मामले की पृष्ठभूमि
याचिकाकर्ता बिहार मिलिट्री पुलिस-2 के एक पूर्व सिपाही की विधवा हैं। उनके पति ने 23.02.1997 को सेवा ज्वाइन की थी। बाद में उन्होंने कमांडेंट, बीएमपी-2, देहरी-ऑन-सोन के अधीन पदस्थापित रहते हुए सिपाही के पद से स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति का विकल्प चुना।
यद्यपि उनकी सामान्य सेवानिवृत्ति की तिथि 30.11.2016 थी, उन्होंने व्यक्तिगत कठिनाइयों के कारण 31.03.2007 से प्रभावी स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति ले ली। प्रतिवादी सं. 2 व 3 ने इस स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति को स्वीकार कर संबंधित अभिलेख एवं सेवा पुस्तिका महालेखाकार, बिहार के कार्यालय को भेज दी।
इसके बाद महालेखाकार ने पीपीओ सं. 429433 (V) दिनांक 25.05.2007 जारी किया, जिसके तहत उनकी पेंशन 01.04.2007 से प्रभावी रूप से 4371/- रुपये प्रतिमाह निर्धारित की गई। बाद में, पत्र दिनांक 13.10.2010 द्वारा उनकी पेंशन संशोधित कर 7373/- रुपये प्रतिमाह निर्धारित की गई।
याचिकाकर्ता के पति की मृत्यु 09.02.2016 को हो गई। उनकी मृत्यु के बाद, याचिकाकर्ता बिहार पेंशन नियमावली, 1950 के अंतर्गत पारिवारिक पेंशन की हकदार हो गईं। वास्तव में उन्हें 10.02.2016 से 2948/- रुपये प्रतिमाह की दर से पारिवारिक पेंशन का भुगतान किया गया।
पेंशन निर्धारण का विवरण जानने के उपरांत, याचिकाकर्ता को विश्वास हुआ कि वह अपने पति की मृत्यु के बाद एक निश्चित अवधि के लिए वर्धित पारिवारिक पेंशन की हकदार हैं। 18.10.2020 को उन्होंने विभाग तथा वरिष्ठ लेखा पदाधिकारी (ए.जी., बिहार) के समक्ष परिवारिक पेंशन के सही निर्धारण तथा वर्धित पारिवारिक पेंशन की स्वीकृति हेतु अभ्यावेदन दायर किया।
न्यायालय ने क्या जांचा और क्या निर्णय लिया
पटना उच्च न्यायालय के समक्ष मूल विवाद याचिकाकर्ता के बुनियादी पारिवारिक पेंशन के अधिकार पर नहीं था, जो उन्हें पहले से मिल रही थी। विवाद इस बात पर था कि स्वैच्छिक सेवानिवृत्त सरकारी कर्मचारी की मृत्यु के बाद “वर्धित पारिवारिक पेंशन” की अवधि और उसकी प्रयोज्यता क्या होगी।
याचिकाकर्ता के अभ्यावेदन के बाद कमांडेंट, बिहार मिलिट्री पुलिस-2, देहरी-ऑन-सोन ने उनके मामले की जांच की। उन्होंने महालेखाकार, बिहार, पटना को पत्रांक 623 दिनांक 08.02.2021 के माध्यम से पत्र भेजा। इस पत्र में उन्होंने अनुशंसा की कि याचिकाकर्ता के लिए वर्धित पारिवारिक पेंशन उस समय तक सुनिश्चित की जाए जब तक वह 67 वर्ष की आयु प्राप्त न कर लें या पेंशनभोगी की मृत्यु के बाद सात वर्ष की अवधि पूरी न हो जाए, जो भी पहले हो।
इसके उत्तर में, वरिष्ठ लेखा पदाधिकारी, ए.जी., बिहार ने पत्र सं. 1132 दिनांक 10.02.2021 के माध्यम से दावा खारिज कर दिया। महालेखाकार के कार्यालय ने यह stand लिया कि वर्धित पारिवारिक पेंशन केवल उन्हीं मामलों में देय है, जहाँ कर्मचारी 01.04.2007 को या उसके बाद सेवा में हों, या जहाँ कर्मचारी की मृत्यु सेवा अवधि के दौरान हुई हो, और वह भी अधिकतम दस वर्ष तक। यह stand वित्त विभाग के संकल्प सं. 1206 दिनांक 22.08.2013 पर आधारित था।
