मामले की पृष्ठभूमि
पटना उच्च न्यायालय के समक्ष आपराधिक रिट याचिका दायर कर केस नंबर 437 of 2021 को चुनौती दी गई। यह मामला उप-मंडलीय दंडाधिकारी (SDM), नौगछिया, भागलपुर द्वारा दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (Cr.PC) की धारा 107 के तहत शुरू किया गया था।
उत्प्रेरक एक पत्र था, संख्या 243 दिनांक 03.04.2021, जिसे सहायक जिला आपूर्ति पदाधिकारी, नौगछिया द्वारा कार्यपालक दंडाधिकारी को भेजा गया था। इस पत्र में यह आरोप लगाया गया था कि याचिकाकर्ता अनावश्यक रूप से सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) डीलरों को परेशान करता है, उनसे पैसे मांगता है और यदि उसकी मांगें पूरी नहीं की जाएं तो उन्हें झूठे मामलों में फंसाने की धमकी देता है।
इस पत्र पर कार्यवाही करते हुए, SDM ने “शांति बनाए रखने” के लिए धारा 107 दंप्रसं के तहत कार्यवाही शुरू की। SDM ने याचिकाकर्ता को नोटिस जारी करने का आदेश दिया, जिसमें उसे यह कारण बताने के लिए कहा गया कि उसे एक वर्ष के लिए दो जमानतदारों के साथ 1,00,000/- रुपये का बांड निष्पादित करने का निर्देश क्यों न दिया जाए।
नोटिस के जवाब में याचिकाकर्ता SDM के समक्ष उपस्थित हुआ और अपना कारण बताओ उत्तर दाखिल किया। उसने कहा कि उसने पहले जिला आपूर्ति पदाधिकारी के विरुद्ध दो RTI आवेदन दायर किए थे। ये “प्रधानमंत्री प्रवासी मजदूर” योजना के तहत वितरण तथा उस अधिकारी की चल–अचल संपत्तियों से संबंधित थे। याचिकाकर्ता के अनुसार, सहायक जिला आपूर्ति पदाधिकारी की शिकायत झूठी और प्रतिशोधात्मक थी, जो केवल इन RTI आवेदनों के कारण की गई थी, और इसी से धारा 107 दंप्रसं की कार्यवाही शुरू हुई।
दोनों पक्षों से साक्ष्य आमंत्रित किए गए। दलीलों और साक्ष्यों पर विचार करने के बाद, SDM ने निष्कर्ष निकाला कि याचिकाकर्ता ने आपूर्ति विभाग के अधिकारियों और शिक्षा विभाग के विभिन्न विद्यालयों को “पत्रकारिता की धमकी” दी, उनसे पैसे की मांग की और इस प्रकार कर्मचारियों तथा PDS डीलरों में भय उत्पन्न किया। यह मानते हुए कि क्षेत्र में “शांति भंग होने की संभावना” है, SDM ने 02.04.2022 को अंतिम आदेश पारित कर याचिकाकर्ता को एक वर्ष के लिए दो जमानतदारों के साथ 1,00,000/- रुपये का बांड निष्पादित करने का निर्देश दिया।
जब रिट याचिका अंतिम सुनवाई के लिए पटना उच्च न्यायालय के समक्ष आई, तब तक बांड की अवधि समाप्त हो चुकी थी। राज्य ने तर्क दिया कि इसलिए मामला निरर्थक (infructuous) हो चुका है और मुद्दों की समीक्षा की कोई आवश्यकता नहीं है। किन्तु याचिकाकर्ता ने जोर देकर कहा कि ऐसी कार्यवाही की वैधता की अब भी जांच होना आवश्यक है, ताकि कार्यपालक मजिस्ट्रेट साधारण नागरिकों को परेशान करने के लिए धारा 107 दंप्रसं का दुरुपयोग न करें।
न्यायालय ने क्या परखा और क्या निर्णय दिया
माननीय श्री न्यायाधीश जितेन्द्र कुमार ने याचिकाकर्ता तथा राज्य के अधिवक्ताओं की दलीलें सुनीं और SDM के अभिलेखों का भी अवलोकन किया। न्यायालय ने पहले नोट किया कि धारा 107 दंप्रसं की कार्यवाही पहले ही 02.04.2022 के अंतिम आदेश से निष्पन्न हो चुकी थी और बांड की अवधि समाप्त हो गई थी। इसके बावजूद, न्यायालय ने यह देखते हुए कि धारा 107 दंप्रसं के तहत कार्यपालक मजिस्ट्रेटों की शक्तियों की सीमा और परिमाण स्पष्ट करना महत्वपूर्ण है, मामले का गुण-दोष के आधार पर निपटारा करने का निर्णय लिया।
