मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला सी.एम. लॉ कॉलेज, दरभंगा के एक विधि शिक्षक तथा ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय के बीच लम्बे समय से चले आ रहे सेवा-विवाद से उत्पन्न हुआ है। शिक्षक ने पहले उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया था, और उसकी शिकायत अंततः अपील के रूप में लेटर्स पेटेंट अपील संख्या 666 वर्ष 2018 के रूप में पहुंची, जो CWJC संख्या 6838 वर्ष 2017 से उत्पन्न हुई थी।
20.06.2019 को उक्त लेटर्स पेटेंट अपील में एक आदेश पारित किया गया। शिक्षक को लगा कि उस आदेश में उसकी विधिक स्थिति और संबंधित विश्वविद्यालय अधिसूचनाओं पर सही प्रकार से विचार नहीं किया गया, अतः उसने पटना उच्च न्यायालय में सिविल रिव्यू संख्या 253 वर्ष 2019 दायर की।
समीक्षा याचिका की सुनवाई माननीय श्री न्यायमूर्ति पी. बी. बजान्त्री तथा माननीय श्री न्यायमूर्ति रमेश चन्द्र मालवीय की खण्डपीठ ने की। सुनवाई के दौरान न्यायालय ने ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय के कुलसचिव की उपस्थिति का भी निर्देश दिया, जो 07.12.2023 को न्यायालय में उपस्थित रहे।
समीक्षा में मूल प्रश्न संकीर्ण किंतु महत्वपूर्ण था: क्या समीक्षा याचिकाकर्ता, जो विधि का एक स्थायी अंशकालिक व्याख्याता है, को पत्र संख्या BSU-8/2005–1614/GS(1), दिनांक 29.06.2005 से प्रवाहित होने वाले लाभ प्राप्त करने का अधिकार है, जो बिहार विश्वविद्यालय कानून मैनुअल भाग II की मद संख्या 49 के रूप में सम्मिलित है और अंशकालिक शिक्षकों की नियुक्ति एवं लाभों से संबंधित है।
न्यायालय ने क्या परखा और क्या निर्णय दिया
खण्डपीठ ने सर्वप्रथम सटीक मुद्दे की पहचान की: क्या याचिकाकर्ता, अपने नियुक्ति इतिहास और विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) विनियम, 1991 के आलोक में, अंशकालिक शिक्षकों से संबंधित 29.06.2005 के पत्र का लाभ ले सकता है।
न्यायालय ने बिहार विश्वविद्यालय कानून मैनुअल भाग II की मद संख्या 49 को पुनरुत्पादित किया। यह प्रावधान निर्धारित करता है कि अंशकालिक शिक्षकों के पास नियमित शिक्षकों जैसी ही न्यूनतम योग्यता होनी चाहिए और चयन प्रक्रिया भी नियमित शिक्षकों जैसी ही होनी चाहिए। यह यह भी अनुमति देता है कि उचित रूप से गठित चयन समिति की अनुशंसा पर कुलपति अंशकालिक शिक्षकों की नियुक्ति अधिकतम छह माह या अकादमिक सत्र की समाप्ति, जो भी पहले हो, तक के लिए कर सकते हैं, और वह भी कार्य-भार या विषयगत आवश्यकता से जुड़े अपवादात्मक परिस्थितियों में।
मद संख्या 49 आगे यह स्पष्ट करती है कि ऐसे शिक्षकों की नियुक्ति अल्प अवधियों के लिए संविदा पर या स्थायी अर्धकालिक/अनुपातिक समय के कर्मचारियों के रूप में वेतनमान के आधे/अनुपातिक वेतन पर की जा सकती है। ऐसे मामलों में उन्हें अनुपातिक वेतन-वृद्धियाँ, महँगाई भत्ता तथा अन्य अनुमन्य लाभ प्राप्त होने हैं। महत्वपूर्ण रूप से, इन स्थायी अंशकालिक शिक्षकों को व्याख्याता से रीडर तथा प्रोफेसर जैसे उच्च वेतनमान तक कैरियर उन्नयन योजना (Career Advancement Scheme) का भी, पुनः आधे/अनुपातिक आधार पर, लाभ मिलने का अधिकार है।
