विस्तृत सारांश:
यह मामला प्रमोद कुमार बनाम संध्या कुमारी से संबंधित है, जिसमें पति प्रमोद कुमार ने परिवार न्यायालय, नवादा के उस आदेश को चुनौती दी, जिसमें उन्हें अपनी पत्नी और नाबालिग बेटी के लिए भरण-पोषण और मुकदमेबाजी खर्च का भुगतान करने का निर्देश दिया गया था।
मामले की पृष्ठभूमि:
संध्या कुमारी और प्रमोद कुमार की शादी 8 जुलाई 2008 को हुई थी। शादी के बाद, संध्या ने आरोप लगाया कि उनके पति और ससुरालवालों ने दहेज की अतिरिक्त मांगें कीं। खासकर, बेटी के जन्म के बाद, ₹2 लाख की मांग की गई। जब संध्या के परिवार ने इस मांग को पूरा करने से इनकार कर दिया, तो उन्हें मानसिक और शारीरिक उत्पीड़न का सामना करना पड़ा। आखिरकार, प्रमोद कुमार ने अपनी पत्नी और बेटी को छोड़ दिया, जिसके कारण संध्या को अपने मायके में रहना पड़ा।
संध्या कुमारी का दावा:
- दहेज उत्पीड़न और पारिवारिक उपेक्षा:
संध्या ने कहा कि शादी के बाद से ही उन्हें उनके ससुराल में प्रताड़ित किया गया। बेटी के जन्म के बाद स्थिति और खराब हो गई। - आर्थिक असमर्थता:
उन्होंने दावा किया कि वह आर्थिक रूप से पूरी तरह असक्षम हैं और उनकी बेटी की देखभाल के लिए उन्हें अपने पति से सहायता की आवश्यकता है। - पति की आर्थिक स्थिति:
संध्या ने यह भी कहा कि प्रमोद का एक सफल व्यवसाय है, जिससे वह ₹1 लाख प्रति माह कमाते हैं।
प्रमोद कुमार का पक्ष:
- आर्थिक असमर्थता का दावा:
प्रमोद ने तर्क दिया कि वह बेरोजगार हैं और उनकी आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं है। - पत्नी की आय:
उन्होंने यह भी कहा कि संध्या स्वयं ₹10,000 प्रति माह कमाती हैं और इसलिए उन्हें भरण-पोषण के लिए भुगतान करने की आवश्यकता नहीं है। - संबंधों की स्थिति:
प्रमोद ने कहा कि उन्होंने अपनी पत्नी और बेटी को जानबूझकर नहीं छोड़ा, और वह आर्थिक दबाव के कारण उनके साथ नहीं रह सकते।
परिवार न्यायालय का आदेश:
परिवार न्यायालय ने प्रमोद कुमार को निर्देश दिया कि:
- वह अपनी पत्नी को ₹15,000 मुकदमेबाजी खर्च के रूप में और ₹5,000 प्रति माह भरण-पोषण के रूप में प्रदान करें।
- यह निर्णय संध्या कुमारी और उनकी बेटी के भरण-पोषण के लिए प्रमोद कुमार की जिम्मेदारी पर आधारित था।
पटना उच्च न्यायालय का निर्णय:
प्रमोद कुमार ने इस आदेश को उच्च न्यायालय में चुनौती दी। पटना उच्च न्यायालय ने मामले के तथ्यों और कानून के प्रासंगिक प्रावधानों पर विचार करते हुए निम्नलिखित टिप्पणियां कीं:
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पति की भरण-पोषण की जिम्मेदारी:
न्यायालय ने स्पष्ट किया कि हिंदू विवाह अधिनियम और सीआरपीसी की धारा 125 के तहत पति की यह जिम्मेदारी है कि वह अपनी पत्नी और नाबालिग बच्चों का भरण-पोषण करे, चाहे वह किसी भी परिस्थिति में हो। -
पत्नी की आय का प्रभाव:
यह कहा गया कि भले ही पत्नी कुछ आय कमा रही हो, इसका यह अर्थ नहीं है कि पति अपनी जिम्मेदारी से बच सकता है। पति का यह कर्तव्य है कि वह पत्नी और बच्चे को गरिमामय जीवन प्रदान करे। -
दहेज उत्पीड़न के दावे:
कोर्ट ने संध्या के इस दावे को गंभीरता से लिया कि दहेज उत्पीड़न और अतिरिक्त पैसों की मांग के कारण वह अपने ससुराल में नहीं रह सकीं। -
प्राकृतिक न्याय और बाल अधिकार:
अदालत ने यह भी कहा कि बच्ची की परवरिश के लिए दोनों माता-पिता की जिम्मेदारी है। प्रमोद कुमार का अपने बच्चे के प्रति कोई आर्थिक दायित्व न निभाने का तर्क अस्वीकार्य है। -
प्रमोद कुमार का बेरोजगारी का दावा:
कोर्ट ने यह तर्क खारिज कर दिया कि प्रमोद बेरोजगार हैं। यह कहा गया कि प्रमोद के व्यवसाय और जीवन शैली के आधार पर यह साबित होता है कि उनकी आर्थिक स्थिति ठीक है।
आदेश और निष्कर्ष:
पटना उच्च न्यायालय ने परिवार न्यायालय के आदेश को सही ठहराते हुए प्रमोद कुमार की याचिका खारिज कर दी। अदालत ने कहा कि पत्नी और बेटी के लिए भरण-पोषण प्रदान करना पति की कानूनी और नैतिक जिम्मेदारी है।
निष्कर्ष:
यह मामला इस बात पर प्रकाश डालता है कि भारत में महिलाओं और बच्चों के अधिकारों की रक्षा के लिए कानून कैसे काम करता है। भरण-पोषण का आदेश केवल आर्थिक सहायता नहीं है, बल्कि यह उस सामाजिक जिम्मेदारी को भी रेखांकित करता है जो पति-पत्नी के संबंधों और बच्चों के पालन-पोषण से जुड़ी होती है। अदालत ने स्पष्ट किया कि पति अपनी जिम्मेदारियों से केवल इस आधार पर नहीं बच सकता कि पत्नी कमाने में सक्षम है।
पूरा
फैसला पढ़ने के लिए यहां
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https://patnahighcourt.gov.in/viewjudgment/NDQjODY0IzIwMTgjMSNO-zxesavApOVQ=


