उत्तर पुस्तिकाओं के कबाड़ के टेंडर में नियम उल्लंघन के कारण आवंटन रद्द — पटना उच्च न्यायालय, 2019

इस मामले में एक व्यापारी ने बिहार विद्यालय परीक्षा समिति द्वारा प्रयुक्त उत्तर पुस्तिकाओं और कबाड़ कागजों की बिक्री के लिए निकाले गए टेंडर के आवंटन को चुनौती दी। पटना उच्च न्यायालय ने पाया कि बोर्ड द्वारा स्वयं निर्धारित पुनर्चक्रण से संबंधित टेंडर शर्तों का पालन नहीं किया गया था। न्यायालय ने दो निजी निविदाकारों के पक्ष में किए गए आवंटन को रद्द कर दिया। अब बोर्ड को टेंडर पर पुनर्विचार करना होगा, याचिकाकर्ता के कागजात की जांच करनी होगी और आवश्यकता होने पर नया टेंडर निकालना होगा।

मामले की पृष्ठभूमि

बिहार विद्यालय परीक्षा समिति ने टेंडर/नीलामी सूचना संख्या PR-198/18 जारी की। यह टेंडर इंटरमीडिएट कंपार्टमेंटल परीक्षा 2017 की प्रयुक्त उत्तर पुस्तिकाओं, वार्षिक इंटरमीडिएट परीक्षा 2018 की प्रयुक्त प्रायोगिक उत्तर पुस्तिकाओं तथा अन्य कबाड़ कागजों जैसे फ्लाइंग स्लिप्स, अवॉर्ड शीट, मार्क्स फाइल, उपस्थिति पत्रक और इंटरमीडिएट एवं मैट्रिक कंपार्टमेंटल परीक्षा 2018 से संबंधित अन्य “उपयोगहीन” कागजात और अभिलेखों की नीलामी के लिए था।

बोर्ड का स्पष्ट उद्देश्य इन सामग्रियों की नीलामी कर उन्हें पुनर्चक्रण एवं सुरक्षित विनष्टि के लिए देना था, ताकि उत्तर पुस्तिकाओं के दुरुपयोग को रोका जा सके और पर्यावरण की रक्षा हो सके। इसे सुनिश्चित करने के लिए बोर्ड ने टेंडर प्रपत्र की धाराओं 14, 15 और 16 में विशेष शर्तें जोड़ीं। इन धाराओं के तहत यह अनिवार्य था कि सभी उत्तर पुस्तिकाओं और संबंधित कागजात को किसी पेपर मिल में ही पुनर्चक्रित किया जाएगा और किसी अन्य प्रयोजन के लिए उपयोग नहीं किया जाएगा, तथा निविदाकार को ऐसे पेपर मिल के साथ किए गए समझौते की प्रमाणित प्रति टेंडर के साथ दाखिल करनी होगी। जिन व्यक्तियों ने पहले भी बोर्ड से ऐसा कागज खरीदा था, उन्हें यह प्रमाण भी देना था कि पिछला स्टॉक वास्तव में पुनर्चक्रित किया गया था।

याचिकाकर्ता, जो एक स्थानीय व्यापारी है, ने अपनी बोली के साथ M/s Multiwal Pulp & Board Mills Pvt. Ltd. के साथ 24.09.2018 को किया गया एक समझौता भी प्रस्तुत किया। उसका कहना था कि इससे यह साबित होता है कि उसने खरीदी जाने वाली उत्तर पुस्तिकाओं और पुराने अभिलेखों को पुनर्चक्रण के लिए उक्त मिल को भेजने की व्यवस्था कर रखी थी।

बाद में प्रतिवादी संख्या 5 और 6 के रूप में वर्णित दो अन्य व्यापारियों ने भी बोलियां जमा कीं। याचिकाकर्ता का आरोप है कि उन्होंने धारा 15 के तहत अपेक्षित किसी पेपर मिल के साथ कोई विधिवत समझौता प्रस्तुत नहीं किया। रिट याचिका के अनुसार, प्रतिवादी संख्या 6 ने मात्र एक घोषणा दी थी, जिसमें VSM Paper Pvt. Ltd. का नाम था, जो कि 01.02.2019 की आरटीआई जवाब के अनुसार उस समय तक चालू पेपर मिल नहीं थी।

