बिजली भुगतान प्रविष्टि त्रुटि पर आपराधिक मामला रद्द — पटना उच्च न्यायालय, 2019

पटना उच्च न्यायालय से एक विद्युतकर्मी के विरुद्ध चल रहे आपराधिक मामले को रद्द करने का अनुरोध किया गया, जिस पर उपभोक्ता के बिल की राशि का गबन करने का आरोप था। न्यायालय ने पाया कि पूरी राशि एवं ब्याज पहले ही जमा कर दिए गए थे, और विद्युत कंपनी ने भी स्वीकार किया कि यह एक त्रुटि थी। न्यायालय ने आपराधिक कार्यवाही तथा संज्ञान आदेश दोनों को रद्द कर दिया। इस प्राथमिकी से आगे कोई आपराधिक कार्यवाही जारी नहीं रहेगी।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला के. हाट थाना कांड संख्‍या 514/2014 से उत्पन्न हुआ, जो खजांची हाट थाना, जिला पूर्णिया में दर्ज किया गया था। यह आपराधिक मामला बिहार स्टेट पावर होल्डिंग कंपनी लिमिटेड (पूर्व में बिहार राज्य विद्युत मंडल) की शिकायत पर आधारित था, जिसमें उसके एक कर्मचारी द्वारा उपभोक्ता भुगतान का गबन किए जाने का आरोप लगाया गया था।

याचिकाकर्ता विद्युत आपूर्ति प्र भाग, किशनगंज में ग्रेड-III कर्मचारी थे। 15.10.2012 को उन्होंने उपभोक्ता, श्रीमती आशा देवी, से बिजली बकाया के रूप में 5282/- रुपये प्राप्त किए। किंतु सरकारी रजिस्टर में उन्होंने केवल 582/- रुपये की प्रविष्टि की। इस आधार पर आरोप लगाया गया कि उन्होंने 4700/- रुपये के अंतर की राशि का गबन किया है।

बाद में, नवनियुक्त विद्युत कार्यपालक अभियंता द्वारा के. हाट थाना प्रभारी अधिकारी के नाम 09.07.2014 को निर्गत पत्र संख्‍या 1669 के आधार पर 4700/- रुपये के गबन का प्राथमिकी दर्ज की गई। अनुसंधान के पश्चात्, learned Chief Judicial Magistrate, Purnea, ने 21.08.2014 के आदेश द्वारा भारतीय दंड संहिता की धारा 409 एवं 406 के तहत दंडनीय अपराधों पर संज्ञान लिया।

इस संज्ञान आदेश तथा संपूर्ण आपराधिक कार्यवाही के विरुद्ध, याचिकाकर्ता ने दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 482 के अंतर्गत Criminal Miscellaneous No. 3609 of 2015 में पटना उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया। उन्होंने प्राथमिकी, संज्ञान आदेश तथा सभी अनुवर्ती कार्यवाहियों को रद्द करने का आग्रह किया।

न्यायालय ने क्या परखा और क्या निर्णय दिया

पटना उच्च न्यायालय ने Hon’ble Mr. Justice Ahsanuddin Amanullah की पीठ के माध्यम से, याचिकाकर्ता के अधिवक्ता, राज्य का प्रतिनिधित्व कर रहे Additional Public Prosecutor तथा बिहार स्टेट पावर होल्डिंग कंपनी लिमिटेड (जिसे आगे “Company” कहा गया है) के अधिवक्ता के तर्क सुने।

याचिकाकर्ता के विरुद्ध मुख्य आरोप सरल था: 15.10.2012 को ड्यूटी पर रहते हुए उन्होंने उपभोक्ता श्रीमती आशा देवी से 5282/- रुपये प्राप्त किए किंतु सरकारी रजिस्टर में केवल 582/- रुपये की प्रविष्टि की। पुलिस तथा मजिस्ट्रेट ने इसे 4700/- रुपये की जानबूझकर की गई गबन की घटना माना और इसे भारतीय दंड संहिता की धारा 409 एवं 406 (लोक सेवक द्वारा आपराधिक न्यासभंग एवं आपराधिक न्यासभंग) के दायरे में माना।

