पटना उच्च
न्यायालय का
निर्णय सारांश
मामला संख्या: सिविल
रिट न्यायिक
क्षेत्र मामला
संख्या 589/2019
न्यायाधीश: माननीय
श्री न्यायमूर्ति
मधुरेश प्रसाद
निर्णय दिनांक:
19 सितंबर 2019
मामले का विवरण
और पृष्ठभूमि
यह मामला
राजीव कुमार
द्वारा दायर
किया गया,
जो स्वर्गीय
विजय कुमार
(विजय कुमार
सिंह के
नाम से
भी जाने
जाते हैं)
के पुत्र
हैं। याचिकाकर्ता
नालंदा जिले
के नेपुरा
गांव के
निवासी हैं।
1. याचिकाकर्ता: राजीव
कुमार
2. प्रतिवादीगण: बिहार
राज्य सरकार
के विभिन्न
विभाग और
अधिकारी
मामले के महत्वपूर्ण
तथ्य
1. याचिकाकर्ता के
पिता, जो
सरकारी कर्मचारी
थे, 23 सितंबर
2005 से लापता
हैं।
2. लापता सरकारी कर्मचारी
की पत्नी
ने 29 जनवरी
2013 को अधिकारियों
के समक्ष
एक आवेदन
प्रस्तुत किया।
3. आवेदन में दो
प्रमुख मांगें
थीं:
– लापता कर्मचारी
के बकाया
भुगतान की
मांग
– अनुकंपा नियुक्ति
की मांग
कानूनी मुद्दे
और विचार–विमर्श
सिविल डेथ (नागरिक
मृत्यु) का
प्रावधान
1. भारतीय साक्ष्य
अधिनियम की
धारा 108 के
अनुसार, किसी
व्यक्ति के
लापता होने
के सात
वर्ष बाद
ही उसकी
सिविल डेथ
मानी जा
सकती है।
2. इस मामले में,
कर्मचारी सितंबर
2005 में लापता
हुए, इसलिए
सिविल डेथ
की परिकल्पना
सितंबर 2012 में ही की
जा सकती
थी।
अनुकंपा नियुक्ति
के लिए
आवेदन का
समय
1. अनुकंपा नियुक्ति
की योजना
के तहत
आवेदन पांच
वर्ष के
भीतर किया
जाना आवश्यक
है।
2. अनुकंपा समिति
ने देखा
कि आवेदन
कर्मचारी के
लापता होने
के पांच
वर्ष से
अधिक समय
बाद प्राप्त
हुआ।
3. हालांकि, समिति
ने एक
महत्वपूर्ण तथ्य
की अनदेखी
की – सिविल
डेथ का
दावा सात
वर्ष पूरे
होने के
बाद ही
किया जा
सकता था।
न्यायालय का
विश्लेषण
1. न्यायालय ने
कुंदन कुमार
बनाम बिहार
राज्य (2017) 4 PLJR 625 के निर्णय का
संदर्भ लिया।
2. न्यायालय ने
निम्नलिखित महत्वपूर्ण
बिंदुओं पर
प्रकाश डाला:
– सिविल डेथ
की स्थिति
में अनुकंपा
नियुक्ति का
दावा केवल
सात वर्ष
पूरे होने
के बाद
ही किया
जा सकता
है
– कर्मचारी के
लापता होने
की तिथि
से पांच
वर्ष की
गणना प्रासंगिक
नहीं है
– इस मामले
में, मृतक
कर्मचारी की
पत्नी ने
जनवरी 2013 में ही तत्परता
से आवेदन
कर दिया
था
– सिविल डेथ
की परिकल्पना
सितंबर 2012 में ही की
जा सकती
थी
3. न्यायालय ने
पाया कि
याचिकाकर्ता की
मां द्वारा
किया गया
दावा न
तो विलंबित
है और
न ही
देर से
किया गया
है।
न्यायालय का
आदेश
1. मुख्य आदेश:
– जिला अनुकंपा
समिति को
याचिकाकर्ता के
दावे पर
विचार करना
होगा
– आवेदन को
केवल इस
आधार पर
खारिज नहीं
किया जा
सकता कि
यह कर्मचारी
के लापता
होने के
पांच वर्ष
बाद किया
गया
– समिति को
अन्य सभी
पात्रता मानदंडों
के आधार
पर दावे
पर विचार
करना होगा
2. समय सीमा:
– जिला अनुकंपा
समिति, औरंगाबाद
को आदेश
की प्रति
प्राप्त होने
के आठ
सप्ताह के
भीतर अंतिम
निर्णय लेना
होगा
महत्वपूर्ण टिप्पणियां
और सुझाव
1. न्यायालय ने
सामान्य प्रशासन
विभाग को
निम्नलिखित सुझाव
दिए:
– सिविल डेथ
के मामलों
में विलंब
से बचने
के लिए
उचित दिशा–निर्देश जारी
करने पर
विचार करें
– कुंदन कुमार
के मामले
के निर्णय
के आलोक
में विभिन्न
अनुकंपा नियुक्ति
समितियों को
दिशा–निर्देश
जारी किए
जा सकते
हैं
2. न्यायालय ने
स्पष्ट किया
कि:
– ये टिप्पणियां
निर्देश नहीं
हैं
– राज्य सरकार
अपने विवेक
का प्रयोग
कर सकती
है
निर्णय का
प्रभाव और
महत्व
1. यह निर्णय सिविल
डेथ के
मामलों में
अनुकंपा नियुक्ति
के लिए
एक महत्वपूर्ण
न्यायिक दृष्टांत
स्थापित करता
है।
2. निर्णय के
प्रमुख निहितार्थ:
– सिविल डेथ
के मामलों
में समय
सीमा की
गणना का
स्पष्टीकरण
– अनुकंपा नियुक्ति
के लिए
आवेदन के
समय की
व्याख्या
– प्रशासनिक प्रक्रियाओं
में सुधार
की आवश्यकता
का संकेत
3. भविष्य के
लिए मार्गदर्शन:
– समान मामलों
में अनुकंपा
समितियों के
लिए स्पष्ट
दिशा–निर्देश
– प्रशासनिक कार्यवाही
में अनावश्यक
विलंब से
बचने का
सुझाव
– सिविल डेथ
के मामलों
में अनुकंपा
नियुक्ति की
प्रक्रिया का
सरलीकरण
निष्कर्ष
याचिका को
स्वीकार करते
हुए महत्वपूर्ण
सिद्धांत स्थापित
किए। यह
निर्णय सिविल
डेथ के
मामलों में
अनुकंपा नियुक्ति
की प्रक्रिया
को अधिक
स्पष्ट और
न्यायसंगत बनाने
में मदद
करेगा। साथ
ही, यह
प्रशासनिक अधिकारियों
को ऐसे
मामलों में
उचित दृष्टिकोण
अपनाने का
मार्गदर्शन प्रदान
करता है।
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फैसला पढ़ने के लिए यहां
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