भूमिका
बिहार सरकार द्वारा क्लास-IV कर्मचारियों की भर्ती को लेकर वर्षों से चल रहे विवाद में पटना उच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया। मामला औरंगाबाद ज़िले में वर्ग-4 कर्मचारियों की भर्ती से संबंधित था, जिसमें याचिकाकर्ताओं (सरोज कुमार और शांत कुमार सिंह) ने यह दावा किया कि रिक्तियां उपलब्ध होने के बावजूद सरकार उन्हें नियुक्ति नहीं दे रही थी।
पटना उच्च न्यायालय ने इस मामले को खारिज करते हुए कहा कि पुराने पैनल (2009 की भर्ती सूची) के आधार पर नए उम्मीदवारों की भर्ती नहीं की जा सकती क्योंकि चयन प्रक्रिया का एक निश्चित समय-सीमा होती है और इसे अनिश्चितकाल तक जारी नहीं रखा जा सकता।
मामले की पृष्ठभूमि
- बिहार सरकार ने वर्ष 2009 में क्लास-IV पदों के लिए भर्ती निकाली थी, जिसमें उम्मीदवारों का एक पैनल तैयार किया गया।
- इस पैनल की वैधता 5 जुलाई 2011 से 4 जुलाई 2012 तक तय की गई थी।
- इस अवधि में 103 उम्मीदवारों की नियुक्ति की गई।
- अदालत के विभिन्न आदेशों के कारण इस पैनल को 27 अप्रैल 2013 से 27 अप्रैल 2014 तक दोबारा वैध कर दिया गया, जिसके तहत 220 और उम्मीदवारों की भर्ती 2015 में की गई।
- हालांकि, 27 अप्रैल 2014 के बाद पैनल की वैधता समाप्त हो गई, जिसके बाद प्रशासन ने और नियुक्तियां रोक दीं।
लेकिन कुछ उम्मीदवारों (जिन्हें नियुक्ति नहीं मिली) ने अदालत में याचिका दायर कर यह दावा किया कि अभी भी 62 पद रिक्त हैं और उन्हें भरने का आदेश दिया जाए।
सरकार का पक्ष
बिहार सरकार के वकीलों ने अदालत में यह दलील दी:
- सरकार ने तय समय-सीमा के भीतर पर्याप्त संख्या में नियुक्तियां कर ली थीं।
- 2009 की भर्ती प्रक्रिया अब पुरानी हो चुकी है, और इसे अनिश्चितकाल तक जारी नहीं रखा जा सकता।
- सरकार ने 2016 में नए नियमों के आधार पर भर्ती प्रक्रिया में बदलाव कर दिया था, जिससे पुरानी प्रक्रिया के आधार पर नियुक्ति देना अब संभव नहीं है।
- अदालत पहले ही स्पष्ट कर चुकी है कि पुरानी चयन प्रक्रिया के आधार पर नई रिक्तियों को भरा नहीं जा सकता।
याचिकाकर्ताओं का पक्ष
याचिकाकर्ताओं का कहना था कि:
- 62 पद अब भी खाली हैं और सरकार जानबूझकर इन्हें नहीं भर रही।
- हम पहले से चयनित सूची में थे, लेकिन हमें नियुक्ति नहीं दी गई।
- सरकार की ओर से कोई नया विज्ञापन नहीं निकाला गया, जिससे पुरानी सूची के उम्मीदवारों को ही वरीयता दी जानी चाहिए।
अदालत का फैसला
न्यायमूर्ति राजन गुप्ता और मोहित कुमार शाह की खंडपीठ ने स्पष्ट रूप से कहा कि:
- भर्ती प्रक्रिया को अनिश्चितकाल तक जारी नहीं रखा जा सकता।
- 2009 की चयन सूची अब वैध नहीं रही और उसे आधार बनाकर नई नियुक्ति संभव नहीं है।
- नए नियमों और मानकों के अनुसार भर्ती की जानी चाहिए।
- सरकार के निर्णय में कोई गड़बड़ी नहीं है, इसलिए अदालत इस मामले में हस्तक्षेप नहीं कर सकती।
इस आधार पर, पटना उच्च न्यायालय ने याचिका को खारिज कर दिया।
इस फैसले का महत्व
- सरकारी भर्तियों में समय-सीमा का महत्व: यह मामला दिखाता है कि भर्ती प्रक्रिया की वैधता सीमित होती है और उसे वर्षों तक खींचा नहीं जा सकता।
- सरकारी नियुक्तियों में पारदर्शिता: अदालत ने यह स्पष्ट कर दिया कि किसी भी भर्ती प्रक्रिया के लिए नए मानकों का पालन आवश्यक है और पुरानी सूची के आधार पर नियुक्ति नहीं दी जा सकती।
- अनिश्चितकालीन कानूनी लड़ाइयों पर रोक: यह फैसला उन मामलों में मिसाल बनेगा जहां अभ्यर्थी वर्षों बाद नियुक्ति की मांग करते हैं।
निष्कर्ष
पटना उच्च न्यायालय का यह निर्णय सरकारी भर्ती प्रक्रियाओं की पारदर्शिता और समय-सीमा को बनाए रखने के लिए एक महत्वपूर्ण उदाहरण है। यह स्पष्ट करता है कि यदि किसी भर्ती प्रक्रिया की वैधता समाप्त हो चुकी हो, तो नए उम्मीदवारों की भर्ती पुरानी सूची के आधार पर नहीं की जा सकती।
इस फैसले से यह भी संकेत मिलता है कि सरकारी पदों के लिए उम्मीदवारों को चयन प्रक्रिया के दौरान ही अपने अधिकारों के लिए सतर्क रहना चाहिए, क्योंकि विलंबित दावों को अदालत में मान्यता नहीं दी जाएगी।
पूरा
फैसला पढ़ने के लिए यहां
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https://patnahighcourt.gov.in/viewjudgment/MyMzMzIjMjAyMSMxI04=-blL0L–ak1–Ebouw=


