भूमिका
पटना उच्च न्यायालय में प्रस्तुत सुनील कुमार बनाम भारत संघ मामले में एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया गया। यह मामला केंद्रीय रिज़र्व पुलिस बल (CRPF) के एक सब-इंस्पेक्टर की बर्खास्तगी से जुड़ा था, जिन्हें ड्यूटी से बार-बार अनुपस्थित रहने और बिना अनुमति गायब होने के आरोप में सेवा से निष्कासित कर दिया गया था।
याचिकाकर्ता सुनील कुमार ने अपनी बर्खास्तगी को चुनौती देते हुए दलील दी कि उन्हें उचित सुनवाई का अवसर नहीं दिया गया और जांच एकतरफा तरीके से पूरी कर ली गई। हालांकि, न्यायालय ने यह पाया कि वह स्वयं कई मौकों पर जांच प्रक्रिया से अनुपस्थित रहे और अनुशासनहीनता के गंभीर आरोप उनके खिलाफ साबित हुए।
अतः, पटना उच्च न्यायालय ने उनकी याचिका को खारिज कर दिया और बर्खास्तगी को सही ठहराया।
मामले की पृष्ठभूमि
- सुनील कुमार, जो कि CRPF के 4वीं बटालियन में सब-इंस्पेक्टर के पद पर कार्यरत थे, पर ड्यूटी से लंबे समय तक अनुपस्थित रहने और बिना अनुमति गायब होने के गंभीर आरोप लगाए गए थे।
- 2005 में उनके खिलाफ अनुशासनात्मक जांच शुरू हुई, लेकिन वे जांच प्रक्रिया में भाग नहीं लेते रहे।
- 2007 में CRPF के डिप्टी इंस्पेक्टर जनरल, पटना ने उन्हें सेवा से बर्खास्त कर दिया।
- उन्होंने इस आदेश को 2009 और 2010 में अपील और पुनरीक्षण याचिकाओं के माध्यम से चुनौती दी, लेकिन वे खारिज कर दी गईं।
- 2010 में उन्होंने पटना उच्च न्यायालय में याचिका दायर की, लेकिन एकल पीठ ने इसे 2012 में खारिज कर दिया।
- इसके बाद, उन्होंने उच्च न्यायालय की खंडपीठ में पुनः अपील (LPA) दायर की।
याचिकाकर्ता (सुनील कुमार) का पक्ष
याचिकाकर्ता के वकील ने निम्नलिखित दलीलें दीं:
- जांच एकतरफा थी: उन्होंने दावा किया कि अनुशासनात्मक जांच उनकी अनुपस्थिति में की गई, जिससे उन्हें अपनी सफाई देने का उचित अवसर नहीं मिला।
- निष्कासन अनुचित था: बर्खास्तगी का निर्णय अत्यधिक कठोर था और छोटे अपराध के लिए इतनी कड़ी सजा नहीं दी जानी चाहिए।
- अनुशासनात्मक जांच की प्रक्रिया में खामियां थीं: याचिकाकर्ता के अनुसार, नियम 31 के तहत उचित प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया और बिना पर्याप्त साक्ष्य के उन्हें दोषी ठहराया गया।
सरकार (CRPF) का पक्ष
CRPF और केंद्र सरकार के वकीलों ने अदालत को निम्नलिखित तर्क दिए:
- सुनील कुमार कई बार ड्यूटी से गायब रहे:
- पहली बार 86 दिनों तक अनुपस्थित रहे।
- दूसरी बार 58 दिनों तक गायब रहे।
- तीसरी बार 16 मई 2005 को बिना हथियार जमा किए लापता हो गए।
- जांच के दौरान बार-बार बुलाने के बावजूद वे उपस्थित नहीं हुए:
- पहले 6 अक्टूबर 2005 को जांच की जानकारी दी गई, लेकिन उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया।
- उन्हें 2 जनवरी 2006 और 21 मार्च 2006 को फिर से बुलाया गया, लेकिन वे नहीं आए।
- अंततः, बार-बार गैर-हाजिर रहने के कारण अनुशासनात्मक जांच एकतरफा पूरी करनी पड़ी।
- सभी प्रक्रियाओं का पालन किया गया:
- जांच प्रक्रिया में सभी दस्तावेज और आरोप पत्र उन्हें भेजे गए।
