मामले की पृष्ठभूमि
सिविल रिट अधिकारिता मामला संख्या 14167/2023 (Civil Writ Jurisdiction Case No. 14167 of 2023) तीन प्रैक्टिसिंग अधिवक्ताओं द्वारा दायर किया गया था, जो पटना उच्च न्यायालय मध्यस्थता केन्द्र में प्रशिक्षित मध्यस्थ भी थे।
उन्होंने बिहार सिविल प्रक्रिया (मध्यस्थता) (संशोधन) नियम, 2019 की वैधता को चुनौती दी। उनके अनुसार ये नियम विधायी अधिकार-क्षेत्र के बिना बनाये गए थे और उच्चतम न्यायालय के आदेशों से निर्मित मूल मध्यस्थता योजना के विरुद्ध थे।
नियमों को चुनौती देने के अतिरिक्त, याचिकाकर्ताओं ने कई अन्य दिशानिर्देशों की भी मांग की। इनमें मध्यस्थता शुल्क के बकाए का भुगतान एवं शुल्क संरचना में वृद्धि, मध्यस्थता योजनाओं का समुचित क्रियान्वयन, मध्यस्थता समिति का पुनर्गठन, मध्यस्थता केन्द्र के लिए पृथक वित्तीय मद का निर्माण और पटना उच्च न्यायालय मध्यस्थता केन्द्र की प्रशासनिक संरचना में परिवर्तन जैसी मांगें शामिल थीं।
06.12.2023 को जब मामला विचारार्थ आया, तो महाधिवक्ता ने आपत्ति की कि नये मध्यस्थ, जिन्हें विधिवत नियुक्त किया गया था, उन्हें मामले में पक्षकार नहीं बनाया गया है। चूंकि नियमों और उनसे संबंधित कार्यवाहियों पर कोई भी आदेश उनके अधिकारों को प्रभावित कर सकता था, न्यायालय ने याचिकाकर्ताओं को निर्देश दिया कि वे चार सप्ताह के भीतर उन्हें पक्षकार बनाएं।
13.01.2024 को याचिकाकर्ताओं ने एक आवेदन दायर कर इन नवनियुक्त मध्यस्थों को पक्षकार के रूप में जोड़ने की प्रार्थना की। किंतु साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि वे उन व्यक्तियों के विरुद्ध कोई राहत नहीं मांग रहे हैं। न्यायालय ने इस रुख को अस्वीकार कर दिया और यह टिप्पणी की कि यह प्रयास इस उद्देश्य से प्रतीत होता है कि सभी प्रभावित व्यक्तियों को नोटिस तामील कराने की जिम्मेदारी से बचा जा सके।
पीठ ने स्पष्ट किया कि यदि 2019 के विवादित नियम को निरस्त कर दिया गया, तो उन मध्यस्थों की नियुक्ति संकट में पड़ जाएगी। चूंकि उन्हें गंभीर रूप से पूर्वाग्रहित (prejudiced) किया जा सकता था, इसलिए उनकी सुनवाई आवश्यक थी। अतः याचिकाकर्ताओं को निर्देश दिया गया कि वे उनके पक्षकार बनाने संबंधी आवेदन को विधिवत दायर कर उसका समुचित रूप से अनुसरण करें।
इसके बाद एक अंतरिम आवेदन, आई.ए. संख्या 3/2024 (I.A. No. 3 of 2024) दायर किया गया, जिसमें रिट याचिका में बाद की घटनाओं को शामिल करने और आवश्यक पक्षकारों को प्रतिवादी के रूप में जोड़ने हेतु संशोधन की मांग की गई। 23.01.2024 के आदेश द्वारा यह आवेदन स्वीकार कर लिया गया। नवनियुक्त प्रतिवादियों को साधारण प्रक्रिया तथा रजिस्टर्ड डाक (स्वीकृति रसीद सहित) दोनों माध्यमों से नोटिस जारी करने का आदेश दिया गया। याचिकाकर्ताओं को निर्देश दिया गया कि वे इसके लिए दो सप्ताह के भीतर आवश्यक अभिलेख (requisites) दाखिल करें।
रिट लंबित रहते हुए, एक और अंतरिम आवेदन, आई.ए. संख्या 4/2024 (I.A. No. 4 of 2024) दायर किया गया। याचिकाकर्ताओं ने 23.01.2024 के आदेश में संशोधन की मांग की।
