हत्या के प्रयास की सजा घटाकर गंभीर चोट — पटना उच्च न्यायालय, 2026

Sunita Kumari

Reviewed by: Sunita Kumari

License Number: BR/708/2009

Sunita Kumari is a lawyer based in Siwan and Chapra practicing family law. She represents clients in divorce proceedings, matrimonial disputes, and POCSO (Protection of Children from Sexual Offences) matters. Her practice handles family law litigation across the region, including matrimonial property issues, inheritance disputes, and matters involving vulnerable persons.

इस आपराधिक अपील में, पटना उच्च न्यायालय ने यह विचार किया कि गाँव के एक घर के अंदर हुआ हमला “हत्या का प्रयास” था या “गंभीर चोट पहुँचाना”। न्यायालय ने माना कि भारतीय दंड संहिता की धारा 307 सिद्ध नहीं हुई और दोषसिद्धि को घटाकर धारा 325 आईपीसी के तहत कर दिया। सजा को जेल में पहले से बिताई गई अवधि तक सीमित कर दिया गया। अपील आंशिक रूप से स्वीकार की गई और जमानत बॉन्ड से मुक्ति दे दी गई।

मामले की पृष्ठभूमि

मामला 25.08.2014 को लगभग शाम 4 बजे थाना गोविंदपुर, जिला नवादा, अंतर्गत गाँव धनपुरी की एक घटना से शुरू हुआ।

अभियोजन के अनुसार, सूचक की पत्नी और बेटी, अर्थात् कालो देवी और आशो देवी, गाँव के सरकारी हैंडपंप से पानी लेने गई थीं।

आरोप लगाया गया कि अपीलकर्ता वहाँ पहुँचा और उन्हें उस हैंडपंप से पानी लेने से रोक दिया।

अभियोजन ने आगे कहा कि हैंडपंप पर हुए इस झगड़े के बाद, अपीलकर्ता सूचक के घर में घुस गया।

घर के अंदर उसने कथित रूप से सूचक की बेटी आशो देवी के सिर पर टांगी (कुल्हाड़ी जैसे नुकीले हथियार) से प्रहार किया, जिससे उसे खून बहने वाली कटने की चोट लगी।

यह भी आरोप था कि उसने उस पर ईंट-पत्थर फेंके।

हमले के बाद सूचक अपनी घायल बेटी को स्थानीय थाने ले गया और अपना फर्दबयान दिया।

इस फर्दबयान के आधार पर गोविंदपुर थाना कांड संख्या 84/2014 भारतीय दंड संहिता की धाराओं 323, 324, 341, 448 और 307 के तहत दर्ज किया गया।

जांच के बाद पुलिस ने इन्हीं धाराओं में आरोपपत्र समर्पित किया। मजिस्ट्रेट ने संज्ञान लिया और विधिसम्मत प्रक्रिया के पश्चात मामला सत्र न्यायालय को प्रतिबद्ध कर दिया गया।

सत्र वाद को सत्र वाद संख्या 139/2015 के रूप में सत्र न्यायाधीश, नवादा, के समक्ष अंकित किया गया।

विचारण के बाद, 10.02.2016 के दोषसिद्धि निर्णय और 12.02.2016 के दंडादेश द्वारा सत्र न्यायाधीश ने अपीलकर्ता को आईपीसी की धाराओं 452 और 307 के तहत दोषी ठहराया।

धारा 452 आईपीसी (गृह-अनधिकार प्रवेश) के लिए, अपीलकर्ता को दो वर्ष के कठोर कारावास की सजा दी गई।

धारा 307 आईपीसी (हत्या का प्रयास) के लिए, उसे दस वर्ष के कठोर कारावास और 10,000/- रुपये अर्थदंड की सजा दी गई, अर्थदंड न देने पर छह माह के अतिरिक्त कठोर कारावास का प्रावधान रखा गया।

दोनों सजाएँ एकसाथ चलने का आदेश दिया गया।

इस दोषसिद्धि और सजा से आहत होकर अपीलकर्ता ने पटना उच्च न्यायालय में आपराधिक अपील (एसजे) संख्या 197/2016 दायर की।

न्यायालय ने क्या विचार किया और क्या निर्णय दिया

अपील की सुनवाई पटना उच्च न्यायालय के माननीय श्री न्यायमूर्ति प्रभात कुमार सिंह द्वारा की गई।

न्यायालय ने अपीलकर्ता के अधिवक्ता, राज्य के लिए एपीपी तथा सूचक के अधिवक्ता की दलीलें सुनीं।