कानूनी ढांचे को स्पष्ट करने के लिए, न्यायालय ने दंप्रसं के अध्याय VIII के प्रावधानों, विशेष रूप से धारा 107, 111, 116, 117 और 118 को उद्धृत और विवेचित किया। न्यायालय ने यह भी उल्लेख किया कि इसके समकक्ष प्रावधान अब भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 के अध्याय IX में रखे गए हैं।
धारा 107 दंप्रसं कार्यपालक मजिस्ट्रेट को यह अधिकार देती है कि जब उसे यह सूचना मिलती है कि कोई व्यक्ति शांति भंग करने वाला कृत्य करने वाला है या लोक–शांति भंग करेगा या लोक–शांति में बाधा उत्पन्न करेगा, या ऐसा कोई अनधिकृत कृत्य करेगा जिससे ऐसी शांति भंग होने या व्यवधान उत्पन्न होने की संभावना हो, और यदि मजिस्ट्रेट की राय में ऐसी कार्यवाही करने के लिए पर्याप्त आधार हो, तो वह उस व्यक्ति से यह कारण बताने को कह सकता है कि शांति बनाए रखने के लिए उससे बांड क्यों न लिया जाए।
धारा 111 दंप्रसं के अनुसार, मजिस्ट्रेट को लिखित आदेश देना होता है, जिसमें प्राप्त सूचना का सार, बांड की राशि, उसकी अवधि और जमानतदारों का विवरण अंकित हो। धारा 116 दंप्रसं यह अनिवार्य करती है कि सूचना की सत्यता के संबंध में जांच की जाए और साक्ष्य का संज्ञान मामलों (summons cases) की तरह लिया जाए। धारा 117 दंप्रसं के तहत, केवल तभी, जब ऐसी जांच के माध्यम से यह सिद्ध हो जाए कि शांति बनाए रखने या सुशील आचरण सुनिश्चित करने के लिए बांड आवश्यक है, मजिस्ट्रेट बांड लेने का आदेश दे सकता है। धारा 118 दंप्रसं यह अपेक्षा करती है कि यदि ऐसी आवश्यकता सिद्ध न हो तो व्यक्ति को मुक्ति दी जाए।
इस कानूनी आधार पर न्यायालय ने जोर देकर कहा कि अध्याय VIII “प्रतिबंधात्मक है, दंडात्मक नहीं”। सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय Madhu Limaye v. Sub Divisional Magistrate Monghyr, 1970 (3) SCC 746 पर भरोसा करते हुए न्यायालय ने रेखांकित किया कि यह अध्याय “असाधारण क्षेत्राधिकार” प्रदान करता है, जिसका उद्देश्य लोक–शांति बनाए रखना और समाज की शांति के लिए खतरनाक हो सकते व्यक्तियों के सुशील आचरण को सुनिश्चित करना है। इसका उद्देश्य अतीत के कृत्यों को दंडित करना नहीं है।
इसके बाद न्यायालय ने कई निर्णयों की समीक्षा की, जिनमें स्पष्ट किया गया है कि किन परिस्थितियों में धारा 107 दंप्रसं का उपयोग नहीं किया जाना चाहिए:
Brahmdeo Singh v. State of Bihar, 1979 SCC OnLine Pat 172 में इस उच्च न्यायालय ने कहा कि जब कोई मूल (substantive) अपराध (जैसे मारपीट) पहले से अभियोजित हो रहा हो और कोई नए प्रत्यक्ष कृत्य (fresh overt act) का आरोप न हो, तब धारा 107 की कार्यवाही शुरू करना अनुचित है।
Lovely v. State of Kerala, 2023 SCC OnLine Ker 7567 में केरल उच्च न्यायालय ने माना कि धारा 107 का उद्देश्य बीते अपराधों को दंडित करना नहीं है; यह भविष्य में संभावित शांति भंग को रोकने का उपकरण है, और केवल इस आधार पर लागू नहीं की जा सकती कि कोई व्यक्ति पंजीकृत अपराध में अभियुक्त है।
