त्रुटिपूर्ण विभागीय जाँच के कारण पेंशन कटौती का आदेश निरस्त — पटना उच्च न्यायालय, 2023

पटना उच्च न्यायालय ने सेवानिवृत्त जूनियर इंजीनियर की पेंशन में कटौती तथा उनकी ग्रेच्युटी रोके जाने की सजा को निरस्त कर दिया। न्यायालय ने माना कि विभागीय जाँच बिहार सीसीए नियमावली, 2005 के अनुसार नहीं की गई थी। मामले को नई विभागीय जाँच के लिए वापस भेज दिया गया है। पेंशन और ग्रेच्युटी पर अंतिम निर्णय केवल उसी जाँच के पूर्ण होने के बाद लिया जाएगा।

मामले की पृष्ठभूमि

अपीलकर्ता राज्य बिहार के पथ निर्माण विभाग में जूनियर इंजीनियर के पद पर कार्यरत थे। 28.05.2006 को उनके विरुद्ध आरोप-पत्र तैयार कर विभागीय कार्यवाही आरंभ की गई। मुख्य आरोप राज्य कोष से 93,00,000/- (तिरानवे लाख रुपये) के गबन से संबंधित था।

अपीलकर्ता ने आरोप-पत्र के जवाब में अपना स्पष्टीकरण दाखिल कर आरोपों से इंकार किया। अनुशासनिक प्राधिकारी इस स्पष्टीकरण से संतुष्ट नहीं हुआ और औपचारिक जाँच कराने का निर्णय लिया। कार्यवाही संचालित करने के लिए एक जाँच अधिकारी तथा एक प्रस्तुतिकरण अधिकारी नियुक्त किए गए।

06.02.2007 को जाँच अधिकारी ने अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की, जिसमें अपीलकर्ता के विरुद्ध आरोपों को सिद्ध ठहराया गया। इस रिपोर्ट के आधार पर अनुशासनिक प्राधिकारी ने 08.03.2007 को दूसरी कारण बताओ सूचना जारी की और उसके साथ जाँच रिपोर्ट भी संलग्न की। अपीलकर्ता ने 08.04.2007 को इस दूसरी कारण बताओ सूचना तथा जाँच रिपोर्ट का उत्तर दिया।

इसी बीच, अपीलकर्ता अधिवर्षिता आयु प्राप्त कर 30.09.2007 को सेवा से सेवानिवृत्त हो गए। चूँकि वे विभागीय कार्यवाही लंबित रहते हुए सेवानिवृत्त हुए थे, राज्य सरकार ने 25.03.2008 को लंबित कार्यवाही को बिहार पेंशन नियमावली के नियम 43(b) के अंतर्गत कार्यवाही में परिवर्तित कर दिया। यह प्रावधान राज्य को सेवानिवृत्त कर्मचारियों के विरुद्ध पेंशन और ग्रेच्युटी के संदर्भ में कार्यवाही करने की अनुमति देता है।

इसके बाद, 11.03.2010 दिनांकित कारण बताओ सूचना अपीलकर्ता को जारी की गई, जिसमें पेंशन में कटौती तथा ग्रेच्युटी रोके जाने का प्रस्ताव रखा गया था। अपीलकर्ता ने 09.04.2010 को अपना उत्तर दाखिल किया।

02.07.2010 को सक्षम प्राधिकारी ने पेंशन में कटौती और ग्रेच्युटी रोके जाने की दंडात्मक आदेश पारित किया। इससे आहत होकर अपीलकर्ता ने 16.04.2010 को अभ्यावेदन/स्मारक प्रस्तुत किया। यह अभ्यावेदन 10.08.2010 को अस्वीकृत कर दिया गया।

इसके पश्चात अपीलकर्ता ने पटना उच्च न्यायालय में सिविल रिट अधिकारिता वाद संख्या 14330 सन् 2010 दायर कर दंड आदेश तथा संबंधित कार्रवाइयों को चुनौती दी। माननीय एकल पीठ ने 16.08.2018 के आदेश द्वारा उक्त रिट याचिका खारिज कर दी।