याचिकाकर्ताओं ने न्यायालय को सूचित किया कि 15.09.2023 को मध्यस्थता अधिनियम (Mediation Act) लागू होने के बाद, उनमें से तीनों याचिकाकर्ताओं सहित 36 मध्यस्थों को पटना उच्च न्यायालय के मध्यस्थों के पैनल से हटा दिया गया था। साथ ही, 40 अधिवक्ताओं को मध्यस्थ के रूप में नियुक्त कर प्रशिक्षण दिया गया और 20 मध्यस्थों को पटना उच्च न्यायालय मध्यस्थता केन्द्र की अनुशंसा पर माननीय मुख्य न्यायाधीश की स्वीकृति से बरकरार रखा गया।
याचिकाकर्ताओं का दावा था कि मध्यस्थता केन्द्र की यह कार्रवाई अधिकार-क्षेत्र से परे, अवैध, शून्य और प्रारम्भ से ही अमान्य (void ab initio) है। साथ ही उन्होंने कहा कि साधारण और रजिस्टर्ड डाक दोनों माध्यमों से नोटिस तामील कराने पर उन पर भारी व्यय का बोझ आयेगा। उन्होंने अनुरोध किया कि न्यायालय पूर्व आदेश में संशोधन करते हुए नोटिस की तामील दस्ती समन (Dasti summons) के माध्यम से करने की अनुमति दे। 27.02.2024 के आदेश द्वारा न्यायालय ने आई.ए. संख्या 4/2024 को खारिज कर दिया और याचिकाकर्ताओं को निर्देश दिया कि वे नवनियुक्त प्रतिवादियों पर पुनः नोटिस की सेवा हेतु आवश्यक कार्यवाही करें, अन्यथा उनके विरुद्ध रिट याचिका खारिज मानी जाएगी।
न्यायालय ने क्या विचार किया और क्या निर्णय दिया
इन स्पष्ट निर्देशों के बावजूद याचिकाकर्ताओं ने नवनियुक्त प्रतिवादियों को नोटिस तामील कराने के लिए आवश्यक अभिलेख दाखिल नहीं किए। जब 24.02.2026 को मामला विचारार्थ आया, तो याचिकाकर्ताओं के अधिवक्ता ने यह दलील दी कि 27.02.2024 के आदेश के कारण रिट याचिका केवल नवनियुक्त प्रतिवादियों (प्रतिवादी सं. 25 से 83) के संबंध में खारिज हुई है और प्रतिवादी सं. 1 से 24 के विरुद्ध अब भी जीवित है।
इसी आधार पर दृढ़ता से तर्क दिया गया कि न्यायालय को अब भी बिहार सिविल प्रक्रिया (मध्यस्थता) (संशोधन) नियम, 2019 की संवैधानिक वैधता पर मेरिट के आधार पर सुनवाई कर निर्णय देना चाहिए, क्योंकि चुनौती मूल रूप से नियमों के विरुद्ध थी, न कि सीधे-सीधे व्यक्तिगत मध्यस्थों के विरुद्ध।
प्रतिवादी सं. 7 से 16 (पटना उच्च न्यायालय और संबद्ध प्राधिकारियों) के अधिवक्ता ने इसका विरोध किया। उन्होंने संकेत किया कि याचिकाकर्ताओं ने नोटिस तामील के संबंध में बार-बार दिये गये आदेशों की अवहेलना करते हुए अपने मांगी गई राहतों का विस्तार भी किया है।
आई.ए. संख्या 2/2023 (I.A. No. 2 of 2023) के माध्यम से याचिकाकर्ताओं ने पटना उच्च न्यायालय मध्यस्थता समिति के निर्णयों और अनुशंसाओं को बुलाने तथा उनके अभिलेख पर आने के बाद उन्हें निरस्त करने का निर्देश माँगा था। उन्होंने आगे चलकर 11.10.2023 को रजिस्ट्रार-सह-समन्वयक, पटना उच्च न्यायालय मध्यस्थता केन्द्र द्वारा जारी मेमो संख्या 1530-53 को भी निरस्त करने की मांग की।
उक्त मेमो के अंतर्गत माननीय मुख्य न्यायाधीश ने मध्यस्थता समिति की अनुशंसा पर पटना उच्च न्यायालय मध्यस्थता केन्द्र के 20 मौजूदा मध्यस्थों की सूची को उनके कार्यकाल के तीन वर्ष के आगे के नवीनीकरण के लिए 2019 के नियम 4 के तहत स्वीकृति प्रदान की थी। याचिकाकर्ताओं ने 11.10.2023 के उस कार्यालय आदेश को भी निरस्त करने की मांग की, जिसके तहत पुनः समिति की अनुशंसा के आधार पर 40 अधिवक्ताओं को तीन वर्ष की अवधि के लिए मध्यस्थता केन्द्र में मध्यस्थों के रूप में सूचीबद्ध (empanel) किया गया था।
