जन्मतिथि विवाद के कारण कांस्टेबल की बर्खास्तगी रद्द — पटना उच्च न्यायालय, 2022

Urvashi Bharti

Reviewed by: Urvashi Bharti

License Number: BR/3533/2024

Urvashi Bharti is a lawyer at Samvida Law Associates practicing in banking regulations and arbitration matters. She represents clients in regulatory compliance issues, arbitration proceedings, and banking sector disputes before the Patna High Court and other forums. Her practice handles commercial arbitration, banking litigation, and dispute resolution for corporate clients and financial institutions.

इस मामले में, एक पुलिस कांस्टेबल, जिसे कथित रूप से दो अलग-अलग जन्मतिथियाँ देने के आधार पर बर्खास्त किया गया था, ने अपनी सेवा से हटाए जाने को चुनौती दी। पटना उच्च न्यायालय ने पाया कि विभागीय जांच त्रुटिपूर्ण थी क्योंकि महत्वपूर्ण दस्तावेज़ों और गवाहों की ठीक से जांच नहीं की गई थी। न्यायालय ने बर्खास्तगी को निरस्त करते हुए उसकी सेवा में पुनर्बहाली का आदेश दिया, परंतु पिछला वेतन देने से इंकार कर दिया। अधिकारियों को निर्देश दिया गया कि वे उसकी सेवा संबंधी सुविधाएँ बहाल करें और दो महीने के भीतर उसे पुनः ड्यूटी पर ले लें।

मामले की पृष्ठभूमि

याचिकाकर्ता को पहली बार 07.08.1989 को होमगार्ड के रूप में नियुक्त किया गया था। उस नियुक्ति के लिए उसकी जन्मतिथि 20.10.1968 दर्ज की गई थी।

बाद में, 10.02.2004 को कांस्टेबल के पद के लिए आवेदन आमंत्रित करने हेतु एक सार्वजनिक विज्ञापन जारी किया गया। याचिकाकर्ता ने उम्मीदवार के रूप में आवेदन किया। इस पद पर चयन मैट्रिक (10वीं पास) योग्यता के आधार पर होना था।

याचिकाकर्ता का चयन 09.05.2008 को हुआ। अंतिम नियुक्ति के लिए 04.07.2008 को उसके दस्तावेजों का सत्यापन किया गया। उस समय कोई आपत्ति दर्ज नहीं की गई और उसके दस्तावेज़ स्वीकार कर लिए गए।

हालाँकि, औपचारिक नियुक्ति आदेश जारी होने से पहले, 18.07.2008 को एक प्राथमिकी दर्ज की गई। आरोप यह था कि याचिकाकर्ता ने अपने ट्रांसफर सर्टिफिकेट और मैट्रिकुलेशन सर्टिफिकेट के आधार पर दो अलग-अलग जन्मतिथियाँ – 20.10.1968 और 02.06.1975 – प्रस्तुत की हैं।

रिकॉर्ड से पता चलता है कि याचिकाकर्ता ने 25.11.1992 को मैट्रिक की परीक्षा पास की, जब वह पहले से ही होमगार्ड के रूप में कार्यरत था। उसके मैट्रिकुलेशन सर्टिफिकेट में उसकी जन्मतिथि 02.06.1975 दर्ज थी, जो होमगार्ड रिकॉर्ड में दर्ज जन्मतिथि से भिन्न थी।

कुछ समान रूप से स्थित व्यक्तियों ने जन्मतिथि संशोधन के संबंध में पहले ही पटना उच्च न्यायालय का रुख किया था। उनके मामलों का निपटारा न्यायालय द्वारा किया गया (जिसे परिशिष्ट-6 के रूप में संदर्भित किया गया है)। याचिकाकर्ता ने भी न्यायालय का दरवाजा खटखटाया और उसकी याचिका का निपटारा (परिशिष्ट-7) इस निर्देश के साथ किया गया कि वह एक विस्तृत प्रार्थना पत्र प्रस्तुत करे, जिसे पूर्ववर्ती निर्णय के आलोक में विचारित किया जाए।

