यह मामला क्रिमिनल मिसलेनियस नंबर 30084 (2013) का है, जो
वैशाली जिले के एक
शिकायत मामले (केस नंबर 2050/2011) से
उत्पन्न हुआ।
याचिकाकर्ता
और प्रतिवादी:
याचिकाकर्ता:
अनुराधा मेहता उर्फ अनुराधा मुंडकर
(स्वर्गीय रवींद्र नाथ मेहता की
पुत्री और बाल्मीकि मुंडकर
की पत्नी, निवासी हेरिटेज सिटी, गुड़गांव, हरियाणा)
1. बिहार
राज्य
2. प्रदीप
कुमार पासवान (स्वर्गीय बिनुल राम के पुत्र,
निवासी मोहल्ला हेला बाजार, हाजीपुर)
3. पुलिस
अधीक्षक, वैशाली
4. निदेशक
जांच, आयकर विभाग, बिहार
5. प्रधान
मुख्य आयुक्त आयकर, बिहार और झारखंड
की पृष्ठभूमि:
याचिकाकर्ता
ने धारा 482 CrPC के तहत याचिका
दायर की, जिसमें न्यायिक
मजिस्ट्रेट, वैशाली हाजीपुर द्वारा शिकायत मामला संख्या C-1-2050/11 में दिनांक 04.09.2012 को पारित
आदेश को रद्द करने
की मांग की गई।
इस आदेश में याचिकाकर्ता
के खिलाफ IPC की धारा 420 के
तहत संज्ञान लिया गया था।
की कार्यवाही:
1. न्यायालय
ने पहले अपने 11.02.2019 के
आदेश द्वारा वैशाली के पुलिस अधीक्षक
और निचली अदालत से रिपोर्ट मांगी
थी।
2. दोनों
अधिकारियों को प्रतिवादी नंबर
2 की वास्तविक पहचान की जांच करनी
थी।
3. रिपोर्ट
से पता चला कि
प्रतिवादी नंबर 2 ने पुलिस और
निचली अदालत के समक्ष अपनी
ड्राइविंग लाइसेंस और आधार कार्ड
के साथ उपस्थित होकर
अपनी पहचान साबित की।
4. प्रतिवादी
नंबर 2 ने याचिकाकर्ता को
30,00,000 रुपये नकद देने की
बात दोहराई।
बिंदु और निर्णय:
1. प्रतिवादी
नंबर 2 के वकील ने
स्वीकार किया कि यह
एक शुद्ध नागरिक विवाद है और आपराधिक
शिकायत दायर करना गलत
सलाह का परिणाम था।
2. याचिकाकर्ता
के वकील ने सर्वोच्च
न्यायालय के निर्णयों का
हवाला दिया, जिनमें भूमि और धन
संबंधी मामलों को नागरिक प्रकृति
का माना गया है।
3. राज्य
के अतिरिक्त लोक अभियोजक ने
भी स्वीकार किया कि शुद्ध
नागरिक विवादों को आपराधिक रंग
नहीं दिया जाना चाहिए।
4. न्यायालय
ने पाया कि याचिकाकर्ता
के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही जारी रखना अदालत
की प्रक्रिया का दुरुपयोग है।
न्यायालय
का आदेश:
1. याचिका
स्वीकार की गई।
मामला संख्या C-1-2050/2011 में दिनांक 04.09.2012 को पारित
आदेश सहित संपूर्ण आपराधिक
कार्यवाही रद्द कर दी
गई।
को कानून के अनुसार उपलब्ध
उपचार का पालन करने
की स्वतंत्रता दी गई।
आयकर
जांच का आदेश:
1. न्यायालय
ने धारा 482 CrPC के तहत अपने
कर्तव्य के तहत आयकर
अधिकारियों द्वारा जांच कराने का
निर्णय लिया।
का मुख्य बिंदु यह है कि
क्या प्रतिवादी नंबर 2 द्वारा याचिकाकर्ता को दिए गए
कथित 30,00,000 रुपये की नकद राशि
उनके तत्कालीन आयकर रिटर्न में
दर्शाई गई है।
भी जांच का विषय
होगा कि क्या बिना
किसी पंजीकृत समझौते के इतनी बड़ी
नकद लेन–देन कानूनी
रूप से अनुमत है।
आगे
की कार्यवाही:
1. आयकर
विभाग के निदेशक (जांच)
और प्रधान मुख्य आयुक्त को प्रतिवादी 4 और
5 के रूप में शामिल
किया गया।
सॉलिसिटर जनरल श्री एस.डी. संजय ने
नए जोड़े गए प्रतिवादियों की
ओर से नोटिस स्वीकार
किया।
अधिकारियों को 15 मई 2019 तक विस्तृत जांच
रिपोर्ट प्रस्तुत करने का निर्देश
दिया गया।
को 17 मई 2019 को ‘आदेश के
लिए‘ शीर्षक के तहत सूचीबद्ध
किया जाना तय हुआ।
निष्कर्ष:
यह निर्णय महत्वपूर्ण है क्योंकि:
1. इसने
नागरिक और आपराधिक मामलों
के बीच स्पष्ट अंतर
को रेखांकित किया।
दर्शाता है कि नागरिक
प्रकृति के विवादों को
आपराधिक रंग नहीं दिया
जाना चाहिए।
ने बड़ी नकद लेन–देन की वैधता
की जांच का आदेश
देकर वित्तीय पारदर्शिता सुनिश्चित करने का प्रयास
किया।
निर्णय अदालती प्रक्रिया के दुरुपयोग को
रोकने और न्याय के
उद्देश्यों को सुरक्षित करने
का एक उदाहरण है।
यह मामला दर्शाता है कि कैसे
उच्च न्यायालय ने न केवल
मूल विवाद का समाधान किया,
बल्कि बड़ी नकद लेन–देन की वैधता
की जांच का आदेश
देकर कानून के शासन को
मजबूत करने का प्रयास
भी किया।
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