पटना उच्च न्यायालय का महत्वपूर्ण फैसला: प्रोफेसर पद पर पदोन्नति विवाद

 

यह मामला पटना मेडिकल कॉलेज और अस्पताल (PMCH) में मनोरोग विभाग (Psychiatry Department) के प्रोफेसर पद पर पदोन्नति से जुड़े विवाद से संबंधित है। याचिकाकर्ता डॉ. नरेंद्र प्रताप सिंह ने दावा किया कि वे अपने समकक्ष प्रतिवादी डॉ. प्रमोद कुमार सिंह से वरिष्ठ हैं और उन्हें प्रोफेसर के पद पर पहले पदोन्नत किया जाना चाहिए था। इस संबंध में पटना उच्च न्यायालय ने 2 सितंबर 2019 को अपना निर्णय सुनाया।


मामले की पृष्ठभूमि

डॉ. नरेंद्र प्रताप सिंह 1989 से पटना मेडिकल कॉलेज और अस्पताल (PMCH) में मनोरोग विभाग में कार्यरत थे। उन्होंने अपनी याचिका में कहा कि:

  • 1989 से ही वे एसोसिएट प्रोफेसर के रूप में कार्यरत थे, लेकिन उन्हें प्रोफेसर के पद पर 2014 में पदोन्नति दी गई।
  • प्रतिवादी डॉ. प्रमोद कुमार सिंह, जो उनसे कनिष्ठ थे, को 2006 में ही प्रोफेसर बना दिया गया।
  • उनके वेतन पर्ची (Pay Slip) में 1989 से शिक्षण भत्ता (Teaching Allowance) शामिल किया गया था, जिसका अर्थ है कि वे शिक्षा सेवा कैडर में गिने जाने चाहिए।
  • यदि उनकी वरिष्ठता 1989 से मानी जाए, तो उन्हें विभागाध्यक्ष (HOD) के रूप में नियुक्त किया जाना चाहिए।

मुख्य विवाद:

  1. क्या याचिकाकर्ता को 1989 से शिक्षण कैडर में गिना जाना चाहिए?
  2. क्या प्रतिवादी की वरिष्ठता सही थी, या उसे गलत तरीके से वरिष्ठ दिखाया गया था?
  3. क्या याचिकाकर्ता को प्रोफेसर पद पर प्रतिवादी से पहले नियुक्त किया जाना चाहिए था?

याचिकाकर्ता की दलीलें

याचिकाकर्ता के वकील, वरिष्ठ अधिवक्ता श्री वाई. वी. गिरी ने तर्क दिया कि:

  • 1989 में उनकी नियुक्ति एक शिक्षण पद (Teaching Post) पर की गई थी, और उन्हें उसी आधार पर वरिष्ठता दी जानी चाहिए।
  • उनके वेतन पर्ची में शिक्षण भत्ता 1989 से शामिल था, जो यह दर्शाता है कि वे उस समय से ही शिक्षा सेवा में कार्यरत थे।
  • यदि 1989 से उनकी सेवा गिनी जाती, तो वे प्रतिवादी से वरिष्ठ होते और उन्हें प्रोफेसर व विभागाध्यक्ष नियुक्त किया जाना चाहिए था।
  • बिहार सरकार द्वारा 2018 में प्रकाशित वरिष्ठता सूची (Seniority List) गलत थी, क्योंकि इसमें प्रतिवादी को उनसे वरिष्ठ दिखाया गया था।

प्रतिवादी की दलीलें

प्रतिवादी डॉ. प्रमोद कुमार सिंह के वकील, वरिष्ठ अधिवक्ता श्री तेज बहादुर सिंह ने कहा कि:

  • याचिकाकर्ता 10 अक्टूबर 1991 को एसोसिएट प्रोफेसर के रूप में नियुक्त हुए थे, जबकि प्रतिवादी को 13 फरवरी 1990 को नियुक्त किया गया था।
  • याचिकाकर्ता की 1989 की नियुक्ति एक गैर-शिक्षण पद (Non-Teaching Post) पर थी, इसलिए वह वरिष्ठता का आधार नहीं हो सकती।
  • 1989 में उनकी नियुक्ति मनोरोग विभाग में नहीं, बल्कि शरीर रचना विज्ञान (Anatomy Department) में थी, इसलिए इसे मनोरोग विभाग में शिक्षण अनुभव नहीं माना जा सकता।
  • बिहार सरकार द्वारा 2008 में जारी वरिष्ठता सूची को चुनौती नहीं दी गई थी, इसलिए अब इतने साल बाद इसे बदलने का कोई आधार नहीं है।

राज्य सरकार की दलीलें

बिहार सरकार के वकील ने कहा कि:

  • 2008 में एक वरिष्ठता सूची प्रकाशित की गई थी, जिसमें याचिकाकर्ता को प्रतिवादी से कनिष्ठ दिखाया गया था।
  • याचिकाकर्ता ने 2008 और 2018 की सूची पर कोई आपत्ति नहीं जताई थी, इसलिए अब इसे अदालत में चुनौती देना अनुचित है।
  • याचिकाकर्ता 1989 में गैर-शिक्षण पद पर कार्यरत थे, इसलिए उनकी वरिष्ठता 1991 से ही गिनी जाएगी।
  • यदि अदालत अब वरिष्ठता को बदलती है, तो अन्य कई कर्मचारियों की वरिष्ठता भी प्रभावित होगी, जिससे प्रशासनिक जटिलताएं उत्पन्न हो सकती हैं।

पटना उच्च न्यायालय का निर्णय

न्यायमूर्ति मधुरेश प्रसाद ने सभी पक्षों की दलीलों को सुनने के बाद निम्नलिखित निष्कर्ष निकाले:

1. वरिष्ठता सूची में परिवर्तन संभव नहीं

  • 2008 और 2018 की वरिष्ठता सूची को याचिकाकर्ता ने पहले कभी चुनौती नहीं दी थी।
  • कई वर्षों बाद वरिष्ठता बदलने से अन्य कर्मचारियों के अधिकार प्रभावित होंगे।
  • इसलिए, याचिकाकर्ता की यह मांग अस्वीकार कर दी गई कि उन्हें प्रतिवादी से वरिष्ठ माना जाए।

2. 1989 की नियुक्ति शिक्षण पद पर नहीं थी

  • याचिकाकर्ता की 1989 की नियुक्ति गैर-शिक्षण पद पर थी, इसलिए उन्हें शिक्षण कैडर में 1989 से नहीं गिना जा सकता।
  • सरकार द्वारा 1990 में जारी आदेश (Annexure 9/A) में केवल यह कहा गया था कि मनोरोग विशेषज्ञ (Psychiatrist) का पद एक शिक्षण पद होगा, लेकिन इसका कोई पिछला प्रभाव (Retrospective Effect) नहीं था।
  • इसलिए, याचिकाकर्ता की वरिष्ठता 10 अक्टूबर 1991 से ही गिनी जाएगी।

3. प्रतिवादी की वरिष्ठता सही है

  • प्रतिवादी की नियुक्ति 13 फरवरी 1990 को एक शिक्षण पद पर हुई थी, जबकि याचिकाकर्ता 10 अक्टूबर 1991 को इस पद पर आए थे।
  • इसलिए, प्रतिवादी को वरिष्ठ माना जाना उचित था।

4. वैकल्पिक अनुरोध पर विचार नहीं किया गया

  • याचिकाकर्ता ने कहा था कि चूंकि मनोरोग विभाग में प्रोफेसर के दो पद खाली हैं, इसलिए उन्हें दूसरा पद दिया जाए।
  • न्यायालय ने कहा कि इस मुद्दे पर राज्य सरकार को निर्णय लेना चाहिए और इस पर कोई टिप्पणी नहीं की।

5. याचिका खारिज

  • न्यायालय ने कहा कि याचिकाकर्ता की वरिष्ठता बदलने का कोई कानूनी आधार नहीं है।
  • याचिका को खारिज कर दिया गया, और याचिकाकर्ता को कोई राहत नहीं दी गई।

न्यायालय के निर्णय का व्यापक प्रभाव

  1. सरकारी नौकरियों में वरिष्ठता को चुनौती देने की एक निश्चित समय-सीमा होनी चाहिए।
  2. यदि कोई वरिष्ठता सूची प्रकाशित होती है और उस पर आपत्ति नहीं जताई जाती, तो उसे बाद में बदलना संभव नहीं होगा।
  3. गैर-शिक्षण पद पर की गई सेवा को शिक्षण पद की वरिष्ठता में नहीं गिना जा सकता।
  4. किसी भी भर्ती प्रक्रिया में नियमों का पालन करना अनिवार्य है, अन्यथा बाद में विवाद उत्पन्न हो सकते हैं।

निष्कर्ष

पटना उच्च न्यायालय ने इस मामले में स्पष्ट कर दिया कि याचिकाकर्ता की वरिष्ठता 1989 से नहीं, बल्कि 1991 से मानी जाएगी। प्रतिवादी को वरिष्ठ मानने का निर्णय सही था और वरिष्ठता सूची को अदालत में चुनौती देने का कोई आधार नहीं था।

यह फैसला उन सरकारी कर्मचारियों के लिए एक महत्वपूर्ण उदाहरण है जो वर्षों बाद अपनी वरिष्ठता को लेकर आपत्ति जताते हैं।

पूरा
फैसला पढ़ने के लिए यहां
क्लिक करें:

https://patnahighcourt.gov.in/viewjudgment/MTUjNjIwNiMyMDEyIzEjTg==-XHhrT1FODcc=

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