इन घटनाक्रमों के बाद, याचिकाकर्ता को 14.04.2011 को कांस्टेबल के रूप में नियुक्त किया गया।

आपराधिक मामले में अन्वेषण अधिकारी की रिपोर्ट के आधार पर, अनुशासनात्मक प्राधिकारी ने 04.11.2011 को याचिकाकर्ता को निलंबित कर दिया। विभागीय स्तर पर 13.11.2011 को एक आरोप-पत्र जारी किया गया। याचिकाकर्ता ने 25.01.2012 को अपना उत्तर प्रस्तुत किया।

अनुशासनात्मक प्राधिकारी उसकी व्याख्या से संतुष्ट नहीं हुआ और विभागीय (घरेलू) जांच कराने का निर्णय लिया। जांच का समापन 11.07.2013 को हुआ, जिसमें यह निष्कर्ष निकाला गया कि याचिकाकर्ता के विरुद्ध आरोप सिद्ध है।

11.07.2013 दिनांकित जांच अधिकारी की रिपोर्ट के आधार पर 05.08.2013 को द्वितीय कारण बताओ नोटिस जारी किया गया। तत्पश्चात, मेमो संख्या 5405 दिनांक 13.09.2013 द्वारा अनुशासनात्मक प्राधिकारी ने विभागीय कार्यवाही संख्या 108/2011 में याचिकाकर्ता को सेवा से बर्खास्त कर दिया। यह भी निर्देशित किया गया कि निलंबन अवधि के दौरान उसे केवल निर्वाह भत्ता ही देय होगा और निलंबन अवधि को आधी अर्जित अवकाश के विरुद्ध समायोजित किया जाएगा।

याचिकाकर्ता ने अपील दायर की, लेकिन अपीलीय प्राधिकारी (प्रतिवादी संख्या 4) ने मेमो संख्या 1391 दिनांक 27.06.2014 के द्वारा अपील को खारिज कर दिया और बर्खास्तगी के आदेश की पुष्टि की। उसके पश्चात दायर स्मरण-पत्र (मेमोरियल) को भी 23.06.2015 को अस्वीकृत कर दिया गया।

इसी बीच, प्राथमिकी दिनांक 18.07.2008 से उत्पन्न आपराधिक मामले में, 04.11.2015 को याचिकाकर्ता को बरी कर दिया गया। आपराधिक न्यायालय ने कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपों को सिद्ध करने में विफल रहा है।

विभागीय बर्खास्तगी और उसकी अपीलों के खारिज किए जाने से आहत होकर, याचिकाकर्ता ने पटना उच्च न्यायालय में सिविल रिट जूरिस्डिक्शन केस संख्या 17398 वर्ष 2014 में याचिका दायर की।

न्यायालय ने क्या जांचा और क्या निर्णय दिया

पटना उच्च न्यायालय के समक्ष याचिकाकर्ता की मुख्य प्रार्थना यह थी कि 30.09.2013 की बर्खास्तगी का आदेश, 27.06.2014 का अपीलीय आदेश निरस्त करते हुए, उसे समस्त परवर्ती मौद्रिक लाभों सहित पुन: सेवा में बहाल किया जाए।

याचिकाकर्ता की ओर से यह इंगित किया गया कि होमगार्ड नियुक्ति के लिए योग्यता केवल आठवीं कक्षा थी। उस समय उसने अपनी जन्मतिथि 20.10.1968 बताई थी और 07.08.1989 को उसकी नियुक्ति हुई थी।

उसने बाद में 25.11.1992 को मैट्रिक की परीक्षा पास की। होमगार्ड रिकॉर्ड में उसकी जन्मतिथि 20.10.1968 ही बनी रही। परंतु कांस्टेबल भर्ती के उद्देश्य से प्रासंगिक दस्तावेज़ मैट्रिकुलेशन सर्टिफिकेट था, जिसमें उसकी जन्मतिथि 02.06.1975 दर्ज थी।

