मामले की पृष्ठभूमि
विवाद की शुरुआत सूचक के स्वामित्व वाली एक भूमि से हुई। उसने यह भूमि अपने मामा को व्यावसायिक प्रयोजन के लिए पट्टे पर दे रखी थी। जब उसके मामा का व्यापार ठीक नहीं चला, तो उन्होंने यह भूमि सह-आरोपी अभय कुमार सिंह को उपपट्टे पर दे दी, जिसने उसी भूमि पर एक धान मिल स्थापित की।
जनवरी 2013 में, एफआईआर के अनुसार, अभय कुमार सिंह सूचक के मामा के पास गया और मूल भूमि बंदोबस्ती पत्र (डीड) की माँग की। उसने कहा कि उसे भूमि की सीमा, क्षेत्रफल और विवरण की जाँच के लिए इसकी आवश्यकता है। मूल भूमि डीड, जिसे पहले सूचक ने अपने पिता को दिया था और फिर उसके बाद वह अभय कुमार सिंह को दे दी गई थी, कथित रूप से कभी वापस नहीं की गई।
बाद में सूचक को यह जानकारी मिली कि अभय कुमार सिंह ने, वर्तमान याचिकाकर्ता के साथ साँठगाँठ करके, उसकी भूमि का उपयोग बिहार राज्य खाद्य एवं उपभोक्ता संरक्षण निगम से 35 लाख रुपये मूल्य का धान आपूर्ति अनुबंध प्राप्त करने के लिए किया है। आरोप यह था कि यह सब धन की हेराफेरी करने और अंततः उसकी भूमि बिकवा देने के उद्देश्य से किया गया।
संबंधित समय पर, याचिकाकर्ता बिहार राज्य खाद्य एवं उपभोक्ता संरक्षण निगम, भागलपुर में जिला प्रबंधक के पद पर पदस्थापित था। सूचक द्वारा दर्ज कराई गई लिखित सूचना के आधार पर भागलपुर (आदमपुर) थाना कांड संख्या 924 of 2014 दिनांक 13.12.2014 दर्ज की गई, जिसमें भारतीय दंड संहिता की धारा 420, 467, 471 एवं 120-बी के तहत अपराध अंकित किए गए।
इस एफआईआर से पूर्व, इसी भूमि लेनदेन के संबंध में एक अन्य मामला पहले ही सूचक के मामा जवाहर लाल मंडल द्वारा सुल्तानगंज थाना कांड संख्या 284 of 2014 के रूप में दर्ज कराया जा चुका था। उस पूर्ववर्ती एफआईआर में केवल अभय कुमार सिंह का नाम था, यद्यपि उसे अन्य लोगों की भी संलिप्तता होने का संदेह था।
याचिकाकर्ता ने पहले वर्तमान एफआईआर को निरस्त करने के लिए पटना उच्च न्यायालय में Cr. Misc. No.11396 of 2015 दायर किया, यह कहते हुए कि यह वही घटना होने के बावजूद दूसरी एफआईआर है। 06.02.2018 को उच्च न्यायालय ने वह याचिका खारिज कर दी। याचिकाकर्ता ने सर्वोच्च न्यायालय में Special Leave Petition (Crl.) Diary No.30123 of 2018 दायर की। 07.09.2018 को सर्वोच्च न्यायालय ने वह एसएलपी भी खारिज कर दी।
न्यायालय ने क्या-क्या जाँचा और क्या निर्णय दिया
वर्तमान Criminal Miscellaneous No.22744 of 2025 में, याचिकाकर्ता ने पुनः भागलपुर (आदमपुर) थाना कांड संख्या 924 of 2014 को निरस्त करने का अनुरोध किया। इस बार उसने बदली हुई परिस्थितियों पर भरोसा किया। मुख्य आधार थे: जाँच में अत्यधिक देरी और बाद में पुलिस द्वारा यह निष्कर्ष देना कि उसके फँसाए जाने में “कानून की भूल” हुई है।