प्रतिवादीगण, अर्थात विश्वविद्यालय और इसके पदाधिकारीगण, निरन्तर यह तर्क देते रहे कि याचिकाकर्ता की नियुक्ति स्थायी अंशकालिक व्याख्याता के रूप में UGC विनियम, 1991 के 19.09.1991 को प्रभावी होने के बाद ही हुई। इस आधार पर उनका कहना था कि याचिकाकर्ता को व्याख्याता पद के लिए विनियम, 1991 के विनियम संख्या 2 में निर्धारित शैक्षिक योग्यताओं को पूरा करना आवश्यक है।
न्यायालय ने विनियम, 1991 के विनियम संख्या 2 पर विचार किया, जो यह उपबंध करता है कि यदि कोई व्यक्ति अनुसूची 1 में निर्धारित योग्यताओं को पूरा नहीं करता, तो उसे किसी विश्वविद्यालय या सम्बद्ध महाविद्यालय में शिक्षकीय पद पर नियुक्त नहीं किया जाएगा। प्रथम प्रावधान केवल UGC की पूर्व स्वीकृति के साथ ही योग्यता में शिथिलीकरण की अनुमति देता है। किन्तु द्वितीय प्रावधान कहता है कि जहाँ विनियमों के प्रवर्तन से पूर्व विधिवत गठित चयन समितियों के माध्यम से चयन हो चुके हैं, वहाँ ये विनियम लागू नहीं होंगे।
इसके बाद खण्डपीठ ने याचिकाकर्ता के नियुक्ति इतिहास का विस्तार से परीक्षण किया। याचिकाकर्ता को सी.एम. लॉ कॉलेज, दरभंगा में 14.11.1989 को विधि के स्थायी अंशकालिक व्याख्याता के रूप में, 700 रुपये मासिक के निर्धारित वेतनमान पर, बिहार राज्य विश्वविद्यालय (घटक महाविद्यालय) सेवा आयोग, पटना की सहमति के अधीन, नियुक्त किया गया था। इस नियुक्ति की अधिसूचना 19.02.1992 को जारी हुई, परन्तु उसमें स्पष्ट रूप से उल्लेख था कि नियुक्ति 14.11.1989 से प्रभावी होगी।
चूँकि नियुक्ति की प्रभावी तिथि 14.11.1989 थी, जो UGC विनियम, 1991 के 19.09.1991 को अधिसूचित होने से पूर्व की है, न्यायालय ने याचिकाकर्ता की सेवा-प्रवेश को प्री-विनियम माना। इसके बाद शेष प्रश्न यह था कि विधिक सेवा आयोग ने इस नियुक्ति को सहमति कब और किस प्रकार प्रदान की।
न्यायालय ने यह उल्लेख किया कि बिहार राज्य विश्वविद्यालय (घटक महाविद्यालय) सेवा आयोग, पटना ने 28.05.1998 को सहमति दी। आयोग द्वारा एल.एन. मिथिला विश्वविद्यालय के कुलसचिव को भेजे गए पत्र में कहा गया कि विश्वविद्यालय के पत्र पर भरोसा करते हुए आयोग ने याचिकाकर्ता की विधि के अंशकालिक व्याख्याता के रूप में नियुक्ति को, इस शर्त के अधीन कि नियुक्ति राज्य सरकार द्वारा अनुमोदित हो, सहमति प्रदान की। इसमें यह शर्त भी जोड़ी गई थी कि यदि समय के साथ कोई असंगति पाई जाती है तो यह सहमति वापस ली जा सकती है।
इसके पश्चात विश्वविद्यालय ने 30.07.1998 को एक अन्य अधिसूचना जारी की। उस अधिसूचना में कुलपति ने, सिंडिकेट की स्वीकृति की प्रत्याशा में, सेवा आयोग के 28.05.1998 के सहमति-पत्र के आधार पर, याचिकाकर्ता को सी.एम. लॉ कॉलेज, दरभंगा में विधि का अंशकालिक व्याख्याता 2200 रुपये मासिक स्थिर वेतन पर नियुक्त किया।
