मामले की पृष्ठभूमि
याचिकाकर्ता बिहार सरकार के पशु एवं मत्स्य संसाधन विभाग में कार्यरत थे। अपने सेवा काल के अंत में वे विशेष उप निदेशक, वृहद पशुविकास परियोजना, पटना के पद पर कार्य कर रहे थे।
वे अधिवर्षता की आयु प्राप्त करने पर 31.12.2017 को सेवानिवृत्त हो गए। सेवानिवृत्ति के बाद उनके सेवानिवृत्ति लाभों, विशेष रूप से पेंशन, को लेकर विवाद उत्पन्न हुआ।
सेवा के दौरान उनके विरुद्ध एक विभागीय कार्यवाही प्रारंभ की गई थी। यह कार्यवाही उनकी सेवानिवृत्ति से पहले समाप्त नहीं हुई। इसके बजाय, इसे Bihar Pension Rules, 1950 के नियम 43(b) के तहत सेवानिवृत्ति के बाद भी जारी रखा गया।
विभागीय कार्यवाही अंततः 24.01.2019 को प्रतिवादी अधिकारियों द्वारा पारित आदेश के साथ समाप्त हुई। इस आदेश द्वारा याचिकाकर्ता की 50% पेंशन स्थायी रूप से रोके जाने का निर्देश दिया गया।
याचिकाकर्ता के अनुसार, इस आदेश के बावजूद, उसे कुछ अवधियों के लिए पेंशन प्राप्त नहीं हुई। इसलिए उन्होंने पटना उच्च न्यायालय में Civil Writ Jurisdiction Case No.14945 of 2021 दायर कर सभी देय सेवानिवृत्ति लाभों के भुगतान, जिसमें सेवानिवृत्ति की तिथि से पेंशन बकाया भी शामिल है, के लिए दिशा-निर्देश मांगे।
न्यायालय ने क्या जांचा और क्या निर्णय दिया
पटना उच्च न्यायालय ने माननीय श्री न्यायमूर्ति नानी टागिया के माध्यम से 09.05.2024 को इस मामले की सुनवाई की। न्यायालय ने याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता श्री सुनील कुमार तथा प्रतिवादियों की ओर से GP-18 श्री राज किशोर राय की दलीलें सुनीं।
याचिकाकर्ता की ओर से कहा गया कि सेवा के दौरान विभागीय कार्यवाही प्रारंभ हुई थी और उसे Bihar Pension Rules, 1950 के नियम 43(b) के तहत सेवानिवृत्ति के बाद भी जारी रखा गया। कार्यवाही का समापन 24.01.2019 के आदेश के साथ हुआ, जिसके द्वारा उनकी 50% पेंशन स्थायी रूप से काट दी गई।
उस आदेश के आधार पर, याचिकाकर्ता ने स्वीकार किया कि उसकी केवल आधी पेंशन देय थी। हालांकि, उसकी शिकायत यह थी कि 50% पेंशन वास्तव में उसे केवल 25.10.2021 से ही दी गई।
उनके अधिवक्ता ने न्यायालय को यह भी सूचित किया कि दिनांक 24.01.2019 का आदेश स्वयं पटना उच्च न्यायालय में एक अन्य वाद, C.W.J.C. No.12175 of 2019 में चुनौती दिया गया है। वह एक अलग कार्यवाही है जिसमें दंड आदेश की वैधता प्रश्नाधीन है।
वर्तमान मामले में, याचिकाकर्ता ने अपनी शिकायत सीमित कर दी। उन्होंने कहा कि अन्य सभी सेवानिवृत्ति लाभ अधिकारियों द्वारा अदा कर दिए गए हैं। केवल 01.01.2018 से 23.01.2019 और 24.01.2019 से 24.10.2021 की अवधि की पेंशन बिल्कुल भी नहीं दी गई।
इसलिए, उन्होंने न्यायालय से अनुरोध किया कि प्रतिवादियों को निर्देश दिया जाए कि वे इन विशिष्ट अवधियों की पेंशन, कम से कम उतनी सीमा तक, जारी करें जितनी विभागीय आदेश के तहत पहले ही स्वीकृत है।
दूसरी ओर, प्रतिवादी संख्या 1 और 2 (राज्य प्राधिकारी) ने प्रति-शपथपत्र और पूरक प्रति-शपथपत्र दाखिल किया। प्रति-शपथपत्र के पैराग्राफ 21 में उन्होंने कहा कि पेंशन का भुगतान प्रक्रिया में है। इस आधार पर उन्होंने याचिका को निरर्थक (infructuous) बताते हुए खारिज करने का अनुरोध किया।