पटना उच्च न्यायालय ने पहले विचारण के दौरान दर्ज साक्ष्यों पर ध्यान दिया।

अभियोजन ने कुल नौ गवाहों की परीक्षा कराई।

घायल बेटी आशो देवी को पी.डब्ल्यू.1 के रूप में पेश किया गया। उसकी माँ कालो देवी पी.डब्ल्यू.2 थीं।

घायल का भाई मुकेश राजवंशी पी.डब्ल्यू.3 था।

दोनों पक्षों का साझा पड़ोसी भोला यादव @ भोला प्रसाद यादव पी.डब्ल्यू.4 था।

इन सभी चारों गवाहों ने घटना के अभियोजन संस्करण का समर्थन किया।

डॉ. बसुदेव प्रसाद वर्मा, प्रभारी चिकित्सा पदाधिकारी, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र, गोविंदपुर, जिन्होंने चोट रिपोर्ट तैयार की, पी.डब्ल्यू.5 के रूप में उपस्थित हुए।

जमुना राजवंशी, सूचक का भाई, पी.डब्ल्यू.6 था।

रवि शंकर पासवान @ रवीनंदन पासवान, दोनों पक्षों का सहग्रामवासी, पी.डब्ल्यू.7 था।

पी.डब्ल्यू.6 और पी.डब्ल्यू.7 दोनों ने अभियोजन कथा की पुष्टि की।

जगदीश पासवान, पुलिस अवर निरीक्षक एवं अनुसंधान अधिकारी, को पी.डब्ल्यू.8 के रूप में परीक्षित किया गया। उन्होंने विभिन्न दस्तावेज साबित किए और आरोपपत्र समर्पित किया।

स्वयं सूचक को पी.डब्ल्यू.9 के रूप में पेश किया गया और उसने मुख्य-परीक्षा में अपने आरोपों का समर्थन किया।

अभियोजन ने कई दस्तावेज भी पेश किए।

इनमें घायल की चोट रिपोर्ट (प्रदर्श 1), पूरक चोट रिपोर्ट (प्रदर्श 1/1), लिखित रिपोर्ट पर थानाध्यक्ष की अनुशंसा (प्रदर्श 2), औपचारिक प्राथमिकी (प्रदर्श 3), चिकित्सकीय परीक्षण हेतु अनुरोध-पत्र (प्रदर्श 4), पीएमसीएच, पटना का बेड हेड टिकट (प्रदर्श 5) और पीएमसीएच, पटना का डिस्चार्ज टिकट (प्रदर्श 6) शामिल थे।

प्रतिरक्षा पक्ष से, एक प्रतिकर कांड की प्राथमिकी की प्रमाणित प्रति पेश की गई जिसे प्रदर्श ‘ए’ के रूप में चिह्नित किया गया।

इस साक्ष्य पर विचार करने के बाद, विचारण न्यायालय ने अपीलकर्ता को धाराओं 452 और 307 आईपीसी के तहत दोषी ठहराया था।

उच्च न्यायालय में, अपीलकर्ता के अधिवक्ता ने इस दोषसिद्धि को कई आधारों पर चुनौती दी।

पहले, उन्होंने कहा कि यदि पूरा अभियोजन कथन भी सच मान लिया जाए, तो भी धारा 307 आईपीसी (हत्या का प्रयास) के कानूनी अवयव पूरे नहीं होते।

उन्होंने इस ओर संकेत किया कि यह आरोप नहीं था कि अपीलकर्ता ने बार-बार घायल पर प्रहार किया।

उनके अनुसार, वर्णित कृत्य अधिक से अधिक धारा 325 आईपीसी के तहत आ सकता है, जो स्वेच्छा से गंभीर चोट पहुँचाने से संबंधित है।

दूसरे, उन्होंने कहा कि अभियोजन घटना के सटीक स्थल और प्रकार को सिद्ध करने में असफल रहा।

उन्होंने हमले के स्थान के संबंध में साक्ष्यों में आई विसंगतियों की ओर ध्यान दिलाया।

पी.डब्ल्यू.1 (घायल) के अनुसार, हमला आंगन में हुआ।

पी.डब्ल्यू.2 (उसकी माँ) ने कहा कि हमला घर के अंदर हुआ।

पी.डब्ल्यू.7 ने कहा कि हमला बरामदे में हुआ।

इस आधार पर, प्रतिरक्षा ने दलील दी कि घटना-स्थान ही ठोस रूप से स्थापित नहीं हो पाया।