खण्डपीठ ने 19.02.1992 और 30.07.1998 की अधिसूचनाओं को सावधानीपूर्वक साथ-साथ पढ़ा। उसने निष्कर्ष निकाला कि 30.07.1998 की अधिसूचना वास्तव में एक नया नियुक्ति-आदेश था, परन्तु 14.11.1989 से प्रत्यावर्ती प्रभाव (retrospective effect) के साथ, जैसा कि उसमें स्पष्ट रूप से उल्लेखित था। 1998 की अधिसूचना में ऐसा कोई उल्लेख नहीं था कि 19.02.1992 की पूर्ववर्ती अधिसूचना को निरस्त, प्रतिस्थापित या परिवर्तित किया गया है।
इस आधार पर न्यायालय ने माना कि 19.02.1992 की अधिसूचना प्रभाव में बनी रही और याचिकाकर्ता की स्थायी अंशकालिक व्याख्याता के रूप में नियुक्ति 14.11.1989 से प्रभावी मानी जाएगी। न्यायालय ने इस तथ्य पर विशेष बल दिया कि विश्वविद्यालय ने कभी भी 19.02.1992 की अधिसूचना को वापस लेने, रद्द करने या संशोधित करने का कोई आदेश जारी नहीं किया, न ही आयोग की सहमति-पत्र में उल्लिखित शर्त के तहत किसी असंगति के आधार पर सहमति वापस ली।
इन तथ्यात्मक परिस्थितियों से खण्डपीठ ने निष्कर्ष निकाला कि याचिकाकर्ता को 14.11.1989 से उसकी नियुक्ति से जुड़ी सेवा-शर्तों और मौद्रिक लाभों का दावा करने का वैध अधिकार (vested right) प्राप्त हो गया था। चूँकि उसकी नियुक्ति वस्तुतः UGC विनियम, 1991 के लागू होने से पहले की थी, वह विनियम संख्या 2 के द्वितीय प्रावधान के संरक्षण का अधिकारी था।
सरल शब्दों में, क्योंकि याचिकाकर्ता की नियुक्ति 14.11.1989 से मानी जाती है और सेवा आयोग ने बाद में उस नियुक्ति को सहमति प्रदान की, इसलिए 1991 के विनियमों का उपयोग यह कहने के लिए नहीं किया जा सकता कि नियुक्ति के समय वह आवश्यक योग्यता नहीं रखता था। परिणामस्वरूप, प्रतिवादीगण विनियम, 1991 के विनियम संख्या 2 का सहारा लेकर उसे 29.06.2005 के अंशकालिक शिक्षकों वाले पत्र के अंतर्गत लाभों से वंचित नहीं कर सकते थे।
न्यायालय ने सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश XLVII नियम 1 के अंतर्गत समीक्षा की सीमित परिधि पर भी विचार किया। सामान्यतः न्यायालय, अभिलेख पर प्रत्यक्ष रूप से परिलक्षित त्रुटि (error apparent on the face of record) के बिना, समीक्षा में अपने पूर्व आदेशों में हस्तक्षेप नहीं करते। यहाँ खण्डपीठ ने ऐसी ही त्रुटि पाई: 20.06.2019 दिनांकित लेटर्स पेटेंट अपील के पूर्व आदेश में न्यायालय 19.02.1992 की उस अधिसूचना के विधिक प्रभाव, जिसके द्वारा 14.11.1989 से प्रत्यावर्ती नियुक्ति दी गई थी, को ठीक से नोटिस और सराह नहीं कर पाया था।
इस त्रुटि के कारण प्रतिवादीगण को 1991 के विनियमों में निर्धारित योग्यताओं पर जोर देने और 29.06.2005 के पत्र के अंतर्गत आधे/अनुपातिक आय-निर्धारण, महँगाई भत्ता तथा स्थायी अंशकालिक शिक्षकों के लिए अन्य अनुमन्य लाभों से याचिकाकर्ता को वंचित करने का अवसर मिल गया था।