हालांकि, पूरक प्रति-शपथपत्र के पैराग्राफ 5 में उन्होंने यह भी कहा कि याचिकाकर्ता की 50% पेंशन वास्तव में 25.10.2021 से प्रभावी रूप से स्वीकृत की गई है। इसका अर्थ यह हुआ कि वास्तव में पेंशन का भुगतान केवल उसी बाद की तिथि से शुरू हुआ।
न्यायालय ने दलीलों का सावधानीपूर्वक परीक्षण किया। उसने नोट किया कि याचिकाकर्ता 31.12.2017 को विशेष उप निदेशक, वृहद पशुविकास परियोजना, पटना के पद से सेवानिवृत्त हुए। यह भी नोट किया गया कि उनके विरुद्ध विभागीय कार्यवाही Bihar Pension Rules के नियम 43(b) के तहत जारी रही और 24.01.2019 के आदेश के साथ समाप्त हुई, जिसके द्वारा उनकी 50% पेंशन स्थायी रूप से रोक दी गई।
दोनों पक्षों की दलीलों और अभिलेख पर उपलब्ध दस्तावेजों से न्यायालय ने पाया कि 24.01.2019 को विभागीय कार्यवाही के निष्कर्ष के बाद, उस आदेश की शर्तों के अनुसार याचिकाकर्ता 50% पेंशन पाने के हकदार थे। फिर भी, उन्हें 50% पेंशन केवल 25.10.2021 से ही दी गई।
न्यायालय ने यह भी दर्ज किया कि अन्य सभी सेवानिवृत्ति लाभ पहले ही याचिकाकर्ता को दिए जा चुके हैं। केवल 01.01.2018 से 23.01.2019 और 24.01.2019 से 24.10.2021 की अवधि की पेंशन अभी तक अवैतनिक थी।
न्यायालय ने यह देखा कि प्रतिवादी संख्या 1 और 2 द्वारा दाखिल प्रति-शपथपत्र में यह विशेष रूप से नहीं बताया गया कि इन अवधियों की पेंशन का भुगतान क्यों नहीं किया गया। 25.10.2021 से पेंशन स्वीकृत होने की बात कहने के अलावा, उससे पूर्व की अवधि के लिए पेंशन न देने का कोई स्पष्टीकरण नहीं दिया गया।
विशेष रूप से, न्यायालय ने दो पृथक समय-खंडों की ओर संकेत किया। प्रथम, 01.01.2018 से 23.01.2019 तक, जब विभागीय कार्यवाही लंबित थी। द्वितीय, 24.01.2019 से 24.10.2021 तक, जब कार्यवाही समाप्त हो चुकी थी और 50% पेंशन स्थायी रूप से रोकने की सजा पहले से ही लागू थी।
पहली अवधि 01.01.2018 से 23.01.2019 के लिए न्यायालय ने नोट किया कि विभागीय कार्यवाही लंबित थी। इसके बावजूद, प्रतिवादियों ने यह नहीं दिखाया कि संपूर्ण अवधि के लिए पेंशन पूरी तरह रोकने का कोई विधिक आधार था।
दूसरी अवधि 24.01.2019 से 24.10.2021 के लिए न्यायालय ने नोट किया कि 24.01.2019 के आदेश के तहत याचिकाकर्ता कम से कम अपनी 50% पेंशन पाने के हकदार थे। इसके बावजूद, अधिकारियों ने 25.10.2021 तक यह घटाई हुई पेंशन भी नहीं दी।
इस प्रकार, न्यायालय ने निष्कर्ष निकाला कि राज्य प्राधिकारियों ने दोनों अवधियों के लिए पेंशन जारी करने में विफलता बरती, जबकि दलीलों में इसके लिए कोई औचित्य नहीं दिखाया गया। न्यायालय ने यह भी पाया कि यह तर्क कि याचिका निरर्थक हो गई है, सही नहीं है, क्योंकि विवादित बकाया अभी भी अवैतनिक थे।
यह दृष्टिकोण अपनाते हुए, न्यायालय ने 50% पेंशन कटौती की वैधता पर विचार नहीं किया, क्योंकि वह मुद्दा पहले से ही C.W.J.C. No.12175 of 2019 में विचाराधीन (sub judice) है। इसके बजाय, न्यायालय ने केवल इस बात पर ध्यान केंद्रित किया कि याचिकाकर्ता को वह भुगतान सुनिश्चित किया जाए जो वर्तमान आदेश के तहत राज्य स्वयं उसकी देयता के रूप में स्वीकार कर रहा है।