यह भी कहा गया कि पी.डब्ल्यू.1, 2 और 4 के बयानों में घटना के प्रारंभ होने के तरीके को लेकर परस्पर विरोधाभास हैं।

इन दलीलों पर भरोसा करते हुए प्रतिरक्षा ने कहा कि दोषसिद्धि और सजा रद्द की जानी चाहिए।

दूसरी ओर, राज्य पक्ष के एपीपी और सूचक के अधिवक्ता ने अपील का विरोध किया।

उन्होंने कहा कि रिकॉर्ड पर मौजूद साक्ष्य अपीलकर्ता के अपराध को स्पष्ट रूप से दर्शाते हैं।

उनके अनुसार, अभियोजन गवाहों ने आरोपों को संदेह से परे सिद्ध कर दिया।

उन्होंने स्वीकार किया कि घटना के सटीक स्थान को लेकर कुछ मामूली विरोधाभास हैं, परन्तु यह तुच्छ हैं।

उनकी दृष्टि में, इस प्रकार की छोटी असंगतियाँ मानवीय गवाही में स्वाभाविक हैं और अभियोजन के मूल मामले को प्रभावित नहीं करतीं।

उन्होंने तर्क दिया कि विचारण न्यायालय ने अपीलकर्ता को धाराओं 452 और 307 आईपीसी के तहत सही रूप से दोषी ठहराया और उच्च न्यायालय को इसमें हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए।

दोनों पक्षों की दलीलें सुनने और अभिलेख पर उपलब्ध सामग्री की जाँच के बाद, पटना उच्च न्यायालय ने संतुलित दृष्टिकोण अपनाया।

न्यायालय ने अभियोजन की इस सामान्य बात से सहमति जताई कि अपीलकर्ता ही हमलावर था और घायल को वास्तव में उसके कृत्य से गंभीर सिर की चोट पहुँची।

हालाँकि, न्यायालय ने धारा 307 आईपीसी के बारे में प्रतिरक्षा के विशिष्ट कानूनी तर्क को स्वीकार किया।

न्यायालय ने उल्लेख किया कि यह आरोप नहीं था कि अपीलकर्ता ने सूचक की बेटी पर बार-बार प्रहार किया।

चोट की गंभीरता के बावजूद, न्यायालय ने देखा कि किसी मध्यवर्ती कारण का उल्लेख नहीं था, फिर भी सूचक की बेटी की जान अंततः बच गई।

इन परिस्थितियों में न्यायालय ने माना कि तथ्य धारा 307 आईपीसी के अंतर्गत “हत्या के प्रयास” को सिद्ध नहीं करते।

इसके बजाय, न्यायालय ने निष्कर्ष निकाला कि मामला स्पष्ट रूप से धारा 325 आईपीसी के अधीन आता है, जो स्वेच्छा से गंभीर चोट पहुँचाने से संबंधित है।

अत: उच्च न्यायालय ने धारा 307 आईपीसी के तहत दोषसिद्धि को बदलकर धारा 325 आईपीसी के तहत दोषसिद्धि करने का निर्णय लिया।

एक ही समय में, धारा 452 आईपीसी (गृह-अनधिकार प्रवेश) के तहत दोषसिद्धि बरकरार रखी गई।

सजा के प्रश्न पर, न्यायालय ने बीता हुआ समय और की गई हिरासत को ध्यान में रखा।

घटना वर्ष 2014 की थी। न्यायालय ने विशेष रूप से दर्ज किया कि इस प्राथमिकी के दर्ज होने के बाद से अपीलकर्ता के विरुद्ध कोई शिकायत नहीं हुई।

न्यायालय ने यह भी दर्ज किया कि अपीलकर्ता 26.08.2014 से हिरासत में रहा और उसे उच्च न्यायालय की समन्वय पीठ द्वारा 27.04.2016 को जमानत दी गई।

इस प्रकार वह लगभग एक वर्ष आठ माह की अवधि तक हिरासत में रह चुका था।

इन तथ्यों को ध्यान में रखते हुए न्यायालय ने सजा को अपीलकर्ता द्वारा पहले से भोगी गई अवधि तक घटा दिया।

अंततः, न्यायालय ने विचारण न्यायालय के दोषसिद्धि निर्णय और दंडादेश में संशोधन किया।

धाराओं 452 और 307 आईपीसी के तहत दोषसिद्धि और सजा के स्थान पर, अपीलकर्ता को धाराओं 452 और 325 आईपीसी के तहत दोषसिद्ध और दंडित माना गया, और सजा को पहले से भोगी गई अवधि तक सीमित किया गया।

