मामले की पृष्ठभूमि
याचिकाकर्ता बिहार सरकार के ग्रामीण कार्य विभाग में कार्यपालक अभियंता हैं।
उन्होंने पहली बार 2018 में सिंचाई विभाग, पूर्णिया में सहायक अभियंता के रूप में सरकारी सेवा ज्वाइन की। वर्ष 2013 में उनका स्थानांतरण ग्रामीण कार्य विभाग में सहायक अभियंता के रूप में वैशाली कर दिया गया। 2015 में उनका पुनः स्थानांतरण सहायक अभियंता, ग्रामीण कार्य विभाग के रूप में दलसिंगसराय कर दिया गया, जहां वे 2020 तक कार्यरत रहे।
2020 में उनका स्थानांतरण खगड़िया कर दिया गया। 2022 में उन्हें कार्यपालक अभियंता के पद पर पदोन्नत किया गया और पटना में पदस्थापित किया गया। जून 2024 में उन्हें कार्यपालक अभियंता, ग्रामीण कार्य विभाग, किशनगंज (II) के पद पर तैनात किया गया।
दिनांक 31.01.2025 को एक आदेश जारी कर उन्हें किशनगंज (II) से स्थानांतरित कर ग्रामीण कार्य विभाग में तकनीकी सलाहकार, अधीक्षण अभियंता, मोतिहारी के अधीन पद पर भेज दिया गया। यही स्थानांतरण आदेश है जिसे पटना उच्च न्यायालय के समक्ष सिविल रिट न्यायाधिकार प्रकरण संख्या 3030/2025 के माध्यम से चुनौती दी गई।
न्यायालय ने क्या परखा और क्या निर्णय दिया
पटना उच्च न्यायालय ने माननीय श्री न्यायमूर्ति विवेक चौधुरी के माध्यम से बोलते हुए मुख्य प्रश्न को बहुत स्पष्ट शब्दों में रेखांकित किया। न्यायालय ने यह प्रश्न उठाया कि क्या केवल किसी पूर्व विधायक, किसी सांसद या किसी निजी व्यक्ति द्वारा किसी सरकारी कर्मचारी के विरुद्ध की गई शिकायत के आधार पर कोई कार्यपालक स्थानांतरण आदेश पारित किया जा सकता है।
याचिकाकर्ता ने स्थानांतरण आदेश को कई आधारों पर चुनौती दी। प्रथम, उनका कहना था कि किशनगंज (II) से मोतिहारी का स्थानांतरण, किशनगंज में उनकी पदस्थापना के छह माह के भीतर ही कर दिया गया, जो सामान्य स्थानांतरण नीति के विरुद्ध है, जहां पदस्थापना सामान्यतः अधिक समय के लिए होती है।
दूसरे, उन्होंने यह तर्क दिया कि स्थानांतरण वस्तुतः दंडात्मक है। दूसरे शब्दों में, यह महज़ एक सामान्य प्रशासनिक निर्णय न होकर उन्हें बिना विधिवत विभागीय कार्यवाही के दंडित करने के उद्देश्य से किया गया।
तीसरे, उन्होंने यह इंगित किया कि उन्हें, जो कि एक कार्यपालक अभियंता हैं, ऐसे सहायक अभियंता के स्थान पर पदस्थापित किया गया जो अधीक्षण अभियंता के तकनीकी सलाहकार के रूप में कार्य कर रहे थे। उनके अनुसार, इसका अर्थ यह हुआ कि उच्च पदस्थ अधिकारी को निम्न पद के लिए निर्धारित पद पर भेज दिया गया, जो सामान्य स्थानांतरण नियमों के विपरीत है।
बाद में, एक अनुपूरक हलफनामे के माध्यम से, याचिकाकर्ता ने एक और चुनौती जोड़ी। उनका कहना था कि यह आदेश ग्रामीण कार्य विभाग के अपर मुख्य सचिव द्वारा जारी नहीं किया गया, बल्कि केवल उस पद के प्रभार पर कार्यरत अधिकारी द्वारा जारी किया गया है। उन्होंने ऐसे अधिकारी की अधिकारिता और इस प्रकार आदेश के वैधता पर प्रश्न उठाया।