Jayanth K.C. v. State of Kerala, 2025 KHC 1591 में पुनः यह दोहराया गया कि किसी मामले में अभियुक्त होना मात्र से धारा 107 आकर्षित नहीं होती; आशंकित शांति भंग निकट भविष्य में होने की होनी चाहिए, न कि दूर की संभावना।
Christalin Costa v. State of Goa, 1992 SCC OnLine Bom 252 में बॉम्बे उच्च न्यायालय ने माना कि निजी व्यक्तियों के बीच झगड़े, जो अधिकतम कानून–व्यवस्था (law-and-order) की समस्या उत्पन्न करते हैं, “लोक–व्यवस्था” या “लोक–शांति” के दायरे में नहीं आते, जो धारा 107 की कार्यवाही को न्यायोचित ठहराए।
Perswami Kandswami Devendra v. Sr. Inspector of Police, 2003 SCC OnLine Bom 251, तथा Sandeep Shivaji Mhatre v. State of Maharashtra, 2014 SCC OnLine Bom 5297 में बॉम्बे उच्च न्यायालय ने निर्णय दिया कि घरेलू या पड़ोस की छोटी–मोटी कलह, या हिंसा की एकमात्र (solitary) घटना, धारा 107 की कार्यवाही को न्यायसंगत नहीं ठहरा सकती।
Ram Prakash v. State, 1996 SCC OnLine Del 314 में दिल्ली उच्च न्यायालय ने मकान मालिक–किरायेदार विवाद से उत्पन्न धारा 107 की कार्यवाही को निरस्त कर दिया।
Kuldeep Singh v. State of Bihar, 1988 SCC OnLine Pat 77 में इस न्यायालय ने माना कि अस्पष्ट आरोप पर्याप्त नहीं हैं। ऐसे विशिष्ट प्रत्यक्ष कृत्य होने चाहिए जो संबंधित व्यक्ति द्वारा किए गए हों और जो शांति भंग होने की आशंका को यथोचित रूप से जन्म दें।
इन नज़ीरों से पटना उच्च न्यायालय ने मूलभूत सिद्धांत निकाले: धारा 107 दंप्रसं का उद्देश्य आसन्न (imminent) लोक–शांति भंग और लोक–शांति में व्यवधान को रोकना है। इसे प्रत्येक साधारण विवाद या अतीत के अपराध के लिए उपयोग नहीं किया जाना चाहिए। ऐसे स्पष्ट और विशिष्ट कृत्य होने चाहिए जो समग्र रूप से लोक–शांति के लिए वास्तविक खतरे की ओर संकेत करें, न कि केवल कुछ व्यक्तियों के बीच भय तक सीमित हों।
इसके बाद न्यायालय ने विचार किया कि क्या SDM के आदेश को चुनौती देने के लिए याचिकाकर्ता को रिट याचिका दायर करने के बजाय उच्च न्यायालय की निहित आपराधिक अधिकारिता (inherent criminal jurisdiction) धारा 482 दंप्रसं के तहत प्रयुक्त करनी चाहिए थी। न्यायालय ने वैकल्पिक उपाय (alternative remedy) की अवधारणा तथा रिट याचिका की “ग्राह्यता” (maintainability) और “स्वीकार्यता” (entertainability) के अंतर पर विस्तार से चर्चा की।
Godrej Sara Lee Ltd. v. Excise and Taxation Officer-cum-Assessing Authority, 2023 SCC OnLine SC 95 पर भरोसा करते हुए न्यायालय ने स्पष्ट किया कि यद्यपि सामान्यतः उच्च न्यायालय तब रिट याचिकाओं पर विचार नहीं करते जब कोई प्रभावी वैकल्पिक उपाय उपलब्ध हो, यह कोई कठोर निषेध नहीं है। यह नीति, सुविधा और विवेक का नियम है, विधि का नहीं। ग्राह्यता न्यायालय की यह शक्ति है कि वह वाद को ग्रहण कर सकता है या नहीं; जबकि स्वीकार्यता यह है कि न्यायालय उस शक्ति का प्रयोग करना चाहता है या नहीं।
