जप्त शराब वाहन की रिहाई हेतु दायर रिट याचिका खारिज — पटना उच्च न्यायालय, 2026

Sakshi Bhatnagar

Reviewed by: Sakshi Bhatnagar

License Number: BR/2891A/2019

Sakshi Bhatanagar is a lawyer at Samvida Law Associates practicing criminal law. She represents clients in criminal proceedings before the Patna High Court and subordinate courts, handling bail applications, criminal appeals, NDPS matters, and customs-related cases. Her practice focuses on criminal defense and litigation across multiple forums in Bihar.

पटना उच्च न्यायालय ने उस कार की जब्ती में हस्तक्षेप से इनकार कर दिया जिससे 350.250 लीटर अवैध शराब बरामद की गई थी। स्वामी द्वारा उप-मंडलीय दंडाधिकारी के जब्ती एवं नीलामी आदेश को चुनौती देते हुए दायर रिट याचिका खारिज कर दी गई। न्यायालय ने माना कि विवादित तथ्यों की उपस्थिति और प्रभावी वैधानिक अपील उपाय उपलब्ध होने के कारण अनुच्छेद 226 के तहत रिट दायर करना उचित नहीं है। यदि याचिकाकर्ता जब्ती को चुनौती देना चाहता है, तो अब उसे बिहार मद्यनिषेध एवं उत्पाद अधिनियम, 2016 की धारा 92 के तहत अपील करनी होगी।

मामले की पृष्ठभूमि

मामला दुर्गावती थाना कांड संख्या 169/2024 से उत्पन्न हुआ, जो 21.06.2024 को बिहार मद्यनिषेध एवं उत्पाद (संशोधन) अधिनियम, 2018 की धारा 30(क) के तहत दर्ज किया गया था। सूचक, दुर्गावती थाने के एक उप-निरीक्षक, को लगभग 9:00 बजे गुप्त सूचना मिली कि एक सफेद Hyundai Venue कार गाँव खुठन के उत्तरी दिशा की ओर जाने वाली सड़क पर खड़ी है और उसमें अवैध शराब रखी हुई है।

पुलिस टीम सरकारी वाहन से घटनास्थल पर पहुँची। उन्होंने सड़क पर खड़ी सफेद Hyundai Venue कार को पाया, जिसकी सभी चारों दरवाजे बंद थे। दो पुलिसकर्मियों की उपस्थिति में कार की तलाशी ली गई। प्राथमिकी के अनुसार, कार से 350.250 लीटर अवैध शराब बरामद की गई।

कार से उसका पंजीयन प्रमाणपत्र (Registration Certificate) की एक प्रति भी मिली। पंजीयन में वर्तमान याचिकाकर्ता को स्वामी दर्शाया गया था, उसके पते सहित। पुलिस ने कार और शराब को जब्त किया, जब्ती सूची तैयार की और दुर्गावती थाना कांड संख्या 169/2024 दर्ज किया।

बाद में, उप-मंडलीय दंडाधिकारी, मोहानिया (कैमूर) के समक्ष Excise (Vehicle Confiscation) Case No. 24/2025 प्रारंभ किया गया। 01.07.2025 के आदेश द्वारा उस न्यायालय ने पंजीयन संख्या UP57BH7128 (Hyundai Venue, जिसका विशेष चेसिस और इंजन नंबर आदेश में अंकित है) वाले वाहन को जब्त कर लिया और निर्देश दिया कि उसे नीलामी के द्वारा बेचा जाए।

इसके बाद याचिकाकर्ता ने पटना उच्च न्यायालय में Civil Writ Jurisdiction Case No. 1800 of 2026 दायर कर उप-मंडलीय दंडाधिकारी के जब्ती एवं नीलामी आदेश को रद्द करने की मांग की।

न्यायालय ने क्या परखा और क्या निर्णय दिया

माननीय श्री न्यायमूर्ति मोहित कुमार शाह एवं माननीय श्री न्यायमूर्ति अरुण कुमार झा की खंडपीठ ने इस मामले की सुनवाई की। निर्णय मौखिक (Oral Judgment) है जो 30.03.2026 को (माननीय श्री न्यायमूर्ति मोहित कुमार शाह द्वारा) सुनाया गया।

याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से भाग लिया। राज्य की ओर से Learned Government Pleader-2 द्वारा पक्ष रखा गया।