इस प्रकार, इन मध्यस्थों की निरंतरता और नियुक्ति को सीधे चुनौती देने के बावजूद, याचिकाकर्ताओं ने जानबूझकर उन्हें नोटिस तामील कराना टालने का प्रयास किया। प्रतिवादी के अधिवक्ता का तर्क था कि इन प्रभावित मध्यस्थों को आवश्यक पक्षकार बनाए बिना और उन पर नोटिस तामील किये बिना रिट कार्यवाही को आगे बढ़ाना सर्वथा गलत और अवैध है।
दोनों पक्षों को सुनने के बाद, पीठ ने मूल प्रश्न निर्धारित किया: क्या आवश्यक पक्षकारों की अनुपस्थिति में, जब उसके निर्णय से उन अनुपस्थित व्यक्तियों के अधिकारों पर गंभीर प्रभाव पड़ेगा, उच्च न्यायालय को रिट याचिका का निस्तारण करना चाहिए?
न्यायालय ने तत्पश्चात स्थापित विधिक सिद्धांतों की ओर रुख किया। उसने पुनः दोहराया कि किसी ऐसे व्यक्ति के विरुद्ध प्रतिकूल आदेश पारित नहीं किया जा सकता जिसे वाद में पक्षकार ही नहीं बनाया गया हो।
पीठ ने उच्चतम न्यायालय के निर्णय रंजन कुमार एवं अन्य बनाम राज्य बिहार एवं अन्य, (2014) 16 SCC 187 का हवाला दिया। उस मामले में अपीलार्थियों को उच्च न्यायालय के समक्ष प्रतिवादी नहीं बनाया गया था, फिर भी उच्च न्यायालय ने चयन को अवैध करार देते हुए उनकी नियुक्ति निरस्त कर दी। उच्चतम न्यायालय ने इसे प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन मानते हुए घोषित किया कि चूंकि सभी नियुक्त व्यक्तियों को पक्षकार नहीं बनाया गया था, इसलिए स्वयं रिट याचिका त्रुटिपूर्ण थी और कोई राहत नहीं दी जा सकती थी।
पटना उच्च न्यायालय ने उच्चतम न्यायालय के एक अन्य निर्णय प्रभोध वर्मा एवं अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य एवं अन्य, (1984) 4 SCC 251 के पैरा 28 पर भी भरोसा किया। वहाँ तीन-न्यायाधीशों की पीठ ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय के पूर्व के एक निर्णय, तथाकथित “संघ प्रकरण” (Sangh case) की समीक्षा की।
उच्चतम न्यायालय ने पाया कि उस मामले में दायर रिट याचिका गंभीर त्रुटियों से ग्रस्त थी, विशेषकर आवश्यक पक्षकारों के न जोड़े जाने के कारण। रिजर्व पूल शिक्षक, जिनका हित प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित हो रहा था, उन्हें पक्षकार नहीं बनाया गया था, यहाँ तक कि प्रतिनिधि क्षमता (representative capacity) में भी नहीं। इस प्रकार मामला उनके अनुपस्थित रहते हुए ही तय कर दिया गया।
उच्चतम न्यायालय ने यह सिद्धांत प्रतिपादित एवं पुनः पुष्ट किया कि किसी भी उच्च न्यायालय को संविधान के अनुच्छेद 226 के अंतर्गत दाखिल रिट याचिका पर निर्णय नहीं देना चाहिए, जब तक कि उसके निर्णय से जिन व्यक्तियों पर गंभीर प्रभाव पड़ेगा, वे उसके समक्ष प्रतिवादी के रूप में उपस्थित न हों; या यदि संख्या अत्यधिक हो तो कम-से-कम उनमें से कुछ को प्रतिनिधि क्षमता में पक्षकार न बनाया गया हो। यह भी कहा गया कि जहाँ याचिकाकर्ता ऐसे आवश्यक पक्षकारों को implead करने से इनकार करते हैं, वहाँ रिट याचिका को आवश्यक पक्षकारों के न जोड़े जाने के आधार पर खारिज कर दिया जाना चाहिए।