याचिकाकर्ता के अधिवक्ता श्री नीलांजन चटर्जी ने तर्क दिया कि एफआईआर दर्ज होने के लगभग ग्यारह वर्ष बीत जाने के बाद भी याचिकाकर्ता के विरुद्ध आरोप-पत्र दायर नहीं किया गया। इस याचिका की लंबितावस्था के दौरान उसे पता चला कि वास्तव में जाँच पहले ही पूरी हो चुकी है और उसे अभियोजन के लिए प्रेषित (sent up) ही नहीं किया गया।
इस दावे पर संज्ञान लेते हुए न्यायालय ने 09.04.2025 को वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक, भागलपुर को जाँच की स्थिति के संबंध में प्रत्युत्तर हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया। एसएसपी के 19.04.2025 दिनांकित प्रत्युत्तर हलफनामे में कहा गया कि Final Form No.110 of 2020 दिनांक 09.04.2020 याचिकाकर्ता के संदर्भ में “mistake of law” (विदि की भूल) के रूप में समर्पित की गई है।
प्रतिवेदन में आगे स्पष्ट किया गया कि उसी घटना के लिए सुल्तानगंज थाना कांड संख्या 284 of 2014 को धारा 420, 406, 467, 468, 469 एवं 471 IPC के तहत दर्ज किया गया था। उस सुल्तानगंज मामले में Charge Sheet/Final Form No.34 of 2015 पहले ही न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत की जा चुकी थी। अतः जोगसर थाना कांड संख्या 924 of 2024 (पूर्व में भागलपुर कोतवाली (आदमपुर) थाना कांड संख्या 924 of 2014) में याचिकाकर्ता के विरुद्ध अंतिम प्रतिवेदन “mistake of law” के रूप में समर्पित कर जाँच बंद कर दी गई।
न्यायालय ने पहले यह जाँचा कि पूर्ववर्ती निरस्तीकरण याचिका के खारिज हो जाने और एसएलपी के अस्वीकार होने के बाद, दूसरी निरस्तीकरण याचिका पोषनीय (maintainable) है या नहीं। इसके लिए याचिकाकर्ता ने सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय Superintendent and Remembrancer of Legal Affairs, West Bengal v. Mohan Singh तथा Vinod Kumar, IAS v. Union of India & Ors. पर भरोसा किया। सर्वोच्च न्यायालय ने यह माना था कि धारा 482 CrPC के तहत पूर्व में की गई याचिका की अस्वीकृति, बाद की याचिका पर रोक नहीं लगाती यदि नए तथ्य या बदली हुई परिस्थितियाँ इसे उचित ठहराती हों।
पटना उच्च न्यायालय ने इस विधिक स्थिति को स्वीकार किया। उसने कहा कि बदली हुई परिस्थितियों, जैसे लम्बी देरी और “कानून की भूल” दर्शाने वाले अंतिम प्रतिवेदन के प्रकाश में, दूसरी निरस्तीकरण याचिका की पोषनीयता पर कोई संदेह नहीं है।
देरी के प्रश्न पर, याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने Pankaj Kumar v. State of Maharashtra & Ors. का भी हवाला दिया, जिसमें सर्वोच्च न्यायालय ने जाँच और विचारण में अत्यधिक देरी को, शीघ्र जाँच एवं शीघ्र विचारण के अधिकार के उल्लंघन के रूप में देखते हुए, आपराधिक कार्यवाही को निरस्त कर दिया था। पटना उच्च न्यायालय ने पंकज कुमार के पैरा 25–28 को उद्धृत करते हुए रेखांकित किया कि बिना स्पष्टीकरण के लम्बे समय तक जाँच लंबित रहने पर भी निरस्तीकरण उचित हो सकता है।
