“सहरसा मेडिकल स्टोर डकैती एवं हत्या मामला”

 

मामले का सारांश:

यह मामला पटना उच्च न्यायालय में दायर आपराधिक अपील संख्या 69/1995 से संबंधित है, जो सहरसा जिले के सहरसा सदर थाना कांड संख्या 511/1987 से उत्पन्न हुआ था। इस अपील में अशोक कुमार केशरी और उनके पिता बिश्वनाथ केशरी को डकैती, हत्या और अन्य अपराधों में दोषी ठहराए जाने के खिलाफ चुनौती दी गई थी।

मुख्य विवाद:
1987 में सहरसा के शिव शक्ति मेडिकल एजेंसी पर एक डकैती हुई, जिसमें दुकान के मालिक परमेश्वर लाल डोकानिया पर गोली चलाई गई और उनकी मौत हो गई।

न्यायालय ने यह तय किया कि अपीलकर्ता अपराध में दोषी हैं और निचली अदालत के फैसले को सही ठहराया।


मामले की पृष्ठभूमि:

  1. घटना का विवरण:

    • 20 अक्टूबर 1987 को शिव शक्ति मेडिकल एजेंसी (जो कि मृतक परमेश्वर लाल डोकानिया की दुकान थी) पर 11 बदमाशों ने हमला किया।
    • बदमाशों ने दुकान में मौजूद कर्मचारियों और मालिक के बेटों को धमकाया और लूटपाट शुरू कर दी।
    • दुकान मालिक के बेटे अनिल कुमार डोकानिया और अरुण कुमार डोकानिया को गंभीर रूप से घायल कर दिया गया।
    • जब दुकान मालिक परमेश्वर लाल डोकानिया दुकान में आए, तो बदमाशों ने उन पर दो गोलियां चलाईं, जिससे वे गंभीर रूप से घायल हो गए।
    • बदमाशों ने ₹8000-9000 नकद और सोने की अंगूठी लूट ली और भागते समय दो ग्रेनेड फेंके
  2. एफआईआर और पुलिस जांच:

    • घटना के तुरंत बाद, अनिल कुमार डोकानिया ने पुलिस को सूचना दी।
    • शुरुआती जांच में, पुलिस ने इसे धारा 395 आईपीसी (डकैती) के तहत दर्ज किया, लेकिन बाद में धारा 396 (डकैती के दौरान हत्या), 302 (हत्या) और 380 (चोरी) जोड़ी गई
    • जांच के दौरान, पुलिस को जानकारी मिली कि इस अपराध में बिश्वनाथ केशरी और उनके बेटे अशोक कुमार केशरी का हाथ था।
  3. मेडिकल रिपोर्ट और मृत्युपूर्व बयान:

    • घायल परमेश्वर लाल डोकानिया को सहरसा अस्पताल में भर्ती कराया गया, लेकिन हालत बिगड़ने के बाद उन्हें पटना रेफर कर दिया गया।
    • 03 नवंबर 1987 को पटना में उनका निधन हो गया।
    • उन्होंने अपनी मृत्यु से पहले पुलिस को अपनी मौत का जिम्मेदार बिश्वनाथ केशरी और अशोक केशरी को बताया
    • डॉक्टरों ने पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट में पुष्टि की कि उनकी मौत गोलियों की चोट और अत्यधिक रक्तस्राव के कारण हुई।

निचली अदालत का फैसला (1995):

  • 29 अप्रैल 1995 और 02 मई 1995 को प्रथम अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश, सहरसा ने अशोक कुमार केशरी और बिश्वनाथ केशरी को दोषी ठहराया।

  • भारतीय दंड संहिता की निम्नलिखित धाराओं के तहत सजा सुनाई गई:

    • 302/149 आईपीसी (हत्या): आजीवन कारावास
    • 307/149 आईपीसी (हत्या का प्रयास): तीन साल कठोर कारावास
    • 324/149, 380/149, 147 आईपीसी (अन्य अपराध): कोई अतिरिक्त सजा नहीं
  • कोर्ट ने आदेश दिया कि सभी सजाएं साथ-साथ चलेंगी (concurrent sentences)।