इन सिद्धांतों को लागू करते हुए पटना उच्च न्यायालय ने आई.ए. संख्या 2/2023 में मांगी गई राहतों की समीक्षा की। याचिकाकर्ता 11.10.2023 की मेमो संख्या 1530-53, जिसके द्वारा 20 मौजूदा मध्यस्थों के कार्यकाल के नवीनीकरण को स्वीकृति दी गई थी, को निरस्त कराना चाहते थे। वे उन 40 अधिवक्ताओं की सूचीबद्धता को निरस्त कराना भी चाहते थे जिन्हें मध्यस्थों के रूप में सूचीबद्ध करने वाला संबंधित कार्यालय आदेश पारित किया गया था। यह सब 2019 के संशोधित नियम के आधार पर किया गया, जिसकी वे वैधता भी चुनौती दे रहे थे।
न्यायालय ने माना कि ऐसी स्थिति में वे 20 मौजूदा मध्यस्थ और 40 नवनियुक्त सूचीबद्ध अधिवक्ता स्पष्ट रूप से आवश्यक पक्षकार हैं। रिट पर पारित कोई भी आदेश “निश्चित रूप से उन्हें गंभीर रूप से प्रभावित” करेगा। उनके नामों को सूचीबद्धता अथवा नवीनीकरण हेतु स्वयं माननीय मुख्य न्यायाधीश द्वारा स्वीकृत किया गया था।
न्यायालय पहले ही याचिकाकर्ताओं का यह तर्क अस्वीकार कर चुका था कि नवनियुक्त मध्यस्थों के विरुद्ध कोई राहत मांगी ही नहीं गई है। उसने याचिकाकर्ताओं को उन्हें पक्षकार बनाने का निर्देश दिया था और उसके अनुपालन में याचिकाकर्ताओं ने उन्हें पक्षकार प्रतिवादी के रूप में जोड़ने हेतु कदम भी उठाए। किंतु न्यायालय के आदेश की अवहेलना करते हुए उन्होंने उन पर नोटिस तामील के लिए आवश्यक अभिलेख जमा नहीं किए।
इन परिस्थितियों में, पीठ ने निष्कर्ष निकाला कि रिट याचिका को आगे जारी रखना दो आधारों पर “पूर्णतः गलत और अवैध” होगा: (i) आवश्यक पक्षकारों को न जोड़ना और उन पर नोटिस की तामील न होना, तथा (ii) न्यायालय के स्पष्ट निर्देशों की अवज्ञा।
इसी तर्क के आधार पर पटना उच्च न्यायालय ने बिहार सिविल प्रक्रिया (मध्यस्थता) (संशोधन) नियम, 2019 को दी गई चुनौती के गुण-दोष (merits) में जाने या सूचीबद्धता और नवीनीकरण से संबंधित निर्णयों की वैधता की जांच करने से इंकार कर दिया। इसके स्थान पर स्वयं रिट याचिका ही खारिज कर दी गई।
तदनुसार, 13.03.2026 के निर्णय द्वारा रिट याचिका खारिज कर दी गई। माननीय श्री न्यायमूर्ति हरीश कुमार ने निर्णय लिखा, जिससे माननीय मुख्य न्यायाधीश संगम कुमार साहू ने सहमति व्यक्त की।
यह निर्णय क्यों महत्वपूर्ण है
यह निर्णय दो मुख्य कारणों से महत्वपूर्ण है।
पहला, यह एक बुनियादी किंतु अत्यंत प्रभावशाली नियम को सुदृढ़ करता है: न्यायालय किसी व्यक्ति के अधिकारों को प्रभावित करने वाला आदेश उसे सुने बिना पारित नहीं करेगा। यदि आप किसी की नियुक्ति, नवीनीकरण या चयन को चुनौती देते हैं, तो सामान्यतः उस व्यक्ति को पक्षकार बनाना और उस पर नोटिस तामील कराना अनिवार्य है। अन्यथा, भले ही आपके कानूनी तर्क कितने ही मजबूत क्यों न हों, न्यायालय केवल प्रक्रियागत खामी के कारण मामला खारिज कर सकता है।
दूसरा, पटना उच्च न्यायालय मध्यस्थता केन्द्र के विशेष संदर्भ में, यह निर्णय वर्तमान ढांचे को अपरिवर्तित छोड़ देता है। बिहार सिविल प्रक्रिया (मध्यस्थता) (संशोधन) नियम, 2019, दिनांक 11.10.2023 का मेमो और कार्यालय आदेश, तथा वर्तमान मध्यस्थों का पैनल — ये सब यथावत जारी हैं क्योंकि चुनौती प्रक्रियागत आधार पर असफल रही।
