बिना चुनौती दिए गए एपीएआर आदेश के कारण पदोन्नति दावा खारिज — पटना उच्च न्यायालय, 2022

Shipra Sinha

Reviewed by: Shipra Sinha

License Number: BR/1674/2021

Shipra Sinha is a lawyer at Samvida Law Associates practicing family law and civil disputes. She represents clients in matrimonial matters, inheritance disputes, property-related family conflicts, and civil litigation before the Patna High Court and subordinate courts. Her practice handles family law proceedings and civil matters for individuals and families across Bihar.

यह मामला सीमा सुरक्षा बल में वार्षिक प्रदर्शन मूल्यांकन रिपोर्ट और उससे संबंधित पदोन्नति अस्वीकृति को चुनौती देने से जुड़ा था। पटना उच्च न्यायालय ने हस्तक्षेप से इनकार कर दिया क्योंकि रिपोर्ट के संबंध में पहले पारित प्रतिकूल आदेश को कभी चुनौती ही नहीं दी गई थी। जब तक 05.06.2016 का वह आदेश यथावत है, याचिकाकर्ता पदोन्नति का दावा नहीं कर सकता। इस कारण रिट याचिका खारिज कर दी गई।

मामले की पृष्ठभूमि

याचिकाकर्ता सीमा सुरक्षा बल (BSF) में असिस्टेंट कमांडेंट के पद पर कार्यरत था। आकलन वर्ष 2014–2015 के लिए उसकी वार्षिक प्रदर्शन आकलन रिपोर्ट (APAR) 30.04.2015 को उसके उच्चाधिकारियों द्वारा लिखी गई।

उस एपीएआर में, कॉलम संख्या 10 के अंतर्गत, उच्चाधिकारियों ने दर्ज किया कि याचिकाकर्ता व्यवस्थित ढंग से कार्य करता है और अपने वरिष्ठों से परामर्श किए बिना स्वयं निर्णय लेता है। साथ ही यह भी उल्लेख किया गया कि उसका व्यावसायिक ज्ञान अच्छा है।

बाद में, उच्चाधिकारी ने इन टिप्पणियों को गंभीरता से लिया। 22.11.2015 को याचिकाकर्ता को एक नोटिस जारी किया गया, जिसमें पूछा गया कि इन प्रतीत होने वाले अच्छे विवरणों को प्रतिकूल टिप्पणी क्यों न माना जाए। याचिकाकर्ता ने 11.01.2016 को अपना स्पष्टीकरण प्रस्तुत किया।

05.06.2016 को सक्षम प्राधिकारी ने याचिकाकर्ता के स्पष्टीकरण को अस्वीकार कर दिया। इस आदेश द्वारा 2014–2015 के एपीएआर में दर्ज “अच्छा” विवरण प्रतिकूल टिप्पणी में बदल दिए गए। 05.06.2016 दिनांकित यह आदेश ही विवाद का केंद्रीय बिंदु बन गया।

इसके पश्चात याचिकाकर्ता डिप्टी कमांडेंट के पद पर पदोन्नति के लिए पात्र हो गया। विभागीय पदोन्नति समितियों ने उसकी उम्मीदवारी पर 28.06.2018 को और पुनः 23.06.2019 को विचार किया। इस दौरान पदोन्नति प्राधिकारी ने 05.06.2016 के प्रतिकूल आदेश का संज्ञान लिया और उसकी पदोन्नति के दावे को अस्वीकार कर दिया।

वर्ष 2020 में याचिकाकर्ता ने पटना उच्च न्यायालय की दीवानी रिट क्षेत्राधिकार में याचिका दायर की। उसने एपीएआर और उससे उसकी पदोन्नति की संभावनाओं पर पड़े प्रभाव को चुनौती दी।

न्यायालय ने क्या परखा और क्या निर्णय दिया

याचिकाकर्ता ने 30.04.2015 दिनांकित एपीएआर को निरस्त करने के लिए रिट याचिका दायर की। उसने आरोप लगाया कि प्रतिवादी संख्या 6, जो उस समय उसका कमांडेंट था, ने उसके प्रदर्शन का सही मूल्यांकन किए बिना एपीएआर में गलत विवरण और टिप्पणियाँ दर्ज कीं।

याचिका के अनुसार, एपीएआर का उपयोग उसे डिप्टी कमांडेंट के पद पर पदोन्नत होने से रोकने के लिए किया गया। उसका आरोप था कि यह दुर्भावनापूर्ण इरादे से किया गया और इस प्रकार उसके “अपग्रेडेशन” को परोक्ष रूप से रोका गया।

इसी आधार पर उसने एपीएआर को निरस्त करने के लिए सर्टियोरेरी की रिट या अन्य उपयुक्त निर्देश जारी करने की प्रार्थना की। उसने यह भी प्रार्थना की कि प्राधिकारियों को उसे डिप्टी कमांडेंट के पद पर पदोन्नत करने का निर्देश दिया जाए, जिसके लिए वह स्वयं को विधिसम्मत रूप से पात्र बताता था, तथा अन्य परिणामी राहतें भी मांगीं।