इस प्रकार, होमगार्ड के रिकॉर्ड और मैट्रिकुलेशन रिकॉर्ड में दर्ज जन्मतिथि के बीच अंतर था। याचिकाकर्ता का मत था कि कांस्टेबल भर्ती के लिए मैट्रिक की जन्मतिथि को अंतिम माना जाना चाहिए।

याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि जांच से यह सिद्ध नहीं हुआ कि उसने जानबूझकर दो जन्मतिथियाँ देकर अधिकारियों को गुमराह किया है। उसने राज्य की एक नीतिगत निर्णय, जो प्रतिवादी संख्या 2 द्वारा 15.01.2000 को सेवा रिकॉर्ड में जन्मतिथि संशोधन के संबंध में जारी किया गया था, पर भरोसा किया। उसका दावा था कि उसने इस नीति के तहत प्रतिनिधित्व किया था, जिसे अस्वीकार कर दिया गया।

याचिकाकर्ता के अनुसार, मुख्य आरोप यह था कि उसने दो जन्मतिथियाँ प्रस्तुत कीं और आवेदन पत्र में अपना नाम मैट्रिकुलेशन सर्टिफिकेट में दर्ज नाम के अनुरूप नहीं लिखा। उसका कहना था कि आवेदन पत्र में अपने पूर्ण नाम का उल्लेख न करना अनजाने में हुई चूक थी।

उसने यह भी रेखांकित किया कि 04.11.2015 को उसे आपराधिक मामले में बरी कर दिया गया, जिससे यह स्पष्ट है कि गलत सूचना देने का आरोप आपराधिक कार्यवाही में भी सिद्ध नहीं हुआ।

सबसे महत्वपूर्ण यह कि याचिकाकर्ता ने इंगित किया कि तीन अत्यंत महत्वपूर्ण दस्तावेज़ – ट्रांसफर सर्टिफिकेट, मैट्रिकुलेशन सर्टिफिकेट और कांस्टेबल पद के लिए उसका आवेदन-पत्र – आरोप-पत्र में आश्रित (रिलाइड-ऑन) दस्तावेज़ों के रूप में सूचीबद्ध ही नहीं थे। इन दस्तावेज़ों को विशेष रूप से शामिल किए बिना और उनकी जांच किए बिना यह निष्पक्ष रूप से तय करना असंभव था कि वास्तव में उसने दो जन्मतिथियाँ दी थीं या गलत नाम लिखा था।

इसी आधार पर उसने तर्क दिया कि विभागीय प्रक्रिया, जांच की पहल से लेकर स्मरण-पत्र की अस्वीकृति तक, संपूर्ण रूप से दूषित है और निरस्त किए जाने योग्य है।

राज्य ने याचिका का विरोध किया। राज्य के अधिवक्ता ने तर्क दिया कि याचिकाकर्ता ने 20.10.1968 और 02.06.1975 दो जन्मतिथियाँ देकर तथा आवेदन-पत्र में ऐसा नाम लिखकर जो मैट्रिकुलेशन सर्टिफिकेट में दर्ज नाम से भिन्न था, अधिकारियों को गुमराह किया है। उनका मत था कि जांच अधिकारी की रिपोर्ट और अनुशासनात्मक व अपीलीय प्राधिकारियों के आदेश विधिसम्मत हैं और उनमें हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है।

दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद, न्यायालय ने मुख्य प्रश्न को संकीर्ण कर यह किया: क्या विभाग ने यह सिद्ध कर दिया कि याचिकाकर्ता ने अपनी जन्मतिथि और नाम के संबंध में अधिकारियों को गुमराह किया था?