याचिकाकर्ता का पक्ष और तर्क

याचिकाकर्ता का दावा था कि उसने Hyundai Venue कार ऋण पर खरीदी थी और 01.12.2022 से प्रति माह 15,758/- रुपये की ईएमआई अदा कर रहा था, तथा 01.11.2025 को ऋण का पूर्ण निपटान कर दिया। इस आर्थिक बोझ को वहन करने के लिए, उसके अनुसार, उसने Zoom Car Application के माध्यम से अपनी कार किराये पर देना शुरू किया और पहले भी दो बार उसे किराये पर दे चुका था।

विवादित घटना के लिए, उसका आरोप था कि “Mr. Farukdin” नामक व्यक्ति ने Zoom Car Application के माध्यम से वाहन बुक किया। याचिकाकर्ता के अनुसार उसने इस व्यक्ति को उसका आधार कार्ड, पैन कार्ड, ड्राइविंग लाइसेंस की फोटोकॉपी लेने और दिनांक 18.06.2024 की एक रेंटल एग्रीमेंट (किराया अनुबंध) करने के बाद वाहन सौंप दिया।

याचिकाकर्ता के अनुसार, बाद में उसे पता चला कि उसकी कार से अवैध शराब की बरामदगी के कारण उसे दुर्गावती थाना कांड संख्या 169/2024 में जब्त कर लिया गया है। 22.06.2024 को उसने कथित रूप से उस किरायेदार को उसकी लोकेशन और कार वापस करने के अनुमानित समय के बारे में पूछने के लिए फोन किया। उसका दावा है कि किरायेदार ने उससे दुर्व्यवहार किया और कार वापस नहीं की।

उसने आगे कहा कि उसी दिन, 22.06.2024 को, वह कार वापस न करने के कारण उक्त किरायेदार के विरुद्ध शिकायत दर्ज कराने हेतु दिल्ली स्थित किशनगढ़ थाने गया। वहाँ उसे कथित रूप से बताया गया कि उसकी कार पहले ही दुर्गावती थाना कांड संख्या 169/2024 के संबंध में जब्त की जा चुकी है।

याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने तर्क दिया कि जब कार जब्त की गई, उस समय घटनास्थल से किसी भी व्यक्ति को गिरफ्तार नहीं किया गया। उनके अनुसार इससे जब्ती प्रक्रिया संदिग्ध हो जाती है और जब्ती सूची अविश्वसनीय प्रतीत होती है। उन्होंने यह भी शिकायत की कि यद्यपि उन्होंने कार की रिहाई के लिए उप-मंडलीय दंडाधिकारी, मोहानिया (कैमूर) के समक्ष प्रार्थना की थी, उस न्यायालय ने 01.07.2025 के आदेश द्वारा “यांत्रिक ढंग” से उनकी अर्जी खारिज कर दी।

उल्लेखनीय है कि याचिकाकर्ता ने स्पष्ट किया कि वह जब्ती आदेश के विरुद्ध बिहार मद्यनिषेध एवं उत्पाद अधिनियम, 2016 की धारा 92 में उपलब्ध वैधानिक अपील का उपयोग नहीं करना चाहता। उसका दावा था कि यह अपीलीय उपाय प्रभावी नहीं है और उसने उच्च न्यायालय से निवेदन किया कि उसकी रिट याचिका का मेरिट के आधार पर निर्णय किया जाए।

याचिकाकर्ता ने 16.05.2019 के पटना उच्च न्यायालय के निर्णय पर भरोसा किया, जो CWJC No. 7612 of 2019 (Rajesh Giri vs. State of Bihar & Ors.) में दिया गया था। उस मामले में न्यायालय ने कुछ शर्तों के अधीन शराब सहित जब्त वाहन की रिहाई का आदेश दिया था। उसने समान राहत की मांग की।

राज्य का पक्ष और आपत्तियाँ

राज्य ने प्रतिवाद-पत्र (Counter-Affidavit) का हवाला देते हुए रिट याचिका का विरोध किया। उसका तर्क था कि याचिकाकर्ता द्वारा प्रस्तुत कहानी – ऐप के माध्यम से किराये पर दिए जाने और बाद में दिल्ली में पुलिस शिकायत करने – से विश्वास उत्पन्न नहीं होता और इसकी सच्चाई का अभी परीक्षण होना शेष है।