सुनवाई के दौरान न्यायालय ने एपीएआर से संबंधित घटनाक्रम की शृंखला पर दृष्टि डाली। एपीएआर स्वयं 30.04.2015 को लिखी गई थी। इसमें सकारात्मक और नकारात्मक दोनों पहलू थे: इसमें उसके व्यावसायिक ज्ञान को अच्छा माना गया, किंतु यह भी उल्लेख किया गया कि वह अपने वरिष्ठों से परामर्श किए बिना स्वयं निर्णय लेता है।

इन्हीं टिप्पणियों के कारण वरिष्ठ अधिकारी ने 22.11.2015 दिनांकित नोटिस जारी किया। उस नोटिस में याचिकाकर्ता से यह स्पष्ट करने को कहा गया कि एपीएआर में दर्ज “अच्छी” टिप्पणियों को प्रतिकूल टिप्पणी क्यों न माना जाए। याचिकाकर्ता ने 11.01.2016 को अपना स्पष्टीकरण दिया।

हालाँकि, 05.06.2016 को प्राधिकारी ने उसका स्पष्टीकरण अस्वीकार कर दिया। सबसे महत्वपूर्ण बात यह रही कि प्राधिकारी ने आदेश पारित कर अच्छी टिप्पणियों को प्रतिकूल टिप्पणियों में परिवर्तित कर दिया। इसका अर्थ यह हुआ कि 2014–2015 के एपीएआर में याचिकाकर्ता के विरुद्ध प्रतिकूल प्रविष्टियाँ दर्ज हो गईं।

रिट याचिका में याचिकाकर्ता की शिकायत यह थी कि उसके अनुसार 2014–2015 का एपीएआर अन्यथा अच्छा था और पदोन्नति के उद्देश्य से उसे अच्छे के रूप में ही माना जाना चाहिए था। उसने यह विशेष रूप से रेखांकित किया कि 28.06.2018 और 23.06.2019 तक उसके एपीएआर अच्छे थे, अतः उसके मामले पर डिप्टी कमांडेंट पद पर पदोन्नति के लिए अनुकूल रूप से विचार होना चाहिए था।

किन्तु न्यायालय ने यह नोट किया कि आधिकारिक प्रतिवादियों ने उसकी पदोन्नति पर विचार करते समय 05.06.2016 दिनांकित आदेश का विधिवत संज्ञान लिया था। उसी प्रतिकूल आदेश के कारण उसके पदोन्नति दावे को 28.06.2018 और पुनः 23.06.2019 को अस्वीकार कर दिया गया।

न्यायमूर्ति पी. बी. बजंथरी ने एक महत्वपूर्ण विधिक बिंदु पर ध्यान केंद्रित किया: याचिकाकर्ता ने 05.06.2016 दिनांकित आदेश की वैधता को कभी चुनौती ही नहीं दी थी। यही वह आदेश था, जिसने उसके एपीएआर में दर्ज अच्छी टिप्पणियों को प्रतिकूल टिप्पणियों में बदला और जिसने सीधे तौर पर उसकी पदोन्नति की संभावनाओं को प्रभावित किया।

इसकी महत्ता के बावजूद, याचिकाकर्ता ने न तो उस आदेश को पारित होने के तुरन्त बाद निरस्त कराने की मांग की, न ही इस रिट याचिका के माध्यम से उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाने पर उसका निरस्तीकरण चाहा। रिट याचिका केवल 30.04.2015 दिनांकित एपीएआर और पदोन्नति अस्वीकृति को चुनौती देने के रूप में तैयार की गई थी, न कि स्वयं 05.06.2016 के आदेश को।

सरल शब्दों में, न्यायालय ने पाया कि याचिकाकर्ता प्रतिकूल आदेश के परिणाम (पदोन्नति न मिलना) पर प्रहार कर रहा था, जबकि मूल कारण (05.06.2016 दिनांकित आदेश) पर कोई आक्रमण ही नहीं किया गया था। जब तक वह प्रतिकूल आदेश वैध और प्रभावशील बना रहता है, कोई भी पदोन्नति प्राधिकारी उसे संज्ञान में लेने और उस पर निर्भर रहने के लिए बाध्य है।

इसलिए न्यायालय ने कहा कि इन परिस्थितियों में याचिकाकर्ता पदोन्नति का अधिकार दावा नहीं कर सकता। 05.06.2016 के निर्णय के बाद 2014–2015 का उसका एपीएआर प्रतिकूल सामग्री लिए हुए था, और वे प्रतिकूल प्रविष्टियाँ अभिलेख पर वैध रूप से विद्यमान थीं।