न्यायालय ने इस प्रश्न के उत्तर के लिए तीन महत्वपूर्ण दस्तावेज़ों की पहचान की: ट्रांसफर सर्टिफिकेट (जन्मतिथि 20.10.1968), मैट्रिकुलेशन सर्टिफिकेट (जन्मतिथि 02.06.1975 और नाम Vijay Kumar या Vijay Kumar Singh), और कांस्टेबल पद हेतु आवेदन-पत्र (जिसमें याचिकाकर्ता ने मैट्रिकुलेशन से भिन्न नाम लिखा और 02.06.1975 के स्थान पर जन्मतिथि 20.10.1970 लिखी)।

न्यायालय ने ध्यान दिया कि ये महत्वपूर्ण दस्तावेज़ परिशिष्ट-13 से स्पष्ट है कि आरोप-पत्र के साथ संलग्न दस्तावेज़ों की सूची में विशेष रूप से उद्धृत नहीं थे। सूचीबद्ध दस्तावेज़ मुख्यत: आधिकारिक रिपोर्टें और पुलिस रिकॉर्ड थे, तथा कुछ गवाहों के नाम दिए गए थे।

न्यायालय ने दर्ज किया कि प्रतिवादियों ने स्वयं यह तर्क दिया कि ये तीनों दस्तावेज़ दस्तावेज़ संख्या 1 का हिस्सा हैं, परंतु दस्तावेज़ संख्या 1 के रचनाकार (लेखक) की जांच या जिरह विभागीय कार्यवाही में नहीं की गई।

न्यायालय ने यह भी देखा कि यदि सटीक जन्मतिथि विवादित है, तो ट्रांसफर सर्टिफिकेट और मैट्रिकुलेशन सर्टिफिकेट के रचनाकारों की जांच की जानी चाहिए थी, ताकि यह निर्धारित किया जा सके कि कौन-सी जन्मतिथि सही है। आगे, 15.01.2000 की राज्य नीति (प्रतिवादी संख्या 2 द्वारा जारी) के अनुसार मैट्रिकुलेशन में दर्ज जन्मतिथि (02.06.1975) को अंतिम माना जाना आवश्यक था।

न्यायालय ने यह रेखांकित किया कि शुरू से ही अधिकारियों ने वे प्रासंगिक दस्तावेज़ दर्शाने और उन पर आश्रित होने में विफलता दिखाई, जो यह सिद्ध करने के लिए आवश्यक थे कि याचिकाकर्ता ने जन्मतिथि और नाम के संबंध में उन्हें गुमराह किया है।

आपराधिक पक्ष पर, 18.07.2008 को दर्ज प्राथमिकी में भी यही मुद्दा जांच के अधीन था। 04.11.2015 को याचिकाकर्ता की बरी होना, न्यायालय के शब्दों में, स्पष्ट रूप से यह दर्शाता है कि अभियोजन पक्ष वहां भी आरोपों को सिद्ध करने में विफल रहा।

न्यायालय ने आगे यह भी नोट किया कि 14.04.2011 को नियुक्ति आदेश जारी होने से पहले, 04.07.2008 को याचिकाकर्ता के दस्तावेज़ों की जाँच की गई थी और उस समय कोई आपत्ति नहीं उठाई गई। इससे यह पता चलता है कि स्वयं चयन प्राधिकारी की तरफ से सत्यापन प्रक्रिया में चूक रही।

न्यायालय ने माना कि अनुशासनात्मक प्राधिकारी, अपीलीय प्राधिकारी और स्मरण-पत्र अस्वीकृत करने वाले प्राधिकारी ने मामले की सही सराहना नहीं की। उन्होंने जांच कार्यवाही में ट्रांसफर सर्टिफिकेट, मैट्रिकुलेशन सर्टिफिकेट और कांस्टेबल का आवेदन-पत्र पर विचार नहीं किया। उन्होंने 02.11.2011 दिनांकित महत्वपूर्ण रिपोर्ट (दस्तावेज़ संख्या 1) के रचनाकार की भी जांच नहीं की।

साथ ही, न्यायालय ने याचिकाकर्ता को पूर्णतः दोषमुक्त नहीं ठहराया। इसने दर्ज किया कि आवेदन-पत्र में याचिकाकर्ता ने वास्तव में अपनी जन्मतिथि 20.10.1970 लिखी, जबकि उसके मैट्रिकुलेशन सर्टिफिकेट में 02.06.1975 दर्ज थी, और उसने अपना नाम भी मैट्रिक रिकॉर्ड के विपरीत ढंग से लिखा।

