यह मामला ग्राम कचहरी सचिव पद की नियुक्ति को लेकर उत्पन्न विवाद से संबंधित है, जो पूर्णिया जिले के रंगपुरा साउथ ग्राम पंचायत में हुआ। इस मामले में याचिकाकर्ता मदन कुमार ने अपनी नियुक्ति को सही ठहराते हुए, संबंधित अधिकारियों द्वारा उनके खिलाफ लिए गए निर्णयों को चुनौती दी थी।
मामले की पृष्ठभूमि
ग्राम कचहरी सचिव के पद के लिए 2007 में एक चयन प्रक्रिया चलाई गई थी। याचिकाकर्ता मदन कुमार सहित कई उम्मीदवारों ने आवेदन किया था। इस प्रक्रिया में एक मेरिट सूची तैयार की गई, जिसमें याचिकाकर्ता को 60.22% अंक प्राप्त हुए थे और वे तीसरे स्थान पर थे। प्रथम स्थान पर 64.22% अंकों के साथ प्रतिवादी संख्या 6 (प्रवीण कुमार) थे।
काउंसलिंग और चयन प्रक्रिया
24 सितंबर 2007 को काउंसलिंग निर्धारित की गई थी, जहां उम्मीदवारों को उपस्थित होना था। याचिकाकर्ता का दावा था कि काउंसलिंग के समय मेरिट सूची में पहले दो स्थान पर रहने वाले उम्मीदवार अनुपस्थित थे। इसके चलते ग्राम कचहरी समिति ने 27 सितंबर 2007 को एक बैठक की और याचिकाकर्ता को सचिव पद के लिए चयनित कर लिया। उन्हें 30 सितंबर 2007 को नियुक्ति पत्र भी जारी कर दिया गया, और उन्होंने 1 अक्टूबर 2007 को पदभार ग्रहण कर लिया।
विवाद की शुरुआत
याचिकाकर्ता की नियुक्ति के बाद, प्रतिवादी संख्या 6 (प्रवीण कुमार) ने उनकी नियुक्ति को चुनौती देते हुए उप-विभागीय पदाधिकारी (SDO) के समक्ष एक शिकायत दर्ज कराई। उन्होंने दावा किया कि वे मेरिट सूची में पहले स्थान पर थे और उन्हें ही इस पद पर नियुक्त किया जाना चाहिए था।
उप-विभागीय पदाधिकारी ने 10 मार्च 2008 को दिए गए अपने आदेश में प्रतिवादी संख्या 6 के पक्ष में फैसला सुनाया और चयन समिति को निर्देश दिया कि वे मेरिट सूची के अनुसार चयन प्रक्रिया को दोबारा करें। इस फैसले से असंतुष्ट होकर, याचिकाकर्ता ने जिला पदाधिकारी के समक्ष अपील दायर की, लेकिन 1 जुलाई 2009 को उनकी अपील खारिज कर दी गई।
याचिकाकर्ता द्वारा उच्च न्यायालय में अपील
जिला पदाधिकारी के फैसले को चुनौती देते हुए, याचिकाकर्ता ने पटना उच्च न्यायालय में सिविल रिट याचिका (CWJC No. 16463/2009) दायर की।
उच्च न्यायालय का 2010 का निर्णय
पटना उच्च न्यायालय ने 11 जनवरी 2010 को अपने आदेश में यह पाया कि:
- याचिकाकर्ता को सुनवाई का पूरा अवसर नहीं दिया गया था।
- यह स्पष्ट नहीं था कि क्या मेरिट सूची में दूसरे स्थान पर रहने वाले उम्मीदवार ने काउंसलिंग में भाग लिया था या नहीं।
- चयन के खिलाफ शिकायत दर्ज करने की समय सीमा 30 दिन थी, जबकि प्रतिवादी संख्या 6 ने 60 दिन बाद शिकायत की थी।
इसलिए, उच्च न्यायालय ने मामले को पुनः उप-विभागीय पदाधिकारी के पास भेज दिया और उन्हें याचिकाकर्ता व प्रतिवादी संख्या 6 दोनों को सुनने के बाद एक नया निर्णय देने के लिए कहा।
दोबारा जांच और निर्णय