उस दृष्टिकोण के अनुसार, चूँकि याचिकाकर्ता के पति ने 31.03.2007 को स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति ले ली थी और उनकी मृत्यु बाद में 09.02.2016 को हुई, इसलिए याचिकाकर्ता अपने पति की मृत्यु की तिथि से वर्धित पारिवारिक पेंशन की हकदार नहीं थीं। इसके बजाय, उन्होंने 31.03.2007 से वर्धित पारिवारिक पेंशन की अवधि की गणना के लिए प्रासंगिक तिथि माना।
रिट याचिका लंबित रहने के दौरान, याचिकाकर्ता के लंबित अभ्यावेदन को पुनः इसी आधार पर खारिज कर दिया गया। यह कार्य वरिष्ठ लेखा पदाधिकारी, बिहार, पटना द्वारा पत्र सं. 478 दिनांक 24.08.2023 के माध्यम से किया गया। याचिकाकर्ता ने इस बाद की अस्वीकृति को वर्तमान रिट मामले में आई.ए. सं. 1 of 2023 दायर कर चुनौती दी।
प्रतिवादियों, जिनमें महालेखाकार तथा कमांडेंट, बिहार मिलिट्री पुलिस-II शामिल थे, ने अपने प्रति-शपथपत्र दाखिल किए। उन्होंने यह रुख बनाए रखा कि चूँकि याचिकाकर्ता के पति ने 31.03.2007 को स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति ली और उनकी मृत्यु 09.02.2016 को हुई, इसलिए वर्धित पारिवारिक पेंशन केवल स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति की तिथि से देय हो सकती है, मृत्यु की तिथि से नहीं।
वित्त विभाग के संकल्प सं. 1206 दिनांक 22.08.2013 पर भरोसा करते हुए उन्होंने तर्क दिया कि यदि कोई सरकारी सेवक सेवा अवधि के दौरान मरता है तो उसकी मृत्यु की तिथि से दस वर्ष तक वर्धित पारिवारिक पेंशन देय है। किन्तु यदि कर्मचारी पूर्व में ही सेवानिवृत्त हो चुका हो, तो परिवार को केवल सेवानिवृत्ति की तिथि से सात वर्ष तक ही वर्धित पारिवारिक पेंशन मिलेगी। इस प्रकार उन्होंने 31.03.2007 को शुरुआती तिथि मानते हुए 31.03.2014 के बाद वर्धित पारिवारिक पेंशन से इनकार कर दिया।
याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने इस दृष्टिकोण को चुनौती दी। उन्होंने तर्क दिया कि वित्त विभाग का संकल्प सं. 1206 दिनांक 22.08.2013 याचिकाकर्ता के मामले में बिल्कुल लागू ही नहीं होता। इसके बजाय उन्होंने पहले के वित्त विभाग के संकल्प, पत्रांक 1764 दिनांक 26.09.2006 पर भरोसा किया, जिसके द्वारा वर्धित पारिवारिक पेंशन की अवधि बढ़ाई गई थी।
याचिकाकर्ता की पत्रांक 1764 दिनांक 26.09.2006 की व्याख्या के अनुसार, वर्धित पारिवारिक पेंशन उस स्थिति में भी उपलब्ध होगी जब कर्मचारी की मृत्यु सेवा के दौरान हो और तब भी जब उसकी मृत्यु अधिवर्षी सेवानिवृत्ति के बाद हो। यह अधिकार मृत्यु की तिथि से सात वर्ष तक या उस उम्र तक रहेगा, जिसे मृतक एक निर्धारित आयु तक पहुँचता, जो भी पहले हो। प्रारंभ में यह आयु सीमा 65 वर्ष थी, जिसे बाद में बढ़ाकर 67 वर्ष कर दिया गया।
याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने यह भी प्रस्तुत किया कि संकल्प सं. 1206 दिनांक 22.08.2013 में दस वर्ष की वर्धित पारिवारिक पेंशन केवल उन कर्मचारियों के परिवारों के लिए शुरू की गई, जो 01.04.2007 को या उसके बाद सेवा के दौरान ही मर जाते हैं। यह, उन्होंने तर्क दिया, सेवा के दौरान मृत्यु के लिए एक पृथक योजना थी और सेवानिवृत्ति के बाद मृत्यु के मामलों से इसका कोई संबंध नहीं था।