इसके परिणामस्वरूप, इस मामले में अपीलकर्ता को उसके जमानत बॉन्ड की दायित्व से मुक्त कर दिया गया और अपील निपटाई गई।

यह निर्णय क्यों महत्वपूर्ण है

यह निर्णय मारपीट से संबंधित मामलों में आरोपितों और पीड़ितों दोनों के लिए महत्वपूर्ण है।

यह दर्शाता है कि पटना उच्च न्यायालय सावधानी से परखता है कि तथ्य वास्तव में “हत्या के प्रयास” के आरोप में आते हैं या “गंभीर चोट पहुँचाने” के दायरे में।

धारा 307 आईपीसी के अंतर्गत हत्या के प्रयास का आरोप बहुत कड़ी सजा और गंभीर सामाजिक कलंक लेकर आता है।

जब दोहराए गए या स्पष्ट रूप से जीवन-घातक हमले सिद्ध नहीं होते, तब दोषसिद्धि को धारा 325 आईपीसी में बदलकर न्यायालय यह सिद्धांत पुष्ट करता है कि दंड कृत्य की वास्तविक प्रकृति के अनुरूप ही होना चाहिए।

साथ ही, न्यायालय ने अपीलकर्ता को पूरी तरह मुक्त नहीं किया।

गृह-अनधिकार प्रवेश और गंभीर चोट पहुँचाने की दोषसिद्धि बरकरार रखी गई और उसने जो समय पहले ही जेल में बिताया, उसे ही पर्याप्त दंड माना गया, मामले की पुरानी तिथि और उसकी हिरासत अवधि को ध्यान में रखते हुए।

साधारण लोगों के लिए यह निर्णय यह रेखांकित करता है कि किसी के घर में जबरन घुसना और गंभीर चोट पहुँचाना, चाहे हत्या के प्रयास का सबसे ऊँचा आरोप सिद्ध न भी हो, फिर भी दोषसिद्धि का कारण बनेगा।

कानूनी प्रश्न और उनके उत्तर

  • प्रश्न: क्या मामले के तथ्यों के आधार पर अपीलकर्ता को धारा 307 आईपीसी (हत्या का प्रयास) के तहत दोषी ठहराया जाना उचित था?
    उत्तर: नहीं। पटना उच्च न्यायालय ने माना कि धारा 307 आईपीसी सिद्ध नहीं हुई क्योंकि बार-बार प्रहार का आरोप नहीं था और पीड़िता की जान बच गई; मामला धारा 325 आईपीसी (गंभीर चोट) के अंतर्गत आता है।
  • प्रश्न: विचारण न्यायालय द्वारा दी गई सजा में क्या संशोधन किया जाना चाहिए था, यदि कोई?
    उत्तर: दोषसिद्धि को धारा 307 से बदलकर धारा 325 आईपीसी कर दिया गया और सजा को अपीलकर्ता द्वारा भोगी जा चुकी हिरासत अवधि तक घटा दिया गया, जबकि धारा 452 आईपीसी के तहत दोषसिद्धि बरकरार रही।

न्यायालय द्वारा उद्धृत मामले

  • उद्धृत अंश के अनुसार, निर्णय में न्यायालय द्वारा किसी पूर्व वाद या नज़ीर का उल्लेख दर्ज नहीं है।

मामले का विवरण

मामला संख्या: आपराधिक अपील (एसजे) संख्या 197/2016; उत्पन्न गोविंदपुर थाना कांड संख्या 84/2014 (जी.आर. मामला संख्या 2388/2014); सत्र वाद संख्या 139/2015।

मामला शीर्षक: धर्मेंद्र राजवंशी बनाम द स्टेट ऑफ बिहार।

पीठ: माननीय श्री न्यायमूर्ति प्रभात कुमार सिंह।

उद्धरण: 2026(3) पीएलजेआर 604।

अधिवक्ता: अपीलकर्ता की ओर से – श्री शिवो कुमार प्रसाद, अधिवक्ता तथा श्री वकील कुमार, अधिवक्ता। राज्य की ओर से – श्री ए.एम.पी. मेहता, एपीपी। सूचक की ओर से – श्री राम प्रवेश कुमार, अधिवक्ता।

मामले का प्रकार: सत्र वाद में सत्र न्यायाधीश द्वारा पारित दोषसिद्धि निर्णय और दंडादेश के विरुद्ध आपराधिक अपील।

पटना उच्च न्यायालय के निर्णय की तिथि: 07.05.2026।

निर्णय का लिंक: पूरा पटना उच्च न्यायालय निर्णय पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।

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