“वसीयत प्रशासन की याचिका बनाम संपत्ति विभाजन का समझौता” नामक इस महत्वपूर्ण मामले में पटना उच्च न्यायालय को एक जटिल कानूनी प्रश्न का समाधान करना था। मामला राम चंद्र सिंह द्वारा की गई एक वसीयत से संबंधित था, जिन्होंने 19 अगस्त 2000 को अपनी पत्नी के भाई चंदेश्वर सिंह के तीन बेटों – सुधीर कुमार, सुजीत कुमार और रवीनेश कुमार के पक्ष में एक पंजीकृत वसीयत की थी।
मामले की पृष्ठभूमि यह थी कि राम चंद्र सिंह की पत्नी राम सखी देवी का निधन 16 मई 1995 को हो गया था और वे निःसंतान थे। इस बीच, 14 मार्च 2001 को राम चंद्र सिंह की बहन राज पति देवी ने संपत्ति के विभाजन के लिए एक वाद दायर किया। इस वाद में 17 अप्रैल 2001 को एक महत्वपूर्ण मोड़ आया जब राम चंद्र सिंह ने एक समझौता याचिका दायर की, जिसमें उन्होंने अपनी पूर्व वसीयत को रद्द करने की घोषणा की। यह समझौता 18 अप्रैल 2001 को न्यायालय द्वारा स्वीकार कर लिया गया। राम चंद्र सिंह का निधन 28 मई 2001 को हो गया।
इसके बाद राज पति देवी ने बेदखली का एक वाद दायर किया, जो 29 नवंबर 2001 को एकपक्षीय रूप से उनके पक्ष में तय हुआ। इस आधार पर उन्हें संपत्ति का कब्जा मिला और उनके नाम म्यूटेशन भी हो गया। उन्होंने इस संपत्ति पर ट्रैक्टर लोन भी लिया, जिसे बाद में चुका दिया।
वर्तमान मामले में चंदेश्वर सिंह के तीनों बेटों ने 2017 में एक टेस्ट सूट दायर किया, जिसमें उन्होंने मूल वसीयत के आधार पर प्रशासन पत्र की मांग की। लेकिन प्रतिवादी की ओर से तर्क दिया गया कि जब वसीयत को पहले ही रद्द किया जा चुका है और उस आधार पर कई कानूनी कार्यवाहियां हो चुकी हैं, तो यह याचिका निरर्थक है।
न्यायालय ने यह महत्वपूर्ण टिप्पणी की कि याचिकाकर्ताओं को समझौता डिक्री को चुनौती देने का अधिकार था, लेकिन उन्होंने परिसीमा अवधि के भीतर ऐसा नहीं किया। उनका यह तर्क स्वीकार नहीं किया गया कि उन्हें प्रशासन पत्र मिलने का इंतजार करना जरूरी था। न्यायालय ने कहा कि जब वसीयत को ही रद्द कर दिया गया है, तो उस पर प्रशासन पत्र जारी करना एक व्यर्थ प्रक्रिया होगी, क्योंकि भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 263 के तहत उसे भी रद्द करना पड़ेगा।
इस मामले में न्यायालय ने कुछ महत्वपूर्ण कानूनी सिद्धांतों की पुष्टि की। पहला, कि एक अप्रमाणित वसीयत के आधार पर भी वाद दायर किया जा सकता है, हालांकि अंतिम निर्णय प्रशासन पत्र मिलने के बाद ही होगा। दूसरा, कि किसी आदेश की वैधता को चुनौती देने के लिए निर्धारित समय सीमा का पालन करना आवश्यक है। तीसरा, कि जब कोई कार्यवाही निरर्थक हो जाती है, तो न्याय के हित में उसे समाप्त कर देना चाहिए।
न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि आम तौर पर प्रोबेट मामलों में संपत्ति पर अधिकार का निर्णय नहीं किया जाता, बल्कि केवल वसीयत की वास्तविकता, वसीयतकर्ता की क्षमता और वसीयत के उचित सत्यापन पर विचार किया जाता है। लेकिन वर्तमान मामले में, जब वसीयत को ही कानूनी रूप से रद्द कर दिया गया है और वह निर्णय अंतिम हो चुका है, तो प्रशासन पत्र की कार्यवाही को आगे बढ़ाना निरर्थक होगा।
इस प्रकार, न्यायालय ने टेस्ट सूट को निरर्थक घोषित कर दिया। यह निर्णय वसीयत कानून और संपत्ति विवादों में समय-सीमा के महत्व को रेखांकित करता है। साथ ही यह दर्शाता है कि न्यायालय निरर्थक कार्यवाहियों को जारी नहीं रखता, भले ही उनका कानूनी आधार हो।
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