इस भूल को सुधारने के लिए खण्डपीठ ने समीक्षा याचिका स्वीकार कर ली। उसने CWJC संख्या 6838 वर्ष 2017 से उत्पन्न लेटर्स पेटेंट अपील संख्या 616 वर्ष 2018 (आदेश-पाठ में इस संख्या का उल्लेख है जबकि शीर्षक में LPA संख्या 666 वर्ष 2018 कहा गया है) में 20.06.2019 को पारित पूर्व आदेश को वापस ले लिया (recall किया)। न्यायालय ने लेटर्स पेटेंट अपील को उसके मूल अभिलेख एवं संख्या पर पुनर्स्थापित कर दिया।
न्यायालय ने आगे रजिस्ट्री को निर्देश दिया कि स्पष्ट हुई विधिक स्थिति के आलोक में उक्त लेटर्स पेटेंट अपील को फरवरी 2024 के दूसरे सप्ताह में उपयुक्त रोस्टर पीठ के समक्ष पुनः विचारार्थ सूचीबद्ध किया जाए। एल.एन. मिथिला विश्वविद्यालय के कुलसचिव, जो न्यायालय में उपस्थित थे, की निजी उपस्थिति की अनिवार्यता को समाप्त कर दिया गया।
यह निर्णय क्यों महत्वपूर्ण है
यह निर्णय विश्वविद्यालय तथा महाविद्यालय के शिक्षकों, विशेषकर बिहार के विश्वविद्यालयों में कार्यरत स्थायी अंशकालिक व्याख्याताओं के लिए महत्वपूर्ण है। यह दर्शाता है कि नियुक्ति की प्रभावी तिथि और नियुक्ति अधिसूचनाओं की भाषा यह तय कर सकती है कि बाद के विनियम लागू होंगे या नहीं।
UGC विनियम, 1991 से पूर्व नियुक्त शिक्षकों के लिए यह निर्णय संकेत देता है कि यदि उनकी नियुक्ति विधिवत की गई थी और बाद में सेवा आयोग द्वारा सहमति प्रदान की गई, तो विश्वविद्यालय बाद में नई योग्यता-संबंधी नियमों को प्रतिगामी रूप से लागू कर उनके लाभों से वंचित नहीं कर सकते। पटना उच्च न्यायालय ने स्पष्ट कर दिया कि ऐसे शिक्षक विनियम संख्या 2 के द्वितीय प्रावधान के संरक्षण का दावा कर सकते हैं।
निर्णय यह भी रेखांकित करता है कि यद्यपि समीक्षा अधिकार-क्षेत्र संकीर्ण है, फिर भी जहाँ कोई पूर्व आदेश महत्वपूर्ण दस्तावेजों जैसे अधिसूचनाओं को, जो विधिक स्थिति को बदल देते हैं, उचित रूप से विचार में लेने में विफल रहता है, वहां प्रत्यक्ष त्रुटि को सुधारने के लिए इसका उपयोग किया जा सकता है। इससे यह सुनिश्चित करने में मदद मिलती है कि लम्बे समय से सेवा दे रहे शिक्षकों को उनकी स्थायी अंशकालिक शिक्षक की स्थिति से प्रवाहित होने वाले मौद्रिक व सेवा लाभों से अन्यायपूर्ण रूप से वंचित न किया जाए।
व्यावहारिक रूप से, यह निर्णय अपील की पुनः पूर्ण सुनवाई के लिए राह खोलता है, जहाँ याचिकाकर्ता 14.11.1989 से अपनी नियुक्ति के आधार पर पत्र संख्या BSU-8/2005–1614/GS(1) में उल्लिखित लाभों, जैसे अनुपातिक वेतन-वृद्धि, महँगाई भत्ता एवं कैरियर उन्नयन, के अपने दावे पर बल दे सकेगा।
विधिक प्रश्न और उनके उत्तर
प्रश्न: क्या समीक्षा याचिकाकर्ता, जो विधि का एक स्थायी अंशकालिक व्याख्याता है, UGC विनियम, 1991 तथा उसके नियुक्ति इतिहास के आलोक में पत्र संख्या BSU-8/2005–1614/GS(1) दिनांक 29.06.2005 के लाभ का अधिकारी था?