- साक्ष्यों और गवाहों के बयान भी उनके पते पर भेजे गए, लेकिन उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया।
- CRPF जैसी अर्धसैनिक बल में अनुशासनहीनता बर्दाश्त नहीं की जा सकती:
- सुनील कुमार की लगातार गैर-हाजिरी ने साबित किया कि वह एक “क्रॉनिक डेजर्टर” (बार-बार ड्यूटी छोड़ने वाला) थे।
- CRPF जैसी संरचनात्मक और अनुशासित फोर्स में ऐसे व्यवहार को स्वीकार नहीं किया जा सकता।
- बर्खास्तगी पूरी तरह न्यायसंगत थी:
- अनुशासनात्मक कार्रवाई के बाद उनकी अपील और पुनरीक्षण याचिकाओं को विधिपूर्ण तरीके से खारिज किया गया।
पटना उच्च न्यायालय का फैसला
न्यायमूर्ति राजन गुप्ता और न्यायमूर्ति मोहित कुमार शाह की खंडपीठ ने याचिका को खारिज करते हुए निम्नलिखित निष्कर्ष निकाले:
-
जांच प्रक्रिया सही थी:
- बार-बार बुलाने के बावजूद याचिकाकर्ता जांच प्रक्रिया में शामिल नहीं हुए।
- सभी दस्तावेज उन्हें भेजे गए थे, लेकिन उन्होंने जानबूझकर जवाब नहीं दिया।
-
CRPF जैसी अर्धसैनिक बल में अनुशासन अत्यंत आवश्यक है:
- सुनील कुमार की लगातार गैर-हाजिरी और बिना अनुमति गायब रहना एक गंभीर अपराध था।
- अर्धसैनिक बलों में अनुशासन बनाए रखना आवश्यक है, और इस तरह की अनुशासनहीनता को बर्दाश्त नहीं किया जा सकता।
-
बर्खास्तगी का निर्णय उचित था:
- याचिकाकर्ता को पर्याप्त अवसर देने के बावजूद उन्होंने बचाव में कोई ठोस प्रमाण नहीं दिया।
- बर्खास्तगी का आदेश वैध और विधिसंगत था, जिसे अदालत ने सही ठहराया।
अतः, पटना उच्च न्यायालय ने उनकी याचिका खारिज कर दी और बर्खास्तगी को बरकरार रखा।
इस फैसले का महत्व
-
अनुशासन का महत्व:
- CRPF और अन्य अर्धसैनिक बलों में अनुशासन सर्वोपरि होता है।
- यह निर्णय स्पष्ट करता है कि जो जवान बार-बार ड्यूटी से अनुपस्थित रहते हैं, उनके खिलाफ कठोर कार्रवाई की जाएगी।
-
जांच प्रक्रिया में भाग लेना आवश्यक:
- यदि किसी कर्मचारी पर आरोप लगे हैं, तो उसे जांच प्रक्रिया में भाग लेना चाहिए।
- अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि कोई व्यक्ति स्वयं अनुपस्थित रहता है, तो उसे बाद में अनुचित प्रक्रिया का हवाला देने का अधिकार नहीं है।
-
निष्कासन के खिलाफ अपील में सावधानी:
- यदि किसी व्यक्ति को निष्कासित किया जाता है, तो उसे अपील में ठोस सबूत और कानूनी आधार प्रस्तुत करने होंगे।
- केवल “अनुचित प्रक्रिया” का तर्क देकर कोई राहत नहीं मिल सकती।
निष्कर्ष
पटना उच्च न्यायालय का यह फैसला अनुशासनहीन सरकारी कर्मचारियों के लिए एक महत्वपूर्ण मिसाल है। अदालत ने स्पष्ट किया कि कानून का पालन करने वालों को ही न्याय मिलेगा। यदि कोई व्यक्ति अपनी जिम्मेदारियों से बचता है और जांच प्रक्रिया में भाग नहीं लेता, तो उसे बाद में न्याय की उम्मीद नहीं करनी चाहिए।
इस मामले से यह भी स्पष्ट हुआ कि CRPF और अन्य सुरक्षाबलों में कर्तव्य से विमुख होना एक गंभीर अपराध है और ऐसे मामलों में सख्त कार्रवाई आवश्यक है।
पूरा
फैसला पढ़ने के लिए यहां
क्लिक करें:
https://patnahighcourt.gov.in/viewjudgment/MyMxODYwIzIwMTIjMSNO-kLy9DsB0mt4=