राज्य प्रतिवादियों — जो ग्रामीण कार्य विभाग के अपर मुख्य सचिव, विशेष सचिव एवं संयुक्त सचिव द्वारा प्रतिनिधित्व कर रहे थे — ने प्रति-हलफनामा दाखिल किया। इस हलफनामे के अनुच्छेद 8 से 11 में उन्होंने अपना पक्ष स्पष्ट किया, जिसे न्यायालय ने अपने निर्णय में उद्धृत किया।
उन्होंने कैबिनेट सचिवालय एवं समन्वय विभाग, बिहार के संकल्प पत्र संख्या 28/2006/434 दिनांक 01.03.2007 का संदर्भ दिया। इस नीति के तहत राज्य सरकार के कर्मचारियों के स्थानांतरण और पदस्थापन सामान्यतः वर्ष में एक बार, जून माह में किए जाने हैं। हालांकि, इसी संकल्प में यह भी प्रावधान है कि पदोन्नति, कार्य की आवश्यकता या प्रशासनिक कारणों से किसी भी समय स्थानांतरण किए जा सकते हैं।
प्रतिवादियों ने आगे कहा कि याचिकाकर्ता की किशनगंज (II) में पदस्थापना के छह माह के भीतर ही विभाग को उनके विरुद्ध तीन शिकायतें प्राप्त हुईं। दिनांक 18.01.2025, 21.10.2024 और 02.10.2024 की इन शिकायतों में कार्य प्र प्रमंडल किशनगंज-2 में भ्रष्ट आचरण, रिश्वत मांगने तथा निविदा निपटान में हेरफेर के आरोप लगाए गए। एक शिकायत वर्तमान सांसद द्वारा, दूसरी पूर्व विधायक द्वारा तथा तीसरी एक निजी ठेकेदार द्वारा की गई थी।
इन शिकायतों के आधार पर ग्रामीण कार्य विभाग के संयुक्त सचिव ने दिनांक 25.10.2024 (पत्र संख्या 27751), 10.01.2025 (पत्र संख्या 403) एवं 13.01.2025 (पत्र संख्या 1213) के तीन पत्रों के माध्यम से विभाग के मुख्य अभियंता-4 को लिखा। इन पत्रों में उन्होंने याचिकाकर्ता के विरुद्ध लगाए गए आरोपों की जांच कराए जाने तथा जांच प्रतिवेदन प्रस्तुत किए जाने का अनुरोध किया।
प्रतिवादियों के अनुसार, इन शिकायतों को ध्यान में रखते हुए तथा कार्य प्र प्रमंडल किशनगंज-2 के अधीन कार्यों के बेहतर निष्पादन के हित में याचिकाकर्ता को किशनगंज से मोतिहारी स्थानांतरित कर दिया गया। उनका यह भी कहना था कि यह आदेश दंडात्मक नहीं बल्कि सुधारात्मक प्रकृति का है।
दोनों पक्षों की दलील सुनने के बाद पटना उच्च न्यायालय ने यह परखा कि वास्तव में यह स्थानांतरण कैसे हुआ। न्यायालय ने यह अवलोकन किया कि राज्य की कार्यपालिका ने मूल रूप से जनप्रतिनिधियों और एक ठेकेदार की शिकायतों के आधार पर याचिकाकर्ता का स्थानांतरण कर दिया।
जब न्यायालय ने पूछा तो राज्य के अधिवक्ता ने सूचित किया कि शिकायतों की सच्चाई जानने के लिए विभागीय जांच अभी भी प्रगति पर है। स्थानांतरण आदेश दिनांक 31.01.2025 के जारी होने के समय कोई प्रारंभिक जांच प्रतिवेदन उपलब्ध नहीं था।
इसके बाद न्यायालय ने लोकतंत्र में कार्यपालिका के कार्य करने के तौर-तरीके पर महत्वपूर्ण टिप्पणियां कीं। न्यायालय ने कहा कि कार्यपालक कार्यवाही स्वतंत्र होनी चाहिए और उस पर जनप्रतिनिधियों के दबाव का प्रभाव नहीं होना चाहिए। यदि मात्र किसी विधायक या सांसद की शिकायत पर किसी अधिकारी का स्थानांतरण कर दिया जाए, तो इसका व्यावहारिक अर्थ यह होगा कि लोकतंत्र के तीन स्तंभों — विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका — में से दो स्तंभ (विधायिका और कार्यपालिका) समान समूह के लोगों द्वारा संचालित हो रहे हैं।