उत्तर: न्यायालय ने माना कि चूँकि याचिकाकर्ता की स्थायी अंशकालिक व्याख्याता के रूप में नियुक्ति 14.11.1989 से प्रभावी थी, जो UGC विनियम, 1991 के लागू होने से पूर्व की है, और यह नियुक्ति न तो वापस ली गई और न ही संशोधित की गई, अतः उसे विनियम संख्या 2 के द्वितीय प्रावधान का संरक्षण प्राप्त था और 1991 की योग्यता मानकों को पूरा न करने के आधार पर उसे 29.06.2005 के अंशकालिक शिक्षकों वाले पत्र के लाभों से वंचित नहीं किया जा सकता।
प्रश्न: क्या 20.06.2019 के लेटर्स पेटेंट अपील के पूर्व आदेश की समीक्षा को न्यायोचित ठहराने वाली अभिलेख पर प्रत्यक्ष रूप से परिलक्षित कोई त्रुटि थी?
उत्तर: हाँ। न्यायालय ने यह पाया कि 19.02.1992 की अधिसूचना, जिसके द्वारा याचिकाकर्ता को 14.11.1989 से प्रभावी स्थायी अंशकालिक व्याख्याता नियुक्त किया गया था, के प्रत्यावर्ती प्रभाव को ठीक से नोटिस और सराह न करने में एक प्रत्यक्ष त्रुटि थी, जिसका UGC विनियम, 1991 की प्रयोज्यता पर सीधा प्रभाव पड़ता था।
प्रश्न: समीक्षा में उस त्रुटि को सुधारने के पश्चात क्या परिणाम होना चाहिए था?
उत्तर: न्यायालय ने सिविल समीक्षा याचिका स्वीकार की, लेटर्स पेटेंट अपील में 20.06.2019 को पारित आदेश को वापस ले लिया (recall किया), अपील को उसके मूल अभिलेख और संख्या पर पुनर्स्थापित किया और निर्देश दिया कि उसे फरवरी 2024 के दूसरे सप्ताह में रोस्टर पीठ के समक्ष पुनः सूचीबद्ध किया जाए।
न्यायालय द्वारा उद्धृत मामले
- निर्णय के पाठ में किसी अन्य प्रकाशित निर्णय का नाम या उद्धरण के साथ उल्लेख या उस पर निर्भरता नहीं की गई है।
मामले का विवरण
मामला संख्या: सिविल रिव्यू संख्या 253 वर्ष 2019, लेटर्स पेटेंट अपील संख्या 666 वर्ष 2018 (शरीर पाठ में LPA संख्या 616 वर्ष 2018 के रूप में भी उल्लिखित), जो CWJC संख्या 6838 वर्ष 2017 से उत्पन्न
मामला शीर्षक: धर्मेश्वर मिश्रा बनाम द वाइस चांसलर, L.N. Mithila University, Darbhanga & Ors.
साइटेशन: 2024(1) PLJR 718
न्यायालय: हाई कोर्ट ऑफ ज्यूडिकेचर एट पटना
कोरम: माननीय श्री न्यायमूर्ति पी. बी. बजान्त्री तथा माननीय श्री न्यायमूर्ति रमेश चन्द्र मालवीय
निर्णय की तिथि: 07.12.2023
वकीलगण:
- याचिकाकर्ता की ओर से: श्री अमरेन्द्र नारायण, अधिवक्ता; श्री संजय कुमार श्रीवास्तव, अधिवक्ता
- ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय की ओर से: श्री नदीम सेराज, अधिवक्ता; श्री शैलेश कुमार, अधिवक्ता
- राज्य बिहार की ओर से: श्री शशि शेखर तिवारी, AC to AG
मामले का स्वरूप: लेटर्स पेटेंट अपील में पारित आदेश की समीक्षा के लिए दायर सिविल समीक्षा याचिका (एक स्थायी अंशकालिक व्याख्याता के सेवा तथा मौद्रिक लाभों के दावे से संबंधित)।
निर्णय का लिंक: पटना उच्च न्यायालय की वेबसाइट पर निर्णय का पूर्ण पाठ
यदि आपको यह स्पष्टीकरण उपयोगी लगा हो और आप यह जानने में रुचि रखते हों कि
बिहार में विधिक विकास आपके अधिकारों को किस प्रकार प्रभावित कर सकते हैं,
तो आप आगे की जानकारी के लिए Samvida Law Associates का अनुसरण करने पर विचार कर सकते हैं।