उस खारिजी आदेश के विरुद्ध अपीलकर्ता ने पटना उच्च न्यायालय की खंडपीठ के समक्ष वर्तमान लेटर्स पेटेंट अपील (एल.पी.ए. संख्या 1347 सन् 2018) दायर की।

न्यायालय ने क्या परखा और क्या निर्णय लिया

लेटर्स पेटेंट अपील में अपीलकर्ता ने मुख्य रूप से विभागीय जाँच की वैधता तथा दंड की सूचना देने वाले प्राधिकारी की क्षमता को चुनौती दी। माननीय श्री न्यायमूर्ति पी. बी. बजंथरी एवं माननीय श्री न्यायमूर्ति अरुण कुमार झा की खंडपीठ ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनीं और अभिलेखों का परीक्षण किया।

सबसे पहले, अपीलकर्ता ने यह तर्क दिया कि दंडादेश एक अक्षम प्राधिकारी, अर्थात मुख्य अभियंता, द्वारा पारित किया गया, अतः वह अवैध है। खंडपीठ ने ध्यान दिया कि इस बिंदु पर पहले ही आधिकारिक अभिलेखों के साथ विचार किया जा चुका था।

उन अभिलेखों से यह तथ्य सामने आया कि पेंशन में कटौती और ग्रेच्युटी रोके जाने की सजा देने का निर्णय स्वयं राज्य सरकार ने लिया था। मुख्य अभियंता ने केवल इस निर्णय की सूचना प्रेषित की थी। अतः न्यायालय ने माना कि प्राधिकारी की अक्षमता संबंधी आपत्ति स्वीकार नहीं की जा सकती। इस सीमित मुद्दे पर अपीलकर्ता असफल रहा।

अपीलकर्ता की दूसरी और अधिक महत्वपूर्ण दलील बिहार सीसीए नियमावली, 2005 के नियम 17 के अंतर्गत विभागीय जाँच की प्रक्रिया से संबंधित थी। अपीलकर्ता ने यह बातें रेखांकित कीं कि:

(1) आरोप-पत्र के साथ केवल एक ही दस्तावेज साक्ष्य के रूप में उल्लेखित किया गया। गवाहों की कोई सूची उपलब्ध नहीं कराई गई।

(2) जाँच के दौरान प्रस्तुतिकरण अधिकारी ने आरोप सिद्ध करने के लिए केवल उसी एक दस्तावेज पर भरोसा किया।

(3) किसी भी गवाह, विशेष रूप से उस दस्तावेज के लेखक, की जाँच नहीं की गई और न ही उसे जिरह के लिए प्रस्तुत किया गया।

इस प्रकार अपीलकर्ता ने दावा किया कि जाँच, नियम 17 के विभिन्न उप-नियमों तथा संबद्ध प्रावधानों में निर्धारित प्रक्रिया के अनुरूप नहीं की गई। सरल शब्दों में शिकायत यह थी कि आरोप को विधिक रूप से आवश्यक तरीके से कभी सही अर्थों में साबित ही नहीं किया गया।

दूसरी ओर, प्रतिवादियों (राज्य तथा विभागीय प्राधिकारी) की ओर से अधिवक्ताओं ने तर्क दिया कि जाँच सीसीए नियमों के अनुरूप की गई। उनका कहना था कि एकमात्र उद्धृत दस्तावेज ही आरोप साबित करने के लिए पर्याप्त था और जाँच अधिकारी ने सही रूप से आरोप सिद्ध माना। अतः उनके अनुसार न तो दंडादेश में कोई दोष था और न ही माननीय एकल पीठ के आदेश में।

खंडपीठ ने अपील में “मूल प्रश्न” यह निर्धारित किया कि क्या अपीलकर्ता के विरुद्ध विभागीय जाँच बिहार सीसीए नियमावली, 2005 के नियम 17 एवं अन्य संबद्ध प्रावधानों के अनुसार की गई थी या नहीं।

पीठ ने कुछ निर्विवाद तथ्य नोट किए:

(i) आरोप-पत्र के साथ केवल एक ही दस्तावेज उद्धृत था।

(ii) अपीलकर्ता को गवाहों की कोई सूची उपलब्ध नहीं कराई गई।

(iii) जाँच के दौरान प्रस्तुतिकरण अधिकारी ने केवल उसी दस्तावेज पर भरोसा किया।

न्यायालय ने माना कि ऐसी प्रक्रिया सीसीए नियमावली, 2005 के नियम 17 के विभिन्न उप-नियमों के प्रतिकूल है। अनुशासनिक प्राधिकारी तथा जाँच अधिकारी इन अनिवार्य प्रावधानों का पालन करने में विफल रहे।