उच्च न्यायालय के समक्ष याचिकाकर्ता की ओर से यह प्रतिरक्षा रखी गई कि आपराधिक मामला दुर्भावनापूर्ण है और विधिसंगत नहीं है। उन्होंने यह नहीं नकारा कि उन्होंने उपभोक्ता से 5282/- रुपये प्राप्त किए थे। किंतु उनका कहना था कि रजिस्टर में प्रविष्टि करते समय वे अत्यधिक कार्यभार में थे और भूलवश बीच की “2” अंक दर्ज नहीं हो सकी, जिसके कारण “5282” के स्थान पर “582” दर्ज हो गया।

याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने तर्क दिया कि यह मानवीय त्रुटि थी, न कि किसी सोची-समझी योजना का परिणाम। यदि गबन करने की नीयत होती, तो प्रविष्टि किसी ऐसे गोल-अंक में की जाती जिसे प्राप्त वास्तविक राशि से आसानी से जोड़ा न जा सके। इसके विपरीत, “582” की प्रविष्टि साफ दर्शाती है कि वास्तविक संख्या “5282” में से केवल एक अंक छूट गया। याचिकाकर्ता के अनुसार, इससे यह सिद्ध होता है कि यह अनजाने में हुई भूल थी, न कि जानबूझकर की गई हेराफेरी।

न्यायालय को यह भी अवगत कराया गया कि त्रुटि सामने आने के बाद क्या कदम उठाए गए। जब कमी का पता चला, तो याचिकाकर्ता ने स्वयं विद्युत आपूर्ति प्र भाग, पूर्णिया के तत्कालीन कार्यपालक विद्युत अभियंता के समक्ष एक आवेदन दायर किया। इस आवेदन में उन्होंने गलती स्वीकार की और 4700/- रुपये की कमी की राशि जमा करने की अनुमति मांगी।

इस आवेदन पर कार्यवाही करते हुए कार्यपालक विद्युत अभियंता ने 06.05.2014 के दिनांकित आदेश द्वारा याचिकाकर्ता को कमी की राशि जमा करने की अनुमति दे दी। आदेश के अनुपालन में, 09.05.2014 को याचिकाकर्ता ने 4700/- रुपये तत्कालीन बिहार राज्य विद्युत मंडल के बैंक खाते में जमा कर दिए।

इसके पश्चात्, 12.05.2014 के आदेश द्वारा सहायक विद्युत अभियंता, विद्युत आपूर्ति प्र भाग, पूर्णिया (शहरी) ने याचिकाकर्ता को 4700/- रुपये की विलंबित जमा पर ब्याज भुगतान करने का निर्देश दिया। ब्याज की राशि 1269/- रुपये निर्धारित की गई। याचिकाकर्ता ने यह ब्याज राशि भी अगले ही दिन, अर्थात 13.05.2014 को जमा कर दी।

याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने दलील दी कि इन घटनाओं के पश्चात् किसी प्रकार का गबन शेष नहीं रहा। पूरी राशि, ब्याज सहित, Company के खाते में जमा हो चुकी थी। इसके बावजूद, नवनियुक्त विद्युत कार्यपालक अभियंता ने, कथित तौर पर अपने कार्यालय द्वारा पूर्व की जमा राशियों और आदेशों के बारे में पूरी जानकारी न दिए जाने के कारण, 09.07.2014 को पत्र संख्‍या 1669 के माध्यम से के. हाट थाना को 4700/- रुपये के गबन की प्राथमिकी दर्ज करने के लिए पत्र भेज दिया।

अतः, इस पत्र तथा उससे उत्पन्न प्राथमिकी की तिथि को Company के कोष में, विभागीय आदेशों के आधार पर, राशि तथा ब्याज पहले से ही जमा थे। याचिकाकर्ता की ओर से यह आग्रह किया गया कि ऐसी स्थिति में आपराधिक कार्यवाही को जारी रखना न्यायालय की प्रक्रिया का दुरुपयोग है और इसे दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 482 के अंतर्गत रद्द किया जाना चाहिए।

मामले में एक महत्वपूर्ण विकास Company द्वारा स्वयं उच्च न्यायालय के समक्ष लिया गया रुख था। Company के अधिवक्ता ने प्रतिवाद हलफनामा दायर कर प्रासंगिक अभिलेखों को अभिलेख पर लाया, जिनमें याचिकाकर्ता का आवेदन, जमा की अनुमति देने वाले आदेश तथा कमी की राशि एवं ब्याज की जमा के प्रमाण पत्र सम्मिलित थे।

