पटना उच्च न्यायालय में एक महत्वपूर्ण मामला (क्रिमिनल मिसलेनियस नंबर 3396/2015) आया, जिसमें एक सामान्य संपत्ति विवाद को आपराधिक रंग देकर पेश किया गया था। मामले में अशोक कुमार यादव ने श्याम बाबू यादव के खिलाफ आपराधिक शिकायत दर्ज की थी। शिकायत का मूल आधार यह था कि श्याम बाबू यादव ने 25 लाख रुपये में अपना मकान/जमीन बेचने का समझौता किया था, जिसमें से 23.5 लाख रुपये का भुगतान कर दिया गया था। शिकायतकर्ता का आरोप था कि बचे हुए 1.5 लाख रुपये देने की तैयारी के बावजूद न तो बिक्री विलेख निष्पादित किया गया और न ही पैसे वापस किए गए। साथ ही, जब वे पैसे वापस मांगने गए, तो उनके साथ गाली-गलौज की गई और मारपीट की धमकी दी गई।
याचिकाकर्ता श्याम बाबू यादव की ओर से तर्क दिया गया कि पूरे मामले में कोई आपराधिक कृत्य नहीं बनता है और यह अदालत की प्रक्रिया का दुरुपयोग है। उनका कहना था कि यह एक शुद्ध दीवानी प्रकृति का मामला है, जिसमें शिकायतकर्ता को सक्षम दीवानी न्यायालय में जाना चाहिए था। महत्वपूर्ण तथ्य यह भी था कि कथित समझौता पंजीकृत नहीं था और उस पर याचिकाकर्ता के हस्ताक्षर केवल पहले दो पृष्ठों पर थे। राज्य की ओर से भी स्वीकार किया गया कि मामले में दीवानी प्रकृति प्रमुख है।
माननीय न्यायमूर्ति अहसानुद्दीन अमानुल्लाह ने मामले की गहन समीक्षा की। उन्होंने पाया कि शिकायत में गाली-गलौज और मारपीट की धमकी के अलावा कोई ऐसा तत्व नहीं था जो इसे आपराधिक मामला बना सके। अदालत ने स्पष्ट किया कि यह एक समझौते के क्रियान्वयन से संबंधित विवाद है, जो पूरी तरह से सक्षम दीवानी न्यायालय के अधिकार क्षेत्र में आता है। समझौते के संबंध में यह भी महत्वपूर्ण था कि वह न तो पूरी तरह हस्ताक्षरित था और न ही पंजीकृत था।
अदालत ने अपने निर्णय में कई महत्वपूर्ण नजीरों का हवाला दिया, जिनमें आनंद कुमार मोहत्ता बनाम दिल्ली राज्य (2019), इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन बनाम NEPC इंडिया लिमिटेड (2006), और हरियाणा राज्य बनाम भजन लाल (1992) प्रमुख थे। इन नजीरों ने स्पष्ट किया कि दीवानी विवादों को आपराधिक मुकदमों के माध्यम से दबाव डालकर निपटाने के प्रयास को हतोत्साहित किया जाना चाहिए।
अंततः, अदालत ने यह मानते हुए कि मुकदमा दुर्भावनापूर्ण है और याचिकाकर्ता को परेशान करने के इरादे से दायर किया गया है, शिकायत मामला संख्या 1084(C)/2012 की समस्त आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया। यह निर्णय न्यायिक प्रक्रिया के दुरुपयोग को रोकने और दीवानी-आपराधिक कार्यवाहियों के बीच स्पष्ट विभाजन रेखा खींचने में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर साबित हुआ। इस फैसले ने स्पष्ट किया कि संपत्ति लेनदेन से जुड़े विवादों में सामान्यतः दीवानी कार्यवाही ही उचित मार्ग है और केवल दबाव बनाने के लिए आपराधिक मुकदमे का सहारा नहीं लिया जा सकता।
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https://patnahighcourt.gov.in/viewjudgment/NiMzMzk2IzIwMTUjMSNO-d2VSdWGkhoc=