इस निष्कर्ष के समर्थन में न्यायालय ने सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय Roop Singh Negi vs. Punjab National Bank and Ors., (2009) 2 SCC 570 पर भरोसा किया। उस मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने यह सिद्धांत स्थापित किया था कि जहाँ विभागीय जाँच में प्रस्तुतिकरण अधिकारी किसी दस्तावेज पर आरोप सिद्ध करने के लिए निर्भर करता है, वहाँ उस दस्तावेज के लेखक की जाँच किया जाना आवश्यक है तथा delinquent employee को उस लेखक से जिरह का अवसर मिलना चाहिए।

चूँकि वर्तमान मामले में किसी भी ऐसे गवाह की जाँच नहीं की गई और केवल दस्तावेज ही रखा गया, इसलिए न्यायालय ने इसे स्थापित विधिक आवश्यकता का उल्लंघन माना। इसी आधार पर खंडपीठ ने निर्णय दिया कि अपीलकर्ता ने दंडादेश तथा उसे बरकरार रखने वाले माननीय एकल पीठ के आदेश में हस्तक्षेप के लिए प्रथमदृष्टया मामला बना लिया है।

तदनुसार, न्यायालय ने निम्न आदेशों को निरस्त कर दिया:

(a) पेंशन में कटौती और ग्रेच्युटी रोके जाने से संबंधित 10.08.2010 को संप्रेषित दंडादेश; तथा

(b) सिविल रिट अधिकारिता वाद संख्या 14330 सन् 2010 में माननीय एकल पीठ का 16.08.2018 दिनांकित आदेश।

हालाँकि, न्यायालय ने अपीलकर्ता को पूर्णरूपेण क्लीन चिट नहीं दी। उसने यह उल्लेख किया कि आरोपों में 93,00,000/- रुपये की बड़ी सार्वजनिक राशि के कथित गबन का प्रश्न शामिल है। इस गंभीरता को देखते हुए न्यायालय ने माना कि यह पुनर्विचार (रीमांड) के लिए उपयुक्त मामला है और इसके लिए सर्वोच्च न्यायालय के निम्नलिखित निर्णयों पर भरोसा किया:

(i) Managing Director, ECIL v. B. Karunakar, (1993) 4 SCC 727; तथा

(ii) Chairman-cum-Managing Director, Coal India Limited & Ors. v. Ananta Saha and Others, (2011) 5 SCC 142 (पैरा 46 से 50)।

Ananta Saha मामले से विस्तृत उद्धरण करते हुए खंडपीठ ने यह सिद्धांत रेखांकित किया कि जहाँ अनुशासनिक मामले में दंड केवल तकनीकी आधारों पर निरस्त किया जाता है, वहाँ सामान्यतः उपयुक्त तरीका यह है कि नियोक्ता को उस स्तर से पुनः जाँच करने का अवसर दिया जाए जहाँ से कार्यवाही दोषपूर्ण हुई थी।

सर्वोच्च न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया था कि ऐसे मामलों में:

– नई जाँच का परिणाम पूर्ववर्ती सेवा-समापन या दंड की तिथि से प्रभावी माना जाता है।

– delinquent कर्मचारी को पुनः नियुक्त कर (या समुचित रूप से मानकर) ताज़ा जाँच के लिए निलंबित किया जा सकता है और उसे निर्वाह भत्ता दिया जा सकता है, किन्तु बकाया वेतन का अधिकार स्वतःस्फूर्त नहीं होता।

– बकाया वेतन तथा अन्य परिणामी लाभ विवेकाधीन होते हैं और इन्हें नई जाँच के बाद अनुशासनिक प्राधिकारी द्वारा न्याय, समता और सद्विवेक को ध्यान में रखते हुए तय किया जाना है।

इन सिद्धांतों को लागू करते हुए, पटना उच्च न्यायालय ने विभागीय जाँच को अनुशासनिक प्राधिकारी के पास निम्न निर्देशों के साथ पुनर्विचार हेतु वापस भेज दिया:

(1) अनुशासनिक प्राधिकारी विधि के अनुरूप नई जाँच प्रारंभ करेगा।

(2) नई जाँच उच्च न्यायालय के आदेश की प्राप्ति की तिथि से चार महीने के भीतर पूर्ण की जाएगी।

(3) अपीलकर्ता जाँच में सहयोग करेगा।

पेंशन और ग्रेच्युटी के संबंध में न्यायालय ने निर्णय दिया कि रोकी गई पेंशन राशि और ग्रेच्युटी राशि के संबंध में निर्णय, पुनर्विचारित विभागीय जाँच में अंतिम आदेश पारित होने के बाद ही, अनुशासनिक प्राधिकारी/राज्य सरकार द्वारा लिया जाएगा।

न्यायालय ने आगे यह भी निर्देश दिया कि:

– विभागीय जाँच में अंतिम आदेश पारित होने के बाद, उस तिथि से चार सप्ताह के भीतर, अनुशासनिक प्राधिकारी/राज्य सरकार अपीलकर्ता को देय पेंशन तथा अन्य पेंशनरी लाभों का विनियमन करेगा।

– इस संबंध में एक “वक्तव्यपूर्ण आदेश” (कारणयुक्त आदेश) पारित कर अपीलकर्ता को सूचित किया जाएगा।

– यदि अपीलकर्ता किसी मौद्रिक लाभ का हकदार पाया जाता है, तो उन लाभों की गणना कर विभागीय जाँच के अंतिम आदेश की तिथि से दो महीने के भीतर भुगतान कर दिया जाएगा।

इन टिप्पणियों और निर्देशों के साथ लेटर्स पेटेंट अपील स्वीकार की गई।

यह निर्णय क्यों महत्वपूर्ण है

यह निर्णय विभागीय कार्यवाही का सामना कर रहे सरकारी कर्मचारियों और पेंशनभोगियों, विशेष रूप से बिहार में, के लिए महत्वपूर्ण है। पटना उच्च न्यायालय ने स्पष्ट रूप से कहा कि किसी कर्मचारी को केवल एक दस्तावेज के आधार पर, बिना उसके लेखक की जाँच किए, दंडित नहीं किया जा सकता और न ही उसकी पेंशन तथा ग्रेच्युटी काटी जा सकती है।

कर्मचारियों के लिए इसका अर्थ यह है कि यदि विभाग उनके विरुद्ध किसी दस्तावेज का उपयोग करना चाहता है, तो उसे ऐसा गवाह भी प्रस्तुत करना होगा जो उस दस्तावेज के बारे में साक्ष्य दे सके और जिरह का सामना कर सके। यदि ऐसा नहीं किया जाता, तो जाँच को बिहार सीसीए नियमावली, 2005 तथा सर्वोच्च न्यायालय द्वारा स्थापित सिद्धांतों के उल्लंघन के कारण निरस्त किया जा सकता है।

साथ ही, न्यायालय ने गंभीर आरोपों, जैसे बड़े पैमाने पर गबन, के मामलों में नियोक्ता का दरवाज़ा बंद नहीं किया। इसके बजाय, उसने राज्य को विधिवत तरीके से जाँच दोबारा करने की अनुमति दी, जबकि पेंशन और ग्रेच्युटी पर अंतिम निर्णय उस प्रक्रिया के पूर्ण होने तक लंबित रखा।

सेवानिवृत्त कर्मचारियों के लिए यह निर्णय यह स्पष्ट करता है कि विभागीय कार्यवाही सेवानिवृत्ति के बाद भी बिहार पेंशन नियमावली के नियम 43(b) के अंतर्गत जारी रह सकती है। परंतु ऐसी कार्यवाही कानून के सख्त अनुपालन के साथ ही की जानी चाहिए, और पेंशन व ग्रेच्युटी के संबंध में कोई भी अंतिम निर्णय कारणयुक्त, समयबद्ध और विधिवत संप्रेषित होना चाहिए।