न्यायालय ने यह भी उल्लेख किया कि आदर्श रूप से याचिकाकर्ता का आवेदन प्रारंभिक स्तर पर ही या दस्तावेज़ सत्यापन के चरण में अस्वीकार कर दिया जाना चाहिए था, और ऐसा न करने में चयन प्राधिकारी की ओर से चूक हुई। फिर भी, यह कि याचिकाकर्ता ने जानबूझकर अधिकारियों को गुमराह किया या नहीं, इसे विधिसम्मत जांच द्वारा सिद्ध किया जाना आवश्यक था, जो कि नहीं किया गया।

इन प्रक्रियागत खामियों के कारण, न्यायालय ने बर्खास्तगी और संबंधित आदेशों को “तकनीकी आधार” पर निरस्त कर दिया। उसने निर्देश दिया कि याचिकाकर्ता को कांस्टेबल के पद पर पुनः बहाल किया जाए।

हालाँकि, न्यायालय ने बर्खास्तगी की तारीख (13.09.2013) से पुनर्बहाली तक की अवधि के लिए पिछला वेतन देने से इंकार कर दिया। इसने स्पष्ट कारण बताया: यह विवादित नहीं था कि याचिकाकर्ता ने अपने आवेदन-पत्र में गलत जन्मतिथि (20.10.1970) और गलत नाम लिखा था, जबकि उसके मैट्रिकुलेशन रिकॉर्ड में 02.06.1975 और सही नाम दर्ज था।

न्यायालय ने यह भी विचार किया कि क्या मामले को पुनः विभागीय जांच हेतु वापस भेजा जाए। चूँकि विवाद 2008 से लंबित था और यह मामला सरकारी धन के गबन से संबंधित नहीं था, न्यायालय ने माना कि नये सिरे से जांच का आदेश देना उपयुक्त नहीं होगा।

इसके बजाय, न्यायालय ने प्रतिवादी अधिकारियों को आदेश दिया कि वे आदेश की प्राप्ति की तिथि से दो महीने के भीतर याचिकाकर्ता को पुनः सेवा में बहाल करें। साथ ही, उन्हें निर्देशित किया गया कि वे 14.04.2011 से प्रभावी नियुक्त उसके तात्कालिक कनिष्ठ के समकक्ष, वर्तमान तक, उसकी समस्त सेवा सुविधाएँ जैसे वार्षिक वेतनवृद्धि, वेतन पुनर्निर्धारण, वरिष्ठता और पेंशन संबंधी लाभ (यदि लागू हो) प्रदान करें। केवल 13.09.2013 से पुनर्बहाली तक की मध्यवर्ती अवधि के मौद्रिक लाभों से इंकार किया गया।

तदनुसार, रिट याचिका स्वीकार कर ली गई।

यह निर्णय क्यों महत्वपूर्ण है

यह निर्णय उन सरकारी कर्मचारियों और अभ्यर्थियों के लिए महत्वपूर्ण है जो आवेदन-पत्रों में गलत जानकारी, विशेष रूप से जन्मतिथि और नाम के संबंध में, आरोपों के आधार पर विभागीय कार्यवाही का सामना कर रहे हैं।

पटना उच्च न्यायालय ने यह स्पष्ट कर दिया है कि यदि राज्य किसी कर्मचारी को गलत विवरण देने के लिए दंडित करना चाहता है, तो उसे निष्पक्ष जांच के माध्यम से आरोप को सख्ती से सिद्ध करना होगा। सभी महत्वपूर्ण दस्तावेज़ों का उल्लेख और प्रस्तुतीकरण आवश्यक है, और महत्वपूर्ण दस्तावेज़ों के रचनाकारों की जांच व जिरह होनी चाहिए।

