मामले
की पृष्ठभूमि
याचिकाकर्ता,
जो BMP-4, डुमरांव में कार्यरत थे,
को 23 नवंबर 2016 को पटना स्थित
सैन्य पुलिस के अतिरिक्त महानिदेशक
के कार्यालय में प्रतिनियुक्ति (deputation) पर भेजा गया
था। उन्होंने वृहस्पति एक्सप्रेस से पटना जाने
के लिए ट्रेन पकड़ी,
लेकिन चलते ट्रेन में
एसी कोच में चढ़ने
पर कोच अटेंडेंट से
उनका विवाद हुआ। इसी बीच,
उनके खिलाफ आरा रेल थाना
में एक एफआईआर दर्ज
कर दी गई, जिसमें
उन पर बिहार उत्पाद
संशोधन अधिनियम की धाराओं और
रेलवे अधिनियम के तहत मामला
दर्ज किया गया। आरोप
था कि उन्होंने नशे
की हालत में यात्रियों
से दुर्व्यवहार किया।
अनुशासनात्मक
कार्रवाई और बर्खास्तगी
इस
घटना के बाद, याचिकाकर्ता
के खिलाफ विभागीय जांच शुरू हुई।
उन्हें आरोपपत्र (chargesheet) जारी किया गया
और 10 दिसंबर 2016 को निलंबित कर
दिया गया। जांच अधिकारी
ने 3 मई 2017 को अपनी रिपोर्ट
प्रस्तुत की, जिसमें आरोप
सही पाए गए। इसके
आधार पर, 29 मार्च 2019 को याचिकाकर्ता को
सेवा से बर्खास्त कर
दिया गया।
बर्खास्तगी
के खिलाफ उन्होंने पुलिस उपमहानिरीक्षक (D.I.G.) से अपील की,
लेकिन यह अपील भी
1 जनवरी 2020 को खारिज कर
दी गई। इसके बाद,
उन्होंने पटना उच्च न्यायालय
में न्याय की गुहार लगाई।
याचिकाकर्ता
की दलीलें
याचिकाकर्ता
के अधिवक्ता ने तर्क दिया
कि—
1. कोई प्रत्यक्ष साक्ष्य नहीं – घटना के संबंध
में रेलवे अधिकारियों, कोच अटेंडेंट, या
अन्य यात्रियों की कोई गवाही
नहीं ली गई।
2. एफएसएल रिपोर्ट में अल्कोहल नहीं – पुलिस ने खून और
मूत्र के नमूने फॉरेंसिक
साइंस लेबोरेटरी (FSL) को भेजे थे,
जिसकी रिपोर्ट में अल्कोहल की
मात्रा शून्य पाई गई। इससे
यह स्पष्ट होता है कि
याचिकाकर्ता शराब के नशे
में नहीं थे।
3. जांच प्रक्रिया त्रुटिपूर्ण थी – विभागीय जांच में पक्षपातपूर्ण
रवैया अपनाया गया और कोई
ठोस साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किया गया।
4. अधिकारियों द्वारा मनमानी कार्रवाई – बिना उचित प्रक्रिया
का पालन किए हुए
उन्हें बर्खास्त किया गया, जो
प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के
विरुद्ध है।
राज्य
सरकार की दलीलें
राज्य
सरकार के वकील ने
तर्क दिया कि—
1. विभागीय जांच पूरी तरह
से कानून सम्मत थी और इसमें
कोई प्रक्रिया संबंधी त्रुटि नहीं थी।
2. याचिकाकर्ता ने एसी कोच
में बिना टिकट यात्रा
की थी और कोच
अटेंडेंट से उनका झगड़ा
हुआ था।
3. चूंकि याचिकाकर्ता की एक अन्य
अपील पहले से लंबित
थी, इसलिए न्यायालय को इस मामले
में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए।
पटना
उच्च न्यायालय का फैसला
न्यायमूर्ति
मोहित कुमार शाह की पीठ
ने इस मामले पर
विस्तृत विचार करते हुए निम्नलिखित
निष्कर्ष निकाले—
1. कोई प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं – चूंकि रेलवे स्टाफ, अन्य यात्रियों, एफआईआर
दर्ज कराने वाले व्यक्ति, या
मेडिकल जांच करने वाले
डॉक्टर की गवाही नहीं
ली गई, इसलिए यह
“नो एविडेंस” (कोई प्रमाण नहीं)
का मामला है।
2. एफएसएल रिपोर्ट के आधार पर आरोप झूठे साबित हुए – चूंकि खून और मूत्र
की जांच में शराब
की मात्रा नहीं पाई गई,
इसलिए यह साबित होता
है कि याचिकाकर्ता शराब
के नशे में नहीं
थे। इस प्रकार, उन
पर लगाया गया प्रमुख आरोप
असत्य था।
3. अनुचित जांच प्रक्रिया – जांच रिपोर्ट में
कोई ठोस प्रमाण प्रस्तुत
नहीं किए गए, और
केवल अनुमानों के आधार पर
निष्कर्ष निकाला गया।
4. बर्खास्तगी अवैध घोषित – न्यायालय ने स्पष्ट रूप
से कहा कि यह
एक अन्यायपूर्ण बर्खास्तगी है और इसे
तत्काल प्रभाव से रद्द किया
जाता है।
5. 100%
वेतन बहाली का आदेश – चूंकि याचिकाकर्ता को गलत तरीके
से बर्खास्त किया गया था,
इसलिए उन्हें बर्खास्तगी की पूरी अवधि
का बकाया वेतन और अन्य
लाभ दिए जाएंगे।
फैसले
का व्यापक प्रभाव
इस
फैसले से सरकारी और
अर्धसरकारी कर्मचारियों को यह संदेश
मिला कि—
·
कोई
भी कार्रवाई उचित साक्ष्यों के
बिना नहीं की जा
सकती।
·
विभागीय
जांच निष्पक्ष और पारदर्शी होनी
चाहिए।
·
प्राकृतिक
न्याय के सिद्धांतों का
पालन हर स्थिति में
किया जाना चाहिए।
निष्कर्ष
यह
फैसला सरकारी विभागों में अनुशासनात्मक कार्यवाही
की पारदर्शिता को सुनिश्चित करने
की दिशा में एक
महत्वपूर्ण कदम है। यह
उन कर्मचारियों के लिए भी
राहत लेकर आया है,
जो बिना ठोस प्रमाणों
के अनुचित दंड का सामना
करते हैं। पटना उच्च
न्यायालय का यह निर्णय
न्याय और साक्ष्य आधारित
प्रणाली की दिशा में
एक मिसाल कायम करता है।
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फैसला पढ़ने के लिए यहां
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