महत्त्वपूर्ण बात यह थी कि Company के अधिवक्ता ने याचिकाकर्ता द्वारा प्रस्तुत तथ्यात्मक विवरण से इंकार नहीं किया। विशेष रूप से, उन्होंने इस दावे का प्रतिवाद नहीं किया कि 09.07.2014 के पत्र से पहले ही पूरी राशि और ब्याज जमा हो चुके थे, और ये कदम तत्कालीन कार्यपालक विद्युत अभियंता तथा सहायक विद्युत अभियंता की जानकारी और आदेशों के अधीन उठाए गए थे।

राज्य की ओर से उपस्थित learned Additional Public Prosecutor ने भी निष्पक्ष रुख अपनाया। जब Company ने स्वयं स्वीकार कर लिया कि यह एक त्रुटि थी और यह भी मान लिया कि राशि और ब्याज प्राप्त हो चुके हैं, तब राज्य के अधिवक्ता ने यह प्रस्तुत किया कि वाद-पत्र (quashing application) स्वीकार किया जाना चाहिए।

न्यायालय ने समग्र तथ्यों और परिस्थितियों पर विचार किया। उसने अनेक पहलुओं पर ध्यान दिया:

  • याचिकाकर्ता की यह व्याख्या कि “5282” के स्थान पर “582” दर्ज होना एक bona fide मानवीय त्रुटि प्रतीत होती है।
  • याचिकाकर्ता ने स्वेच्छा से अपने उच्चाधिकारी के समक्ष जाकर गलती स्वीकार की और कमी की राशि जमा करने की अनुमति मांगी।
  • सक्षम प्राधिकारी ने जमा की अनुमति दी और याचिकाकर्ता ने प्राथमिकी दर्ज करने के अनुरोध से पहले ही कमी की राशि तथा ब्याज दोनों जमा कर दिए।
  • Company ने अपने अधिवक्ता तथा दस्तावेजों के माध्यम से तथ्य स्थिति का समर्थन किया और किसी भी प्रकार के चल रहे गबन का आरोप नहीं लगाया।
  • Company के रुख को देखते हुए राज्य ने भी सहमति जताई कि मामले को रद्द करने का आधार बनता है।

इन तथ्यों पर विचार करने के बाद, पटना उच्च न्यायालय ने दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 482 के अंतर्गत अपनी अंतर्निहित शक्तियों का प्रयोग किया। उसने यह माना कि आवेदन स्वीकार किया जाना चाहिए और आपराधिक मामला जारी रखना न्यायोचित नहीं होगा।

अतः न्यायालय ने के. हाट थाना कांड संख्‍या 514/2014 से उत्पन्न संपूर्ण आपराधिक कार्यवाही, जो अधीनस्थ न्यायालय पूर्णिया में लंबित थी, को रद्द कर दिया। विशेष रूप से, उसने 21.08.2014 के उस संज्ञान आदेश को निरस्त कर दिया जिसके द्वारा learned Chief Judicial Magistrate, Purnea, ने याचिकाकर्ता के विरुद्ध भारतीय दंड संहिता की धाराओं 409 एवं 406 के अपराधों पर संज्ञान लिया था।

समापन से पूर्व, न्यायालय ने Company के learned counsel श्री कुमार प्रिया रंजन की सराहना दर्ज की, जिन्होंने न्यायालय के अनुरोध पर तुरंत उपस्थिति दी, प्रतिवाद हलफनामा दायर किया और निष्पक्ष रुख अपनाया।

यह निर्णय क्यों महत्त्वपूर्ण है

यह निर्णय सरकारी विभागों, सार्वजनिक उपक्रमों तथा बिजली बोर्ड जैसी उपयोगिताओं के कर्मचारियों के लिए महत्त्वपूर्ण है। यह दर्शाता है कि धन के प्रबंधन में होने वाली हर गलती अपने आप आपराधिक मामला नहीं बन जाती, यदि तथ्य स्पष्ट रूप से दिखाते हों कि यह एक वास्तविक त्रुटि थी, जिसे बाद में पूर्ण रूप से सुधार लिया गया।