अंततः, निर्णय के पैराग्राफ 9 में, पटना उच्च न्यायालय ने स्पष्ट निर्देश के साथ रिट याचिका का निपटारा किया। न्यायालय ने प्रतिवादियों को आदेश दिया कि वे 01.01.2018 से 23.01.2019 और 24.01.2019 से 24.10.2021 की अवधियों के लिए, कानून के तहत याचिकाकर्ता की देयता के अनुसार, उसकी पेंशन का भुगतान करें।
इसका अर्थ यह है कि सरकार को अब उन अवधियों की पेंशन की गणना कर, स्थायी 50% रोक की वर्तमान व्यवस्था के अनुरूप, पेंशन जारी करनी होगी, जब तक कि अलग लंबित रिट याचिका में दंड आदेश बाद में बदला न जाए।
यह निर्णय क्यों महत्वपूर्ण है
यह निर्णय बिहार के सेवानिवृत्त सरकारी कर्मचारियों के लिए महत्वपूर्ण है, जिन्हें विभागीय कार्यवाही के बाद पेंशन भुगतान में देरी का सामना करना पड़ता है।
पटना उच्च न्यायालय ने स्पष्ट कर दिया कि भले ही पेंशन का आंशिक रोका जाना जैसे दंड लगाया गया हो, सरकार कानूनन देय शेष पेंशन के भुगतान को अनिश्चित काल तक टाल नहीं सकती।
न्यायालय ने विशिष्ट पूर्ववर्ती अवधियों की पेंशन न चुकाए जाने को एक जीवित विवाद माना और केवल इस आधार पर कि बाद में कुछ पेंशन देना शुरू कर दिया गया, राज्य के इस तर्क को अस्वीकृत कर दिया कि मामला निरर्थक हो गया है।
सेवानिवृत्त कर्मचारियों के लिए यह निर्णय यह दर्शाता है कि वे पेंशन बकाया का भुगतान न होने पर न्यायालय का दरवाजा खटखा सकते हैं, भले ही मुख्य दंड आदेश अलग से चुनौती के अधीन हो।
कानूनी प्रश्न और उनके उत्तर
- प्रश्न: क्या रिट याचिका इस कारण निरर्थक हो गई थी कि 25.10.2021 से 50% पेंशन स्वीकृत कर दी गई थी और अन्य सेवानिवृत्ति लाभ दे दिए गए थे?
उत्तर: नहीं। न्यायालय ने माना कि याचिका बनी रहती है क्योंकि 01.01.2018 से 23.01.2019 तथा 24.01.2019 से 24.10.2021 की अवधियों की पेंशन अभी तक नहीं दी गई थी। - प्रश्न: क्या प्रतिवादी 24.01.2019 के दंड आदेश से पहले और बाद की अवधियों के लिए, 50% कटौती के अधीन, पेंशन देने के लिए बाध्य थे?
उत्तर: हाँ। न्यायालय ने प्रतिवादियों को निर्देश दिया कि वे उन अवधियों की पेंशन याचिकाकर्ता की विधिक देयता के अनुसार अदा करें।
न्यायालय द्वारा उद्धृत मामले
- निर्णय में किसी अन्य उद्धृत मामले का उल्लेख या उस पर निर्भरता नहीं की गई है।
मामले का विवरण
मामला संख्या: Civil Writ Jurisdiction Case No.14945 of 2021
मामला शीर्षक: Dr. Dharmendra Singh v. The State of Bihar & Ors.
पीठ: माननीय श्री न्यायमूर्ति नानी टागिया
उद्धरण: 2024(2) PLJR 759
अधिवक्ता: याचिकाकर्ता की ओर से: श्री सुनील कुमार, अधिवक्ता; श्री संजीब कुमार संजू, अधिवक्ता; श्री भास्कर संधिल्य, अधिवक्ता। प्रतिवादियों की ओर से: श्री राज किशोर राय, GP-18।
मामले का स्वरूप: सेवानिवृत्ति लाभ और पेंशन बकाया के भुगतान हेतु दिशा-निर्देश की मांग वाली रिट याचिका।
निर्णय का लिंक: https://patnahighcourt.gov.in/viewjudgment/MTUjMTQ5NDUjMjAyMSMxI04=-ta–am1–9Ctb0–am1–R4=
यदि आपको यह विवरण उपयोगी लगा हो और आप बिहार में विधिक विकास आपके अधिकारों को कैसे प्रभावित कर सकते हैं, इस बारे में सूचित रहना चाहते हों, तो आप आगे की जानकारियों के लिए Samvida Law Associates को फॉलो करने पर विचार कर सकते हैं।