जब 26.09.2018 को तकनीकी बोलियां खोली गईं, तो याचिकाकर्ता ने प्रतिवादी संख्या 5 और 6 की तकनीकी पात्रता के विरुद्ध लिखित आपत्ति दी। इस अभ्यावेदन के बावजूद, बोर्ड ने उनकी वित्तीय बोलियां भी खोलीं और अंततः टेंडर की मद संख्या 1, 2, 3, 5, 6 और 8 के लिए उन्हें सफल घोषित कर दिया। याचिकाकर्ता को मद संख्या 4, 7 और 9 दिए गए और उससे 13,37,024/- रुपये जमा करने के लिए कहा गया।

बाद में, 07.02.2019 की दिनांकित पत्र द्वारा प्रतिवादी संख्या 5 और 6 को औपचारिक रूप से सफल निविदाकार माना गया और आवश्यक धनराशि जमा कराने को कहा गया। एक अन्य पत्र दिनांक 12.02.2019 में प्रतिवादी संख्या 6 को 1,26,55,000/- रुपये जमा करने को कहा गया, ताकि वह निर्धारित मदों को उठा सके। ये पत्र पटना उच्च न्यायालय के समक्ष मुख्य रूप से चुनौती का विषय बने।

न्यायालय ने क्या परखा और क्या निर्णय दिया

पटना उच्च न्यायालय के समक्ष मुख्य शिकायत यह थी कि बोर्ड ने अपने ही टेंडर दस्तावेज की महत्त्वपूर्ण और स्वयं लगाई गई शर्तों का पालन नहीं किया। याचिकाकर्ता ने दलील दी कि धाराएं 14, 15 और 16 इस उद्देश्य से बनाई गई थीं कि उत्तर पुस्तिकाओं और परीक्षा अभिलेखों का दुरुपयोग न हो और उनका सही ढंग से पुनर्चक्रण हो। उसके अनुसार, प्रतिवादी संख्या 5 और 6 इन शर्तों को पूरा नहीं करते थे, फिर भी उन्हें पात्र बोलीदाता माना गया, जबकि उसने इन शर्तों का पालन किया, फिर भी उसे नुकसान की स्थिति में रखा गया।

याचिकाकर्ता ने विशेष रूप से कहा कि धारा 15 के तहत पेपर मिल के साथ हुए समझौते की प्रमाणित प्रति दाखिल करना अनिवार्य था, जिससे यह सुनिश्चित हो सके कि खरीदा गया सारा कबाड़ कागज केवल पुनर्चक्रण के लिए ही इस्तेमाल होगा। उसने धारा 16 पर भी जोर दिया, जिसके अनुसार पूर्व में सफल रहे निविदाकारों को यह प्रमाण पत्र देना था कि बोर्ड से पूर्व में खरीदी गई सामग्री वास्तव में किसी पेपर मिल में पुनर्चक्रित की गई थी।

दूसरी ओर, बिहार विद्यालय परीक्षा समिति ने अपने प्रतिउत्तर हलफनामे के माध्यम से अपने कार्यों का बचाव किया। बोर्ड ने कहा कि उसने सभी निविदाकारों के साथ समान व्यवहार किया और पेपर मिलों द्वारा दी गई “अंडरटेकिंग” तथा निविदाकारों की घोषणाओं को धारा 15 की सारगर्भित अनुपालना माना। बोर्ड ने यह भी स्वीकार किया कि याचिकाकर्ता के समझौते में भी यह स्पष्ट शब्दों में नहीं लिखा था कि पेपर मिल, उससे प्राप्त होने वाले कबाड़ कागज को अवश्य ही पुनर्चक्रित करेगी, लेकिन चूंकि उसने एक घोषणा दाखिल की थी, इसलिए उसे भी पात्र माना गया।

बोर्ड के अनुसार, इससे यह साबित होता है कि कोई भेदभाव नहीं किया गया। बोर्ड ने आगे तर्क दिया कि अनुबंध सद्भावना में और जनहित में दिया गया था। उसने कहा कि 2019 की परीक्षाओं और आगामी परीक्षाओं की उत्तर पुस्तिकाओं को सुरक्षित रखने के लिए तत्काल स्थान खाली करना आवश्यक था और पुरानी उत्तर पुस्तिकाओं का निस्तारण इससे मददगार होता। बोर्ड ने यह भी दलील दी कि भले ही कुछ प्रक्रियागत त्रुटियां हों, फिर भी अनुच्छेद 226 के तहत न्यायिक पुनरावलोकन करते हुए न्यायालय को ऐसे संविदात्मक मामलों में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए।