निर्णय में कड़े शब्दों का प्रयोग करते हुए कहा गया कि ऐसी स्थिति में कार्यपालक अधिकारी जनप्रतिनिधियों की उंगलियों के इशारे पर “कठपुतलियों की तरह नाचते” हैं। न्यायालय ने स्पष्ट रूप से कहा कि यह देश की संवैधानिक योजना के अनुरूप नहीं है।
साथ ही न्यायालय ने यह भी स्वीकार किया कि यदि किसी विभागीय कर्मचारी के विरुद्ध भ्रष्टाचार के आरोप हों तो कार्यपालक प्राधिकारी आवश्यक कार्रवाई करने के लिए पूर्णतः सक्षम है। परंतु ऐसी कार्रवाई आरोपों के कम से कम प्रथमदृष्टया सिद्ध होने के आधार पर की जानी चाहिए।
इस मामले में शिकायतों की जांच अभी भी चल रही थी। स्थानांतरण का आदेश पारित किए जाने के समय कोई प्रारंभिक जांच प्रतिवेदन उपलब्ध नहीं था। इन तथ्यों के आधार पर न्यायालय ने असंतोष व्यक्त करते हुए कहा कि विवादित स्थानांतरण आदेश “बिल्कुल भी संतोषजनक नहीं” है। यह अभिव्यक्ति इस बात को दर्शाती है कि न्यायालय के मत में स्थानांतरण के पीछे का निर्णय-प्रक्रिया संतोषजनक एवं परिपक्व नहीं थी।
हालाँकि, इसके बाद न्यायालय ने सुनवाई की तिथि पर विद्यमान वास्तविक स्थिति पर ध्यान दिया। न्यायालय ने यह तथ्य नोट किया कि याचिकाकर्ता पहले ही अधीक्षण अभियंता, मोतिहारी के तकनीकी सहायक के रूप में अपनी नई पदस्थापना पर ज्वाइन कर चुके हैं। वे लगभग एक वर्ष से वहाँ कार्य कर रहे हैं।
यह देखते हुए कि आदेश का पालन हो चुका है और पर्याप्त समय बीत चुका है, न्यायालय “किसी विशिष्ट रिट जारी कर स्थानांतरण आदेश को अस्थिर” करने के पक्ष में नहीं था। व्यावहारिक रूप से इसका अर्थ यह है कि यद्यपि न्यायालय ने स्थानांतरण किए जाने की प्रक्रिया की आलोचना की, फिर भी उसने आदेश को रद्द करने या यह निर्देश देने से परहेज किया कि याचिकाकर्ता को पुनः किशनगंज या किसी अन्य पद पर भेजा जाए।
अंततः पटना उच्च न्यायालय ने इन टिप्पणियों के साथ रिट याचिका का निपटारा कर दिया, स्थानांतरण आदेश को यथावत रखते हुए यह स्पष्ट कर दिया कि केवल राजनेताओं या निजी व्यक्तियों की शिकायतों के आधार पर, बिना कम से कम प्रारंभिक जांच के, स्थानांतरण नहीं किए जाने चाहिए।
यह निर्णय क्यों महत्वपूर्ण है
पटना उच्च न्यायालय का यह निर्णय सरकारी कर्मचारियों और आम नागरिकों दोनों के लिए, विशेषकर बिहार में, महत्वपूर्ण है।
प्रथम, न्यायालय ने स्पष्ट रूप से कहा है कि कार्यपालक निर्णय, जिनमें अधिकारियों के स्थानांतरण भी शामिल हैं, स्वतंत्र होने चाहिए। वे केवल इस आधार पर नहीं किए जा सकते कि किसी विधायक, सांसद या ठेकेदार ने शिकायत कर दी है। यदि स्थानांतरण इस प्रकार के दबाव से प्रेरित होंगे तो यह लोकतंत्र में विधायिका और कार्यपालिका के बीच मूलभूत संतुलन को नुकसान पहुँचाएगा।
द्वितीय, न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि जब भ्रष्टाचार के आरोप हों तो सरकार कार्रवाई करने के लिए स्वतंत्र है। लेकिन उसे कम से कम किसी जांच से प्राप्त प्रथमदृष्टया सामग्री के आधार पर ही गंभीर कदम, जैसे स्थानांतरण, विशेषकर जब वह स्थानांतरण उन्हीं आरोपों से जुड़ा हो, उठाने चाहिए।