साथ ही, न्यायालय ने यह संकेत भी दिया है कि अभ्यर्थियों को फॉर्म भरते समय सावधानी और ईमानदारी बरतनी चाहिए। यहाँ याचिकाकर्ता को पिछला वेतन इसलिए नहीं मिला क्योंकि उसने अपने आवेदन में अलग जन्मतिथि और गलत नाम लिखा था, यद्यपि उसकी बर्खास्तगी रद्द कर दी गई।

समान स्थिति में मौजूद व्यक्तियों के लिए यह निर्णय यह दर्शाता है कि त्रुटिपूर्ण विभागीय जांचों को सफलतापूर्वक चुनौती दी जा सकती है। परंतु यदि उनका अपना आचरण पूरी तरह निष्कलंक नहीं है तो, पुनर्बहाली मिलने पर भी उन्हें पूर्ण पिछला वेतन मिलने की अपेक्षा नहीं रखनी चाहिए।

कानूनी प्रश्न और उनके उत्तर

  • प्रश्न: क्या विभागीय जांच ने यह उचित रूप से सिद्ध किया कि याचिकाकर्ता ने कांस्टेबल भर्ती के लिए अलग-अलग जन्मतिथियाँ और गलत नाम देकर अधिकारियों को गुमराह किया?
    उत्तर: नहीं। जांच को त्रुटिपूर्ण माना गया क्योंकि महत्वपूर्ण दस्तावेज़ (ट्रांसफर सर्टिफिकेट, मैट्रिकुलेशन सर्टिफिकेट, आवेदन-पत्र) का समुचित रूप से उल्लेख या प्रमाणन नहीं हुआ और महत्वपूर्ण गवाहों की जांच नहीं की गई।
  • प्रश्न: क्या ऐसी परिस्थितियों में बर्खास्तगी का आदेश, अपीलीय आदेश और स्मरण-पत्र की अस्वीकृति टिक सकती थी?
    उत्तर: नहीं। इन सभी आदेशों को तकनीकी आधार पर निरस्त कर दिया गया और याचिकाकर्ता को कांस्टेबल के रूप में पुनर्बहाली का निर्देश दिया गया।
  • प्रश्न: क्या याचिकाकर्ता बर्खास्तगी और पुनर्बहाली के बीच की अवधि के लिए मौद्रिक लाभ पाने का हकदार था?
    उत्तर: नहीं। न्यायालय ने उस अवधि के लिए पिछला वेतन देने से इंकार कर दिया क्योंकि याचिकाकर्ता ने स्वीकार्य रूप से अपने कांस्टेबल आवेदन-पत्र में गलत जन्मतिथि और नाम दिया था।

न्यायालय द्वारा उद्धृत मामले

  • निर्णय में किसी विशिष्ट प्रतिवेदित वाद-विवरण (रिपोर्टेड केस लॉ) का उल्लेख या उस पर निर्भरता नहीं है। तथापि, इसमें पटना उच्च न्यायालय के एक पूर्व निर्णय (परिशिष्ट-6) और राज्य की 15.01.2000 दिनांकित नीतिगत निर्णय का उल्लेख है।

मामले का विवरण

मामला संख्या: Civil Writ Jurisdiction Case No. 17398 of 2014

मामले का शीर्षक: Vijay Kumar @ Vijay Kumar Singh बनाम The State of Bihar and Others

उद्धरण: 2022 (2) PLJR 86

न्यायालय: High Court of Judicature at Patna

पीठ (कोरम): माननीय श्री न्यायमूर्ति P. B. Bajanthri

निर्णय की तिथि: 08.03.2022

अधिवक्ता:

याचिकाकर्ता की ओर से: Mr. Arun Kumar

राज्य की ओर से: Mr. Ashok Kumar Dubey (AC to AAG-11)

मामले का स्वरूप: सेवा से बर्खास्तगी को चुनौती देते हुए तथा परवर्ती लाभों सहित पुनर्बहाली की मांग करते हुए सिविल रिट क्षेत्राधिकार के अंतर्गत दायर रिट याचिका।

निर्णय की प्रति का लिंक: पूरे पटना उच्च न्यायालय के निर्णय को पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें

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