यह मामला पटना उच्च न्यायालय में दायर एक आपराधिक अपील (DB) संख्या 254/2016 से संबंधित है, जो मुजफ्फरपुर जिले के पारू थाना कांड संख्या 56/2014 से उत्पन्न हुआ था। इस मामले में अभियुक्तों – शंभू नाथ सिंह, रविंद्र कुमार और धीरेंद्र कुमार – को भारतीय दंड संहिता की विभिन्न धाराओं, विशेष रूप से धारा 302/34 (हत्या), 307 (हत्या का प्रयास), 326, 325, 324 और 323 के तहत दोषी ठहराया गया था। उन्हें आजीवन कारावास (जीवन के अंत तक) और भारी जुर्माने की सजा सुनाई गई थी।
मामले का सारांश:
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घटना की पृष्ठभूमि:
घटना 14 मार्च 2014 की है, जब मृतक बलिराम सिंह अपने खेत में सरसों की फसल काट रहे थे। उनकी बेटियां – अभिनव कुमारी, अमृता कुमारी और पुष्पांजलि कुमारी – उनके लिए नाश्ता लेकर खेत में आई थीं। इसी दौरान उनके रिश्तेदार और सह-स्वामित्व वाले लोग – शंभू सिंह, रविंद्र कुमार, धीरेंद्र कुमार और सुधा देवी – हथियारों के साथ वहां पहुंचे और बलिराम सिंह को फसल काटने से रोकने लगे। -
हमला और हत्या:
इस विवाद के दौरान रविंद्र कुमार ने फरसा से बलिराम सिंह पर वार किया और शंभू सिंह ने लोहे की रॉड से हमला किया। धीरेंद्र कुमार, जो पिस्तौल लिए था, ने पिस्तौल की बट से मारा, जिससे बलिराम सिंह गंभीर रूप से घायल हो गए। उनकी बेटियां जब उन्हें बचाने आईं, तो हमलावरों ने अमृता कुमारी और अन्य पर भी हमला किया, जिससे पुष्पांजलि कुमारी की मौके पर ही मौत हो गई। हमलावरों ने उनकी माँ (सरस्वती देवी) को भी घर में घुसकर बेरहमी से मारा। -
एफआईआर और पुलिस जांच:
अभिनव कुमारी द्वारा दिए गए बयान के आधार पर पारू थाना में एफआईआर दर्ज की गई। पुलिस ने जांच पूरी कर चार्जशीट दाखिल की और आरोपियों को सत्र न्यायालय में मुकदमे के लिए भेज दिया। -
निचली अदालत का फैसला:
अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश-IX, मुजफ्फरपुर ने 30 जनवरी 2016 को इन अभियुक्तों को दोषी ठहराया और 2 फरवरी 2016 को सजा सुनाई:- 302/34 आईपीसी (हत्या) के लिए आजीवन कारावास (जीवनभर) और ₹1 लाख जुर्माना
- 307 आईपीसी (हत्या का प्रयास) के लिए 10 वर्ष की कठोर कैद और ₹50,000 जुर्माना
- अन्य धाराओं के लिए कोई अलग सजा नहीं दी गई।
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उच्च न्यायालय में अपील:
अभियुक्तों ने इस फैसले को पटना उच्च न्यायालय में चुनौती दी। उनका तर्क था कि उन्हें निष्पक्ष सुनवाई का अधिकार नहीं मिला और उन्हें कोई सरकारी वकील उपलब्ध नहीं कराया गया, जिससे वे प्रभावी रूप से अपना बचाव नहीं कर सके। -
न्यायालय का निर्णय:
उच्च न्यायालय ने पाया कि निचली अदालत में अभियुक्तों को उचित कानूनी सहायता नहीं दी गई, जिससे उनका बचाव कमजोर पड़ा। अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के पूर्व के निर्णयों का हवाला देते हुए माना कि यदि कोई अभियुक्त गरीब है और वकील नियुक्त करने में असमर्थ है, तो अदालत का कर्तव्य बनता है कि वह सरकारी खर्चे पर वकील नियुक्त करे। -
फैसले को रद्द कर पुनः सुनवाई का आदेश:
इस आधार पर, पटना उच्च न्यायालय ने निचली अदालत के फैसले को खारिज कर दिया और मामले की पुनः सुनवाई (retrial) का आदेश दिया ताकि अभियुक्तों को कानूनी सहायता मिल सके और निष्पक्ष सुनवाई सुनिश्चित हो।
निष्कर्ष:
यह मामला भारतीय न्याय प्रणाली में निष्पक्ष सुनवाई के महत्व को दर्शाता है। उच्च न्यायालय ने अभियुक्तों के कानूनी अधिकारों का हनन माना और यह सुनिश्चित करने के लिए मामला वापस भेज दिया कि उन्हें उचित कानूनी प्रतिनिधित्व मिले। इस प्रकार, यह फैसला न्याय प्रक्रिया में पारदर्शिता और निष्पक्षता को बनाए रखने की आवश्यकता को रेखांकित करता है।
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