“अंतरधार्मिक विवाह पर हाईकोर्ट का सख्त फैसला – बालिग को अपनी पसंद चुनने का पूरा अधिकार”

 

भूमिका

यह मामला सहरसा जिले की रहने वाली बीबी दरख्शां फिरोज द्वारा दायर एक बंदी प्रत्यक्षीकरण (Habeas Corpus) याचिका से संबंधित है, जिसमें उन्होंने अपनी बेटी रेशम फिरोज को अवैध हिरासत से छुड़ाने की मांग की थी।

याचिकाकर्ता का आरोप था कि उनकी बेटी, जो पटना में रहकर पढ़ाई कर रही थी, अचानक लापता हो गई और उसे जबरन अगवा कर लिया गया। बाद में उन्हें पता चला कि बेटी ने नितीश कुमार नाम के युवक से शादी कर ली

हालांकि, पटना उच्च न्यायालय ने इस याचिका को खारिज कर दिया और कहा कि रेशम फिरोज बालिग है और उसने अपनी मर्जी से शादी की है, इसलिए उसे जबरदस्ती माता-पिता के पास भेजने का कोई कारण नहीं है


मामले का संक्षिप्त विवरण

1. याचिकाकर्ता और प्रतिवादी

याचिकाकर्ता:

  • बीबी दरख्शां फिरोज, निवासी – सहरसा, बिहार।
  • इन्होंने पटना हाईकोर्ट में अपनी बेटी रेशम फिरोज की गुमशुदगी को लेकर बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दायर की

प्रतिवादी:

  1. बिहार सरकार (मुख्य सचिव, गृह विभाग)
  2. पटना पुलिस (वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक, पीरबहोर थाना, पटना)
  3. रविंद्र कुमार यादव और उनकी पत्नी रिंकू देवी (जिन्होंने कथित रूप से शादी में मदद की)।
  4. नितीश कुमार (बेटी का कथित पति)
  5. रेशम फिरोज (याचिकाकर्ता की बेटी)

2. घटना का विवरण और FIR

  • रेशम फिरोज पटना के शाहीन गर्ल्स हॉस्टल में रहकर बीएन कॉलेज से बीए की पढ़ाई कर रही थी
  • 7 दिसंबर 2019 को वह हॉस्टल से निकली और फिर वापस नहीं आई
  • 11 दिसंबर 2019 को पीरबहोर थाना, पटना में गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज कराई गई
  • FIR में अपहरण (धारा 363), जबरन कैद (धारा 364) के तहत मामला दर्ज किया गया
  • परिवार का आरोप था कि नितीश कुमार ने उनकी बेटी को अगवा कर लिया और जबरन शादी कर ली

3. पुलिस जांच और बेटी की प्रतिक्रिया

  • 19 जनवरी 2020 को याचिकाकर्ता को बेटी का फोन आया, जिसमें उसने कहा कि उसे जबरदस्ती शादी करवाई गई और वह अलग होना चाहती है
  • बाद में पुलिस ने बेटी को बरामद किया और उसे न्यायिक मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया
  • 20 जनवरी 2020 को मजिस्ट्रेट के सामने दिए बयान में रेशम फिरोज ने कहा कि उसने नितीश कुमार से अपनी मर्जी से शादी की है और वह अपने माता-पिता के पास नहीं जाना चाहती
  • बेटी ने अपना आधार कार्ड और स्कूल का प्रमाण पत्र भी दिया, जिससे साबित हुआ कि वह 18 वर्ष से अधिक उम्र की है

पटना उच्च न्यायालय का निर्णय

1. क्या यह मामला बंदी प्रत्यक्षीकरण के अंतर्गत आता है?

  • बंदी प्रत्यक्षीकरण (Habeas Corpus) केवल उन्हीं मामलों में स्वीकार्य होती है, जहां किसी व्यक्ति को गैरकानूनी रूप से हिरासत में लिया गया हो
  • इस मामले में रेशम फिरोज ने स्पष्ट रूप से कहा कि उसे जबरन नहीं रखा गया है और उसने अपनी मर्जी से शादी की है
  • इसलिए, कोर्ट ने कहा कि यह मामला बंदी प्रत्यक्षीकरण के अंतर्गत नहीं आता

2. क्या बेटी पर दबाव था?

  • याचिकाकर्ता ने दावा किया कि उनकी बेटी पर दबाव डाला गया होगा और वह अपनी मर्जी से बयान नहीं दे रही होगी
  • कोर्ट ने कहा कि बेटी का बयान मजिस्ट्रेट के सामने दिया गया था और यह कानूनी रूप से वैध माना जाएगा

3. हाईकोर्ट का अंतिम आदेश

  • पटना उच्च न्यायालय ने बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका को खारिज कर दिया
  • कोर्ट ने कहा कि रेशम फिरोज बालिग है और उसने अपनी मर्जी से शादी की है, इसलिए उसे जबरदस्ती माता-पिता के पास भेजने का कोई आधार नहीं है
  • याचिकाकर्ता को निर्देश दिया गया कि वह बेटी के फैसले का सम्मान करें और उसे शांति से अपने जीवन का चुनाव करने दें

इस फैसले के प्रभाव

1. व्यक्तिगत स्वतंत्रता की सुरक्षा

  • इस फैसले से स्पष्ट होता है कि भारत में हर व्यक्ति को अपनी पसंद से शादी करने का अधिकार है, चाहे वह माता-पिता के खिलाफ ही क्यों न हो
  • संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत किसी भी बालिग व्यक्ति को अपनी मर्जी से जीवन जीने का अधिकार है

2. माता-पिता और समाज के लिए संदेश

  • कोर्ट ने कहा कि माता-पिता को अपने बच्चों की पसंद का सम्मान करना चाहिए और उन्हें स्वतंत्र रूप से निर्णय लेने देना चाहिए
  • अंतरधार्मिक या अंतरजातीय विवाह के मामलों में कानूनी हस्तक्षेप तभी हो सकता है, जब जबरदस्ती या गैरकानूनी गतिविधि पाई जाए

3. बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका का दायरा स्पष्ट हुआ

  • यह मामला स्पष्ट करता है कि यदि कोई बालिग व्यक्ति अपनी मर्जी से कहीं रहता है, तो माता-पिता उसे जबरन वापस लाने के लिए बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दायर नहीं कर सकते
  • बंदी प्रत्यक्षीकरण का उपयोग केवल उन्हीं मामलों में किया जाना चाहिए, जहां किसी व्यक्ति को गैरकानूनी रूप से रोका या कैद किया गया हो

निष्कर्ष

यह मामला भारत में विवाह और व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जुड़े अधिकारों को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल है। पटना उच्च न्यायालय ने साफ कर दिया कि यदि कोई बालिग महिला अपनी मर्जी से शादी कर चुकी है और अपने माता-पिता के पास नहीं जाना चाहती, तो उसे जबरदस्ती वापस नहीं भेजा जा सकता

इस फैसले से यह स्पष्ट होता है कि बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका का उपयोग केवल उन्हीं मामलों में किया जा सकता है, जहां कोई व्यक्ति अवैध हिरासत में हो

यह निर्णय परिवारों और समाज के लिए एक महत्वपूर्ण संदेश देता है कि उन्हें बच्चों की पसंद का सम्मान करना चाहिए और उनकी स्वतंत्रता का समर्थन करना चाहिए

पूरा
फैसला पढ़ने के लिए यहां
क्लिक करें:

https://patnahighcourt.gov.in/viewjudgment/MTYjMjQxIzIwMjAjMSNO-AGv1Y852kbo=

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