भूमिका
यह मामला बिहार के अररिया जिले की रहने वाली मनोरमा कुमारी से संबंधित है, जिन्होंने बी.एन. मंडल विश्वविद्यालय, मधेपुरा के खिलाफ अपने बी.ए. (ऑनर्स) परीक्षा के तृतीय वर्ष के परिणाम को घोषित कराने के लिए उच्च न्यायालय में याचिका दायर की थी। विश्वविद्यालय ने तकनीकी आधार पर उनका परिणाम रोक दिया था, जिसके खिलाफ उन्होंने पटना उच्च न्यायालय में अपील की।
मामले का संक्षिप्त विवरण
याचिकाकर्ता मनोरमा कुमारी ने सत्र 2012-13 में बी.ए. (ऑनर्स) मनोविज्ञान विषय से दाखिला लिया था और उनका पंजीकरण संख्या 53549/2013 था।
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उन्होंने 2013 में बी.ए. भाग-1 की परीक्षा दी लेकिन असफल रहीं।
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2014 में उन्होंने परीक्षा नहीं दी, लेकिन 2015 में फिर से भाग-1 की परीक्षा में शामिल हुईं।
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लगातार कई वर्षों तक परीक्षा देते रहने के बाद, 2018 में उन्होंने बी.ए. भाग-3 की परीक्षा दी।
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विश्वविद्यालय ने परीक्षा के नियमों का हवाला देते हुए उनके परिणाम को रोक दिया।
ट्रायल कोर्ट और विश्वविद्यालय का रुख
विश्वविद्यालय के अनुसार, उनकी परीक्षा नियमावली की धारा 7.1 के तहत कोई भी छात्र जो तीन लगातार प्रयासों के भीतर बी.ए. भाग-1 पास नहीं कर पाता, वह भाग-3 की परीक्षा देने के लिए पात्र नहीं होता।
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मनोरमा ने 2017 में बी.ए. भाग-1 की परीक्षा दी, जो विश्वविद्यालय के नियमों के अनुसार मान्य नहीं थी।
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चूंकि उन्होंने परीक्षा में बैठने की पात्रता के नियमों का उल्लंघन किया था, इसलिए उनका परिणाम घोषित नहीं किया गया।
पटना उच्च न्यायालय का निर्णय
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नियमों का उल्लंघन – न्यायालय ने विश्वविद्यालय के परीक्षा नियमावली का विश्लेषण किया और पाया कि मनोरमा कुमारी को 2017 में परीक्षा में बैठने की अनुमति देना विश्वविद्यालय की गलती थी।
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पिछले मामलों का संदर्भ – न्यायालय ने इससे जुड़े अन्य मामलों जैसे कि मिहिर कुमार झा बनाम बी.एन. मंडल विश्वविद्यालय, सुनिल कुमार बनाम बी.एन. मंडल विश्वविद्यालय इत्यादि का उल्लेख किया, जहां छात्रों को नियमों के उल्लंघन के कारण कोई राहत नहीं दी गई थी।
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कोर्ट का निष्कर्ष – न्यायालय ने पाया कि याचिकाकर्ता को परीक्षा देने की अनुमति देना ही गलत था, इसलिए उनके परिणाम को रोकना उचित था।
निष्कर्ष
यह मामला यह दर्शाता है कि विश्वविद्यालयों के परीक्षा नियमों का पालन करना आवश्यक है और यदि कोई छात्र नियमों का उल्लंघन करके परीक्षा देता है, तो उसका परिणाम घोषित नहीं किया जाएगा। न्यायालय ने याचिका को खारिज करते हुए विश्वविद्यालय के निर्णय को बरकरार रखा।
पूरा
फैसला पढ़ने के लिए यहां
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https://patnahighcourt.gov.in/viewjudgment/MTUjMTE5MjMjMjAyMSMxI04=-xxKxadu4v–am1–s=