न्यायालय ने आगे Whirlpool Corporation v. Registrar of Trade Marks, Mumbai, (1998) 8 SCC 1 तथा Radha Krishan Industries v. State of Himachal Pradesh, (2021) 6 SCC 771 का हवाला दिया, जिनमें यह मान्य अपवाद निर्धारित किए गए हैं कि किन परिस्थितियों में वैकल्पिक उपाय उपलब्ध होने के बावजूद रिट याचिका सुनी जा सकती है: जहाँ मूल अधिकारों का प्रश्न हो, जहाँ प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन हुआ हो, जहाँ आदेश पूर्णतः अधिकार–विहीन (without jurisdiction) हों, या जहाँ विधि की संवैधानिक वैधता (vires) को चुनौती दी गई हो।
इन सिद्धांतों को लागू करते हुए न्यायालय ने देखा कि यद्यपि तकनीकी रूप से याचिकाकर्ता धारा 482 दंप्रसं के तहत उच्च न्यायालय का रुख कर सकता था, मामला इन मान्य अपवादों के दायरे में आता है। यदि कार्यपालक मजिस्ट्रेट ने धारा 107 की कार्यवाही पूर्णतः अधिकार–विहीन तरीके से शुरू की और ऐसी कार्यवाही ने याचिकाकर्ता की संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत स्वतंत्रता को सीमित किया, तो उच्च न्यायालय अपने रिट क्षेत्राधिकार का उपयोग कर सकता था और करना चाहिए था।
तथ्यों की ओर लौटते हुए न्यायालय ने नोट किया कि आरोप, यदि स्वीकार भी कर लिए जाएं, तो अधिकतम यह संकेत करते हैं कि याचिकाकर्ता ने भारतीय दंड संहिता के तहत (जैसे जबरन वसूली या आपराधिक धमकी) कोई मूल अपराध किया हो सकता है। ऐसे कृत्यों के लिए उचित कानूनी मार्ग सामान्य आपराधिक अभियोजन था, न कि धारा 107 दंप्रसं की कार्यवाही।
निर्णायक रूप से, याचिकाकर्ता द्वारा किए गए किसी विशिष्ट प्रत्यक्ष कृत्य का कोई आरोप नहीं था जो “लोक–शांति” या “लोक–शांति में व्यवधान” की आसन्न जोखिम को, जो व्यापक जन–समुदाय को प्रभावित करता हो, दर्शाता हो। कर्मचारियों और PDS डीलरों के याचिकाकर्ता से भयभीत रहने के SDM के निष्कर्ष से स्वतः ही विधिक अर्थों में लोक–शांति के लिए खतरे का निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता।
न्यायालय ने माना कि धारा 107 दंप्रसं के तहत यह आवश्यक है कि यह आरोप हो कि व्यक्ति के कृत्य सीमित व्यक्तियों के दायरे से आगे जाकर लोक–व्यवस्था को भंग करने की संभावना रखते हैं। कुछ सरकारी कर्मचारियों या डीलरों द्वारा अनुभव किया गया भय, अपने आप में, इस असाधारण प्रतिबंधात्मक अधिकार–क्षेत्र को लागू करने के लिए अपर्याप्त है।
इस तर्क के आधार पर न्यायालय ने निष्कर्ष निकाला कि कार्यपालक मजिस्ट्रेट ने “किसी भी अधिकार–क्षेत्र के बिना कार्यवाही शुरू की।” SDM ने, अपने अधिकार के भीतर कार्य करने के आवरण में, “अपने अधिकार/क्षेत्राधिकार का अतिक्रमण” किया। धारा 107 दंप्रसं का सहारा लेने के बजाय, यदि अधिकारियों को यह विश्वास था कि वास्तव में कोई अपराध किया गया है, तो उन्हें सामान्य आपराधिक मामले दर्ज कर उनका अनुसरण करना चाहिए था।
न्यायालय ने आगे धारा 107 दंप्रसं की कार्यवाही की शुरुआत को याचिकाकर्ता के संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत प्रदत्त व्यक्तिगत स्वतंत्रता के मूल अधिकार के उल्लंघन और कटौती के रूप में चित्रित किया। न्यायालय ने माना कि किसी नागरिक के जीवन और स्वतंत्रता को इस तरह से संकुचित या सीमित नहीं किया जा सकता जैसा इस मामले में कार्यपालक मजिस्ट्रेट ने किया।