बोर्ड ने यह भी रुख अपनाया कि प्रतिवादी संख्या 6 द्वारा नामित VSM Paper Pvt. Ltd. उस समय क्रियाशील थी या नहीं, यह टेंडर के चरण पर प्रासंगिक नहीं था। बोर्ड के अनुसार, टेंडर में केवल यह अपेक्षा थी कि कबाड़ कागज को पुनर्चक्रण के लिए इस्तेमाल करने संबंधी अंडरटेकिंग/समझौता/घोषणा दी जाए। यदि बाद में कोई निविदाकार सामग्री का दुरुपयोग करता है, तो बोर्ड उसके विरुद्ध कानूनी कार्रवाई, जिसमें प्राथमिकी दर्ज करना भी शामिल है, कर सकता है।

प्रतिवादी संख्या 5 ने अपने प्रतिउत्तर हलफनामे में कहा कि उसने “इंदिरा पेपर मिल प्रा. लि.”, पटना द्वारा जारी प्रमाण पत्र जमा किया था। इस प्रमाण पत्र में कहा गया था कि यदि प्रतिवादी संख्या 5 BSEB के टेंडर में सफल होता है और शर्तों पर सफलतापूर्वक सहमति बन जाती है, तो मिल उसके यहाँ से कबाड़ कागज की आपूर्ति ले सकती है।

प्रतिवादी संख्या 6 ने अपने प्रतिउत्तर हलफनामे में यह दावा किया कि वह बिहार का एक बड़ा पेपर व्यापारी है, जो कई पेपर मिलों के साथ कारोबार करता है। उसने 15.09.2018 की दिनांकित Kawatra Papers Pvt. Ltd. का एक तथाकथित “एग्रीमेंट-कम-सर्टिफिकेट” प्रस्तुत किया। इस दस्तावेज में प्रमाणित किया गया था कि बिहार विद्यालय परीक्षा समिति के टेंडर के माध्यम से प्रतिवादी संख्या 6 द्वारा अधिकृत आपूर्तिकर्ता के रूप में खरीदी गई उत्तर पुस्तिकाएं और अन्य कबाड़ कागज मिल में पल्प निर्माण के लिए उपयोग किए जाएंगे। प्रतिवादी संख्या 6 ने यह भी बताया कि उसने स्वयं की कंपनी VSM Paper Pvt. Ltd. स्थापित की है, जो कंपनी अधिनियम, 2013 के तहत पंजीकृत है तथा एक सूक्ष्म या लघु उद्यम के रूप में पंजीकृत है, और भविष्य में वह कबाड़ कागज से पल्प बनाने का इरादा रखता है।

प्रतिवादी संख्या 6 ने आगे यह आरोप लगाया कि याचिकाकर्ता ने Multiwal Pulp & Board Mills Pvt. Ltd. का जाली समझौता प्रस्तुत किया है। उसके अनुसार, उसके पास 25.02.2019 की दिनांकित उस कंपनी का एक ईमेल है, जिसमें कहा गया है कि याचिकाकर्ता के समझौते में जिन व्यक्ति के हस्ताक्षर दर्शाए गए हैं, वे 2016 में ही कंपनी छोड़ चुके थे और उसके बाद से दस्तावेजों पर हस्ताक्षर करने का कोई अधिकार नहीं था।

माननीय न्यायमूर्ति राजीव रंजन प्रसाद ने सबसे पहले बोर्ड के टेंडर की धाराओं 14, 15 और 16 का सूक्ष्मता से अवलोकन किया। धारा 14 के तहत यह विशिष्ट अंडरटेकिंग अपेक्षित थी कि सभी प्रयुक्त उत्तर पुस्तिकाओं और कबाड़ कागजों को किसी पेपर मिल में पुनर्चक्रित किया जाएगा और किसी अन्य प्रकार से उपयोग नहीं किया जाएगा। धारा 15 के अनुसार निविदाकार को पुनर्चक्रण हेतु पेपर मिल के साथ किए गए समझौते की प्रमाणित प्रति प्रस्तुत करनी थी। धारा 16 में उन निविदाकारों से पुनर्चक्रण का प्रमाण पत्र मांगा गया था, जिन्होंने पूर्व वर्षों में बोर्ड से कबाड़ कागज खरीदा था।

