पीड़ित की गलत बरी के विरुद्ध अपील स्वीकार — पटना उच्च न्यायालय, 2026

Shubham Shivansh

Reviewed by: Shubham Shivansh

License Number: D/7102/2022

Shubham Shivansh is a lawyer at Samvida Law Associates practicing in civil disputes, service law, and GST matters. He represents clients in property disputes, contractual disagreements, service-related grievances, and tax compliance matters before the Patna High Court and other jurisdictions. His practice handles civil litigation, employment-related disputes, and regulatory matters for individuals and businesses across Bihar.

पटना उच्च न्यायालय ने वह बरी रद्द कर दी जो बिना किसी साक्ष्य को विधिवत दर्ज किए ही पारित कर दी गई थी।
न्यायालय ने माना कि सत्र न्यायाधीश और लोक अभियोजक गवाहों को उपस्थित कराने के अपने बुनियादी कर्तव्यों का पालन करने में विफल रहे।
मामले को पुनः आपराधिक मुकदमे के लिए वापस भेज दिया गया है और अभियुक्त के विरुद्ध गैर-जमानती वारंट जारी किया गया है।
अब सत्र न्यायालय को यह सुनिश्चित करना होगा कि गवाहों को पेश किया जाए और वास्तविक साक्ष्य सुनने के बाद ही मामले का निर्णय किया जाए।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला थाना–भितहा, थाना क्षेत्र बैरिया, जिला पश्चिम चंपारण के एक गांव के विवाद से उत्पन्न हुआ। पीड़ित, शर्मा दुबे ने 22.01.2009 को सायं 18:15 बजे टाउन थाना, बेतिया के एस.आई. नागेंद्र पासवान के समक्ष फर्दबयान दर्ज कराया।

उन्होंने आरोप लगाया कि 21.01.2009 को रात्रि लगभग 8–9 बजे उनके सहग्रामवासी राजेंद्र द्विवेदी फावड़े से उनकी जमीन की मेड़ काट रहे थे। जब उन्होंने आपत्ति की तो झगड़ा हुआ, लेकिन ग्रामीणों ने उसे शांत करा दिया। उसी रात बाद में, लगभग 8 बजे, आरोप है कि राजेंद्र द्विवेदी, उसके पुत्र अमित और सुमित तथा बैरिस्टर (बरिसरार) द्विवेदी लाठी, डंडा और रस्सी से लैस होकर सूचक के घर में घुसे, उसे गाली दी और फिर उस पर हमला कर दिया।

फर्दबयान के अनुसार, राजेंद्र और उसके दोनों पुत्रों ने सूचक के गले में रस्सी डालकर खींचा, जिससे दम घुटने और सांस लेने में तकलीफ होने लगी, जबकि बैरिस्टर ने कथित रूप से उसकी पीठ और शरीर के अन्य हिस्सों पर लाठी से प्रहार किया। जब सूचक की पत्नी और बेटी ने उसे बचाने की कोशिश की तो कई सहग्रामवासी दौड़कर आए और बीच-बचाव किया। सूचक ने यह भी आरोप लगाया कि उसकी जेब से 1,500 रुपये निकाल लिए गए और केस दर्ज करने पर जान से मार देने की धमकी दी गई।

इसी आधार पर बैरिया थाना कांड संख्या 22/2009 दिनांक 01.02.2009 दर्ज किया गया, जिसमें भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 341, 323/307, 379, 427, 428, 504/34 के अंतर्गत अपराध आरोपित किए गए।

पुलिस ने अनुसंधान कर आरोप–पत्र दाखिल किया, जिसमें सात गवाहों के नाम दिए गए थे, जिनमें सूचक, तीन प्रत्यक्षदर्शी ग्रामीण, एम.जे.के. अस्पताल, बेतिया के चिकित्सक तथा दो पुलिस अधिकारी (अनुसंधानकर्ता अधिकारी और एक सहायक उप–निरीक्षक) शामिल थे। 10.06.2010 को मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी, बेतिया ने IPC की धारा 341, 323, 307, 379, 427, 448 एवं 504/34 के अंतर्गत अपराधों पर संज्ञान लिया और चार अभियुक्तों को मुकदमे का सामना करने के लिए समन किया। मूल रूप से नामित दो व्यक्तियों, अमित और सुमित, को मुकदमे के लिए नहीं भेजा गया।

चूंकि IPC की धारा 307 का वाद अनन्य रूप से सत्र न्यायालय द्वारा विचारणीय है, इसलिए 20.07.2011 को अभिलेख सत्र न्यायालय को प्रतिहस्तांतरित कर दिए गए। 22.07.2011 को सत्र वाद संख्या 323/2011 दर्ज किया गया।

अभियुक्तों ने दंड प्रक्रिया संहिता (Cr.P.C.) की धारा 227 और 228 के तहत डिस्चार्ज याचिका दायर कर यह दावा किया कि यह मामला भूमि विवाद से उत्पन्न बैरिया थाना कांड संख्या 29/2009 का प्रतिशोध मात्र है। 18.04.2012 को सत्र न्यायालय ने यह प्रार्थना खारिज कर दी और 01.05.2012 को IPC की धारा 307/34, 448, 504 और 342 के अंतर्गत आरोप तय कर आगे बढ़ा।

किन्तु 2012 से आगे मुकदमे की कार्यवाही व्यावहारिक रूप से ठप हो गई। कोई भी अभियोजन गवाह परीक्षित नहीं किया गया। अभिलेखों से अनेक स्थगन, विभिन्न अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीशों के बीच फाइल का स्थानांतरण, गवाहों को उपस्थित कराने के लिए प्रभावी कार्रवाइयों का अभाव और सहायक लोक अभियोजक (APP) की बार–बार गैर–हाजिरी या निष्क्रियता परिलक्षित होती है।

कुछ आदेशों में समन, जमानतीय वारंट और गैर–जमानती वारंट का उल्लेख होने के बावजूद, अभिलेख में इनके विधिवत तामील या निष्पादन का कोई प्रमाण नहीं है। यहां तक कि बेतिया के पुलिस अधीक्षक को गवाहों को उपलब्ध कराने में सहायता हेतु लिखे जाने वाले एक कथित पत्र के संबंध में भी अभिलेख पर न तो प्रेषण का सबूत है और न ही प्राप्ति का।

एक अवसर पर, 05.12.2018 को, एक अभियोजन गवाह (राकेश कुमार द्विवेदी) अदालत में अवश्य उपस्थित हुआ, लेकिन उसी दिन अभियुक्त पक्ष उपस्थित न होने और उसके जमानत बंधपत्र के रद्द हो जाने के कारण, गवाह का बयान दर्ज नहीं हो सका और उसे बिना परीक्षा के लौटना पड़ा।

अंततः, 13.12.2019 को, जिला एवं अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश–V–सह–विशेष न्यायाधीश, उत्पाद, बेतिया ने यह कहते हुए प्रतिवादी संख्या 2, बैरिस्टर द्विवेदी को दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 232 के अंतर्गत बरी कर दिया कि अनेक अवसर दिए जाने के बावजूद एक भी अभियोजन गवाह परीक्षित नहीं हुआ। यह एक पृष्ठ का आदेश था जो राज्य के प्रतिनिधि की अनुपस्थिति में पारित किया गया।

पीड़ित ने दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 372 के प्रावधान (अब निरस्त) का उपयोग करते हुए, पटना उच्च न्यायालय में बरी के आदेश को चुनौती देने के लिए Criminal Appeal (DB) No.144 of 2021 दायर की।

न्यायालय ने क्या परखा और क्या निर्णय दिया

पटना उच्च न्यायालय ने पहले अपील दायर करने में हुई देरी के प्रश्न पर विचार किया। विवादित निर्णय 13.12.2019 का था और सामान्य परिसीमा अवधि 12.03.2020 को समाप्त हो जाती। अपील इस अवधि के बाद दायर हुई थी।

अपीलकर्ता ने स्पष्ट किया कि कोविड–19 मामलों में तेज वृद्धि और देशव्यापी लॉकडाउन के कारण वह समय पर अपील दायर नहीं कर सका। Civil Writ (Suo Moto) No. 03 of 2020 में सर्वोच्च न्यायालय के आदेशों पर भरोसा करते हुए न्यायालय ने नोट किया कि 15.03.2020 से 28.02.2022 तक की अवधि को परिसीमा गणना से बाहर रखा जाना है। राज्य के लिए उपस्थित अधिवक्ता अतिरिक्त लोक अभियोजक ने इस स्थिति का विरोध नहीं किया।

उच्च न्यायालय ने स्पष्टीकरण स्वीकार किया, पाया कि 324 दिनों की देरी का समुचित हिसाब दिया जा चुका है और I.A. No. 01 of 2025 को स्वीकार करते हुए देरी को माफ कर दिया।

विवाद के गुण–दोष पर आते हुए, न्यायालय ने दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 232 के अंतर्गत दिनांक 13.12.2019 के एक पृष्ठीय बरी आदेश की बारीकी से जांच की। सत्र न्यायालय ने दर्ज किया था कि अनेक कदम उठाए जाने और कई अवसर दिए जाने के बावजूद कोई अभियोजन गवाह उपस्थित नहीं हुआ, और इसलिए 2012 से मुकदमे का सामना कर रहे अभियुक्त को “हित–न्याय” में साक्ष्य के अभाव में बरी किया जा रहा है।

इसके बाद उच्च न्यायालय ने वास्तव में यह देखने के लिए निचली अदालत के अभिलेखों की ओर रुख किया कि इन वर्षों के दौरान वास्तव में क्या हुआ था। इस गहन छानबीन से गंभीर चूकें सामने आईं।

पहले, 01.05.2012 को आरोप तय होने के बाद, सत्र न्यायालय की आदेश–पत्रिका के हाशिये पर यह टिप्पणी है कि गवाह संख्या 1 से 4 को समन जारी किए गए हैं। किन्तु इस प्रविष्टि के नीचे कोई हस्ताक्षर नहीं है और न ही अभिलेख में कोई समन या सेवा प्रतिवेदन है जिससे पता चले कि गवाहों को वास्तव में विधिवत समन किया गया।

दूसरे, 04.03.2013 की आदेश–पत्रिका के हाशिये पर “W.A. issued” लिखा है, जिससे गवाहों के विरुद्ध वारंट ऑफ अरेस्ट जारी होने का संकेत मिलता है। फिर भी न तो कोई हस्ताक्षर है, न कोई वारंट अभिलेख पर है और न ही कोई निष्पादन प्रतिवेदन। उच्च न्यायालय ने विशेषत: रेखांकित किया कि ऐसा कुछ भी नहीं है जिससे यह साबित हो कि कोई वारंट वास्तव में निष्पादित हुआ।

तीसरे, 07.08.2014 को सत्र न्यायालय ने बेतिया के पुलिस अधीक्षक को गवाहों को प्रस्तुत कराने के लिए पत्र लिखे जाने का निर्देश दिया। ऐसे पत्र की साइक्लोस्टाइल प्रति अभिलेख में है, किन्तु उसके प्रेषण का कोई प्रमाण नहीं है और न ही इस बात का कोई संकेत है कि वह एस.पी. के कार्यालय तक पहुंचा या उसका कोई प्रत्युत्तर आया।

इसके बाद वर्षों तक मामला प्रायः केवल औपचारिक स्थगनों के जरिए ही आगे बढ़ता रहा। उच्च न्यायालय ने देखा कि लोक अभियोजक प्राय: उपस्थित नहीं होते थे और उनकी अनुपस्थिति को आदेश–पत्रिका में दर्ज भी किया गया है। फाइल विभिन्न अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीशों के पास स्थानांतरित होती रही। A.D.J.–IV, बेतिया के समक्ष अभियोजन ने कोई हाजिरी (हाजरी) या पैरवी नहीं की।

जब मामला 03.04.2018 को A.D.J.–V, बेतिया के समक्ष आया तो पहली बार अभियोजन की उपस्थिति दर्ज की गई। न्यायालय ने गवाहों के लिए जमानतीय वारंट जारी करने का आदेश दिया, लेकिन फिर भी अभिलेख पर किसी निष्पादन प्रतिवेदन का उल्लेख नहीं है।

05.12.2018 को एक महत्वपूर्ण क्षण आया: एक अभियोजन गवाह, राकेश कुमार द्विवेदी, वास्तव में अदालत में उपस्थित हुआ। किंतु उसी दिन अभियुक्त पक्ष की कोई उपस्थिति नहीं थी, उसका जमानत बांड रद्द कर दिया गया और गवाह का बयान दर्ज किए बिना ही उसे लौटना पड़ा। इस प्रकार, जब गवाह तैयार था, तब भी व्यवस्था उसके साक्ष्य को दर्ज करने में विफल रही।

23.02.2019 को अभियुक्त ने आत्मसमर्पण किया, 1,000 रुपये गवाह खर्च अदा करने और प्रत्येक तिथि पर उपस्थित रहने का वचन देने के बाद उसका जमानत बांड बहाल कर दिया गया। इसके बाद के आदेशों में यह तो दर्ज है कि कोई गवाह उपस्थित नहीं हुआ, परंतु अधिक महत्वपूर्ण बात यह है कि APP ने प्राय: कोई पैरवी नहीं की।

06.11.2019 को गवाहों के विरुद्ध गैर–जमानती वारंट (NBW) जारी होने का उल्लेख है, लेकिन फिर भी अभिलेख में निष्पादन प्रतिवेदन का कोई अता–पता नहीं है।

06.12.2019 को, जब राज्य की ओर से कोई प्रतिनिधि उपस्थित नहीं था पर अभियुक्त उपस्थित था, सत्र न्यायालय ने दर्ज किया कि कई अवसर दिए जाने के बावजूद कोई भी अभियोजन गवाह परीक्षित नहीं हुआ है। उसने अभियोजन को “अंतिम अवसर” दिया और चेतावनी दी कि यदि कोई गवाह प्रस्तुत नहीं हुआ तो साक्ष्य बंद कर दिए जाएंगे। महत्वपूर्ण रूप से, इस आदेश पर “Seen Chandrashekhar Prasad, APP, 06.12.2019” का अनुमोदन दर्ज है, जो स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि APP इस स्थिति की गम्भीरता से अवगत था। फिर भी, अगले सप्ताह में गवाहों को प्रस्तुत कराने के लिए कोई कदम नहीं उठाया गया, जिसके परिणामस्वरूप 13.12.2019 को विवादित बरी का आदेश पारित हो गया।

इन तथ्यों का अवलोकन करने के बाद उच्च न्यायालय ने निष्कर्ष निकाला कि सत्र न्यायालय ने केवल यांत्रिक ढंग से समन, जमानतीय वारंट और गैर–जमानती वारंट जारी होने का उल्लेख किया, परंतु कभी यह सुनिश्चित नहीं किया कि उनकी तामील या निष्पादन वास्तव में हो। गवाहों को उपलब्ध कराने के लिए कोई प्रभावी प्रयास नहीं हुआ। पुलिस अधीक्षक के साथ विधिवत अनुवर्तन नहीं किया गया और यह भी स्पष्ट नहीं है कि उन्हें लिखा गया पत्र कभी पहुंचा भी या नहीं।

न्यायालय ने यह भी पाया कि APP का आचरण “अत्यंत लापरवाह” था। अधिकांश तिथियों पर वह अनुपस्थित रहा या पैरवी करने में विफल रहा, और 06.12.2019 के “अंतिम अवसर” वाले आदेश को देख लेने के बाद भी उसने अभियोजन के मामले की रक्षा हेतु कोई कदम नहीं उठाया।

फौजदारी मुकदमों में अदालतों और लोक अभियोजकों को कैसे कार्य करना चाहिए, इसे रेखांकित करने के लिए उच्च न्यायालय ने सर्वोच्च न्यायालय के दो निर्णयों पर भरोसा किया।

पहले, उसने Shailendra Kumar v. State of Bihar & Ors., AIR 2002 SC 272 का हवाला दिया। उस निर्णय के पैरा 9 में सर्वोच्च न्यायालय ने उस स्थिति की आलोचना की थी, जिसमें न्यायालय और APP ने थाना प्रभारी को सूचित किए बिना ही इस तरह आगे बढ़ गए मानो कोई साक्ष्य प्रस्तुत ही नहीं हुआ हो, और यह जोर देकर कहा था कि:

  • सत्र न्यायाधीशों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि अनुसंधानकर्ता अधिकारी की उपस्थिति रहे;
  • गवाहों को उपस्थित रखना I.O. का दायित्व है;
  • यदि गवाह उपस्थित नहीं होते, तो न्यायालय को कार्रवाई करनी चाहिए, जिसमें जमानतीय या गैर–जमानती वारंट जारी करना भी शामिल है;
  • अभियोजन को ऐसे तरीकों से विफल होने की अनुमति नहीं दी जा सकती, जिससे पीड़ितों को असहाय छोड़ दिया जाए।

दूसरे, उच्च न्यायालय ने Harendra Rai v. State of Bihar & Ors., (2023) 13 SCC 563 का उल्लेख किया, विशेषकर पैरा 66 और 67, जिसमें सर्वोच्च न्यायालय ने अभियोजन और सत्र न्यायालयों की गंभीर चूकों का सार दिया था, जैसे मुख्य गवाहों और I.O. को पेश न करना और लोक अभियोजक की संदिग्ध भूमिका।

इन निर्णयों से मार्गदर्शन लेते हुए पटना उच्च न्यायालय ने माना कि इस मामले में सत्र न्यायालय ने स्थापित विधिक प्रक्रिया का पालन नहीं किया। गवाहों को विधिवत उपलब्ध कराने में असफल रहते हुए और फिर “साक्ष्य के अभाव” के आधार पर अभियुक्त को बरी कर देने से सत्र न्यायालय ने “न्यायपूर्ण कार्रवाई में एक रुकावट” खड़ी कर दी।

पीठ ने जोर देकर कहा कि निष्पक्ष सुनवाई की अवधारणा के लिए हस्तक्षेप आवश्यक था। अतः न्यायालय ने:

  • 13.12.2019 के बरी आदेश को निरस्त कर दिया;
  • मामले को पुनः विचारार्थ सत्र न्यायालय के पास भेज दिया, साथ ही स्पष्ट निर्देश दिया कि कानून के अनुरूप गवाहों की उपस्थिति सुनिश्चित की जाए;
  • पुलिस अधीक्षक, बेतिया तथा लोक अभियोजक, बेतिया को निर्देश दिया कि वे सत्र न्यायालय द्वारा निर्धारित तिथियों पर गवाहों की उपस्थिति सुनिश्चित करें;
  • नोट किया कि अभियुक्त–प्रतिवादी संख्या 2, नोटिस की तामील के बावजूद उच्च न्यायालय के समक्ष उपस्थित नहीं हुआ और परिणामस्वरूप उसके विरुद्ध गैर–जमानती वारंट (NBW) जारी किया।

न्यायालय ने आगे निर्देश दिया कि अभियुक्त–प्रतिवादी संख्या 2 या तो आत्मसमर्पण करे या उसे सत्र न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत किया जाए, जहां वह जमानत के लिए आवेदन कर सकता है। किसी भी जमानत याचिका पर उसी दिन निर्णय किया जाएगा और ऐसी शर्तें लगाई जाएंगी जो हर तिथि पर उसकी उपस्थिति सुनिश्चित करने के लिए पर्याप्त हों।

अंततः, अपील स्वीकार कर ली गई। पटना उच्च न्यायालय ने विशेष रूप से यह भी आदेश दिया कि पुलिस अधीक्षक, बेतिया स्वयं दो सप्ताह के भीतर NBW के निष्पादन को सुनिश्चित करें और इसकी रिपोर्ट उच्च न्यायालय के रजिस्ट्रार जनरल को भेजें।

यह निर्णय क्यों महत्वपूर्ण है

यह फैसला हिंसक अपराधों के पीड़ितों और बिहार में लंबित सभी आपराधिक मुकदमों के लिए महत्वपूर्ण है। यह दर्शाता है कि पटना उच्च न्यायालय केवल इसलिए अभियुक्त को बरी होने नहीं देगा कि तंत्र ने मामले पर सोया रहा।

जब सत्र न्यायालय और लोक अभियोजक गवाहों को बुलाने या समन–वारंट की तामील पर अनुवर्तन जैसे बुनियादी कदम नहीं उठाते हैं, तो केवल “साक्ष्य के अभाव” के आधार पर मामला बंद नहीं किया जाना चाहिए। उच्च न्यायालय ने स्पष्ट कर दिया है कि न्यायालय और अभियोजन का दायित्व है कि वे सक्रिय रूप से यह सुनिश्चित करें कि साक्ष्य अभिलेख पर लाया जाए।

यह निर्णय इस विचार को सुदृढ़ करता है कि “निष्पक्ष सुनवाई” केवल अभियुक्त के लिए नहीं, बल्कि पीड़ित के लिए भी है। यदि गवाहों को ठीक से समन नहीं किया जाता या वे उपस्थित होकर भी बिना परीक्षा के लौटा दिए जाते हैं, तो विफलता न्याय व्यवस्था की है, आवश्यक रूप से पीड़ित या उसके मामले की विश्वसनीयता की नहीं।

अभियुक्त के विरुद्ध गैर–जमानती वारंट जारी करने और उसके निष्पादन के लिए पुलिस अधीक्षक पर व्यक्तिगत जवाबदेही तय करने का निर्देश भी यह संदेश देता है: एक बार उच्च न्यायालय ने नए सिरे से मुकदमा चलाने का आदेश दे दिया, तो सभी अधिकारी–कर्मचारियों को सहयोग करना होगा और वे देरी नहीं कर सकते।

विधिक प्रश्न और उनके उत्तर

  • प्रश्न: क्या कोविड–19 व्यवधान और सर्वोच्च न्यायालय के परिसीमा संबंधी आदेशों के मद्देनजर, पीड़ित की बरी के विरुद्ध अपील दायर करने में हुई देरी को माफ किया जा सकता था?
    उत्तर: हां। सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशानुसार 15.03.2020 से 28.02.2022 की अवधि को परिसीमा से बाहर रखते हुए, पटना उच्च न्यायालय ने माना कि 324 दिनों की देरी का संतोषजनक स्पष्टीकरण दे दिया गया है और देरी को माफ कर दिया।
  • प्रश्न: क्या अभियोजन के किसी गवाह के परीक्षित न होने के आधार पर सत्र न्यायालय द्वारा दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 232 के तहत अभियुक्त को बरी करना न्यायोचित था?
    उत्तर: नहीं। उच्च न्यायालय ने पाया कि सत्र न्यायालय और APP ने गवाहों को सुरक्षित करने और परीक्षित कराने के आवश्यक विधिक कदम नहीं उठाए, समन एवं वारंट की तामील–निष्पादन सुनिश्चित नहीं किया। अतः बरी किया जाना स्थापित प्रक्रिया के प्रतिकूल था और उसे रद्द कर दिया गया।
  • प्रश्न: इस मामले की परिस्थितियों में निष्पक्ष सुनवाई सुनिश्चित करने के लिए कौन–कौन से निर्देश आवश्यक थे?
    उत्तर: उच्च न्यायालय ने मामले को पुनः विचारार्थ सत्र न्यायालय को भेजा, सत्र न्यायालय को गवाहों की उपस्थिति सुनिश्चित करने का निर्देश दिया, पुलिस अधीक्षक और लोक अभियोजक, बेतिया को गवाहों की प्रस्तुति सुनिश्चित करने के लिए बाध्य किया, अभियुक्त के विरुद्ध गैर–जमानती वारंट जारी किया और यह निर्देश दिया कि किसी भी जमानत आवेदन पर शीघ्रतापूर्वक कड़े शर्तों के साथ निर्णय लिया जाए।

न्यायालय द्वारा उद्धृत वाद

  • Shailendra Kumar v. State of Bihar & Ors., AIR 2002 SC 272 – सत्र न्यायाधीश और लोक अभियोजक के उन कर्तव्यों के लिए भरोसा किया गया, जिनके तहत उन्हें अनुसंधान अधिकारी और गवाहों की उपस्थिति सुनिश्चित करनी होती है तथा अभियोजन को विफल होने से बचाना होता है।
  • Harendra Rai v. State of Bihar & Ors., (2023) 13 SCC 563 – इस बात को संक्षेपित करने के लिए उद्धृत किया गया कि जब मुख्य गवाहों और अनुसंधान की औपचारिकताओं को पेश या सिद्ध नहीं किया जाता, तो अभियोजन और सत्र न्यायालय की कौन–कौन सी गंभीर चूकें मानी जाती हैं।
  • यदि अन्य किसी वाद का उल्लेख किया गया हो, तो वह इस उद्धृत निर्णय–पाठ में नहीं दिया गया है।

मामले का विवरण

वाद संख्या: Criminal Appeal (DB) No.144 of 2021; Bairiya P.S. Case No. 22 of 2009 से उत्पन्न; Sessions Trial No. 323 of 2011; CIS-Session Case 2123 of 2013.

वाद का शीर्षक: Sharma Dubey v. The State of Bihar & Anr.

उद्धरण: 2026(3) PLJR 294

पीठ: माननीय श्री न्यायमूर्ति राजीव रंजन प्रसाद एवं माननीय न्यायमूर्ति श्रीमती सोनी श्रीवास्तव

अधिवक्ता: अपीलकर्ता (पीड़ित) की ओर से अधिवक्ता श्री बिमलेश कुमार पांडे; राज्य (प्रतिवादी संख्या 1) की ओर से अतिरिक्त लोक अभियोजक श्री दिलीप कुमार सिन्हा। अभिलेख में प्रतिवादी संख्या 2 के लिए किसी पृथक अधिवक्ता का उल्लेख नहीं है।

वाद का स्वरूप: बरी के आदेश के विरुद्ध पीड़ित की आपराधिक अपील (दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 372 के प्रावधान के तहत, जो अब निरस्त है), जो दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 232 के अंतर्गत पारित बरी के आदेश के विरुद्ध है, जिसमें IPC की धारा 307/34, 448, 504 और 342 के तहत अपराध आरोपित थे।

निर्णय का लिंक: Full text of Patna High Court judgment


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