दरभंगा, बिहार में घटित एक गंभीर आपराधिक मामले का यह विवरण है, जिसमें एक किशोर हामिद अहमद उर्फ रुमानी द्वारा की गई हत्या का मामला सामने आया। 15 जून 2017 की रात करीब 10 बजे, आरोपी हामिद अहमद और उसका साथी मोना उर्फ मोनू उर्फ एहसान ने मोहम्मद आरिफ के घर जाकर उनके बेटे को बुलाया और साथ ले गए। जब बेटा वापस नहीं लौटा, तो परिवार ने खोजबीन शुरू की और उमा सिनेमा के पीछे एक लड़के का खून से सना शव मिला, जो आरिफ के बेटे का था।
मामले की जांच में सामने आया कि आरोपी हामिद अहमद घटना के समय 16 वर्ष 1 माह और 26 दिन का था, जिसके कारण उसे किशोर न्याय बोर्ड के समक्ष पेश किया गया। हालांकि, अपराध की गंभीरता और आरोपी की मानसिक परिपक्वता को देखते हुए, किशोर न्याय बोर्ड ने मामले को बाल न्यायालय में स्थानांतरित कर दिया, जहां उस पर वयस्क के रूप में मुकदमा चलाने का निर्णय लिया गया।
पुलिस जांच में पाया गया कि मृतक के शरीर पर नौ गहरे चाकू के घाव थे, जिससे अत्यधिक रक्तस्राव के कारण उसकी मृत्यु हो गई। आरोपी के घर से खून से सना लोहे का चाकू भी बरामद किया गया। महत्वपूर्ण तथ्य यह भी है कि हामिद अहमद का एक पूर्व आपराधिक रिकॉर्ड भी था, जिसमें वह धारा 379 के तहत एक अन्य मामले में भी आरोपी था।
हालांकि आरोपी की ओर से जमानत के लिए कई प्रयास किए गए और उसके अच्छे आचरण के बारे में ऑब्जर्वेशन होम से सकारात्मक रिपोर्ट भी प्राप्त हुई, जिसमें बताया गया कि वह होम की विभिन्न गतिविधियों में सक्रिय रूप से भाग लेता था और अन्य कैदियों के साथ अच्छा व्यवहार करता था। प्रोबेशन अधिकारी की रिपोर्ट में भी उसके परिवार को सम्मानजनक बताया गया और यह सुझाव दिया गया कि उसकी ऊर्जा को सकारात्मक दिशा में मोड़ा जा सकता है।
लेकिन मामले की गंभीरता, अपराध की प्रकृति, साक्ष्यों की मजबूती और न्याय के हित को देखते हुए पटना उच्च न्यायालय ने 19 दिसंबर 2019 को हामिद की जमानत याचिका को खारिज कर दिया। न्यायालय ने माना कि आरोपी की रिहाई से न्याय का उद्देश्य विफल हो सकता है। हालांकि, न्यायालय ने निचली अदालत को निर्देश दिया कि वह मुकदमे की सुनवाई में तेजी लाए और नौ महीने के भीतर इसे पूरा करे।
इस पूरे मामले में किशोर न्याय अधिनियम की धारा 12 के प्रावधानों का विशेष ध्यान रखा गया, जिसमें कहा गया है कि किशोर को जमानत तभी नहीं दी जानी चाहिए जब उसकी रिहाई से वह ज्ञात अपराधियों के संपर्क में आ सकता हो, या उसे नैतिक, शारीरिक या मनोवैज्ञानिक खतरा हो, या फिर उसकी रिहाई से न्याय का उद्देश्य विफल हो सकता हो।
मामले में विशेष रूप से ध्यान देने योग्य बात यह है कि हालांकि आरोपी किशोर था, लेकिन उसके द्वारा किए गए अपराध की प्रकृति और उसकी मानसिक स्थिति को देखते हुए उसे वयस्क की तरह मुकदमे का सामना करना पड़ा। यह मामला इस बात का भी उदाहरण है कि किस तरह न्यायिक प्रणाली किशोर अपराधियों के मामलों में संतुलित दृष्टिकोण अपनाती है, जहां एक ओर उनकी उम्र और सुधार की संभावनाओं पर विचार किया जाता है, वहीं दूसरी ओर अपराध की गंभीरता और समाज के हित को भी ध्यान में रखा जाता है।
मामले में प्रासंगिक तथ्य यह भी है कि आरोपी के परिवार की स्थिति मध्यम वर्गीय है और उसके दो भाई और तीन बहनें हैं। एक भाई बैंगलोर में क्रेन सर्विसिंग का काम करता है, जबकि दूसरा मिल्लत कॉलेज में पढ़ाई कर रहा है। सामाजिक जांच रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि आरोपी गलत संगत का शिकार हो गया था और उसकी ऊर्जा को व्यावसायिक या पेशेवर कार्यों की ओर मोड़ने की आवश्यकता है।
हालांकि ऑब्जर्वेशन होम में आरोपी का आचरण अच्छा रहा और वह विभिन्न समितियों जैसे मेस कमेटी, गार्डनिंग कमेटी, हेल्थ कमेटी और क्लीनिंग कमेटी का सक्रिय सदस्य रहा, लेकिन अपराध की गंभीरता और साक्ष्यों की मजबूती को देखते हुए न्यायालय ने उसे जमानत देना उचित नहीं समझा। यह मामला दर्शाता है कि न्यायिक प्रणाली किशोर अपराधियों के प्रति संवेदनशील होते हुए भी, समाज के बृहत्तर हित और न्याय के उद्देश्यों की रक्षा को प्राथमिकता देती है।
इस मामले से यह भी स्पष्ट होता है कि किशोर न्याय प्रणाली में सुधारात्मक न्याय के साथ-साथ दंडात्मक न्याय का भी समुचित संतुलन आवश्यक है, विशेषकर जब अपराध की प्रकृति अत्यंत गंभीर हो। यह केस भविष्य में इसी तरह के मामलों में एक महत्वपूर्ण न्यायिक उदाहरण के रूप में काम आ सकता है, जहां किशोर अपराधी द्वारा किए गए जघन्य अपराध के मामले में न्यायालय को निर्णय लेना हो।
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https://patnahighcourt.gov.in/viewjudgment/NyMxMzQjMjAxOSMxI04=-nxcnILAwCQc=