न्यायालय ने नोट किया कि याचिकाकर्ता लगभग 15 वर्षों से आपराधिक मामले के दबाव का सामना कर रहा था। उसने यह भी देखा कि 2020 में अंतिम प्रतिवेदन समर्पित होने के बावजूद न्यायालय में कोई आगे की कार्यवाही नहीं हुई और याचिकाकर्ता लगातार आपराधिक अभियोजन के मानसिक आघात से जूझता रहा।
इसके बाद न्यायालय ने स्वयं एफआईआर और प्रत्युत्तर हलफनामे में संदर्भित सामग्री का परीक्षण किया। एफआईआर में आरोप था कि निगम के जिला प्रबंधक के रूप में याचिकाकर्ता ने अभय कुमार सिंह के साथ मिलकर सूचक की भूमि को 35 लाख रुपये मूल्य के सरकारी धान आपूर्ति अनुबंध के लिए सुरक्षा (बंधक) के रूप में गिरवी रखा। सूचक का कहना था कि दस्तावेज़ उसकी वास्तविक सहमति के बिना तैयार किए गए और उसकी भूमि का उपयोग सरकारी धन प्राप्त करने के लिए किया गया।
हालाँकि न्यायालय ने कुछ महत्त्वपूर्ण पहलुओं पर बल दिया। उसने पाया कि याचिकाकर्ता के विरुद्ध आरोप मूलतः उसके जिला प्रबंधक पद पर आसीन होने के कारण उत्पन्न संदेह पर आधारित हैं। यह भी उल्लेख किया कि स्वयं सूचक ने निगम के समक्ष अपनी भूमि के बंधक के संबंध में हलफनामा दाखिल किया था। न्यायालय ने एसएसपी के प्रत्युत्तर हलफनामे का उल्लेख करते हुए यह रेखांकित किया कि एक ही घटना के लिए दो एफआईआर दर्ज हुईं — एक मामा द्वारा, और दूसरी बाद में सूचक द्वारा, जब उसके विरुद्ध प्रमाण-पत्र (certificate) की कार्यवाही आरंभ हो चुकी थी।
मामा द्वारा दर्ज पूर्ववर्ती एफआईआर में याचिकाकर्ता का नाम नहीं था। बाद में सूचक द्वारा दर्ज एफआईआर में उसका नाम जोड़ा गया, परन्तु पुलिस ने पूर्ण जाँच के बाद यह निष्कर्ष निकाला कि जहाँ तक याचिकाकर्ता का प्रश्न है, वहाँ “कानून की भूल” (mistake of law) हुई है। इसी आधार पर Final Form No.110 of 2020 उसके विरुद्ध समर्पित की गई।
इसके बाद न्यायालय ने सर्वोच्च न्यायालय के State of Haryana v. Bhajan Lal निर्णय में प्रतिपादित सिद्धांतों की ओर रुख किया, विशेष रूप से पैरा 102 में उल्लिखित वे उदाहरणात्मक श्रेणियाँ, जिनमें धारा 482 CrPC के अंतर्गत अंतर्निहित (inherent) अधिकारों का प्रयोग कर आपराधिक कार्यवाही निरस्त की जा सकती है। इनमें शामिल हैं:
- जहाँ एफआईआर के आरोपों को यथावत मान भी लिया जाए, तब भी वे आरोपी के विरुद्ध किसी अपराध का गठन न करते हों।
- जहाँ अनविवादित आरोप और साक्ष्य किसी अपराध के घटित होने को उजागर न करते हों।
- जहाँ आरोप इतने असंगत या अविश्वसनीय हों कि कोई भी समझदार व्यक्ति आगे कार्यवाही करने की सोच भी न सके।
- जहाँ कार्यवाही दुर्भावना से प्रेरित हो या किसी परोक्ष उद्देश्य से आरंभ की गई हो।
