पटना उच्च न्यायालय में एक महत्वपूर्ण मामले में, अशोक कुमार यादव नामक एक सरकारी कर्मचारी ने न्यायालय का दरवाजा खटखटाया। यह मामला सरकारी नौकरी से बर्खास्तगी से जुड़ा था, जिसमें प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों की अनदेखी का गंभीर मुद्दा सामने आया। यादव, जो पटना मेडिकल कॉलेज और अस्पताल में ड्रग इंस्पेक्टर के पद पर प्रतिनियुक्ति पर थे, पर वित्तीय वर्ष 2008-09 और 2009-10 में दवाइयों, रसायनों, और उपकरणों की खरीद में अनियमितताओं का आरोप था।
इस मामले में सबसे पहले 2013 में सतर्कता विभाग ने एक मामला दर्ज किया, जिसमें भारतीय दंड संहिता की धारा 406/409/420/120-B के साथ-साथ भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 की धारा 13(1)(D) के तहत आरोप लगाए गए। बिहार सरकार ने 22 मई 2014 को आपराधिक मुकदमा चलाने की मंजूरी दी। इसके बाद 7 अक्टूबर 2016 को बिहार सरकार के स्वास्थ्य विभाग ने बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण और अपील) नियमावली, 2005 के नियम 17 के तहत विभागीय कार्यवाही शुरू की।
जांच अधिकारी ने 14 फरवरी 2020 को अपनी रिपोर्ट सौंपी, जिसमें यादव पर लगे आरोपों को सही पाया गया। विभाग ने 27 मार्च 2020 को यादव को इस रिपोर्ट की प्रति भेजी और 15 दिनों के भीतर जवाब मांगा। लेकिन यहाँ एक बड़ी चूक हुई – रिपोर्ट के पृष्ठ 7 से 13 तक यादव को नहीं दिए गए। यादव ने कोविड-19 महामारी के कारण लगे लॉकडाउन और अधूरी रिपोर्ट का हवाला देते हुए उचित जवाब देने के लिए समय मांगा।
लेकिन विभाग ने उनकी मांग पर ध्यान नहीं दिया और 26 मार्च 2021 को बिहार लोक सेवा आयोग की सहमति लेकर उन्हें नौकरी से बर्खास्त कर दिया। यादव ने इस आदेश को पटना हाई कोर्ट में चुनौती दी। मामले की सुनवाई के दौरान 3 नवंबर 2021 को राज्य औषधि नियंत्रक ने कोर्ट में स्वीकार किया कि वास्तव में जांच रिपोर्ट के कुछ पृष्ठ यादव को नहीं दिए गए थे।
माननीय न्यायमूर्ति चक्रधारी शरण सिंह ने इस मामले में एक महत्वपूर्ण फैसला दिया। उन्होंने कहा कि जांच रिपोर्ट की अधूरी प्रति देना प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन है और यह बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण और अपील) नियमावली के नियम 18(3) का भी उल्लंघन है, जो विभागीय जांच में आरोपी कर्मचारी को पूरी रिपोर्ट देने का प्रावधान करता है।
कोर्ट ने बर्खास्तगी का आदेश रद्द कर दिया और निर्देश दिया कि यादव को तुरंत बहाल किया जाए। साथ ही अनुशासनिक प्राधिकारी को एक महीने के भीतर जांच रिपोर्ट की पूरी प्रति यादव को देने का आदेश दिया। यादव को रिपोर्ट मिलने के बाद 15 दिन के भीतर अपना लिखित जवाब देने का अधिकार दिया गया।
यह फैसला कई मायनों में महत्वपूर्ण है। यह दर्शाता है कि विभागीय कार्यवाही में प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन करना अनिवार्य है। किसी भी कर्मचारी को बिना पूरी जानकारी के अपना पक्ष रखने से वंचित नहीं किया जा सकता। साथ ही यह फैसला बताता है कि प्रशासनिक कार्यवाही में पारदर्शिता और निष्पक्षता बनाए रखना कितना जरूरी है।
इस केस से यह भी सीख मिलती है कि भले ही किसी कर्मचारी पर गंभीर आरोप हों, लेकिन उसे अपना बचाव करने का पूरा मौका मिलना चाहिए। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि जांच प्रक्रिया में किसी भी तरह की कमी या त्रुटि पूरी कार्यवाही को दोषपूर्ण बना देती है। यह फैसला सरकारी विभागों को एक स्पष्ट संदेश देता है कि विभागीय कार्यवाही में नियमों और कानूनी प्रक्रियाओं का पूरी तरह से पालन करना आवश्यक है।
हालांकि यह भी ध्यान देने योग्य है कि कोर्ट ने यादव को पूरी तरह से दोषमुक्त नहीं किया है। कोर्ट ने केवल प्रक्रियात्मक त्रुटि के आधार पर बर्खास्तगी के आदेश को रद्द किया है और विभाग को नियमानुसार कार्यवाही करने का निर्देश दिया है। यानी, अब विभाग को पूरी जांच रिपोर्ट देकर यादव का पक्ष सुनना होगा और फिर नए सिरे से निर्णय लेना होगा।
यह केस सरकारी कर्मचारियों के अधिकारों और कर्तव्यों के बीच संतुलन का भी एक अच्छा उदाहरण है। जहां एक ओर भ्रष्टाचार के खिलाफ कड़ी कार्रवाई जरूरी है, वहीं दूसरी ओर यह भी जरूरी है कि कार्यवाही नियमों के अनुरूप हो और आरोपी को अपना पक्ष रखने का पूरा अवसर मिले।
इस फैसले से यह भी स्पष्ट होता है कि न्यायपालिका प्रशासनिक कार्यवाही पर नजर रखती है और जहां कहीं नियमों का उल्लंघन होता है, वहां हस्तक्षेप करती है। यह लोकतांत्रिक व्यवस्था में चेक एंड बैलेंस का एक महत्वपूर्ण उदाहरण है।
अंत में, यह केस सभी सरकारी विभागों के लिए एक सीख है कि विभागीय कार्यवाही में पारदर्शिता और निष्पक्षता बनाए रखना कितना महत्वपूर्ण है। साथ ही यह आम नागरिकों को भी यह संदेश देता है कि अगर प्रशासनिक स्तर पर उनके साथ अन्याय होता है, तो वे न्यायपालिका का दरवाजा खटखटा सकते हैं।
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https://patnahighcourt.gov.in/viewjudgment/MTUjOTEzNSMyMDIwIzEjTg==-J–am1–Z8PAzDb7Y=