राज्य ने रेखांकित किया कि कार के संबंध में कथित रेंटल एग्रीमेंट दिनांक 18.06.2024 का बताया गया है, जबकि कार 21.06.2024 को केवल कुछ ही दिन बाद 350.250 लीटर अवैध शराब के साथ जब्त की गई। जबकि याचिकाकर्ता का कहना है कि वह 22.06.2024 को किशनगढ़ थाना, दिल्ली गया था, रिकॉर्ड पर उस थाने से कोई प्राथमिकी अथवा शिकायत उपलब्ध नहीं है।

राज्य ने जोर देकर कहा कि यह निर्विवाद है कि कार से 350.250 लीटर अवैध विदेशी शराब बरामद हुई और याचिकाकर्ता उस वाहन का पंजीकृत स्वामी है। उसने अधिनियम, 2016 की धारा 47 पर भी भरोसा किया, जिसके अनुसार वाहन स्वामी की स्थल पर उपस्थिति दायित्व उत्पन्न होने के लिए आवश्यक नहीं है।

बिहार मद्यनिषेध एवं उत्पाद (संशोधन) अधिनियम, 2022 की धारा 56 और बिहार मद्यनिषेध एवं उत्पाद (संशोधन) नियमावली, 2022 के नियम 12A(3) पर भरोसा करते हुए, राज्य ने तर्क दिया कि यदि Collector या अधिकृत अधिकारी इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि वाहन की रिहाई लोकहित में नहीं है, तो वे अवैध शराब के परिवहन हेतु प्रयुक्त किसी भी वाहन को जब्त कर सकते हैं। उप-मंडलीय दंडाधिकारी ने इसी शक्ति का प्रयोग करते हुए वाहन को जब्त किया और उसकी नीलामी का आदेश दिया।

राज्य ने यह भी प्रस्तुत किया कि जब्ती आदेश के विरुद्ध याचिकाकर्ता के पास अधिनियम, 2016 की धारा 92 के तहत प्रभावी वैधानिक अपील उपलब्ध थी। उस अपील में रेंटल एग्रीमेंट और कथित रूप से कार वापस न करने संबंधी सभी तथ्यात्मक मुद्दों की सही जाँच की जा सकती थी, साक्ष्य प्रस्तुत किए जा सकते थे और प्राधिकारी सम्यक निर्णय ले सकता था। उसका तर्क था कि ऐसे विवादित तथ्यात्मक प्रश्नों का उचित निस्तारण संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत रिट याचिका में नहीं किया जा सकता।

वैधानिक योजना पर न्यायालय की विचार-विमर्श

पटना उच्च न्यायालय ने वैधानिक प्रावधानों का विस्तार से परीक्षण किया। उसने उल्लेख किया कि बिहार मद्यनिषेध एवं उत्पाद (संशोधन) अधिनियम, 2018 की धारा 30(क) बिना लाइसेंस शराब के अवैध निर्माण, परिवहन, कब्जा या अन्य लेन-देन के लिए कठोर दंड का प्रावधान करती है।

न्यायालय ने संशोधन अधिनियम, 2022 की धारा 56 का हवाला दिया, जो Collector या अधिकृत अधिकारी को अधिनियम के तहत अपराध होने पर वस्तुओं को जब्त करने का अधिकार देती है। इन वस्तुओं में कोई भी परिसर, कोई भी वाहन या परिवहन साधन, स्वयं शराब और मामले से संबंधित अन्य कोई भी वस्तु शामिल हैं।

न्यायालय ने अधिनियम की धारा 58 को भी उद्धृत किया, जिसमें विस्तार से वर्णन है कि जिला कलेक्टर जब्ती की रिपोर्ट प्राप्त होने पर – चाहे अभियोजन दायर किया गया हो या नहीं – किस प्रकार जब्ती का आदेश दे सकता है, तथा जब्ती आदेश देने से पहले सुनवाई का समुचित अवसर देने का दायित्व है। यह धारा यह भी अनुमति देती है कि यदि Collector लोकहित में उचित समझे तो जब्त संपत्ति की सार्वजनिक नीलामी कर सकता है।

इसके अतिरिक्त, न्यायालय ने संशोधन अधिनियम, 2022 की धारा 57B तथा बिहार मद्यनिषेध एवं उत्पाद (संशोधन) नियमावली, 2021 के नियम 12A एवं 13A पर चर्चा की। ये प्रावधान जब्त वाहनों को दंड राशि जमा कराए जाने पर रिहा करने और यदि वाहन रिहा न हो तो जब्ती एवं नीलामी की प्रक्रिया से संबंधित हैं।