इन सिद्धांतों को लागू करते हुए न्यायालय ने माना कि एफआईआर के आरोपों को समग्र रूप से स्वीकार करने और साथ‑साथ याचिकाकर्ता के विरुद्ध मामले को “कानून की भूल” मानते हुए दायर अंतिम प्रतिवेदन को देखते हुए, उसके विरुद्ध कोई प्रथमदृष्टया संज्ञेय अपराध बनता ही नहीं है। केवल उसके पदनाम और सरकारी कृत्यों के आधार पर उत्पन्न संदेह, उस स्थिति में, जब जाँच एजेंसी स्वयं अभियोजन का कोई वैध आधार न पाती हो, आपराधिक मामला जारी रखने के लिए पर्याप्त नहीं है।
न्यायालय ने यह भी ध्यान में रखा कि एक ही व्यापक घटना के लिए दो एफआईआर दर्ज हुईं और मामा द्वारा दर्ज पूर्ववर्ती एफआईआर में पहले ही आरोपपत्र समर्पित हो चुका था। इससे पुलिस द्वारा बाद वाली एफआईआर में याचिकाकर्ता के विरुद्ध मामले को “कानून की भूल” मानते हुए बंद करने के निर्णय को बल मिला।
इस पृष्ठभूमि में, और लंबित आपराधिक मामले के कारण याचिकाकर्ता को हुए दीर्घकालिक मानसिक आघात को ध्यान में रखते हुए, न्यायालय ने निष्कर्ष निकाला कि न्याय के हित में अपने अंतर्निहित अधिकारों के प्रयोग के लिए यह उपयुक्त मामला है।
तदनुसार पटना उच्च न्यायालय ने भागलपुर (आदमपुर) थाना कांड संख्या 924 of 2014 दिनांक 13.12.2014 तथा उससे उत्पन्न सभी परिणामी कार्यवाहियों को, जहाँ तक वे याचिकाकर्ता से संबंधित हैं, निरस्त एवं अपस्त कर दिया। निरस्तीकरण “qua petitioner” था, अर्थात यह केवल उसके संबंध में लागू होगा, अन्य आरोपितों के लिए अनिवार्य रूप से नहीं।
इसके साथ ही वर्तमान निरस्तीकरण याचिका स्वीकार कर ली गई। न्यायालय ने यह निर्देश भी दिया कि निर्णय की प्रति संबंधित न्यायालय को बिना विलंब भेजी जाए।
यह निर्णय क्यों महत्त्वपूर्ण है
यह निर्णय उन लोगों के लिए महत्त्वपूर्ण है, जिन्हें केवल उनके आधिकारिक पद की वजह से, विशेषकर सरकारी या सार्वजनिक उपक्रमों में कार्यरत होने के कारण, आपराधिक मामलों में नामजद कर दिया जाता है। यह दर्शाता है कि यदि बाद में पुलिस स्वयं अंतिम प्रतिवेदन दाखिल कर यह कहे कि किसी व्यक्ति को फँसाने में “कानून की भूल” हुई थी, तो उच्च न्यायालय आगे बढ़कर उस व्यक्ति के विरुद्ध मामला बंद कर सकता है।
यह भी स्पष्ट करता है कि किसी व्यक्ति को बिना स्पष्ट साक्ष्य के वर्षों‑वर्ष तक आपराधिक विचारण के भय में नहीं रखा जा सकता। जाँच में लम्बी, बिना स्पष्टीकरण देरी और केवल संदेह‑आधारित या कमज़ोर आरोप मिलकर, उपयुक्त परिस्थितियों में, मामले के निरस्तीकरण का आधार बन सकते हैं।
सूचकों और पुलिस के लिए यह निर्णय इस बात पर भी बल देता है कि केवल पद के आधार पर, और एफआईआर में उनके विरुद्ध ठोस कृत्यों का उल्लेख किए बिना, लोक सेवकों को अभियुक्त के रूप में नामित करने में अत्यधिक सावधानी बरतनी चाहिए।
विधिक प्रश्न और उनके उत्तर
- प्रश्न: क्या धारा 482 CrPC के अंतर्गत, पूर्ववर्ती निरस्तीकरण याचिका और एसएलपी के खारिज होने के बाद, एफआईआर को निरस्त कराने के लिए दूसरी याचिका दायर की जा सकती है?
