मामले का सारांश:
यह मामला पटना उच्च न्यायालय में दायर नागरिक रिट याचिका संख्या 3176/2021 से संबंधित है, जिसमें याचिकाकर्ता प्रभांश कुमार भारती ने भूपेंद्र नारायण मंडल विश्वविद्यालय (BNMU), मधेपुरा के परीक्षा नियंत्रक द्वारा उनके BCA द्वितीय सेमेस्टर के परीक्षा परिणाम को प्रकाशित न करने के निर्णय को चुनौती दी थी।
मुख्य विवाद: विश्वविद्यालय ने याचिकाकर्ता का परिणाम यह कहते हुए जारी करने से इनकार कर दिया कि उन्होंने निर्धारित समय-सीमा के बाद परीक्षा दी थी।
न्यायालय ने इस तर्क को खारिज कर दिया और विश्वविद्यालय को तुरंत छात्र का परिणाम जारी करने का आदेश दिया।
मामले की पृष्ठभूमि:
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छात्र का प्रवेश और परीक्षा प्रक्रिया:
- याचिकाकर्ता ने 2011-2014 BCA कोर्स में प्रवेश लिया और BNMU, मधेपुरा के तहत पूर्णिया कॉलेज, पूर्णिया से पढ़ाई की।
- अक्टूबर 2012 में आयोजित द्वितीय सेमेस्टर परीक्षा में उन्होंने भाग लिया, लेकिन एक विषय में फेल हो गए।
- इसके बावजूद, उन्होंने अपने चौथे और छठे सेमेस्टर की परीक्षाएं पूरी कर लीं।
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फेल विषय की पुनः परीक्षा और परीक्षा परिणाम का विवाद:
- फेल होने के बाद, याचिकाकर्ता ने 2016 में पुनः परीक्षा के लिए आवेदन किया, जिसे विश्वविद्यालय ने स्वीकार कर लिया और उन्हें प्रवेश पत्र भी जारी किया।
- उन्होंने 2017 में परीक्षा दी और पास भी हो गए।
- हालांकि, विश्वविद्यालय ने 2011-2014 सत्र के उनके अंतिम परीक्षा परिणाम को जारी करने से इनकार कर दिया, यह कहते हुए कि उन्होंने द्वितीय सेमेस्टर की परीक्षा देने में देरी की थी।
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विश्वविद्यालय प्रशासन का पक्ष:
- विश्वविद्यालय ने दावा किया कि याचिकाकर्ता ने परीक्षा नियमावली के अनुच्छेद IX (b) का उल्लंघन किया, जिसके तहत
- कोई भी छात्र यदि परीक्षा में फेल हो जाता है, तो उसे तीन वर्षों के भीतर अधिकतम दो बार परीक्षा में बैठने की अनुमति होती है।
- चूंकि याचिकाकर्ता ने 2016 में परीक्षा दी थी, जो तीन वर्ष की सीमा के बाहर थी, इसलिए विश्वविद्यालय ने परिणाम जारी करने से इनकार कर दिया।
- विश्वविद्यालय ने दावा किया कि याचिकाकर्ता ने परीक्षा नियमावली के अनुच्छेद IX (b) का उल्लंघन किया, जिसके तहत
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छात्र का पक्ष और न्यायालय की प्रतिक्रिया:
- याचिकाकर्ता का तर्क था कि अगर परीक्षा देने का अधिकार खत्म हो गया था, तो विश्वविद्यालय ने परीक्षा फॉर्म स्वीकार क्यों किया और प्रवेश पत्र क्यों जारी किया?
- न्यायालय ने पाया कि विश्वविद्यालय ने स्वयं प्रवेश पत्र जारी किया, परीक्षा आयोजित की, छात्र को परीक्षा में बैठने दिया और उसका परिणाम भी प्रकाशित किया।
- इसलिए, विश्वविद्यालय का यह दावा कि “परीक्षा की समय-सीमा समाप्त हो चुकी थी”, न्यायसंगत नहीं था।
न्यायालय का निर्णय:
पटना उच्च न्यायालय ने विश्वविद्यालय को निर्देश दिया कि वह तुरंत याचिकाकर्ता का BCA परीक्षा परिणाम प्रकाशित करे।
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मुख्य तर्क:
- न्यायालय ने सुप्रीम कोर्ट के पूर्व के फैसलों को आधार बनाते हुए कहा कि यदि कोई विश्वविद्यालय किसी छात्र को परीक्षा में बैठने की अनुमति देता है, तो वह बाद में परीक्षा परिणाम रोक नहीं सकता।
- Guru Nanak Dev University बनाम संजय कुमार कटवाल (2009) 1 SCC 610 और Shri Krishnan बनाम कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय (1976) 1 SCC 311 जैसे मामलों में सुप्रीम कोर्ट ने यही सिद्धांत लागू किया था।
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निष्कर्ष:
- यदि विश्वविद्यालय को समय-सीमा से बाहर परीक्षा नहीं लेनी थी, तो उसे आवेदन अस्वीकार करना चाहिए था।
- परीक्षा लेने और परिणाम रोकने का कोई कानूनी आधार नहीं था।
- इसलिए, विश्वविद्यालय को तत्काल छात्र का परिणाम प्रकाशित करने का आदेश दिया गया।
मामले का व्यापक प्रभाव:
यह मामला शिक्षण संस्थानों की लापरवाही और छात्रों के भविष्य पर इसके प्रभाव को उजागर करता है।
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विश्वविद्यालय प्रशासन की जवाबदेही:
- कोई भी विश्वविद्यालय या संस्थान छात्रों को परीक्षा में बैठने की अनुमति देने के बाद उनके परिणाम को रोक नहीं सकता।
- प्रशासन को अपने नियमों को पहले स्पष्ट करना चाहिए।
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छात्रों के अधिकार:
- यदि किसी छात्र को विश्वविद्यालय द्वारा परीक्षा में बैठने की अनुमति दी जाती है, तो उसका परिणाम प्रकाशित करना अनिवार्य है।
- छात्र अपने अधिकारों की रक्षा के लिए न्यायालय का दरवाजा खटखटा सकते हैं।
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शिक्षा प्रणाली में सुधार की आवश्यकता:
- उच्च शिक्षा प्रणाली को पारदर्शी और उत्तरदायी बनाया जाना चाहिए।
- छात्रों को ऐसी अनुचित प्रशासनिक देरी से बचाने के लिए स्पष्ट नियम और उचित मार्गदर्शन मिलना चाहिए।
पूरा
फैसला पढ़ने के लिए यहां
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https://patnahighcourt.gov.in/viewjudgment/MTUjMzE3NiMyMDIxIzEjTg==-cD4HUbc0T6Y=