यहाँ, पटना उच्च न्यायालय ने नोट किया कि याचिकाकर्ता ने विभागीय आदेशों के अधीन पहले ही पूरी कमी की राशि जमा कर दी थी और यहां तक कि ब्याज भी चुका दिया था, वह भी उस समय से काफी पहले जब प्राथमिकी दर्ज कराने का अनुरोध किया गया। स्वयं विद्युत कंपनी ने इस त्रुटि को स्वीकार किया और तथ्यात्मक पृष्ठभूमि का समर्थन किया। ऐसी स्थिति में न्यायालय ने माना कि 409 और 406 IPC जैसी गंभीर धाराओं के तहत आपराधिक मामला जारी रखना न्यायसंगत नहीं है।

साधारण कर्मचारियों के लिए यह निर्णय यह संकेत देता है कि यदि सरकारी धन के प्रबंधन में वास्तविक, ईमानदार गलती हो जाए, तो उसे तत्काल रिपोर्ट करना, त्रुटि स्वीकार करना और जितनी जल्दी हो सके कमी की राशि जमा कर देना बहुत महत्त्वपूर्ण है। इन कदमों का दस्तावेजीकरण तथा विभाग द्वारा लिए गए रुख बाद में न्यायालय में निर्णायक सिद्ध हो सकते हैं।

साथ ही, यह निर्णय यह नहीं कहता कि सभी कमी या अनियमितताएँ मात्र भूल ही मानी जाएँगी। यह अपने विशिष्ट तथ्यों पर आधारित था: स्पष्ट संख्यात्मक त्रुटि, स्वैच्छिक सुधार, विभाग द्वारा स्वीकार्यता और निरंतर हानि का अभाव। जहाँ बेईमानी की नीयत के साक्ष्य हों या हानि की भरपाई से इंकार किया जाए, वहाँ आपराधिक अभियोजन अब भी जारी रह सकता है।

विधिक प्रश्न और उनके उत्तर


  • प्रश्न: जब कोई विद्युतकर्मी 4700/- रुपये की कथित गबन की राशि तथा उसका ब्याज पहले ही जमा कर चुका हो और विद्युत कंपनी स्वयं इसे एक त्रुटि स्वीकार कर रही हो, तो क्या उसके विरुद्ध 409 एवं 406 IPC के अंतर्गत संज्ञान सहित आपराधिक कार्यवाही जारी रहनी चाहिए?

    उत्तर: नहीं। पटना उच्च न्यायालय ने माना कि इस मामले के तथ्यों में यह त्रुटि bona fide प्रतीत होती है, राशि एवं ब्याज विभागीय आदेशों के तहत जमा हो चुके थे और Company ने इन तथ्यों पर विवाद नहीं किया। अतः संपूर्ण आपराधिक कार्यवाही, जिसमें 21.08.2014 का संज्ञान आदेश भी शामिल है, को धारा 482 CrPC के अंतर्गत रद्द कर दिया गया।

न्यायालय द्वारा उद्धृत मामले

  • इस निर्णय के पाठ में किसी पूर्ववर्ती निर्णय का उल्लेख या उस पर निर्भरता नहीं की गई है।

मामले का विवरण

मामला संख्या: Criminal Miscellaneous No. 3609 of 2015; arising out of K. Hat P.S. Case No. 514 of 2014, District Purnea.

मामले का शीर्षक: Md. Abdul Mannan v. The State of Bihar & Ors.

प्रकाशन उद्धरण: 2019 (2) PLJR 1086

न्यायालय: High Court of Judicature at Patna

पीठ: Hon’ble Mr. Justice Ahsanuddin Amanullah

निर्णय की तिथि: 10.05.2019

अधिवक्ता:

  • याचिकाकर्ता की ओर से: Mr. Ashok Kumar Jha, Dr. Bidhu Ranjan, Advocates
  • राज्य की ओर से: Mr. Jharkhandi Upadhyay, APP
  • Power Company की ओर से: Mr. Kumar Priya Ranjan, Mr. Niraj Kumar, Advocates

मामले का स्वरूप: दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 482 के अंतर्गत दायर याचिका, जिसमें एक आपराधिक मामले में (धारा 409 एवं 406 IPC के तहत गबन के अपराध) प्राथमिकी तथा संज्ञान आदेश को रद्द करने का अनुरोध किया गया।

निर्णय का लिंक: पटना उच्च न्यायालय की वेबसाइट पर पूर्ण निर्णय देखें


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