इस मामले के केंद्र में रहे नियम 12A(3) में प्रावधान है कि यदि पुलिस या उत्पाद अधिकारी की रिपोर्ट पर Collector या अधिकृत अधिकारी संतुष्ट हो जाए कि वाहन की रिहाई लोकहित में नहीं है, तो वह जब्ती एवं नीलामी की कार्यवाही आगे बढ़ाएगा।

तथ्यों पर निष्कर्ष और वैकल्पिक उपाय

न्यायालय ने दर्ज किया कि इस बात पर कोई विवाद नहीं है कि दुर्गावती थाना कांड संख्या 169/2024 में याचिकाकर्ता की कार से 350.250 लीटर अवैध शराब बरामद की गई। अतः प्रथम दृष्टया, संशोधन अधिनियम, 2018 की धारा 30(क) के तहत अपराध सिद्ध होता है, क्योंकि वाहन में अवैध शराब का परिवहन किया जा रहा था।

इन प्रावधानों के आलोक में Collector अथवा अधिकृत अधिकारी के पास वाहन को जब्त करने की शक्ति थी। उप-मंडलीय दंडाधिकारी, मोहानिया (कैमूर) ने विधिक प्रावधानों पर विचार करने के बाद impugned order दिनांक 01.07.2025 में यह निष्कर्ष निकाला कि जब्त की गई शराब की भारी मात्रा को देखते हुए दंड राशि पर वाहन को रिहा करना लोकहित में नहीं है। अतः अधिकारी ने वाहन को जब्त कर उसकी नीलामी का आदेश दिया।

उच्च न्यायालय ने यह अवलोकन किया कि जब एक बार वाहन जब्त किया जा चुका है, तब नियम 12A(2) के तहत दंड राशि पर रिहाई का प्रश्न अब प्रासंगिक नहीं बचा। याचिकाकर्ता के लिए उचित उपाय यह था कि वह अधिनियम, 2016 की धारा 92 के तहत अपील दायर कर जब्ती आदेश को चुनौती देता।

धारा 92 यह प्रावधान करती है कि Collector द्वारा पारित सभी अंतिम आदेशों के विरुद्ध 90 दिनों के भीतर Excise Commissioner के समक्ष अपील की जा सकती है और अन्य आदेशों के विरुद्ध अधिनियमित पदानुक्रम के अनुसार अपील योग्य हैं। इस प्रकार, जब्ती आदेशों को चुनौती देने के लिए स्वतंत्र वैधानिक अपीलीय व्यवस्था उपलब्ध है।

न्यायालय ने रेखांकित किया कि याचिकाकर्ता के मामले में कई विवादित तथ्यात्मक प्रश्न शामिल हैं: रेंटल एग्रीमेंट की प्रामाणिकता, कथित किरायेदार का आचरण और दिल्ली में कथित शिकायत दर्ज कराने का प्रयास। इन मुद्दों का निर्णय मौखिक एवं दस्तावेजी साक्ष्य के आधार पर किया जाना आवश्यक होगा, जिन्हें अनुच्छेद 226 के तहत रिट क्षेत्राधिकार में विधिवत परखा नहीं जा सकता।

न्यायालय ने सर्वोच्च न्यायालय के कई निर्णयों का हवाला दिया, जिनमें Thansingh Nathmal v. Superintendent of Taxes (A.I.R. 1964 SC 1419), Punjab National Bank v. Atmanand Singh (2020) 6 SCC 256, Babubhai Muljibhai Patel v. Nandlal Khodidas Barot (1974) 2 SCC 706, और Government of Andhra Pradesh v. Thummala Krishna Rao (1982) 2 SCC 134 शामिल हैं। इन पर भरोसा करते हुए न्यायालय ने यह बल दिया कि जब वैधानिक उपाय उपलब्ध हों और तथ्यगत विवादों के समाधान हेतु साक्ष्य की आवश्यकता हो, तब रिट क्षेत्राधिकार का सहारा नहीं लिया जाना चाहिए।

