मुस्लिम कानून के तहत हिबा (दान) और पंजीकृत दान-पत्र के विवाद से जुड़े इस महत्वपूर्ण मामले में पटना उच्च न्यायालय को एक जटिल कानूनी प्रश्न का समाधान करना था। मामला शेख मंजूर और उनकी पत्नी बीबी नूरजहां द्वारा दायर की गई एक याचिका से संबंधित था, जिसमें उन्होंने बिहार लैंड ट्रिब्यूनल के 17 अक्टूबर 2019 के आदेश को चुनौती दी थी।
विवाद की जड़ में दो परस्पर विरोधी दस्तावेज थे – एक पंजीकृत दान-पत्र और एक बिक्री विलेख। शेख रहमत ने 22 जुलाई 1994 को अपने दो वर्षीय पुत्र शेख मंगनिया के पक्ष में एक पंजीकृत दान-पत्र निष्पादित किया था। बाद में, उन्होंने वही जमीन अपने भाई शेख मंजूर को तीन अलग-अलग बिक्री विलेखों के माध्यम से बेच दी।
याचिकाकर्ताओं का मुख्य तर्क यह था कि मुस्लिम कानून के अनुसार, हिबा (दान) तभी वैध होता है जब दाता संपत्ति पर अपने सभी अधिकार और कब्जा त्याग दे। उनका कहना था कि चूंकि शेख रहमत ने संपत्ति का कब्जा नहीं छोड़ा था और बाद में उसी संपत्ति को बेच दिया, इसलिए दान-पत्र अवैध था और बिक्री विलेख वैध था।
अपने तर्क के समर्थन में, याचिकाकर्ताओं ने बॉम्बे उच्च न्यायालय के ‘कद्दीरनबी बनाम फातिमाबी’ मामले का हवाला दिया, जिसमें कहा गया था कि हालांकि वास्तविक कब्जे के हस्तांतरण पर जोर नहीं दिया जा सकता, लेकिन दान की घोषणा से संबंधित अन्य आवश्यकताओं को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
हालांकि, न्यायालय ने याचिकाकर्ताओं के तर्कों को खारिज करते हुए एक महत्वपूर्ण कानूनी स्थिति स्पष्ट की। न्यायालय ने कहा कि मुस्लिम कानून और सामान्य नागरिक कानून में इस मामले में थोड़ा अंतर है। मुस्लिम कानून के तहत, हिबा को पंजीकृत या लिखित होने की आवश्यकता नहीं है – यह मौखिक रूप से किया जा सकता है और इसके समर्थन में एक यादाश्त (स्मरण पत्र) हो सकता है। लेकिन जब कोई दान-पत्र पंजीकृत हो जाता है, तो सामान्य कानून लागू होता है और वह दस्तावेज प्राप्तकर्ता के अधिकार, स्वामित्व और कब्जे का अनुमानित प्रमाण बन जाता है।
वर्तमान मामले में, चूंकि शेख मंगनिया के पक्ष में एक पंजीकृत दान-पत्र था, जो बिक्री विलेख से पहले का था, इसलिए दान-पत्र को रद्द किए बिना कोई भी व्यक्ति, यहां तक कि दान-पत्र के निष्पादक शेख रहमत भी, उस जमीन को नहीं बेच सकते थे। न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि कद्दीरनबी मामले के तथ्य बिल्कुल अलग थे, क्योंकि उस मामले में दान का कोई दस्तावेजी या मौखिक प्रमाण नहीं था।
इस प्रकार, न्यायालय ने याचिका को खारिज कर दिया। हालांकि, न्यायालय ने याचिकाकर्ताओं को उचित मंच पर दान-पत्र को चुनौती देने की छूट दी। यह निर्णय मुस्लिम कानून में हिबा की अवधारणा और पंजीकृत दस्तावेजों के महत्व को स्पष्ट करता है। साथ ही यह बताता है कि कैसे कानूनी प्रणाली विभिन्न धार्मिक कानूनों और सामान्य नागरिक कानून के बीच संतुलन बनाती है।
यह मामला पंजीकृत दस्तावेजों की प्राथमिकता और दान से संबंधित मुस्लिम कानून की व्याख्या का एक महत्वपूर्ण उदाहरण है। यह दर्शाता है कि जब कोई व्यक्ति धार्मिक कानून के तहत उपलब्ध विकल्प को छोड़कर सामान्य कानून का रास्ता चुनता है, तो उसे सामान्य कानून के प्रावधानों का पालन करना होगा।
पूरा
फैसला पढ़ने के लिए यहां
क्लिक करें:
https://patnahighcourt.gov.in/viewjudgment/MTUjMjUyMTgjMjAxOSMxI04=-sln8pSTylfg=


