भूमिका
यह मामला बिहार के पूर्वी चंपारण जिले के रक्सौल थाना क्षेत्र से संबंधित है, जिसमें श्रीलाल यादव नामक व्यक्ति पर एक नाबालिग लड़की के अपहरण और शारीरिक शोषण का आरोप लगाया गया था। इस मामले की सुनवाई विशेष न्यायाधीश, पोक्सो, पूर्वी चंपारण द्वारा की गई थी, जिसमें आरोपी को दोषी ठहराया गया था। बाद में, आरोपी ने पटना उच्च न्यायालय में इस फैसले के खिलाफ अपील दायर की।
मामले का संक्षिप्त विवरण
फरियादी शंकर साह ने पहले मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट, रक्सौल के समक्ष एक परिवाद दायर किया, जिसे बाद में पुलिस थाने में एफआईआर के रूप में दर्ज किया गया। एफआईआर में कहा गया था कि 18 सितंबर 2016 को शाम 7 बजे उनकी 14 वर्षीय नाबालिग बेटी, जो आठवीं कक्षा की छात्रा थी, शौच के लिए गई थी। उसी समय, आरोपी श्रीलाल यादव और उनके परिवार के अन्य सदस्यों ने उसका अपहरण कर लिया और उसे नेपाल ले गए। 21 सितंबर 2016 को पीड़िता को रेलवे क्रॉसिंग के पास बेहोशी की हालत में पाया गया।
ट्रायल कोर्ट का निर्णय
ट्रायल कोर्ट ने आरोपी को भारतीय दंड संहिता की धारा 341 (अवैध रोक), 323 (मारपीट), 366 (अपहरण), और पोक्सो अधिनियम की धारा 8 के तहत दोषी ठहराया। अदालत ने उसे निम्नलिखित सजा सुनाई:
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धारा 341 के तहत 1 माह की साधारण कारावास
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धारा 323 के तहत 6 माह की सजा
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धारा 366 के तहत 6 वर्ष की कारावास और 10,000 रुपये का जुर्माना
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पोक्सो अधिनियम की धारा 8 के तहत 4 वर्ष की कारावास और 10,000 रुपये का जुर्माना
हालांकि, अदालत ने आरोपी को धारा 376(D) (सामूहिक बलात्कार) और 504 (गाली-गलौज) के आरोपों से बरी कर दिया।
गवाहों की गवाही और उनकी विश्वसनीयता
न्यायालय में अभियोजन पक्ष द्वारा सात गवाहों को पेश किया गया, लेकिन इनमें से कई गवाहों की गवाही अभियोजन पक्ष के दावों से मेल नहीं खाती थी।
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पीड़िता के पिता (PW-1) – उन्होंने कहा कि उन्होंने घटना होते हुए नहीं देखा और वह अब इस मामले को आगे नहीं बढ़ाना चाहते क्योंकि उन्होंने अपनी बेटी की शादी कर दी है।
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पीड़िता की मां (PW-7) – उन्होंने कहा कि उनकी बेटी को कोई जबरदस्ती नहीं ले गया बल्कि वह खुद किसी कारणवश घर छोड़कर गई थी। उन्होंने यह भी कहा कि उनकी बेटी 20 वर्ष की थी और पहले भी बिना बताए घर से चली जाती थी।
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प्रत्यक्षदर्शी गवाह (PW-5) – इस गवाह ने कहा कि पीड़िता और आरोपी के बीच पहले से प्रेम संबंध थे और पीड़िता अपनी इच्छा से उसके साथ गई थी।
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पीड़िता (PW-6) – उसने कोर्ट में कहा कि आरोपी ने उसका मुंह दबाकर जबरदस्ती नेपाल ले जाया था। हालांकि, उसकी गवाही में कई विरोधाभास थे और मेडिकल रिपोर्ट भी अदालत में प्रस्तुत नहीं की गई।
पटना उच्च न्यायालय का फैसला
पटना उच्च न्यायालय ने ट्रायल कोर्ट के फैसले की समीक्षा करते हुए पाया कि अभियोजन पक्ष द्वारा प्रस्तुत गवाहों की गवाही में भारी विरोधाभास था।
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पीड़िता की उम्र संदिग्ध थी – कोई ठोस दस्तावेजी प्रमाण नहीं था जो यह साबित करता कि वह नाबालिग थी।
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गवाहों की गवाही विश्वसनीय नहीं थी – पीड़िता के माता-पिता और अन्य स्वतंत्र गवाहों की गवाही ने अभियोजन की कहानी पर संदेह उत्पन्न किया।
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मेडिकल साक्ष्य का अभाव – पुलिस द्वारा प्रस्तुत मेडिकल रिपोर्ट और डॉक्टर की गवाही कोर्ट में पेश नहीं की गई थी।
इन सभी तथ्यों के आधार पर उच्च न्यायालय ने आरोपी को संदेह का लाभ देते हुए दोषसिद्धि को निरस्त कर दिया और उसे तत्काल रिहा करने का आदेश दिया।
निष्कर्ष
यह मामला न्यायिक प्रक्रिया में साक्ष्यों की विश्वसनीयता और उचित जांच के महत्व को दर्शाता है। उच्च न्यायालय ने गवाहों की गवाही और अन्य तथ्यों को ध्यान में रखते हुए निष्कर्ष निकाला कि अभियोजन पक्ष अपना मामला संदेह से परे साबित नहीं कर सका। यह निर्णय यह भी दर्शाता है कि किसी भी मामले में केवल आरोपों के आधार पर दोषसिद्धि नहीं की जानी चाहिए, बल्कि ठोस साक्ष्यों की आवश्यकता होती है।
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