न्यायालय ने बोर्ड के अधिवक्ता को निर्देश दिया कि वे मौलिक अभिलेख प्रस्तुत करें, ताकि यह देखा जा सके कि क्या सक्षम प्राधिकारी द्वारा धारा 15 में किसी संशोधन या शिथिलीकरण का कोई विचारपूर्ण निर्णय लिया गया था। अभिलेखों की जांच करने पर न्यायालय को ऐसा कोई निर्णय नहीं मिला। बोर्ड के अधिवक्ता ने भी स्वीकार किया कि ऐसा कोई दस्तावेज उपलब्ध नहीं है, जिससे यह पता चले कि धारा 15 को कभी शिथिल किया गया हो। अतः न्यायालय ने निष्कर्ष निकाला कि ये धाराएं पूर्ण रूप से बाध्यकारी रहीं।

प्रतिवादी संख्या 6 के दस्तावेजों की ओर रुख करते हुए, न्यायालय ने Kawatra Papers Pvt. Ltd. के प्रमाण पत्र की जांच की। इसमें केवल इतना कहा गया था कि टेंडर के माध्यम से प्रतिवादी संख्या 6 द्वारा खरीदी गई उत्तर पुस्तिकाएं और अन्य कबाड़ कागज पल्प निर्माण के लिए उपयोग किए जाएंगे। न्यायालय ने माना कि ऐसा प्रमाण पत्र धारा 15 के तहत अपेक्षित “समझौता” नहीं माना जा सकता। समझौता, न्यायालय ने स्पष्ट किया, पक्षकारों के बीच एक बाध्यकारी दस्तावेज होता है, जबकि प्रस्तुत प्रमाण पत्र महज ढीली-ढाली आश्वासन मात्र थे।

न्यायालय ने प्रतिवादी संख्या 6 के प्रतिउत्तर हलफनामे में की गई एक महत्वपूर्ण स्वीकृति पर भी ध्यान दिया। उसने कहा कि पिछले वर्ष भी वह इसी तरह के BSEB टेंडर में सर्वाधिक बोलीदाता था और उसे अनुबंध दिया गया था। बावजूद इसके, उसने कोई ऐसा प्रमाण पत्र प्रस्तुत नहीं किया, जिससे यह साबित हो कि पूर्व में खरीदी गई उत्तर पुस्तिकाएं और कबाड़ कागज धारा 16 के अनुसार किसी पेपर मिल में पुनर्चक्रित किए गए थे। पीठ ने माना कि प्रतिवादी संख्या 6 स्वयं के कथन के अनुसार भी ऐसे प्रमाण पत्र प्रस्तुत करने के लिए बाध्य था, लेकिन उसने ऐसा नहीं किया। यह टेंडर की एक महत्वपूर्ण शर्त के उल्लंघन की ओर संकेत करता है।

इसी प्रकार, प्रतिवादी संख्या 5 द्वारा इंदिरा पेपर मिल प्रा. लि. से प्राप्त प्रमाण पत्र भी कमजोर और सशर्त पाया गया। इसमें कहा गया था कि मिल, प्रतिवादी संख्या 5 से कबाड़ कागज की आपूर्ति “ले सकती है”, “यदि” वह टेंडर में सफल हो और “यदि” बातचीत सफलतापूर्वक सम्पन्न हो। न्यायालय ने इसे केवल दिखावे की कार्रवाई (“आई वॉश”) बताया। इससे यह स्पष्ट हुआ कि प्रतिवादी संख्या 5 और उक्त मिल के बीच कोई ठोस समझौता अस्तित्व में नहीं था।

न्यायालय ने यह भी देखा कि न तो प्रतिवादी संख्या 5 और न ही प्रतिवादी संख्या 6 ने यह प्रमाण प्रस्तुत किया कि Kawatra Papers Pvt. Ltd. या इंदिरा पेपर मिल प्रा. लि. की ओर से इन प्रमाण पत्रों पर हस्ताक्षर करने वाले व्यक्तियों के पास ऐसा करने का प्राधिकार था। इस कारण ये दस्तावेज बाध्यकारी प्रतिबद्धता के रूप में और भी संदिग्ध हो गए।