न्यायालय ने Seth Chand Ratan v. Pandit Durga Prasad (2003) 5 SCC 399 और Radha Krishan Industries v. State of Himachal Pradesh (2021) 6 SCC 771 का भी हवाला दिया। इन निर्णयों में यह सिद्धांत पुष्ट किया गया है कि जब अधिकार और दायित्व किसी विधि द्वारा निर्मित हों और उसमें विशिष्ट उपाय या प्रक्रिया प्रदान की गई हो, तो पक्षकारों को सामान्यतः ऐसे उपायों को व्यय करना चाहिए, उसके बाद ही उच्च न्यायालय के समक्ष अनुच्छेद 226 के तहत आना चाहिए।

पूर्व निर्णय Rajesh Giri को अलग ठहराना

पीठ ने सावधानीपूर्वक 2019 के Rajesh Giri के निर्णय पर विचार किया, जिस पर याचिकाकर्ता ने भरोसा किया था। न्यायालय ने महत्वपूर्ण भिन्नताओं की ओर संकेत किया:

पहला, Rajesh Giri में केवल 540 ml Indian Made Foreign Liquor की नगण्य मात्रा बरामद हुई थी। इसके विपरीत, वर्तमान मामले में 350.250 लीटर अवैध शराब की भारी मात्रा शामिल है।

दूसरा, Rajesh Giri में उच्च न्यायालय द्वारा वाहन की रिहाई का आदेश दिए जाने के समय वाहन के संबंध में कोई जब्ती कार्यवाही लंबित नहीं थी। यहाँ, जब तक रिट याचिका दायर हुई, तब तक उप-मंडलीय दंडाधिकारी 01.07.2025 का आदेश पारित कर वाहन को जब्त कर उसकी नीलामी का निर्देश दे चुके थे।

इसके अतिरिक्त, Rajesh Giri में रिहाई इस शर्त के अधीन आदेशित की गई थी कि याचिकाकर्ता वाहन के बीमित मूल्य की सीमा तक दो जमानतें, जिनमें से एक स्थानीय हो, प्रस्तुत करेगा। वर्तमान मामले में याचिकाकर्ता ने रिहाई के लिए शर्तें स्वीकार करने की कोई तत्परता नहीं दिखाई और न ही किसी प्रकार की सुरक्षा का प्रस्ताव दिया।

इन कारणों से न्यायालय ने माना कि पूर्व निर्णय का उपयोग इस मामले में समान राहत प्राप्त करने के लिए नहीं किया जा सकता।

अंतिम निष्कर्ष

न्यायालय ने दर्ज किया कि जब विशेष रूप से पूछा गया, तब भी याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने धारा 92 के तहत अपीलीय उपाय अपनाने से इनकार कर दिया, जबकि न्यायालय ने यह संकेत दिया था कि यदि ऐसी अपील दायर की जाती है तो वह वाहन की नीलामी पर रोक लगाने पर विचार कर सकता है।

वैधानिक योजना, तथ्यगत विवादों और विशिष्ट अपीलीय उपाय की उपलब्धता को देखते हुए, न्यायालय ने माना कि रिट याचिका ग्राह्य (Maintainable) नहीं है और इसमें कोई औचित्य नहीं है। अतः Civil Writ Jurisdiction Case No. 1800 of 2026 खारिज कर दी गई।

यह निर्णय क्यों महत्वपूर्ण है

यह निर्णय उन वाहन-मालिकों के लिए महत्वपूर्ण है जिनके वाहन बिहार में मद्यनिषेध मामलों में जब्त किए जाते हैं। इससे स्पष्ट होता है कि यदि किसी वाहन से भारी मात्रा में अवैध शराब बरामद हो, तो प्राधिकारी उसे जब्त कर उसकी नीलामी का आदेश दे सकते हैं, भले ही पंजीकृत स्वामी यह दावा करे कि कार किसी अन्य व्यक्ति द्वारा उपयोग की जा रही थी।

पटना उच्च न्यायालय ने स्पष्ट कर दिया है कि वाहन-मालिकों को जब्ती आदेश को चुनौती देने के लिए पहले बिहार मद्यनिषेध एवं उत्पाद अधिनियम, 2016 की धारा 92 में प्रदान की गई अपील का उपयोग करना होगा। विशेष रूप से तब, जब तथ्य विवादित हों और साक्ष्य की आवश्यकता हो, उच्च न्यायालय सामान्यतः ऐसी मामलों का सीधा निस्तारण रिट याचिका के माध्यम से नहीं करेगा।