न्यायालय ने निष्कर्ष निकाला कि जब तक 05.06.2016 दिनांकित आदेश को उपयुक्त विधिक चुनौती द्वारा निरस्त नहीं किया जाता, तब तक याचिकाकर्ता वर्तमान रिट याचिका में मांगी गई राहतों का हकदार नहीं है। इसमें एपीएआर को निरस्त करने की उसकी मांग और उसे डिप्टी कमांडेंट के रूप में पदोन्नत करने के निर्देश की प्रार्थना दोनों शामिल हैं।

इसी तर्क के आधार पर पटना उच्च न्यायालय ने रिट याचिका खारिज कर दी। कोई अन्य निर्देश नहीं दिए गए, और निर्णय में 05.06.2016 के आदेश को अलग से चुनौती देने के लिए कोई स्पष्ट स्वतंत्रता दिए जाने का भी उल्लेख नहीं है। निर्णय इस बात तक सीमित है कि परिस्थितियाँ जैसी थीं, उनके तहत कोई राहत प्रदान नहीं की जा सकती थी।

यह निर्णय क्यों महत्वपूर्ण है

यह निर्णय उन सरकारी और वर्दीधारी सेवा कर्मचारियों के लिए महत्वपूर्ण है जिनकी पदोन्नति एपीएआर पर निर्भर करती है। यह दर्शाता है कि जब किसी एपीएआर को बाद में किसी अलग आदेश द्वारा संशोधित कर दिया जाता है या प्रतिकूल घोषित कर दिया जाता है, तो वही आदेश भविष्य के कैरियर पर प्रभाव डालने वाला मुख्य दस्तावेज बन जाता है।

यदि ऐसे प्रतिकूल आदेश को समय पर चुनौती नहीं दी जाती, तो न्यायालय बाद में, जब उसी आदेश के आधार पर पदोन्नति से वंचित किया जाता है, हस्तक्षेप करने से इनकार कर सकते हैं। इस मामले में पटना उच्च न्यायालय ने स्पष्ट कर दिया कि जब तक प्रतिकूल आदेश अभिलेख पर मौजूद है, पदोन्नति को अधिकार के रूप में दावा नहीं किया जा सकता।

कर्मचारियों के लिए यह इस बात पर बल देता है कि एपीएआर से संबंधी नोटिसों का सावधानीपूर्वक उत्तर देना और जहाँ आवश्यक हो, उसके बाद पारित किसी अंतिम प्रतिकूल आदेश को विधिक रूप से चुनौती देना अत्यंत महत्वपूर्ण है। प्राधिकारियों के लिए, यह निर्णय पदोन्नति पर विचार करते समय वैध प्रतिकूल टिप्पणियों पर निर्भर रहने की उनकी शक्ति का समर्थन करता है।

विधिक प्रश्न और उत्तर

  • प्रश्न: जब एपीएआर में संशोधन कर उसे प्रतिकूल बनाने वाला आदेश चुनौतीहीन बना हुआ हो, तो क्या उच्च न्यायालय डिप्टी कमांडेंट के पद पर पदोन्नति का निर्देश दे सकता है?
    उत्तर: नहीं। न्यायालय ने माना कि जब तक 05.06.2016 दिनांकित आदेश, जिसने अच्छी टिप्पणियों को प्रतिकूल टिप्पणियों में बदला, यथावत है, तब तक याचिकाकर्ता पदोन्नति संबंधी किसी राहत का अधिकारी नहीं है।
  • प्रश्न: क्या 28.06.2018 और 23.06.2019 की पदोन्नति संबंधी निर्णयों में हस्तक्षेप करने का कोई आधार था?
    उत्तर: नहीं। पदोन्नति प्राधिकारियों को याचिकाकर्ता के पदोन्नति दावे को अस्वीकार करते समय 05.06.2016 दिनांकित विद्यमान प्रतिकूल आदेश पर निर्भर रहने का अधिकार था।

न्यायालय द्वारा उद्धृत मामले

  • इस निर्णय में किसी पूर्ववर्ती निर्णय या न्यायिक नज़ीर का हवाला नहीं दिया गया है और न ही उस पर भरोसा किया गया है।

मामले का विवरण

मामला संख्या: Civil Writ Jurisdiction Case No. 6610 of 2020

मामले का शीर्षक: Prawesh Singh v. The Union of India & Ors.

पीठ: माननीय श्री न्यायमूर्ति पी. बी. बजंथरी

उद्धरण: 2022(2) PLJR 61

निर्णय की तिथि: 03.03.2022

अधिवक्ता:

  • याचिकाकर्ता की ओर से: श्री मनोज कुमार सिंह
  • संघ की ओर से: श्री कुमार प्रिया रंजन (Central Government Counsel), श्री पल्लव

मामले का स्वरूप: रिट याचिका (सीमा सुरक्षा बल में एपीएआर और पदोन्नति से संबंधित सेवा विवाद)

निर्णय का लिंक: पटना उच्च न्यायालय की वेबसाइट पर निर्णय का पूर्ण पाठ


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