विस्तृत संदर्भ में, न्यायालय ने रेखांकित किया कि धाराएं 14, 15 और 16 एक महत्त्वपूर्ण सार्वजनिक उद्देश्य की पूर्ति करती हैं। वे भारी मात्रा में कागज के पुनर्चक्रण के द्वारा पर्यावरणीय हितों की रक्षा करती हैं और साथ ही परीक्षा अभिलेखों की गोपनीयता और अखंडता की भी रक्षा करती हैं। पुनर्चक्रण के महत्त्व को स्पष्ट करने के लिए न्यायाधीश ने Wikipedia जैसे स्रोतों से सामान्य जानकारी का संदर्भ दिया और CBSE द्वारा उपयोग की जाने वाली समान टेंडर शर्तों की ओर इशारा किया, जिनमें कबाड़ कागज के निस्तारण के अनुभव का प्रमाण और यह शर्त मांगी जाती है कि ऐसे कागज का उपयोग केवल पुनर्चक्रण के लिए किया जाएगा या उसे इस प्रकार नष्ट किया जाएगा कि आधिकारिक गोपनीयता सुरक्षित रहे।

न्यायमूर्ति प्रसाद ने इस बात पर जोर दिया कि बोर्ड के प्रतिउत्तर हलफनामे से यह आभास होता है कि वह केवल भंडारण स्थान खाली करने और बिक्री मूल्य प्राप्त करने में रूचि रखता है, जबकि पर्यावरणीय चिंताओं और परीक्षा गोपनीयता पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया। न्यायालय के मत में, धाराएं 14, 15 और 16, जो इस टेंडर की “आत्मा और हृदय” थीं, की अनदेखी को इस तर्क से उचित नहीं ठहराया जा सकता कि सभी निविदाकार समान रूप से लाभान्वित हो गए।

न्यायालय ने B.S.N. Joshi & Sons Ltd. v. Nair Coal Services Ltd. के निर्णय के अनुच्छेद 66 पर भरोसा किया, जिसमें टेंडर मामलों में न्यायिक पुनरावलोकन के सिद्धांतों का सार प्रस्तुत किया गया है। इनमें से एक प्रमुख सिद्धांत यह है कि टेंडर में निहित आवश्यक (एसेंशियल) शर्तों का सख्ती से पालन किया जाना चाहिए और यदि किसी आवश्यक शर्त का शिथिलीकरण पूर्णतः अवैध हो, तो न्यायालय हस्तक्षेप कर सकता है।

इन सिद्धांतों को लागू करते हुए, पटना उच्च न्यायालय ने माना कि BSEB टेंडर की धाराएं 14, 15 और 16 आवश्यक और अनिवार्य थीं। टेंडर समिति को इन्हें नजरअंदाज करने या कमज़ोर करने का कोई अधिकार नहीं था और बोर्ड द्वारा ऐसा करने संबंधी कोई लिखित निर्णय भी नहीं था। अतः प्रतिवादी संख्या 5 और 6 को टेंडर आवंटित करने की पूरी निर्णय प्रक्रिया आवश्यक शर्तों के उल्लंघन और लोकहित की रक्षा में असफलता से ग्रसित पाई गई।

जहाँ तक यह आरोप है कि याचिकाकर्ता ने Multiwal Pulp & Board Mills Pvt. Ltd. के साथ जाली समझौता प्रस्तुत किया, न्यायालय ने इस रिट याचिका के दायरे में इस प्रश्न का निर्णय करने से इंकार कर दिया। उसने कहा कि यदि प्रतिवादी संख्या 6 को यह विश्वास है कि वह दस्तावेज जाली है, तो वह यह मुद्दा बोर्ड या अन्य उपयुक्त मंच के समक्ष उठा सकता है। फिर भी, क्योंकि यह गंभीर विवाद विद्यमान था, न्यायालय ने यह उचित नहीं समझा कि सीधे-सीधे याचिकाकर्ता को विवादित मदों के आवंटन के लिए मांडमस जारी कर दे।

परिणामतः, न्यायालय ने 07.02.2019 की वह पत्र रद्द कर दी, जिसके द्वारा प्रतिवादी संख्या 5 और 6 को टेंडर सूचना संख्या PR-198/18 के अंतर्गत सफल निविदाकार घोषित किया गया था। न्यायालय ने बोर्ड को निर्देश दिया कि वह आदेश की प्राप्ति से तीस दिन के भीतर, याचिकाकर्ता को सुनवाई का अवसर प्रदान करते हुए उसके समझौते की प्रामाणिकता की जांच करे।