कानूनी प्रश्न और उनके उत्तर

  • प्रश्न: क्या अपीलकर्ता के विरुद्ध विभागीय जाँच बिहार सीसीए नियमावली, 2005 के नियम 17 के अनुरूप की गई थी?
    उत्तर: नहीं। न्यायालय ने पाया कि केवल एक दस्तावेज पर निर्भर किया गया, गवाहों की कोई सूची उपलब्ध नहीं कराई गई, और दस्तावेज के लेखक की जाँच नहीं की गई, जो नियम 17 तथा Roop Singh Negi में प्रतिपादित विधि के प्रतिकूल है।
  • प्रश्न: पेंशन में कटौती और ग्रेच्युटी रोके जाने की सजा क्या विधि की दृष्टि से टिकाऊ थी?
    उत्तर: नहीं। चूँकि स्वयं जाँच ही दोषपूर्ण थी, अतः दंडादेश तथा उसे बरकरार रखने वाले एकल पीठ के आदेश को निरस्त कर दिया गया तथा मामले को नई जाँच हेतु वापस भेज दिया गया।
  • प्रश्न: जब किसी अनुशासनिक कार्यवाही में दंड केवल तकनीकी आधारों पर, विशेषकर सेवानिवृत्ति के बाद, निरस्त किया जाता है तो उचित course of action क्या है?
    उत्तर: ECIL v. B. Karunakar तथा Ananta Saha के अनुसार, उपयुक्त तरीका यह है कि दोषपूर्ण स्तर से पुनः जाँच की अनुमति दी जाए, कर्मचारी को पुनः नियुक्त (या समुचित रूप से माना) कर आवश्यक हो तो निलंबित किया जाए, और बकाया वेतन तथा पेंशनरी लाभ नई जाँच के बाद तय किए जाएँ।

न्यायालय द्वारा उद्धृत मामलों की सूची

  • Roop Singh Negi vs. Punjab National Bank and Ors., (2009) 2 SCC 570.
  • Managing Director, ECIL v. B. Karunakar, (1993) 4 SCC 727.
  • Chairman-cum-Managing Director, Coal India Limited & Ors. v. Ananta Saha and Others, (2011) 5 SCC 142.
  • R. Thiruvirkolam v. Presiding Officer, (1997) 1 SCC 9.
  • Punjab Dairy Development Corpn. Ltd. v. Kala Singh, (1997) 6 SCC 159.
  • Graphite India Ltd. v. Durgapur Projects Ltd., (1999) 7 SCC 645.
  • Union of India v. Y.S. Sadhu, (2008) 12 SCC 30.
  • U.P. SRTC v. Mitthu Singh, (2006) 7 SCC 180.
  • Akola Taluka Education Society v. Shivaji, (2007) 9 SCC 564.
  • Balasaheb Desai Sahakari S.K. Ltd. v. Kashinath Ganapati Kambale, (2009) 2 SCC 288.

मामले का विवरण

मामला संख्या: Letters Patent Appeal No. 1347 of 2018 in Civil Writ Jurisdiction Case No. 14330 of 2010

मामले का शीर्षक: Mahendra Prasad Singh vs. The State of Bihar and Ors.

प्रकाशन: 2023 (1) PLJR 711

पीठ: Hon’ble Mr. Justice P. B. Bajanthri and Hon’ble Mr. Justice Arun Kumar Jha

निर्णय की तिथि: 09.01.2023

अधिवक्ता:

  • अपीलकर्ता की ओर से: Mr. P.N. Shahi, Sr. Advocate; Mr. Arun Kumar Pandey, Advocate; Mr. Amresh Kumar, Advocate
  • प्रतिवादियों की ओर से: Mr. S.D. Yadav, AAG-9

मामले का स्वरूप: सेवानिवृत्त सरकारी कर्मचारी के विरुद्ध अनुशासनिक कार्यवाही से उत्पन्न, पेंशन में कटौती और ग्रेच्युटी रोके जाने से संबंधित बिहार पेंशन नियमावली के नियम 43(b) के अंतर्गत दंड को चुनौती देते हुए दायर रिट याचिका की खारिजी के विरुद्ध लेटर्स पेटेंट अपील।

निर्णय का लिंक: https://patnahighcourt.gov.in/viewjudgment/MyMxMzQ3IzIwMTgjMSNO-pcOE1aLSmOs=

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