“दस्तावेजी साक्ष्य के अभाव में पॉक्सो मामले में आरोपी बरी – पटना हाईकोर्ट का अहम फैसला”

यह मामला पटना उच्च न्यायालय का है, जहाँ शोनू कुमार पासवान ने अपनी सजा के खिलाफ अपील की थी। उन्हें निचली अदालत ने भारतीय दंड संहिता की धारा 366A और 376 के साथ-साथ पॉक्सो एक्ट की धारा 4 के तहत दोषी ठहराया था और दस साल की सजा सुनाई थी। मामला 9 जुलाई 2016 का है, जब एक 12 वर्षीय लड़की अपनी बड़ी बहन चंदा कुमारी और दोस्त सरिता कुमारी के साथ बाजार गई थी। आरोप के अनुसार, जब लड़की सड़क पर अकेली थी, तब अभियुक्त मोटरसाइकिल पर आया और उसका अपहरण कर लिया। हालांकि FIR 23 जुलाई 2016 को दर्ज की गई। पीड़िता बाद में 27 अगस्त 2016 को महिला थाना मधुबनी में स्वयं उपस्थित हुई, जहाँ उसका मेडिकल परीक्षण किया गया और 29 अगस्त 2016 को मजिस्ट्रेट के समक्ष उसका बयान दर्ज किया गया।

मामले की सुनवाई के दौरान कई महत्वपूर्ण तथ्य सामने आए। पीड़िता ने अपने बयान में कहा कि आरोपी उसे नेपाल ले गया, जहाँ वह एक महीने तक रही, फिर दिल्ली में एक महीना बिताया। वह बस और ट्रेन में यात्रा करते समय कई यात्रियों के बीच थी, लेकिन डर के कारण विरोध नहीं कर सकी। हालांकि, अदालत ने पाया कि पीड़िता की गवाही और अन्य गवाहों के बयानों से यह स्पष्ट होता है कि वह अपनी मर्जी से आरोपी के साथ गई थी। महत्वपूर्ण बात यह है कि जब वह मोटरसाइकिल पर बैठी, तब न तो उसने विरोध किया और न ही कोई शोर मचाया, जबकि ऐसा करने का पर्याप्त अवसर था।

अदालत ने एक और महत्वपूर्ण बिंदु पर ध्यान दिया – पीड़िता की उम्र का सटीक प्रमाण। यद्यपि अभियोजन पक्ष ने दावा किया कि पीड़िता नाबालिग थी, लेकिन इसके लिए कोई स्कूल दस्तावेज या जन्म प्रमाण पत्र पेश नहीं किया गया। मेडिकल बोर्ड ने उसकी उम्र 16-17 वर्ष के बीच बताई, लेकिन यह केवल रेडियोलॉजिकल जांच पर आधारित थी, जिसकी रिपोर्ट या विशेषज्ञ को अदालत में पेश नहीं किया गया। जुवेनाइल जस्टिस एक्ट की धारा 94 के अनुसार, उम्र का निर्धारण स्कूल प्रमाण पत्र या जन्म प्रमाण पत्र के आधार पर किया जाना चाहिए, और केवल इनकी अनुपस्थिति में ही मेडिकल टेस्ट का सहारा लिया जा सकता है।

FIR में देरी को लेकर भी गंभीर सवाल उठे। शिकायतकर्ता ने लिखित रिपोर्ट में कहा कि देरी पंचायत की वजह से हुई, लेकिन अदालत में गवाही के दौरान उन्होंने किसी पंचायत के होने से इनकार कर दिया। अदालत ने माना कि अगर वाकई अपहरण हुआ था, तो पंचायत का कोई औचित्य नहीं था क्योंकि संज्ञेय अपराधों का निपटारा पंचायत में नहीं किया जा सकता।

इन सभी तथ्यों को देखते हुए पटना हाई कोर्ट ने पाया कि अभियोजन पक्ष किसी भी आरोप को सिद्ध करने में विफल रहा। पीड़िता की सहमति से संबंध होने के कारण, और उसकी नाबालिग होने का सटीक प्रमाण न होने के कारण, अदालत ने निचली अदालत के फैसले को पलट दिया और अभियुक्त को सभी आरोपों से बरी कर दिया।

यह केस कई महत्वपूर्ण कानूनी सिद्धांतों को रेखांकित करता है। पहला, किसी व्यक्ति की उम्र साबित करने के लिए सटीक दस्तावेजी प्रमाण की आवश्यकता। दूसरा, FIR में देरी के लिए संतोषजनक स्पष्टीकरण का महत्व। तीसरा, पीड़िता के व्यवहार और परिस्थितियों का समग्र मूल्यांकन। इस मामले में अदालत ने पाया कि न तो पीड़िता की नाबालिग होने का कोई ठोस प्रमाण था, न ही उसके साथ जबरन कृत्य का कोई स्पष्ट साक्ष्य। उसका व्यवहार दर्शाता था कि वह अपनी मर्जी से आरोपी के साथ गई थी, और दो महीने तक अलग-अलग जगहों पर रहने के दौरान उसके पास शिकायत करने के कई अवसर थे। अदालत ने यह भी गंभीरता से लिया कि शिकायतकर्ता ने पंचायत के बारे में विरोधाभासी बयान दिए, जो मामले की प्रामाणिकता पर सवाल खड़े करते हैं।

यह फैसला यह भी दर्शाता है कि न्यायिक प्रणाली में साक्ष्य का महत्व कितना अधिक है। केवल आरोप लगाना पर्याप्त नहीं है, उन्हें ठोस प्रमाणों से सिद्ध करना भी आवश्यक है। विशेष रूप से नाबालिग से संबंधित मामलों में, उम्र का सटीक प्रमाण अत्यंत महत्वपूर्ण होता है, क्योंकि इस पर पूरे मामले का निर्णय निर्भर कर सकता है। इस मामले में, यद्यपि मेडिकल बोर्ड ने पीड़िता की उम्र 16-17 वर्ष बताई, लेकिन बिना स्कूल दस्तावेजों या जन्म प्रमाण पत्र के यह अनुमान पर्याप्त नहीं माना गया।

साथ ही, यह केस FIR में देरी के मुद्दे को भी महत्वपूर्ण तरीके से संबोधित करता है। यद्यपि बलात्कार जैसे मामलों में FIR में देरी स्वाभाविक हो सकती है, लेकिन इस देरी का उचित स्पष्टीकरण होना आवश्यक है। इस मामले में, शिकायतकर्ता के विरोधाभासी बयानों ने मामले की विश्वसनीयता को प्रभावित किया।

अंत में, यह फैसला इस बात का भी उदाहरण है कि कैसे न्यायालय सभी पहलुओं पर विचार करके निष्पक्ष निर्णय लेता है। केवल आरोप या दावों के आधार पर नहीं, बल्कि ठोस साक्ष्य और परिस्थितियों के आधार पर न्याय किया जाता है। इस मामले में, सभी तथ्यों और परिस्थितियों के आधार पर अदालत ने पाया कि अभियुक्त के खिलाफ कोई भी आरोप सिद्ध नहीं होता है, इसलिए उसे बरी कर दिया गया।

पूरा
फैसला पढ़ने के लिए यहां
क्लिक करें:

https://patnahighcourt.gov.in/viewjudgment/MjQjNTQyMCMyMDE5IzEjTg==-4Bp–am1–kxnZUkI=

 

Facing a similar matter before the Patna High Court? Contact Samvida Law Associates.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Recent News