पटना उच्च न्यायालय के माननीय न्यायमूर्ति हरीश कुमार ने दोनों परस्पर-विरोधी संकल्पों तथा तथ्यात्मक क्रम का सूक्ष्म परीक्षण किया। न्यायालय ने पहले संकल्प सं. 1206 दिनांक 22.08.2013 को देखा। साधारण पठन पर, न्यायालय ने पाया कि इसकी प्रयोज्यता “केवल” उन कर्मचारियों तक “सीमित” है जिनकी मृत्यु 01.04.2007 को या उसके बाद हुई हो अथवा जिन्होंने सेवा अवधि के दौरान ही प्राण गँवाए हों। जहाँ यह शर्त पूरी होती है, वहाँ दस वर्ष की अवधि तक वर्धित पारिवारिक पेंशन देय है। परंतु न्यायालय ने स्पष्ट रूप से उल्लेख किया कि यह संकल्प उन कर्मचारियों पर लागू नहीं होता जिनकी मृत्यु सेवानिवृत्ति के बाद हुई हो।
न्यायालय ने यह अवलोकन किया कि वर्तमान मामले में याचिकाकर्ता के पति की स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति 31.03.2007 से प्रभावी रूप से स्वीकृत थी। वही उनकी सेवानिवृत्ति की तिथि थी। उनकी मृत्यु 2016 में, सेवा छोड़ने के काफी बाद हुई। अतः न्यायालय ने निर्णय दिया कि संकल्प सं. 1206 दिनांक 22.08.2013 “निश्चय ही उनके मामले में लागू नहीं” होता। इस तर्क के आलोक में, महालेखाकार द्वारा इस संकल्प पर बार-बार निर्भर होकर विधवा के दावे को अस्वीकार करना अनुचित माना गया।
इसके बाद न्यायालय ने वित्त विभाग, बिहार सरकार द्वारा जारी पत्रांक 1764 दिनांक 26.09.2006 की ओर रुख किया। निर्णय में संकल्प का प्रासंगिक हिंदी पाठ पुनरुत्पादित किया गया है। इस संकल्प को, जिन पहले के निर्देशों को यह संशोधित करता है, उनके साथ पढ़ने पर यह प्रावधान सामने आया कि यदि कोई सरकारी सेवक सेवा के दौरान मर जाता है, तो उसकी मृत्यु की तिथि से सात वर्ष तक, अथवा मृतक की एक निश्चित आयु (पूर्व में 65 वर्ष, बाद में बढ़ाकर 67 वर्ष) तक, जो भी पहले हो, उसके परिवार को वर्धित पारिवारिक पेंशन देय होगी।
इसी संकल्प ने यह भी स्पष्ट किया कि यह लाभ उन मामलों पर भी लागू होगा, जहाँ मृत्यु सेवानिवृत्ति के बाद होती है। इसमें यह भी कहा गया कि किसी भी स्थिति में वर्धित पारिवारिक पेंशन उस मूल पेंशन से अधिक नहीं हो सकती, जो मृतक कर्मचारी को प्राप्त हो रही थी।
अनुच्छेद 12 में न्यायालय ने इस स्थिति का सार प्रस्तुत किया: वह कर्मचारी जो सेवा अवधि के दौरान या अधिवर्षी सेवानिवृत्ति के बाद मर जाता है, उसके परिवार को मृत्यु की तिथि से सात वर्ष तक या मृतक कर्मचारी की 67 वर्ष की आयु तक, जो भी पहले हो, वर्धित पारिवारिक पेंशन का अधिकार है, इस शर्त के अधीन कि यह मूल पेंशन से अधिक नहीं होगी।
इस नियम को याचिकाकर्ता के मामले पर लागू करते हुए, न्यायालय ने अनुच्छेद 13 में स्पष्ट रूप से निष्कर्ष निकाला कि याचिकाकर्ता के पति 31.03.2007 से सेवानिवृत्त हुए और उनकी मृत्यु 2016 में हुई। अतः पत्रांक 1764 दिनांक 26.09.2006 पूर्णतः उनके मामले पर लागू होता है। परिणामस्वरूप, याचिकाकर्ता अपने पति की मृत्यु की तिथि से सात वर्ष तक, अथवा मृतक की 67 वर्ष की आयु तक, जो भी पहले घटित हो, वर्धित पारिवारिक पेंशन की अधिकारी ठहराई गईं।
इस विधिक स्थिति के आलोक में, न्यायालय ने वरिष्ठ लेखा पदाधिकारी, बिहार, पटना द्वारा जारी पत्र सं. 1132 दिनांक 10.02.2021 तथा पत्र सं. 478 दिनांक 24.08.2023 को निरस्त कर दिया, जिनके माध्यम से याचिकाकर्ता के दावे को गलत तरीके से संकल्प सं. 1206 दिनांक 22.08.2013 के आधार पर खारिज किया गया था।
अंततः, अनुच्छेद 15 में न्यायालय ने महालेखाकार, बिहार को निर्देश दिया कि वह याचिकाकर्ता के वर्धित पारिवारिक पेंशन के दावे पर केवल और केवल पत्रांक 1764 दिनांक 26.09.2006 के आलोक में पुनर्विचार करें। महालेखाकार को आगे निर्देश दिया गया कि वह सभी आनुषंगिक लाभ सुनिश्चित करें, अधिमानतः आदेश की प्रति प्राप्त या प्रस्तुत होने की तिथि से आठ सप्ताह के भीतर।
इन निर्देशों के साथ रिट याचिका स्वीकार कर ली गई।
यह निर्णय क्यों महत्वपूर्ण है
यह निर्णय बिहार के उन सरकारी कर्मचारियों के परिवारों के लिए महत्वपूर्ण है, जिन्होंने स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति ली या सामान्य रूप से सेवानिवृत्त हुए और बाद में उनकी मृत्यु हो गई। यह स्पष्ट करता है कि ऐसे परिवार पत्रांक 1764 दिनांक 26.09.2006 के तहत मृत्यु के बाद सीमित अवधि तक भी वर्धित पारिवारिक पेंशन का दावा कर सकते हैं।
पटना उच्च न्यायालय ने यह भी स्पष्ट कर दिया कि बाद का संकल्प सं. 1206 दिनांक 22.08.2013 केवल उन स्थितियों पर लागू होता है, जहाँ कर्मचारी की मृत्यु सेवा में रहते हुए होती है। प्राधिकारी इस बाद के संकल्प का उपयोग सेवानिवृत्त कर्मचारियों की विधवाओं को लाभ से वंचित करने के लिए नहीं कर सकते।
प्रभावित परिवारों के लिए, यह निर्णय इस बात को सुदृढ़ करता है कि वे 2006 के वित्त विभाग के संकल्प पर भरोसा कर अपने पीपीओ में संशोधन और अपने पति/पत्नी की मृत्यु की तिथि से सात वर्ष तक या मृतक के 67 वर्ष की आयु तक, जो भी पहले हो, वर्धित पारिवारिक पेंशन का दावा कर सकते हैं।
यह विभागों और महालेखाकार के कार्यालय को यह संदेश भी देता है कि उन्हें सही सरकारी संकल्प का सावधानीपूर्वक चयन करना चाहिए और भिन्न परिस्थितियों के लिए बनाई गई बाद की योजनाओं का गलत अनुप्रयोग कर पेंशन संबंधी लाभों को कम नहीं कर सकते।
कानूनी मुद्दे और उनके उत्तर
- मुद्दा: क्या याचिकाकर्ता, जो स्वैच्छिक रूप से सेवानिवृत्त सिपाही की विधवा हैं जिसकी मृत्यु सेवानिवृत्ति के बाद हुई, अपने पति की मृत्यु की तिथि से वर्धित पारिवारिक पेंशन की अधिकारी हैं, और उसके दावे पर कौन-सा सरकारी संकल्प लागू होगा?
उत्तर: हाँ। पटना उच्च न्यायालय ने निर्णय दिया कि संकल्प पत्रांक 1764 दिनांक 26.09.2006 लागू होगा, न कि संकल्प सं. 1206 दिनांक 22.08.2013। 2006 के पत्र के तहत वह अपने पति की मृत्यु की तिथि से सात वर्ष तक या जब तक वह 67 वर्ष के हो जाते, जो भी पहले हो, वर्धित पारिवारिक पेंशन की अधिकारी हैं। - मुद्दा: क्या महालेखाकार द्वारा 31.03.2007 (स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति की तिथि) को प्रासंगिक तिथि मानकर और संकल्प सं. 1206 दिनांक 22.08.2013 पर निर्भर होकर वर्धित पारिवारिक पेंशन के दावे को अस्वीकार करना न्यायसंगत था?
उत्तर: नहीं। न्यायालय ने अस्वीकृति पत्रों को निरस्त करते हुए यह माना कि संकल्प सं. 1206 केवल उन कर्मचारियों पर लागू होता है, जिनकी मृत्यु 01.04.2007 को या उसके बाद सेवा के दौरान हुई हो, और यह सेवानिवृत्ति के बाद मृत्यु के मामलों तक विस्तृत नहीं होता। - मुद्दा: सही पेंशन कानून के क्रियान्वयन को सुनिश्चित करने के लिए क्या निर्देश दिए जाने चाहिए?
उत्तर: न्यायालय ने महालेखाकार, बिहार को निर्देश दिया कि वह पत्रांक 1764 दिनांक 26.09.2006 के अनुसार याचिकाकर्ता की वर्धित पारिवारिक पेंशन का पुनर्निर्धारण कर सभी आनुषंगिक लाभ आठ सप्ताह के भीतर प्रदान करें।
न्यायालय द्वारा उद्धृत मामले
- निर्णय में किसी भी पूर्ववर्ती न्यायिक निर्णय का उल्लेख या उस पर भरोसा नहीं किया गया है। यह केवल वित्त विभाग के संकल्पों और बिहार पेंशन नियमावली, 1950 के आधार पर आगे बढ़ता है।
मामले का विवरण
मामला संख्या: सिविल रिट अधिकारिता मामला सं. 7652 of 2023
मामले का शीर्षक: मुनिया देवी बनाम द स्टेट ऑफ बिहार एवं अन्य
न्यायालय: उच्च न्यायालय, पटना
समक्ष: माननीय श्री न्यायमूर्ति हरीश कुमार
निर्णय की तिथि: 08.01.2024
उद्धरण: 2024(1) PLJR 517
वादपत्रकार:
- याचिकाकर्ता की ओर से: श्री एम. एन. पारबत, वरिष्ठ अधिवक्ता सह श्री संजय कुमार मिश्रा, अधिवक्ता
- राज्य की ओर से: श्री धिरेन्द्र कुमार, ए.सी. टू जी.पी. 5
- महालेखाकार की ओर से: श्री राम यश सिंह, अधिवक्ता
मामले का स्वरूप: भारत के संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत रिट याचिका, जिसके माध्यम से पीपीओ में संशोधन तथा बिहार पेंशन नियमावली, 1950 एवं वित्त विभाग के संकल्पों के अंतर्गत वर्धित पारिवारिक पेंशन की स्वीकृति हेतु निदेश की मांग की गई।
प्रभावित आदेश: वरिष्ठ लेखा पदाधिकारी, बिहार, पटना द्वारा जारी पत्र सं. 1132 दिनांक 10.02.2021 तथा पत्र सं. 478 दिनांक 24.08.2023, जिनके माध्यम से याचिकाकर्ता के वर्धित पारिवारिक पेंशन के दावे को खारिज किया गया।
अंतिम परिणाम: रिट याचिका स्वीकार; विवादित पत्र निरस्त; महालेखाकार, बिहार को निर्देश कि वह पत्रांक 1764 दिनांक 26.09.2006 के अनुसार वर्धित पारिवारिक पेंशन का पुनर्निर्धारण कर आठ सप्ताह के भीतर वर्धित पारिवारिक पेंशन एवं समस्त आनुषंगिक लाभों का भुगतान करें।
पूर्ण निर्णय का लिंक: CWJC No. 7652 of 2023 में पटना उच्च न्यायालय का निर्णय
यदि आपको यह व्याख्या उपयोगी लगी हो और आप बिहार में विधिक विकास आपके अधिकारों को किस प्रकार प्रभावित कर सकते हैं, इस बारे में सूचित रहना चाहते हों, तो आप सम्विदा लॉ एसोसिएट्स को आगे की जानकारियों के लिए फॉलो करने पर विचार कर सकते हैं।



