पटना
उच्च न्यायालय में क्रिमिनल मिसलेनियस
केस संख्या 19391/2016 का निर्णय
का संक्षिप्त विवरण:
यह मामला डॉ. सर्युग कुमार
द्वारा दायर की गई
एक याचिका से संबंधित है।
याचिकाकर्ता टेम्पल ऑफ हैनीमैन होम्योपैथिक
मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल, मुंगेर
के प्रभारी प्राचार्य थे। उनके खिलाफ
भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम 1988 की धारा 7/13(2) के
साथ पठित धारा 13(1)(d) के
तहत विजिलेंस विशेष न्यायाधीश द्वारा पारित संज्ञान आदेश को चुनौती
दी गई थी।
की पृष्ठभूमि:
– अमृत
कुमार सिंह नामक छात्र
ने विजिलेंस ब्यूरो में शिकायत दर्ज
कराई
– आरोप
था कि प्राचार्य ने
हाउस सर्जनशिप प्रमाणपत्र और चरित्र प्रमाणपत्र
के लिए 50,000 रुपये की मांग की
– 12.06.2015 को
विजिलेंस द्वारा छापेमारी में याचिकाकर्ता को
30,000 रुपये की रिश्वत लेते
रंगे हाथों पकड़ा गया
– जांच
के बाद आरोप पत्र
दाखिल किया गया और
विशेष न्यायाधीश ने संज्ञान लिया
के मुख्य तर्क:
1. कॉलेज
एक निजी और गैर–सहायता प्राप्त संस्थान है, इसलिए वह
लोक सेवक नहीं हैं
2. कुलपति
को मुकदमा चलाने की मंजूरी देने
का अधिकार नहीं था
3. मंजूरी
देने वाले अधिकारी के
समक्ष जांच में एकत्र
सामग्री नहीं रखी गई
का पक्ष:
1. कॉलेज
को बी.बी.आर.ए. बिहार विश्वविद्यालय
से संबद्धता प्राप्त है
2. केंद्रीय
होम्योपैथी परिषद की सिफारिश पर
आयुष मंत्रालय से मान्यता मिली
3. कॉलेज
को सरकारी अनुदान भी मिला है
4. विश्वविद्यालय
को छात्र पंजीकरण शुल्क और परीक्षा शुल्क
जमा किया जाता है
5. आयुष
स्वास्थ्य सेवा निदेशालय से
भी फंड मिला
के प्रमुख निष्कर्ष:
1. याचिकाकर्ता
भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 2(c)(iii) के
तहत लोक सेवक हैं
क्योंकि:
– कॉलेज बिहार विश्वविद्यालय अधिनियम द्वारा नियंत्रित है
– सरकारी अनुदान प्राप्त करता है
की वैधता के संबंध में:
– जांच सामग्री मंजूरी
देने वाले अधिकारी के
समक्ष नहीं रखी गई,
यह निश्चित रूप से नहीं
कहा जा सकता
– यह विचारणीय विषय
है जिसे विचारण के
दौरान परीक्षण किया जाएगा
का नियंत्रण:
– कुलपति को कॉलेजों का
निरीक्षण करने का अधिकार
है
– शिक्षकों की नियुक्ति में
विश्वविद्यालय की भूमिका है
– शासी निकाय में
विश्वविद्यालय का प्रतिनिधित्व होता
है
– सिंडिकेट शासी निकाय को
निलंबित कर सकती है
निकाय की शक्तियां:
– शिक्षकों की नियुक्ति और
बर्खास्तगी का अधिकार कानून
और परिनियमों के अधीन है
– विश्वविद्यालय का नियंत्रण सर्वोपरि
है
महत्वपूर्ण
कानूनी बिंदु:
1. भ्रष्टाचार
निवारण अधिनियम की धारा 19(1) के
तहत संज्ञान लेने से पूर्व
सक्षम प्राधिकारी की पूर्व मंजूरी
आवश्यक है
19(3) के अनुसार:
– मंजूरी में त्रुटि के
आधार पर विशेष न्यायाधीश
के आदेश को केवल
न्याय विफलता की स्थिति में
ही उलटा जा सकता
है
– मंजूरी में त्रुटि के
आधार पर कार्यवाही रोकी
नहीं जा सकती
प्राधिकारी द्वारा दी गई मंजूरी
अवैध नहीं होती:
– यदि निचले प्राधिकारी
द्वारा मंजूरी दी जाती तो
वह अवैध होती
– कुलपति शासी निकाय से
उच्चतर प्राधिकारी हैं
का अंतिम निर्णय:
1. याचिका
को खारिज किया गया
2. विचारण
न्यायालय इस आदेश से
प्रभावित हुए बिना मंजूरी
की वैधता का निर्णय करेगा
3. विचारण
न्यायालय कानून के अनुसार निर्णय
लेगा
निहितार्थ:
1. संबद्ध
कॉलेज के प्राचार्य लोक
सेवक माने जाएंगे
2. विश्वविद्यालय
का नियंत्रण व्यापक है
3. शासी
निकाय की शक्तियां सीमित
हैं
4. मंजूरी
की वैधता का मुद्दा विचारण
के दौरान परीक्षण किया जा सकता
है
यह निर्णय शैक्षणिक संस्थानों में भ्रष्टाचार के
मामलों में महत्वपूर्ण न्यायिक
दृष्टांत स्थापित करता है। इसमें
स्पष्ट किया गया है
कि संबद्ध कॉलेज के प्राचार्य लोक
सेवक हैं और उन
पर भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम लागू होता है।
साथ ही, विश्वविद्यालय के
नियंत्रण की व्यापकता को
भी रेखांकित किया गया है।
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