चूँकि आदेश को पूर्णतः अधिकार–विहीन और अनुच्छेद 21 का उल्लंघन करने वाला पाया गया, उच्च न्यायालय ने माना कि अनुच्छेद 226 के तहत रिट याचिका पर विचार करना और राहत प्रदान करना उसका दायित्व है, भले ही वैकल्पिक उपाय उपलब्ध हो और भले ही बांड की अवधि पहले ही समाप्त हो चुकी हो।
अंततः, सर्टियोरारी की रिट जारी करते हुए, पटना उच्च न्यायालय ने केस नंबर 437 of 2021 में धारा 107 दंप्रसं के तहत 03.04.2021 के आदेश द्वारा शुरू की गई पूरी कार्यवाही को निरस्त कर दिया। रिट याचिका स्वीकार कर ली गई।
व्यापक प्रभाव को स्वीकार करते हुए, न्यायालय ने रजिस्ट्रार जनरल को निर्देश दिया कि इस निर्णय की प्रति संबंधित कार्यपालक मजिस्ट्रेट तथा बिहार सरकार के मुख्य सचिव को भेजी जाए, ताकि इसे सभी कार्यपालक मजिस्ट्रेटों के बीच प्रसारित किया जा सके, जिससे वे धारा 107 दंप्रसं के तहत अपनी शक्तियों की सीमाओं से भली–भांति अवगत हों।
यह निर्णय क्यों महत्वपूर्ण है
यह निर्णय उन साधारण नागरिकों के लिए महत्वपूर्ण है जो अधिकारियों या पड़ोसियों की शिकायतों के आधार पर धारा 107 दंप्रसं के तहत प्रतिबंधात्मक कार्यवाही का सामना कर सकते हैं।
पहले, पटना उच्च न्यायालय ने स्पष्ट कहा है कि धारा 107 दंप्रसं का उपयोग हर बार एक शॉर्टकट के रूप में नहीं किया जा सकता जब किसी पर पैसे मांगने, दूसरों को परेशान करने या यहाँ तक कि अपराध करने का आरोप हो। यदि किसी अपराध का आरोप है, तो पुलिस को उचित आपराधिक मामला पंजीकृत कर जांच करनी होगी, न कि व्यक्ति को प्रतिबंधात्मक बांड की कार्यवाही में धकेलना।
दूसरे, न्यायालय ने ज़ोर देकर कहा है कि धारा 107 दंप्रसं केवल संभावित लोक–शांति भंग या लोक–शांति में व्यवधान को रोकने के लिए है। कुछ सीमित व्यक्तियों के समूह को प्रभावित करने वाला भय या झुंझलाहट पर्याप्त नहीं है। गाँव स्तर के कार्यकर्ता, RTI उपयोगकर्ता, पत्रकार या व्हिसल–ब्लोअर, जो अक्सर प्रतिशोधात्मक कार्रवाइयों का सामना करते हैं, उनके लिए यह स्पष्टीकरण विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण है।
तीसरे, यह निर्णय पुनः स्थापित करता है कि प्रतिबंधात्मक शक्तियों का दुरुपयोग अनुच्छेद 21 का उल्लंघन हो सकता है। भले ही बांड की अवधि समाप्त हो चुकी हो, न्यायालय फिर भी हस्तक्षेप कर ऐसी कार्रवाइयों को अवैध घोषित कर सकते हैं, ताकि दुरुपयोग का विधिवत अभिलेखन हो सके और वह दोहराया न जाए।
अंत में, बिहार में कार्यपालक मजिस्ट्रेटों के बीच आदेश के प्रसारण का निर्देश देकर, न्यायालय भविष्य में इसी तरह के दुरुपयोग को रोकना चाहता है और यह सुनिश्चित करना चाहता है कि प्रतिबंधात्मक शक्तियों का प्रयोग सावधानी और नागरिकों के मूल अधिकारों के सम्मान के साथ किया जाए।
कानूनी प्रश्न और उत्तर
प्रश्न: क्या पटना उच्च न्यायालय धारा 482 दंप्रसं के तहत उपाय उपलब्ध होने के बावजूद धारा 107 दंप्रसं की कार्यवाही के विरुद्ध आपराधिक रिट याचिका पर विचार कर सकता है?
