“आत्महत्या के लिए उकसाने के मामले में पटना उच्च न्यायालय का निर्णय”

 

भूमिका

यह मामला बिहार के कटिहार जिले के प्रणपुर थाना क्षेत्र से संबंधित है, जिसमें भड्डो मंडल नामक व्यक्ति को आत्महत्या के लिए उकसाने (IPC धारा 306) के आरोप में दोषी ठहराया गया था। ट्रायल कोर्ट ने उन्हें आठ वर्ष के कठोर कारावास और 10,000 रुपये के जुर्माने की सजा सुनाई थी। बाद में, आरोपी ने पटना उच्च न्यायालय में इस फैसले के खिलाफ अपील दायर की।

मामले का संक्षिप्त विवरण

फरियादी सागर मंडल (पीड़िता के भाई) ने 8 जून 2007 को प्रणपुर पुलिस थाने में एफआईआर दर्ज कराई। उन्होंने आरोप लगाया कि उनकी बहन संतोषी कुमारी की शादी भड्डो मंडल से हुई थी, लेकिन शादी के बाद से ही पति शराब के नशे में उसे प्रताड़ित करता था। घटना के दिन, फरियादी को सूचना मिली कि उनकी बहन ने आत्महत्या कर ली है। जब वे वहां पहुंचे, तो उन्होंने देखा कि पीड़िता के गले पर काले निशान थे, जिससे उन्हें संदेह हुआ कि उसकी हत्या कर आत्महत्या का रूप दिया गया है।

ट्रायल कोर्ट का निर्णय

ट्रायल कोर्ट ने भड्डो मंडल को IPC की धारा 306 (आत्महत्या के लिए उकसाना) के तहत दोषी ठहराया और उन्हें 8 साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई। साथ ही, 10,000 रुपये का जुर्माना भी लगाया गया।

गवाहों की गवाही और उनकी विश्वसनीयता

न्यायालय में अभियोजन पक्ष द्वारा 12 गवाहों को पेश किया गया, जिनमें से कुछ की गवाही महत्वपूर्ण रही:

  1. पीड़िता का भाई (PW-10, सागर मंडल) – उन्होंने आरोप लगाया कि आरोपी शादी के बाद से ही उनकी बहन को प्रताड़ित करता था और उसकी हत्या कर इसे आत्महत्या का रूप दिया गया।

  2. पीड़िता की मां (PW-8, पारो देवी) – उन्होंने बताया कि जब वे घटनास्थल पर पहुंची, तो उन्होंने मृतका के गले और पीठ पर चोट के निशान देखे।

  3. डॉक्टर (PW-13, डॉ. अमर कुमार देव) – उन्होंने पोस्टमार्टम रिपोर्ट में पुष्टि की कि पीड़िता की मौत दम घुटने (asphyxia) के कारण हुई।

  4. अन्य स्वतंत्र गवाहों – कुछ गवाहों ने आरोपी के खिलाफ प्रत्यक्ष सबूत नहीं दिए, जिससे बचाव पक्ष को संदेह उठाने का अवसर मिला।

पटना उच्च न्यायालय का फैसला

उच्च न्यायालय ने ट्रायल कोर्ट के फैसले की समीक्षा करते हुए पाया कि अभियोजन पक्ष आत्महत्या के लिए उकसाने के आरोप को संदेह से परे साबित नहीं कर सका।

  1. आरोप संदेहास्पद थे – कोई ठोस सबूत नहीं था कि आरोपी ने प्रत्यक्ष रूप से पीड़िता को आत्महत्या के लिए उकसाया था।

  2. गवाहों की गवाही में विरोधाभास था – अभियोजन पक्ष की प्रमुख गवाहियों में असंगति पाई गई।

  3. सजा की समीक्षा – आरोपी पहले ही 7 साल जेल में बिता चुका था, और न्यायालय ने इसे पर्याप्त सजा मानते हुए उसकी सजा को घटा दिया।

अंतिम निर्णय

उच्च न्यायालय ने आरोपी की सजा को घटाकर “जितनी सजा काटी जा चुकी है” कर दिया और उसे रिहा करने का आदेश दिया।

निष्कर्ष

यह मामला न्यायिक प्रक्रिया में साक्ष्यों की विश्वसनीयता और संदेह का लाभ देने के सिद्धांत को दर्शाता है। यह निर्णय बताता है कि केवल परिस्थितिजन्य साक्ष्यों के आधार पर किसी को कठोर दंड नहीं दिया जा सकता, जब तक कि आरोप संदेह से परे साबित न हों।

पूरा
फैसला पढ़ने के लिए यहां
क्लिक करें:

https://patnahighcourt.gov.in/viewjudgment/MjQjMzA5MiMyMDE3IzEjTg==-CGtE7warOXI=

 

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