यदि जांच में टेंडर समिति यह पाती है कि याचिकाकर्ता का समझौता वास्तविक है और टेंडर शर्तों के अनुरूप है, तो वह यह निर्णय ले सकती है कि शेष मद (जो पहले प्रतिवादी संख्या 5 और 6 को आवंटित थे) याचिकाकर्ता को दे दिए जाएं। यदि समिति यह पाती है कि समझौता वास्तविक नहीं है, तो वह उपयुक्त कार्रवाई करने के लिए स्वतंत्र होगी, जिसमें नया टेंडर निकालना भी शामिल है।

अंत में, न्यायालय ने भविष्य के टेंडरों के लिए बोर्ड को मार्गदर्शन भी दिया। उसने कहा कि बोर्ड यह सुनिश्चित करे कि जो व्यक्ति पूर्व में उत्तर पुस्तिकाएं और कबाड़ कागज खरीद चुके हैं, वे उस सामग्री के वास्तविक पुनर्चक्रण का प्रमाण पत्र प्रस्तुत करें। प्रत्येक नए टेंडर में सफल निविदाकारों से एक निश्चित उचित अवधि के भीतर इसी प्रकार के प्रमाण पत्र प्राप्त किए जाएं, जिसकी समय-सीमा बोर्ड द्वारा तय की जाए। केवल उन्हीं bona fide प्रतिभागियों को भाग लेने की अनुमति होनी चाहिए, जिनके पास उचित पुनर्चक्रण की व्यवस्था या स्वयं के पुनर्चक्रण इकाई हों।

यह निर्णय क्यों महत्वपूर्ण है

यह निर्णय उन व्यापारियों, ठेकेदारों और सार्वजनिक निकायों के लिए महत्त्वपूर्ण है जो परीक्षा उत्तर पुस्तिकाओं और अन्य संवेदनशील कबाड़ सामग्री की बिक्री से संबंधित हैं। पटना उच्च न्यायालय ने स्पष्ट कर दिया कि जब कोई सार्वजनिक निकाय टेंडर में कठोर शर्तें लिखता है, तो उसे स्वयं भी उन शर्तों का पालन करना होगा। इन शर्तों को केवल प्रक्रिया तेज करने या अधिक धन प्राप्त करने के लिए वैकल्पिक नहीं माना जा सकता।

निविदाकारों के लिए यह निर्णय इस बात का संकेत है कि यदि टेंडर नियम किसी पेपर मिल के साथ वास्तविक समझौते की मांग करते हैं, तो केवल अस्पष्ट प्रमाण पत्र या भविष्य की प्रतिज्ञा पर्याप्त नहीं होगी। निविदाकारों के पास पुनर्चक्रण इकाइयों के साथ स्पष्ट और बाध्यकारी व्यवस्था होनी चाहिए और पूर्व खरीदारों को यह साबित करने के लिए तैयार रहना चाहिए कि पहले के स्टॉक का वास्तव में पुनर्चक्रण हुआ था।

परीक्षा बोर्डों और अन्य प्राधिकरणों के लिए यह फैसला पर्यावरण संरक्षण और परीक्षा गोपनीयता दोनों की रक्षा करने की जिम्मेदारी को रेखांकित करता है। न्यायालय ने इन्हें ऐसे लोकहित के मुद्दे माना, जो बोर्ड के व्यावसायिक निर्णयों में भी हस्तक्षेप को न्यायोचित ठहराते हैं। केवल सुविधा के आधार पर प्राधिकरण ऐसे सुरक्षा उपायों की अनदेखी नहीं कर सकते।

यह निर्णय यह संदेश भी देता है कि जहाँ टेंडर की आवश्यक शर्तों का पालन नहीं किया जाता, वहाँ उच्च न्यायालय सार्वजनिक निविदाओं की निर्णय प्रक्रिया की जांच करेगा, भले ही सभी निविदाकारों के साथ समान व्यवहार होता प्रतीत हो। नियमों का समान रूप से उल्लंघन किया जाना, स्वयं में कोई बचाव नहीं है।