उप-विभागीय पदाधिकारी ने 4 मार्च 2016 को अपने नए आदेश में कहा कि प्रतिवादी संख्या 6 यह साबित नहीं कर सके कि उन्होंने काउंसलिंग में भाग लिया था। लेकिन साथ ही, यह भी स्पष्ट नहीं हुआ कि वे अनुपस्थित थे। इसी आधार पर, उन्होंने प्रतिवादी संख्या 6 (प्रवीण कुमार) को नियुक्त करने का निर्णय लिया।
याचिकाकर्ता ने इस फैसले को चुनौती देते हुए जिला पदाधिकारी के पास अपील दायर की, लेकिन 8 मार्च 2018 को यह अपील भी खारिज कर दी गई।
फिर से पटना उच्च न्यायालय में अपील
याचिकाकर्ता ने एक बार फिर उच्च न्यायालय में याचिका दायर की (CWJC No. 17814/2019)। उन्होंने तर्क दिया कि:
- प्रतिवादी संख्या 6 की काउंसलिंग में उपस्थिति साबित नहीं हुई, फिर भी उन्हें नियुक्त किया गया।
- 2010 के उच्च न्यायालय के आदेश का सही पालन नहीं किया गया, क्योंकि SDO ने स्पष्ट रूप से यह निष्कर्ष नहीं निकाला कि प्रतिवादी संख्या 6 ने काउंसलिंग में भाग लिया था या नहीं।
उच्च न्यायालय का अंतिम निर्णय (2019)
पटना उच्च न्यायालय ने मामले की गहराई से समीक्षा करने के बाद यह पाया कि:
- उप-विभागीय पदाधिकारी (SDO) और जिला पदाधिकारी (DM) ने यह स्पष्ट नहीं किया कि प्रतिवादी संख्या 6 ने काउंसलिंग में भाग लिया था या नहीं।
- हालांकि, मेरिट सूची में पहले स्थान पर होने के कारण प्रतिवादी संख्या 6 को नियुक्त करने का निर्णय गलत नहीं कहा जा सकता।
- चूंकि यह मामला विवादास्पद तथ्यों (disputed facts) पर आधारित था, इसलिए न्यायालय ने अपने विशेषाधिकार का उपयोग करते हुए इस पर हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया।
न्यायालय का निष्कर्ष:
- उच्च न्यायालय ने याचिकाकर्ता की याचिका को खारिज कर दिया।
- न्यायालय ने यह माना कि चयन प्रक्रिया में पारदर्शिता को लेकर संदेह हो सकता है, लेकिन मेरिट सूची में प्रथम स्थान पर रहने वाले उम्मीदवार को सचिव पद पर नियुक्त करने का निर्णय न्यायसंगत था।
- न्यायालय ने किसी भी पक्ष को कानूनी खर्च नहीं देने का आदेश दिया।
निष्कर्ष और व्यापक प्रभाव
यह मामला सरकारी भर्ती प्रक्रियाओं में पारदर्शिता और निष्पक्षता से संबंधित महत्वपूर्ण सवाल उठाता है।
- काउंसलिंग में उपस्थिति का प्रमाणन:
- यदि किसी उम्मीदवार की उपस्थिति को लेकर विवाद है, तो इसकी स्पष्ट जांच होनी चाहिए।
- शिकायत दर्ज करने की समय सीमा:
- यदि किसी भर्ती प्रक्रिया में आपत्ति है, तो उसे निर्धारित समय सीमा के भीतर ही दायर किया जाना चाहिए।
- अधिकारियों की जिम्मेदारी:
- चयन प्रक्रिया को निष्पक्ष रूप से संचालित करने और पारदर्शिता सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी अधिकारियों की होती है।
हालांकि न्यायालय ने इस मामले में दखल नहीं दिया, लेकिन यह मामला सरकारी भर्तियों में निष्पक्षता सुनिश्चित करने की आवश्यकता को उजागर करता है। भविष्य में, नियुक्ति प्रक्रियाओं को अधिक पारदर्शी बनाने के लिए स्पष्ट दिशानिर्देशों की जरूरत होगी ताकि इस तरह के विवाद न उत्पन्न हों।
पूरा
फैसला पढ़ने के लिए यहां
क्लिक करें:


