विवाद की पृष्ठभूमि
याचिकाकर्ता पटना निवासी हैं, जिन्होंने मौजा मानपुर बैरिया, थाना कोड संख्या 174, तौजी संख्या 360 में एक छोटा भूखंड खरीदा।
भूमि खाता संख्या 616, सर्वे प्लॉट संख्या 314 (अंश), रकबा 10 धुर से संबंधित है, जो 1.5625 डिसिमल के बराबर है। उन्होंने यह भूमि एक अभिकरित पंजीकृत बिक्री विलेख दिनांक 11.03.2015 के माध्यम से दो विक्रेताओं, रंजन कुमार और चंदन कुमार, दोनों पुत्र श्री सुरेन्द्र प्रसाद सिन्हा से खरीदी।
खरीद के बाद, उन्होंने अंचल अधिकारी के समक्ष नामांतरण के लिए आवेदन किया, जो इस मामले में प्रतिवादी संख्या 3 हैं। उनके आवेदन को नामांतरण वाद संख्या 2338/04/2014-15 के रूप में दर्ज किया गया। जांच के बाद, उनके नाम नामांतरण हुआ और उनके पक्ष में जमाबंदी बना दी गई।
कुछ वर्ष बाद, जैसा कि निर्णय में दर्ज नहीं है, बिना किसी पूर्व चेतावनी के, याचिकाकर्ता को अतिरिक्त समाहर्ता, पटना के न्यायालय से एक पृष्ठ की नोटिस प्राप्त हुई, जो प्रतिवादी संख्या 2 हैं। इस नोटिस में उन्हें सूचित किया गया कि उनके विरुद्ध जमाबंदी रद्दीकरण मामला संख्या 25/2021-22 शुरू किया गया है।
दिनांक 13.07.2021 की इस नोटिस में केवल 02.09.2021 को सुनवाई की तिथि निर्धारित की गई और उनसे आवश्यक अभिलेखों के साथ उपस्थित होने को कहा गया, अन्यथा एकपक्षीय आदेश पारित किए जा सकते हैं। इसमें यह नहीं बताया गया कि जमाबंदी पर आपत्ति क्यों है या किस विधि का उल्लंघन बताया गया है।
यह महसूस करते हुए कि यह न न्यायसंगत है न विधिसम्मत, याचिकाकर्ता संविधान के अनुच्छेद 226 के अंतर्गत पटना उच्च न्यायालय पहुँचीं। उन्होंने जमाबंदी रद्दीकरण कार्यवाही तथा विवादित नोटिस दोनों को रद्द करने और अन्य उपयुक्त राहतें, जिसमें व्यय भी शामिल है, मांगीं।
न्यायालय ने क्या परीक्षण किया और क्या निर्णय दिया
याचिकाकर्ता की मूल शिकायत बिहार भूमि नामांतरण अधिनियम, 2011 की धारा 9 के अंतर्गत जारी नोटिस की वैधता के संबंध में थी।
याचिकाकर्ता के अनुसार, धारा 9 यह अपेक्षा करती है कि जमाबंदी रद्दीकरण प्रारम्भ करने से पहले अतिरिक्त समाहर्ता के पास कुछ स्पष्ट कारण हों, जिससे यह प्रतीत हो कि जमाबंदी विधि या सरकारी निर्देशों के उल्लंघन में बनाई गई है। उनका तर्क था कि उन पर जो नोटिस जारी हुई उसमें ऐसे कोई आधार दर्ज नहीं थे, अतः वह क्षेत्राधिकार से परे है।
उनके अधिवक्ता ने प्रस्तुत किया कि नोटिस अस्पष्ट और संक्षिप्त है। इसमें किसी प्रकार का विचार-प्रयोग प्रदर्शित नहीं होता और याचिकाकर्ता को यह भी अंदाजा नहीं होता कि उन्हें किस बात का प्रतिवाद करना है। रद्दीकरण कार्यवाही प्रारम्भ करने का कोई आधार नोटिस में दर्ज नहीं था, जिससे उनके लिए प्रभावी उत्तर देना असंभव हो गया।
दूसरी ओर, राज्य ने अपने अधिवक्ता के माध्यम से भिन्न चित्र प्रस्तुत किया। काउंटर एफिडेविट का हवाला देते हुए, राज्य ने बताया कि मामला स्थानीय स्तर पर किस प्रकार उठा।
जन शिकायतों के निवारण के लिए आयोजित साप्ताहिक बैठक में, जो संबंधित थाना एवं अंचल अधिकारी द्वारा संयुक्त रूप से की जाती है, विजय कुमार सिन्हा नामक व्यक्ति ने शिकायत की। उनका आरोप था कि कुछ व्यक्ति, अर्थात् रंजन कुमार, अनिल मेहता, सुनील कुमार सिन्हा और बली राय, उनकी भूमि पर विवाद उत्पन्न कर रहे हैं।
शिकायत की पुष्टि के लिए राजस्व कर्मचारी से भूमि संबंधी प्रतिवेदन देने को कहा गया। उन्होंने मौजा-बैरिया, थाना संख्या 122, खाता संख्या 616, प्लॉट संख्या 314 (क्षेत्रफल 13 डिसमिल) और प्लॉट संख्या 350 (क्षेत्रफल 17 डिसमिल) की विवरणी, इन भूमियों पर दर्ज राययतों के नाम तथा बनी हुई जमाबंदियों के नंबर सहित, प्रस्तुत की।
इसके बाद, सभी संबंधित व्यक्तियों को नोटिसें जारी की गईं। जांच में पाया गया कि प्लॉट संख्या 314 और 350 दोनों खाली भूमि हैं तथा पक्षकारों के बीच कब्जे को लेकर विवाद है।
संपतचक अंचल अधिकारी ने अपने समक्ष उपलब्ध सामग्री पर विचार कर यह पाया कि भूमि पर अधिकार के दावों को लेकर गंभीर विवाद है। उन्होंने यह भी देखा कि कुछ व्यक्तियों के पक्ष में बिना समुचित जांच के तथा उनके वास्तविक कब्जे के बिना ही जमाबंदियां बना दी गई थीं।
इसी आधार पर अंचल अधिकारी ने दिनांक 26.03.2021 का आदेश पारित कर ऐसी बिना आधार की बनाई गई जमाबंदियों को रद्द करने की अनुशंसा की। इसके बाद प्रकरण को अतिरिक्त समाहर्ता, पटना के पास “आवश्यक कार्यवाही हेतु” संदर्भित कर दिया गया।
इन तथ्यों के आधार पर राज्य का तर्क था कि याचिकाकर्ता को उच्च न्यायालय आने के बजाय अतिरिक्त समाहर्ता के समक्ष चल रही कार्यवाही में सम्मिलित होना चाहिए था। राज्य के अनुसार, उन्हें अभिलेखों सहित अपना कारण बताने का प्रभावी अवसर प्राप्त था, अतः केवल एक नोटिस के विरुद्ध दायर रिट याचिका पर विचार नहीं किया जाना चाहिए।
राज्य ने यह भी तर्क दिया कि जब जमाबंदी रद्दीकरण कार्यवाही में याचिकाकर्ता के पास वैकल्पिक अथवा वैधानिक उपाय उपलब्ध था, तो उच्च न्यायालय को अनुच्छेद 226 के अंतर्गत हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए।
जवाब में, याचिकाकर्ता ने इंगित किया कि वे वास्तव में 02.09.2021 को अपने अधिवक्ता के माध्यम से अतिरिक्त समाहर्ता के समक्ष उपस्थित हुई थीं, जैसा कि आई.ए. संख्या 1 वर्ष 2022 में उल्लिखित है। उन्होंने कार्यवाही प्रारम्भ करने के पीछे के कागजात और कारणों की मांग की थी।
उन्हें केवल यह बताया गया कि कार्यवाही अंचल अधिकारी की अनुशंसा पर प्रारम्भ की गई है, किंतु कोई दस्तावेज या अभिलेख उन्हें उपलब्ध नहीं कराए गए। इस प्रकार, उन्हें वास्तविक आरोपों या उनके विरुद्ध सामग्री के संबंध में अंधेरे में रखा गया।
माननीय न्यायाधीश प्रभात कुमार सिंह ने दोनों पक्षों के तर्कों पर विचार किया और विवादित नोटिस दिनांक 13.07.2021 का परीक्षण किया।
न्यायालय ने देखा कि नोटिस में केवल सुनवाई की तिथि तय की गई थी और याचिकाकर्ता को आवश्यक अभिलेखों सहित उपस्थित होने का निर्देश दिया गया था। इसमें किसी कारण का उल्लेख नहीं था और न ही यह संकेत था कि क्या आरोप है। ऐसा कुछ भी नहीं था जिससे यह स्पष्ट हो कि अतिरिक्त समाहर्ता की प्रारंभिक राय यह है कि याचिकाकर्ता के नाम की जमाबंदी किसी कानून या सरकारी निर्देश का उल्लंघन करती है।
इसके बाद न्यायालय ने बिहार भूमि नामांतरण अधिनियम, 2011 की धारा 9(1) का परीक्षण किया। इस धारा के अंतर्गत, अतिरिक्त समाहर्ता स्वयं या किसी आवेदन पर, ऐसी किसी भी जमाबंदी की जांच कर सकते हैं जो उन्हें विधि या कार्यपालक निर्देशों के उल्लंघन में बनाई हुई प्रतीत होती हो।
धारा में आगे यह प्रावधान है कि अतिरिक्त समाहर्ता, पक्षकारों को उचित अवसर देकर, उन्हें उपस्थित होने, साक्ष्य प्रस्तुत करने और सुने जाने का मौका देकर, ऐसी जमाबंदी रद्द कर सकते हैं, उस पर अधिकार जताने वाले व्यक्ति को बेदखल कर सकते हैं और वैध स्वामी या अभिकर्ता को न्यायोचित तथा समुचित शर्तों पर कब्जा दिला सकते हैं।
न्यायालय ने इस पर बल दिया कि धारा 9 के अंतर्गत जारी कोई भी नोटिस कम से कम मूलभूत कारण तो बताती ही होनी चाहिए। यह संकेत अवश्य होना चाहिए कि अतिरिक्त समाहर्ता की राय में जमाबंदी विधि या निर्देशों के प्रतिकूल बनाई गई है।
इस मामले में, नोटिस में यह नहीं बताया गया था कि कौन सा कानून उल्लंघित हुआ, कौन-सा कार्यपालक निर्देश तोड़ा गया, या किन तथ्यों के आधार पर यह निष्कर्ष निकाला गया। न्यायालय ने इस नोटिस को “पूर्णत: अस्पष्ट, संक्षिप्त और [किसी भी] विचार-प्रयोग को प्रदर्शित न करने वाली” करार दिया।
वैकल्पिक उपाय की प्रारंभिक आपत्ति पर न्यायालय ने उच्चतम न्यायालय के सुप्रसिद्ध निर्णय Whirlpool Corporation vs. Registrar of Trade Marks, Mumbai and Others, रिपोर्टेड इन (1998) 8 SCC 1, पर भरोसा किया।
इस निर्णय का हवाला देते हुए न्यायालय ने माना कि वैकल्पिक उपाय का अस्तित्व रिट याचिका पर पूर्ण निषेध नहीं है। यदि कोई आदेश पूर्णत: अधिकार-क्षेत्र से बाहर हो, तो उच्च न्यायालय नोटिस की अवस्था में भी हस्तक्षेप कर सकता है और करना चाहिए, विशेषकर जब इससे गंभीर पूर्वाग्रह उत्पन्न हो सकता हो।
इस सिद्धांत को लागू करते हुए न्यायालय ने माना कि विवादित नोटिस को धारा 9(1) के अंतर्गत वैध नोटिस नहीं माना जा सकता। चूंकि यह वैधानिक आवश्यकताओं को पूरा नहीं करती, इसलिए यह क्षेत्राधिकार से परे है।
फलस्वरूप, न्यायालय ने विवादित नोटिस दिनांक 13.07.2021 को निरस्त कर दिया और माना कि यह बिहार भूमि नामांतरण अधिनियम, 2011 की धारा 9(1) के अनुरूप नहीं है।
हालांकि, उच्च न्यायालय ने प्राधिकारियों को वैध कार्रवाई करने से नहीं रोका। अंतर्निहित भूमि विवाद और अंचल अधिकारी की पूर्व अनुशंसा को ध्यान में रखते हुए, न्यायालय ने कानून के अनुसार पुनः कार्यवाही करने की स्वतंत्रता प्रदान की।
न्यायालय ने अतिरिक्त समाहर्ता, पटना को निर्देश दिया कि वे याचिकाकर्ता को एक नई कारण बताओ नोटिस जारी करें। इस नई नोटिस में यह स्पष्ट रूप से दर्ज हो कि किन सामग्रियों के आधार पर वे यह राय बनाते हैं कि याचिकाकर्ता के नाम बनाई गई जमाबंदी रद्द किए जाने योग्य है।
न्यायालय ने एक समय-सीमा तय की: ऐसी नोटिस 11.01.2024 से दो माह के भीतर जारी की जानी होगी। उचित नोटिस जारी करने के बाद, अतिरिक्त समाहर्ता को आगे की कार्यवाही सख्ती से विधि के अनुसार करने के लिए कहा गया है।
इन टिप्पणियों और निर्देशों के साथ रिट याचिका स्वीकार कर ली गई।
यह निर्णय क्यों महत्वपूर्ण है
यह निर्णय बिहार के उन सभी भूमिधारकों और खरीदारों के लिए महत्वपूर्ण है जिनके नाम जमाबंदी दर्ज है।
इससे यह स्पष्ट हो गया है कि सरकार खाली अथवा एक पंक्ति की नोटिस के आधार पर जमाबंदी रद्दीकरण कार्यवाही शुरू नहीं कर सकती। नोटिस में उन मूलभूत कारणों और सामग्रियों का उल्लेख होना चाहिए, जिनके आधार पर अधिकारी को जमाबंदी पर संदेह हुआ।
साधारण नागरिकों के लिए इसका अर्थ यह है कि यदि उन्हें कोई ऐसी नोटिस प्राप्त होती है जिसमें कोई विशिष्ट आधार नहीं दिए गए हों, तो वे उसकी वैधता पर प्रश्न उठा सकते हैं। वे बिना आरोप जाने, आँख मूँदकर अपना बचाव करने के लिए बाध्य नहीं हैं।
यह निर्णय यह भी दर्शाता है कि जब कोई प्राधिकारी अपने वैधानिक अधिकार से परे जाकर कार्य करता है, तो पटना उच्च न्यायालय वैकल्पिक उपाय उपलब्ध होने के बावजूद नोटिस की अवस्था में भी हस्तक्षेप करेगा।
साथ ही, न्यायालय ने नागरिकों के अधिकारों और प्रशासन की शक्तियों के बीच संतुलन भी बनाए रखा है। उसने प्राधिकारियों को पूरी तरह कार्यवाही से नहीं रोका है, बल्कि उन्हें विधिसम्मत प्रक्रिया का पालन करते हुए उचित, कारणयुक्त कारण बताओ नोटिस जारी करने के लिए बाध्य किया है।
राजस्व प्राधिकारियों के लिए यह यह स्मरण-पत्र है कि किसी व्यक्ति को उसकी जमाबंदी का बचाव करने के लिए बुलाने से पहले, वे यह स्पष्ट रूप से दर्ज करें कि उन्हें किस आधार पर जमाबंदी अवैध प्रतीत होती है।
कानूनी प्रश्न और उनके उत्तर
- प्रश्न: क्या अतिरिक्त समाहर्ता, बिहार भूमि नामांतरण अधिनियम, 2011 की धारा 9 के अंतर्गत, बिना किसी कारण या आधार बताए नोटिस जारी कर, जमाबंदी रद्दीकरण कार्यवाही शुरू कर सकते हैं?
उत्तर: नहीं। पटना उच्च न्यायालय ने माना कि धारा 9 के अंतर्गत जारी नोटिस में अतिरिक्त समाहर्ता की प्रारंभिक राय दर्ज होनी चाहिए, जिसमें यह भी शामिल हो कि किस कानून या कार्यपालक निर्देश का कथित रूप से उल्लंघन हुआ है। अस्पष्ट, कारणरहित नोटिस क्षेत्राधिकार से परे है और निरस्त किए जाने योग्य है। - प्रश्न: क्या वैकल्पिक या वैधानिक उपाय की उपलब्धता, इस प्रकार की नोटिस जारी होने की अवस्था में, उच्च न्यायालय को हस्तक्षेप करने से रोकती है?
उत्तर: नहीं। Whirlpool Corporation vs. Registrar of Trade Marks पर भरोसा करते हुए न्यायालय ने माना कि जब कोई आदेश या नोटिस पूर्णत: क्षेत्राधिकार से बाहर हो, तो वैकल्पिक उपाय उपलब्ध होने के बावजूद उच्च न्यायालय अनुच्छेद 226 के अंतर्गत नोटिस की अवस्था में भी हस्तक्षेप कर सकता है। - प्रश्न: जमाबंदी रद्दीकरण संबंधी मामले में अवैध नोटिस को निरस्त करने के बाद न्यायालय क्या निर्देश दे सकता है?
उत्तर: न्यायालय ने अतिरिक्त समाहर्ता को निर्देश दिया कि वे दो माह के भीतर नई कारण बताओ नोटिस जारी करें, जिसमें उनकी राय के आधार बनाने वाली सामग्रियों को स्पष्ट रूप से दर्ज किया जाए, और तत्पश्चात कानून के अनुसार आगे की कार्यवाही की जाए।
न्यायालय द्वारा उद्धृत मामले
- (1998) 8 SCC 1, Whirlpool Corporation vs. Registrar of Trade Marks, Mumbai and Others.
मामले का विवरण
मामला संख्या: Civil Writ Jurisdiction Case No. 19368 of 2021
मामले का शीर्षक: Rina Devi vs. The State of Bihar & Ors.
उद्धरण: 2024(1) PLJR 929
पीठ: माननीय श्री न्यायाधीश प्रभात कुमार सिंह
अधिवक्ता: याचिकाकर्ता की ओर से श्री नितेश कुमार, अधिवक्ता; प्रतिवादियों की ओर से श्री मो. खुरशीद आलम, AAG-12; प्रतिवादियों की ओर से श्रीमती नूतन सहाय, AC to AAG-12।
मामले का स्वरूप: भारतीय संविधान के अनुच्छेद 226 के अंतर्गत दायर रिट याचिका, जिसमें जमाबंदी रद्दीकरण कार्यवाही की पहल तथा बिहार भूमि नामांतरण अधिनियम, 2011 की धारा 9 के अंतर्गत जारी संबंधित नोटिस को चुनौती दी गई।
निर्णय की तिथि: 11.01.2024
निर्णय का लिंक: पटना उच्च न्यायालय के पूर्ण निर्णय को पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें
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