यह निर्णय यह भी स्पष्ट करता है कि पुराने रिहाई संबंधी आदेश, जो बहुत भिन्न परिस्थितियों (जैसे शराब की अल्प मात्रा और कोई जब्ती आदेश नहीं) में पारित किए गए थे, हर नए मामले पर स्वचालित रूप से लागू नहीं किए जा सकते। प्रत्येक मामले का निर्णय शराब की मात्रा, कार्यवाही की अवस्था और वाहन की रिहाई लोकहित में है या नहीं, इन कारकों पर निर्भर करेगा।

कानूनी प्रश्न और उत्तर

  • प्रश्न: क्या पटना उच्च न्यायालय, अनुच्छेद 226 के तहत दायर रिट याचिका में, उस स्थिति में उप-मंडलीय दंडाधिकारी द्वारा पारित जब्ती एवं नीलामी आदेश को रद्द कर सकता है, जब याचिकाकर्ता के वाहन से भारी मात्रा में अवैध शराब बरामद हुई हो?
    उत्तर: नहीं। न्यायालय ने माना कि बिहार मद्यनिषेध एवं उत्पाद अधिनियम, 2016 के तहत जब्ती और धारा 92 में अपील की वैधानिक योजना तथा साक्ष्य की आवश्यकता वाले विवादित तथ्यों की उपस्थिति को देखते हुए रिट याचिका ग्राह्य नहीं है और याचिकाकर्ता को वैधानिक अपील उपाय अपनाना होगा।
  • प्रश्न: क्या Rajesh Giri में पटना उच्च न्यायालय द्वारा जब्त वाहन की रिहाई के संबंध में दिया गया पूर्व निर्णय उस मामले पर लागू होता है, जिसमें 350.250 लीटर अवैध शराब शामिल हो और वाहन पहले ही जब्त कर उसकी नीलामी का आदेश दिया जा चुका हो?
    उत्तर: नहीं। न्यायालय ने तथ्यात्मक भिन्नताओं के आधार पर Rajesh Giri को वर्तमान मामले से अलग ठहराया, यह उल्लेख करते हुए कि उस मामले में शराब की मात्रा नगण्य थी और कोई जब्ती कार्यवाही लंबित नहीं थी, तथा उसे वर्तमान मामले पर लागू करने से इंकार कर दिया।

न्यायालय द्वारा उद्धृत मामले

  • Thansingh Nathmal & others v. Superintendent of Taxes, Dhubri & Ors., A.I.R. 1964 SC 1419
  • Punjab National Bank and others v. Atmanand Singh and others, (2020) 6 SCC 256
  • Babubhai Muljibhai Patel v. Nandlal Khodidas Barot, (1974) 2 SCC 706
  • Government of Andhra Pradesh v. Thummala Krishna Rao & Anr., (1982) 2 SCC 134
  • Seth Chand Ratan v. Pandit Durga Prasad (D) By Lrs. & Others, (2003) 5 SCC 399
  • Radha Krishan Industries v. State of Himachal Pradesh & Ors., (2021) 6 SCC 771
  • Rajesh Giri v. State of Bihar & Ors., judgment dated 16.05.2019 in CWJC No. 7612 of 2019 (distinguished)

मामले का विवरण

मामला संख्या: Civil Writ Jurisdiction Case No. 1800 of 2026

मामले का शीर्षक: Prayagadhwaj Yadav @ Prayag v. State of Bihar & Ors.

उद्धरण: 2026(3) PLJR 228

समक्ष (Coram): Hon’ble Mr. Justice Mohit Kumar Shah; Hon’ble Mr. Justice Arun Kumar Jha

निर्णय की तिथि: 30.03.2026

अधिवक्ता:

  • याचिकाकर्ता की ओर से: Mr. Abhigyan Kumar, Advocate; Mr. Saurabh Yadav, Advocate (appearing virtually)
  • राज्य की ओर से: Mr. Prashant Pratap, Government Pleader-2

मामले का स्वरूप: संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत दायर रिट याचिका, जो Excise (Vehicle Confiscation) Case No. 24/2025 में पारित जब्ती एवं नीलामी आदेश को चुनौती देती है, यह मामला दुर्गावती थाना कांड संख्या 169/2024 से उत्पन्न हुआ है, जो बिहार मद्यनिषेध एवं उत्पाद (संशोधन) अधिनियम, 2018 की धारा 30(क) के अंतर्गत दर्ज हुआ था।

निर्णय की प्रति का लिंक: Patna High Court Judgment in CWJC No. 1800 of 2026


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