उत्तर: हाँ। न्यायालय ने माना कि वैकल्पिक उपाय की उपलब्धता पूर्ण निषेध नहीं है। चूँकि कार्यपालक मजिस्ट्रेट का आदेश अधिकार–विहीन था और उसने याचिकाकर्ता के अनुच्छेद 21 के अधिकार का उल्लंघन किया, इसलिए मान्य अपवादों के तहत रिट याचिका स्वीकार्य थी।
प्रश्न: याचिकाकर्ता के विरुद्ध लगाए गए तथ्यात्मक आरोप क्या विधि की दृष्टि से धारा 107 दंप्रसं के तहत कार्यवाही शुरू करने और शांति बनाए रखने हेतु बांड निष्पादित करने के आदेश को न्यायोचित ठहराने के लिए पर्याप्त थे?
उत्तर: नहीं। न्यायालय ने माना कि अधिकतम, आरोप IPC के तहत परीक्षण योग्य मूल अपराधों को उजागर करते हैं। ऐसा कोई विशिष्ट प्रत्यक्ष कृत्य नहीं था जो व्यापक जन–समुदाय को प्रभावित करने वाली आसन्न लोक–शांति भंग या लोक–शांति में व्यवधान को दर्शाए। इसलिए कार्यपालक मजिस्ट्रेट के पास धारा 107 दंप्रसं को लागू करने का अधिकार–क्षेत्र नहीं था।
प्रश्न: इस मामले में SDM के अधिकार–क्षेत्र के अभाव का कानूनी परिणाम क्या है?
उत्तर: केस नंबर 437 of 2021 में धारा 107 दंप्रसं के तहत 03.04.2021 के आदेश द्वारा शुरू की गई पूरी कार्यवाही सर्टियोरारी की रिट द्वारा निरस्त कर दी गई, और बिहार के कार्यपालक मजिस्ट्रेटों के बीच निर्णय के प्रसारण के लिए निर्देश जारी किए गए।
न्यायालय द्वारा उद्धृत मामले
- Madhu Limaye v. Sub Divisional Magistrate Monghyr, 1970 (3) SCC 746
- Brahmdeo Singh v. State of Bihar, 1979 SCC OnLine Pat 172
- Lovely v. State of Kerala, 2023 SCC OnLine Ker 7567
- Jayanth K.C. v. State of Kerala, 2025 KHC 1591
- Christalin Costa v. State of Goa and Others, 1992 SCC OnLine Bom 252
- Perswami Kandswami Devendra v. Sr. Inspector of Police, 2003 SCC OnLine Bom 251
- Sandeep Shivaji Mhatre v. State of Maharashtra and Another, 2014 SCC OnLine Bom 5297
- Ram Prakash and Another v. State, 1996 SCC OnLine Del 314
- Kuldeep Singh and Others v. State of Bihar and Others, 1988 SCC OnLine Pat 77
- Godrej Sara Lee Ltd. v. Excise and Taxation Officer-cum-Assessing Authority and Others, 2023 SCC OnLine SC 95
- Whirlpool Corporation v. Registrar of Trade Marks, Mumbai and Others, (1998) 8 SCC 1
- Radha Krishan Industries v. State of Himachal Pradesh and Others, (2021) 6 SCC 771
मामले का विवरण
मामला संख्या: Criminal Writ Jurisdiction Case No. 1119 of 2021
मामला शीर्षक: Lalan Prasad Singh v. The State of Bihar & Others
उद्धरण: 2022 (2) PLJR 440
पीठ: Hon’ble Mr. Justice Jitendra Kumar
अधिवक्ता:
- याचिकाकर्ता की ओर से: Mr. Shambhu Sharan Singh, Advocate
- राज्य की ओर से: Mr. Vijay Kumar Sinha, AC to AAG-5
मामले का स्वरूप: संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत आपराधिक रिट याचिका, जिसमें धारा 107 दंप्रसं के अंतर्गत कार्यवाही को चुनौती दी गई तथा केस नंबर 437 of 2021 में समस्त कार्यवाही को निरस्त करने की प्रार्थना की गई।
निर्णय की तिथि: 07.04.2026
विवादित कार्यवाही: केस नंबर 437 of 2021 में धारा 107 दंप्रसं के तहत उप-मंडलीय दंडाधिकारी, नौगछिया, भागलपुर द्वारा पारित 03.04.2021 की आदेश–पत्र तथा एक वर्ष के लिए बांड निष्पादित करने का निर्देश देने वाला 02.04.2022 का अंतिम आदेश।
निर्णय का लिंक: Patna High Court के निर्णय का पूर्ण पाठ
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