उत्तर: हाँ। पटना उच्च न्यायालय ने सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों पर भरोसा करते हुए माना कि बदली हुई परिस्थितियों या नए तथ्यों, जैसे बाद में दायर पुलिस के अंतिम प्रतिवेदन, की स्थिति में दूसरी याचिका पोषनीय है। - प्रश्न: क्या याचिकाकर्ता के विरुद्ध भागलपुर (आदमपुर) थाना कांड संख्या 924 of 2014 में आपराधिक कार्यवाही को जारी रखना विधि सम्मत था?
उत्तर: नहीं। पुलिस द्वारा मामले को “mistake of law” मानते हुए दिया गया अंतिम प्रतिवेदन, लम्बी देरी और आरोपों के स्वरूप को देखते हुए न्यायालय ने माना कि याचिकाकर्ता के विरुद्ध कोई संज्ञेय अपराध नहीं बनता और उसके विरुद्ध एफआईआर तथा सभी परिणामी कार्यवाही को निरस्त कर दिया। - प्रश्न: क्या जाँच में अत्यधिक और बिना स्पष्टीकरण देरी, अभियुक्त के शीघ्र जाँच एवं शीघ्र विचारण के अधिकार को प्रभावित करती है?
उत्तर: हाँ। Pankaj Kumar के संदर्भ में न्यायालय ने यह मान्यता दी कि जाँच में अनावश्यक एवं लम्बी देरी, संवैधानिक रूप से संरक्षित शीघ्र जाँच एवं शीघ्र विचारण के अधिकार का उल्लंघन कर सकती है और उपयुक्त मामलों में निरस्तीकरण का आधार बन सकती है।
न्यायालय द्वारा उद्धृत मामले
- Pankaj Kumar v. State of Maharashtra & Ors., (2008) 16 SCC 117
- Superintendent and Remembrancer of Legal Affairs, West Bengal v. Mohan Singh & Ors., (1975) 3 SCC 706
- Vinod Kumar, IAS v. Union of India & Ors., Live Law 2021 SC 281 (order quoted)
- State of Haryana v. Bhajan Lal & Ors., 1992 Supp (1) SCC 335
- Amit Bhai Anil Chandra Shah v. Central Bureau of Investigation & Anr., (2013) 6 SCC 348 (referred in earlier 2018 order)
मामले का विवरण
मामला संख्या: Criminal Miscellaneous No.22744 of 2025 (arising out of P.S. Case No.924 of 2014, Bhagalpur Kotwali (Adampur), District Bhagalpur)
मामला शीर्षक: Shovendra Kumar Chaudhary @ Shobhendra Kumar Chaudhary v. The State of Bihar & Anr.
पीठ (Coram): माननीय न्यायमूर्ति श्री चन्द्र शेखर झा
Citation: 2025(3) PLJR 147
अधिवक्ता:
याचिकाकर्ता की ओर से: श्री नीलांजन चटर्जी, अधिवक्ता; श्री उज्ज्वल राज, अधिवक्ता; श्री साहिल कुमार, अधिवक्ता
राज्य/प्रतिवादी की ओर से: श्री अनिल कुमार सिंह संख्या‑1, APP
मामले का स्वरूप: धारा 482 CrPC के अंतर्गत दायर याचिका, जिसमें एफआईआर एवं उससे उत्पन्न आपराधिक कार्यवाहियों के निरस्तीकरण की प्रार्थना की गई।
निर्णय की लिंक:https://patnahighcourt.gov.in/viewjudgment/NiMyMjc0NCMyMDI1IzEjTg==-avbedSUHVMc=
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कि बिहार में कानूनी विकास आपके अधिकारों को किस प्रकार प्रभावित कर सकते हैं,
तो आप आगे की जानकारी के लिए Samvida Law Associates को फ़ॉलो करने पर विचार कर सकते हैं।