तृतीय, सरकारी सेवकों के लिए यह निर्णय यह दर्शाता है कि न्यायालय हर बार स्थानांतरण में दखल नहीं देगा, भले ही वह प्रक्रिया की आलोचना करे, खासकर तब जब अधिकारी पहले ही नए पद पर कार्यभार ग्रहण कर चुका हो और समय बीत चुका हो। ऐसे मामलों में न्यायालय प्रायः प्रशासनिक व्यवस्था को विचलित न करने को प्राथमिकता दे सकता है।
नागरिकों और जनप्रतिनिधियों के लिए यह निर्णय यह स्मरण कराता है कि वे भ्रष्टाचार या शक्ति के दुरुपयोग के विरुद्ध शिकायत अवश्य कर सकते हैं, परंतु स्थानांतरण संबंधी निर्णय कार्यपालिका को अपनी स्वतंत्र मूल्यांकन-प्रक्रिया के आधार पर ही लेने होते हैं।
कानूनी प्रश्न और उनके उत्तर
प्रश्न: क्या राज्य बिना किसी प्रारंभिक जांच प्रतिवेदन प्राप्त किए, केवल किसी सांसद, पूर्व विधायक या निजी व्यक्ति द्वारा की गई शिकायतों के आधार पर किसी सरकारी अधिकारी का स्थानांतरण कर सकता है?
उत्तर: न्यायालय ने माना कि कार्यपालक कार्रवाई स्वतंत्र होनी चाहिए और उस पर जनप्रतिनिधियों के दबाव का प्रभाव नहीं होना चाहिए, तथा भ्रष्टाचार के आरोपों पर आधारित स्थानांतरण जैसी कार्रवाई कम से कम प्रथमदृष्टया प्रमाण के बाद ही की जानी चाहिए। इस मामले में न्यायालय ने स्थानांतरण आदेश को “बिल्कुल भी संतोषजनक नहीं” पाया क्योंकि यह किसी प्रारंभिक जांच प्रतिवेदन प्राप्त होने से पहले ही जारी कर दिया गया था, लेकिन अंततः आदेश को इसलिए निरस्त नहीं किया क्योंकि अधिकारी पहले ही नई पदस्थापना पर ज्वाइन कर चुके थे और लगभग एक वर्ष तक वहाँ सेवा दे चुके थे।
प्रश्न: क्या पटना उच्च न्यायालय लगभग एक वर्ष से क्रियान्वित स्थानांतरण आदेश में हस्तक्षेप करेगा?
उत्तर: न्यायालय ने स्थानांतरण को अस्थिर करने के लिए कोई विशेष रिट जारी करने से इनकार कर दिया, यह देखते हुए कि याचिकाकर्ता पहले ही मोतिहारी में नए पद पर ज्वाइन कर चुके थे और लगभग एक वर्ष तक वहाँ कार्य कर चुके थे। रिट याचिका का निपटारा स्थानांतरण को रद्द किए बिना कर दिया गया।
न्यायालय द्वारा उद्धृत मामले
- इस निर्णय के पाठ में किसी भी पूर्व न्यायिक निर्णय या नज़ीर (case law) का उल्लेख या उस पर निर्भरता नहीं की गई है।
मामले का विवरण
मामला संख्या: Civil Writ Jurisdiction Case No. 3030 of 2025
मामले का शीर्षक: Rajesh Kumar Choudhary बनाम The State of Bihar & Ors.
उद्धरण: 2026 (2) PLJR 334
न्यायालय: High Court of Judicature at Patna
पीठ: Hon’ble Mr. Justice Bibek Chaudhuri
निर्णय की तिथि: 28-01-2026
पक्षकारों के अधिवक्ता: याचिकाकर्ता की ओर से – Mr. Madhumay Madhup, Advocate; प्रतिवादियों की ओर से – Mr. Anuj Kumar, AC to GP-24
मामले की प्रकृति: ग्रामीण कार्य विभाग में एक सरकारी अधिकारी के स्थानांतरण आदेश को चुनौती देने वाली सिविल रिट याचिका
निर्णय का लिंक: पटना उच्च न्यायालय का पूर्ण निर्णय देखने के लिए यहाँ क्लिक करें
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