केवल किराया रसीदों या म्यूटेशन प्रविष्टियों के आधार पर भूमि पर स्वामित्व का दावा करते हैं, विशेषकर तब जब पंचायत सरकार भवन जैसे सरकारी प्रोजेक्ट्स बनाए जा रहे हों।

पटना उच्च न्यायालय ने एक बार फिर स्पष्ट कर दिया है कि किराया रसीदें, जमाबंदियां और म्यूटेशन प्रविष्टियां अपने आप में स्वामित्व सिद्ध नहीं करतीं। जिन लोगों की निजी दावे वाली भूमि “अनाबद बिहार सरकार” के नाम दर्ज है, उन्हें अपने पास ठोस शीर्षक दस्तावेज रखने होंगे।

यह निर्णय यह भी दर्शाता है कि न्यायालय ऐसे विवादों के निपटारे में आधिकारिक जांचों, राजस्व अभिलेखों और ग्रामीणों के सामूहिक बयान को महत्व देंगे। बिना ठोस साक्ष्य के रिट याचिका दाखिल करना न केवल विफल हो सकता है बल्कि, जैसा कि यहां हुआ, न्यायालय की कड़ी टिप्पणियों को भी आमंत्रित कर सकता है, जब उसने मामले को “झूठा और मनगढ़ंत” कहा।

विधिक प्रश्न और उनके उत्तर

  • प्रश्न: क्या याचिकाकर्ता ने खाता संख्या 866, खेसरा संख्या 1559, जिस पर पंचायत सरकार भवन का निर्माण हो रहा था, के संबंध में कोई ऐसा विधिक हक, शीर्षक या स्वार्थ सिद्ध किया कि राज्य को निर्माण कार्य या उसके कथित मकान के विध्वंस से रोका जा सके?
    उत्तर: नहीं। न्यायालय ने माना कि भूमि “अनाबद बिहार सरकार” के नाम दर्ज है, याचिकाकर्ता ने न तो कोई ठोस शीर्षक दस्तावेज और न ही जमाबंदी का विश्वसनीय प्रमाण प्रस्तुत किया, उसकी किराया रसीद में खाता या खेसरा संख्या का उल्लेख नहीं था और उससे शीर्षक सिद्ध नहीं हो सकता था, तथा आधिकारिक जांच और राजस्व अभिलेखों से स्पष्ट था कि विवादित भूखंड पर उसका कोई हक, शीर्षक या स्वार्थ नहीं है।

न्यायालय द्वारा उद्धृत मामले

  • State of Bihar & Ors. vs. Chandrabanshi Singh, LPA संख्या 34/2015, निर्णय दिनांक 15.12.2015 (पटना उच्च न्यायालय)।
  • Tripathy Kiran Nath Sharma vs. State of Bihar, (2005) 4 PLJR 670 (पटना उच्च न्यायालय)।
  • S. M. Ehteshamul Hasan Rehmani vs. the State of Bihar & Ors., LPA संख्या 1106/2023 एवं युग्मित वाद, निर्णय दिनांक 10.05.2024 (पटना उच्च न्यायालय)।
  • Suraj Bhan & Ors vs. Financial Commissioner & Ors., (2007) 6 SCC 186 (Supreme Court of India)।
  • Jitendra Singh vs. State of Madhya Pradesh & Ors., 2021 SCC OnLine SC 802 (Supreme Court of India)।
  • P. Kishore Kumar vs. Vittal K. Patkar, 2023 SCC OnLine SC 1483 (Supreme Court of India)।

मामले का विवरण

विवाद संख्या: Civil Writ Jurisdiction Case No. 1060 of 2021

विवाद शीर्षक: Ram Lakhan Mandal vs. The State of Bihar & Ors.

पीठ: माननीय न्यायमूर्ति मोहित कुमार शाह

उद्धरण: 2024(4) PLJR 555

निर्णय तिथि: 04.10.2024

CAV तिथि: 24.07.2024

मामले का स्वरूप: कथित रायती भूमि पर स्थित मकान के विध्वंस और पंचायत सरकार भवन के निर्माण पर रोक की मांग करते हुए दायर सिविल रिट क्षेत्राधिकार के तहत रिट याचिका।

पक्षकारों के अधिवक्ता:
याचिकाकर्ता की ओर से: श्री रजनीकांत झा, अधिवक्ता
राज्य की ओर से: श्री एबादुर रहमान शकेब, AC to AAG-12
प्रतिवादी संख्या 11 (मुखिया) की ओर से: श्री प्रफुल्ल चंद्र झा, अधिवक्ता

निर्णय की प्रति हेतु लिंक: Patna High Court Judgment CWJC No. 1060 of 2021


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