कानूनी प्रश्न और उनके उत्तर

  • प्रश्न: क्या बिहार विद्यालय परीक्षा समिति अपनी टेंडर शर्तों की धाराएं 14, 15 और 16 (जो बाध्यकारी पुनर्चक्रण व्यवस्था और पूर्व पुनर्चक्रण के प्रमाण की मांग करती हैं) को लचीला मानकर भी प्रतिवादी संख्या 5 और 6 को सफल निविदाकार घोषित कर सकती थी?
    उत्तर: नहीं। पटना उच्च न्यायालय ने इन धाराओं को आवश्यक और अनिवार्य माना। बोर्ड द्वारा इन्हें शिथिल करने का कोई लिपिबद्ध निर्णय नहीं था और प्रतिवादी संख्या 5 और 6 द्वारा प्रस्तुत प्रमाण पत्र न तो वैध समझौते थे और न ही पुनर्चक्रण का प्रमाण। अतः टेंडर आवंटन अवैध पाया गया।
  • प्रश्न: क्या एक बार प्रतिवादी संख्या 5 और 6 के पक्ष में किया गया आवंटन रद्द हो जाने पर न्यायालय बाध्य था कि विवादित मदों को अगले सर्वाधिक बोलीदाता के रूप में याचिकाकर्ता को आवंटित करने का निर्देश दे?
    उत्तर: नहीं। चूंकि याचिकाकर्ता के स्वयं के पेपर मिल के साथ किए गए समझौते की प्रामाणिकता पर गंभीर विवाद था, न्यायालय ने स्वतः आवंटन का आदेश नहीं दिया। इसके बजाय, उसने बोर्ड को निर्देश दिया कि वह तीस दिनों के भीतर समझौते की जांच करे और उसके बाद या तो मदों को याचिकाकर्ता को आवंटित करे या पुनः टेंडर सहित अन्य वैध कदम उठाए।
  • प्रश्न: संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत उच्च न्यायालय कब टेंडर संबंधी निर्णयों में हस्तक्षेप कर सकता है?
    उत्तर: B.S.N. Joshi & Sons Ltd. v. Nair Coal Services Ltd. पर भरोसा करते हुए न्यायालय ने कहा कि जहाँ टेंडर की आवश्यक शर्तों का उल्लंघन हो, विशेषकर जब वे लोकहित की सेवा करती हों, वहाँ न्यायालय हस्तक्षेप कर सकता है। इस मामले में धाराओं 14, 15 और 16 के उल्लंघन ने न्यायिक पुनरावलोकन को उचित ठहराया।

न्यायालय द्वारा उद्धृत मामले

  • B.S.N. Joshi & Sons Ltd. v. Nair Coal Services Ltd. & Others, (2006) 11 SCC 548 (टेंडर मामलों में न्यायिक पुनरावलोकन के सिद्धांतों के लिए भरोसा किया गया)।
  • Poddar Steel Corporation v. Ganesh Engineering Works & Others, (1991) 3 SCC 273 (प्रतिवादी संख्या 6 द्वारा तर्क में संदर्भित; जबकि न्यायालय ने BSEB की धाराओं 14, 15 और 16 को अनिवार्य मानते हुए इसे अलग परिस्थितियों वाला करार दिया)।

मामले का विवरण

मामला संख्या: सिविल रिट क्षेत्राधिकार मामला संख्या 3129 वर्ष 2019

मामले का शीर्षक: M/s S.K. Traders बनाम बिहार विद्यालय परीक्षा समिति एवं अन्य

उद्धरण: 2019 (3) PLJR 450

न्यायालय: उच्च न्यायालय, पटना

पीठ: माननीय श्री न्यायमूर्ति राजीव रंजन प्रसाद

निर्णय की तिथि: 13-03-2019

वकील:

  • याचिकाकर्ता की ओर से: श्री ब्रिस्केतु शरण पांडेय, श्री प्रिंस कुमार मिश्रा, सुश्री कुमारी शुभम
  • बिहार विद्यालय परीक्षा समिति की ओर से: श्री सत्यमवीर भारती, श्री ज्ञान शंकर, श्री आलोक चंद्र
  • प्रतिवादी संख्या 5 की ओर से: श्री सुभाष कुमार सिंह
  • प्रतिवादी संख्या 6 की ओर से: श्री एस.डी. संजय, वरिष्ठ अधिवक्ता, सहायक: श्री आलोक कुमार अग्रवाल

मामले का स्वरूप: संविधान के अनुच्छेद 226 के अंतर्गत रिट याचिका, जिसमें प्रयुक्त उत्तर पुस्तिकाओं और कबाड़ कागजों की बिक्री हेतु टेंडर/नीलामी के आवंटन को चुनौती दी गई तथा पुनः आवंटन हेतु मांडमस की मांग की गई।

निर्णय का लिंक: पटना उच्च न्यायालय की वेबसाइट पर पूर्ण निर्णय देखें

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