अधिवक्ताओं और मध्यस्थों के लिए यह मामला यह स्मरण कराता है कि यदि वे नियमों या पैनल में किये गये परिवर्तनों को चुनौती देना चाहते हैं, तो उन्हें प्रक्रियागत आवश्यकताओं का कठोरता से पालन करना होगा, विशेष रूप से सभी प्रभावित व्यक्तियों को पक्षकार बनाने तथा नोटिस तामील के संबंध में न्यायालय के निर्देशों का अनुपालन करने के मामले में।
विधिक प्रश्न और उनके उत्तर
- प्रश्न: क्या पटना उच्च न्यायालय उन मध्यस्थों की नियुक्ति को दांव पर लगाते हुए मध्यस्थता नियमों और मध्यस्थों की सूचीबद्धता को चुनौती देने वाली रिट याचिका पर निर्णय दे सकता है, जब उन मध्यस्थों को विधिवत पक्षकार नहीं बनाया गया हो और उन पर नोटिस तामील न हुई हो?
उत्तर: नहीं। न्यायालय ने माना कि जिन मध्यस्थों की सूचीबद्धता और नवीनीकरण को चुनौती दी गई है, वे आवश्यक पक्षकार हैं। उनकी अनुपस्थिति और न्यायालय के आदेशों के बावजूद उन पर नोटिस तामील न होने की स्थिति में, स्वयं रिट याचिका त्रुटिपूर्ण है और उसे खारिज करना अनिवार्य है। - प्रश्न: यदि रिट याचिका प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित व्यक्तियों के विरुद्ध प्रभावी रूप से खारिज मानी जाए, तो क्या वह कुछ आधिकारिक प्रतिवादियों के विरुद्ध फिर भी जारी रह सकती है?
उत्तर: इस मामले में न्यायालय ने माना कि रिट याचिका को आगे जारी रखना पूर्णतः गलत और अवैध होगा, क्योंकि नियमों और आदेशों पर दिया गया कोई भी निर्णय उन मध्यस्थों को गंभीर रूप से प्रभावित करेगा जिन पर नोटिस तामील नहीं हुई है। इसलिए, मेरिट पर विचार किए बिना संपूर्ण रिट याचिका खारिज कर दी गई।
न्यायालय द्वारा उद्धृत मामले
- Ranjan Kumar and Others v. The State of Bihar and Others, (2014) 16 SCC 187
- Prabodh Verma and Others v. State of Uttar Pradesh and Others, (1984) 4 SCC 251 (पैरा 28 उद्धृत एवं उस पर भरोसा किया गया)
मामले का विवरण
मामला संख्या: Civil Writ Jurisdiction Case No. 14167 of 2023
मामले का शीर्षक: Jyoti Prakash and Others v. The State of Bihar and Others
उद्धरण (Citation): 2026 (3) PLJR 14
न्यायालय: उच्च न्यायालय, पटना (High Court of Judicature at Patna)
पीठ (Coram): Hon’ble the Chief Justice Sangam Kumar Sahoo; Hon’ble Mr. Justice Harish Kumar
निर्णय की तिथि: 13.03.2026
मामले की प्रकृति: अनुच्छेद 226 के अंतर्गत दायर रिट याचिका, जिसमें बिहार सिविल प्रक्रिया (मध्यस्थता) (संशोधन) नियम, 2019 तथा पटना उच्च न्यायालय मध्यस्थता केन्द्र के मध्यस्थों के पैनल से संबंधित आदेशों को चुनौती दी गई थी।
अधिवक्ता:
- याचिकाकर्ताओं की ओर से: Mr. Ratnesh Kumar Singh, Advocate
- राज्य/प्रतिवादियों की ओर से: Mr. P. K. Shahi, Advocate General; Mr. Vikash Kumar, AC to AG
- पटना उच्च न्यायालय की ओर से: Mr. Piyush Lall, Advocate
निर्णय का लिंक: पटना उच्च न्यायालय के पूर्ण निर्णय को पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें
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