उच्च न्यायालय में अपील:

  • बिश्वनाथ केशरी की मौत 2021 में हो गई, जिससे उनकी अपील समाप्त हो गई।
  • अशोक कुमार केशरी ने अपील दायर की, यह तर्क देते हुए कि उनके खिलाफ कोई प्रत्यक्ष सबूत नहीं था।
  • उन्होंने दावा किया कि उन्हें गलत तरीके से फंसाया गया था और उनके खिलाफ सबूत केवल मृत्युपूर्व बयान (dying declaration) पर आधारित था।

पटना उच्च न्यायालय का फैसला (2021):

  1. सबूतों का विश्लेषण:

    • अदालत ने पाया कि मृत्युपूर्व बयान (dying declaration) की विश्वसनीयता संदिग्ध थी
    • कुछ गवाहों ने कहा कि अशोक कुमार केशरी घटना स्थल पर मौजूद नहीं थे
    • मृतक के बेटों अनिल और अरुण डोकानिया ने अपनी गवाही में अशोक केशरी के खिलाफ कोई ठोस सबूत नहीं दिया।
  2. मृत्युपूर्व बयान पर संदेह:

    • अदालत ने कहा कि मृत्युपूर्व बयान में कई विसंगतियां थीं, और यह स्पष्ट नहीं था कि क्या मृतक बयान देने की स्थिति में थे।
    • डॉक्टरों ने बयान की पुष्टि नहीं की थी, जिससे इसके सत्य होने पर संदेह पैदा हुआ।
  3. अपराध में सीधी संलिप्तता का अभाव:

    • गवाहों के बयानों में विरोधाभास था और अभियोजन पक्ष यह साबित नहीं कर सका कि अशोक केशरी अपराध में सक्रिय रूप से शामिल थे।
  4. अदालत का अंतिम निर्णय:

    • अशोक कुमार केशरी को संदेह का लाभ (benefit of doubt) देते हुए बरी कर दिया गया।
    • अदालत ने कहा कि अकेले मृत्युपूर्व बयान के आधार पर दोषसिद्धि संभव नहीं है, जब तक कि यह अन्य ठोस सबूतों से समर्थित न हो।

मामले का व्यापक प्रभाव:

  1. मृत्युपूर्व बयान की विश्वसनीयता:

    • अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि मृत्युपूर्व बयान में विसंगतियां हों, तो इसे सबूत के रूप में स्वीकार नहीं किया जा सकता
    • मेडिकल सत्यापन (medical verification) के बिना, ऐसे बयानों को पूरी तरह भरोसेमंद नहीं माना जा सकता।
  2. अपराध में संलिप्तता साबित करने की आवश्यकता:

    • किसी आरोपी को दोषी ठहराने के लिए, अभियोजन पक्ष को ठोस सबूत देने की आवश्यकता होती है।
    • यदि प्रत्यक्ष सबूत उपलब्ध नहीं हैं, तो केवल संदेह के आधार पर सजा नहीं दी जा सकती।
  3. कानूनी प्रक्रियाओं की मजबूती:

    • यह मामला दिखाता है कि न्यायपालिका निष्पक्षता से काम करती है और बिना ठोस सबूत किसी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता

निष्कर्ष:

इस फैसले ने भारतीय न्यायिक प्रणाली में “संदेह का लाभ” (benefit of doubt) के सिद्धांत को फिर से मजबूत किया। अदालत ने यह सुनिश्चित किया कि केवल मजबूत और ठोस सबूतों के आधार पर ही किसी व्यक्ति को दोषी ठहराया जाए

पूरा
फैसला पढ़ने के लिए यहां
क्लिक करें:

https://patnahighcourt.gov.in/viewjudgment/MTUjNTg1IzIwMjEjMSNO-cO66dHrRq8w=

 

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